Sri Durga Ashtottara Shatanamavali (Narada Rishi) – श्रीदुर्गाष्टोत्तरशतनामावली

॥ श्रीदुर्गाष्टोत्तरशतनामावली ॥
॥ विनियोगः ॥
अस्यश्री दुर्गाऽष्टोत्तरशतनाम महामन्त्रस्य नारद ऋषिः
गायत्री छन्दः श्री दुर्गा देवता परमेश्वरीति बीजं
कृष्णानुजेति शक्तिः शाङ्करीति कीलकं
दुर्गाप्रसादसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः ॥
॥ ध्यानम् ॥
प्रकाशमध्यस्थितचित्स्वरूपां वराभये सन्दधतीं त्रिनेत्राम् ।
सिन्दूरवर्णामतिकोमलाङ्गीं मायामयीं तत्त्वमयीं नमामि ॥
॥ अथ श्री दुर्गाऽष्टोत्तरशतनामावलिः ॥
ॐ दुर्गायै नमः ।
ॐ दारिद्र्यशमन्यै नमः ।
ॐ दुरितघ्न्यै नमः ।
ॐ लक्ष्म्यै नमः ।
ॐ लज्जायै नमः ।
ॐ महाविद्यायै नमः ।
ॐ श्रद्धायै नमः ।
ॐ पुष्ट्यै नमः ।
ॐ स्वधायै नमः ।
ॐ ध्रुवायै नमः । १०
ॐ महारात्र्यै नमः ।
ॐ महामायायै नमः ।
ॐ मेधायै नमः ।
ॐ मात्रे नमः ।
ॐ सरस्वत्यै नमः ।
ॐ शिवायै नमः ।
ॐ शशिधरायै नमः ।
ॐ शान्तायै नमः ।
ॐ शाम्भव्यै नमः ।
ॐ भूतिदायिन्यै नमः । २०
ॐ तामस्यै नमः ।
ॐ नियतायै नमः ।
ॐ नार्यै नमः ।
ॐ काल्यै नमः ।
ॐ नारायण्यै नमः ।
ॐ कलायै नमः ।
ॐ ब्राह्म्यै नमः ।
ॐ वीणाधरायै नमः ।
ॐ वाण्यै नमः ।
ॐ शारदायै नमः । ३०
ॐ हंसवाहिन्यै नमः ।
ॐ त्रिशूलिन्यै नमः ।
ॐ त्रिनेत्रायै नमः ।
ॐ ईशानायै नमः ।
ॐ त्रय्यै नमः ।
ॐ त्रयतमायै नमः ।
ॐ शुभायै नमः ।
ॐ शङ्खिन्यै नमः ।
ॐ चक्रिण्यै नमः ।
ॐ घोरायै नमः । ४०
ॐ कराल्यै नमः ।
ॐ मालिन्यै नमः ।
ॐ मत्यै नमः ।
ॐ माहेश्वर्यै नमः ।
ॐ महेष्वासायै नमः ।
ॐ महिषघ्न्यै नमः ।
ॐ मधुव्रतायै नमः ।
ॐ मयूरवाहिन्यै नमः ।
ॐ नीलायै नमः ।
ॐ भारत्यै नमः । ५०
ॐ भास्वराम्बरायै नमः ।
ॐ पीताम्बरधरायै नमः ।
ॐ पीतायै नमः ।
ॐ कौमार्यै नमः ।
ॐ पीवरस्तन्यै नमः ।
ॐ रजन्यै नमः ।
ॐ राधिन्यै नमः ।
ॐ रक्तायै नमः ।
ॐ गदिन्यै नमः ।
ॐ घण्टिन्यै नमः । ६०
ॐ प्रभायै नमः ।
ॐ शुम्भघ्न्यै नमः ।
ॐ सुभगायै नमः ।
ॐ सुभ्रुवे नमः ।
ॐ निशुम्भप्राणहारिण्यै नमः ।
ॐ कामाक्ष्यै नमः ।
ॐ कामुकायै नमः ।
ॐ कन्यायै नमः ।
ॐ रक्तबीजनिपातिन्यै नमः ।
ॐ सहस्रवदनायै नमः । ७०
ॐ सन्ध्यायै नमः ।
ॐ साक्षिण्यै नमः ।
ॐ शाङ्कर्यै नमः ।
ॐ द्युतये नमः ।
ॐ भार्गव्यै नमः ।
ॐ वारुण्यै नमः ।
ॐ विद्यायै नमः ।
ॐ धरायै नमः ।
ॐ धरासुरार्चितायै नमः ।
ॐ गायत्र्यै नमः । ८०
ॐ गायक्यै नमः ।
ॐ गङ्गायै नमः ।
ॐ दुर्गायै नमः ।
ॐ गीतघनस्वनायै नमः ।
ॐ छन्दोमयायै नमः ।
ॐ मह्यै नमः ।
ॐ छायायै नमः ।
ॐ चार्वाङ्ग्यै नमः ।
ॐ चन्दनप्रियायै नमः ।
ॐ जनन्यै नमः । ९०
ॐ जाह्नव्यै नमः ।
ॐ जातायै नमः ।
ॐ शाङ्कर्यै नमः ।
ॐ हतराक्षस्यै नमः ।
ॐ वल्लर्यै नमः ।
ॐ वल्लभायै नमः ।
ॐ वल्ल्यै नमः ।
ॐ वल्ल्यलङ्कृतमध्यमायै नमः ।
ॐ हरीतक्यै नमः ।
ॐ हयारूढायै नमः । १००
ॐ भूत्यै नमः ।
ॐ हरिहरप्रियायै नमः ।
ॐ वज्रहस्तायै नमः ।
ॐ वरारोहायै नमः ।
ॐ सर्वसिद्ध्यै नमः ।
ॐ वरप्रदायै नमः ।
ॐ सिन्दूरवर्णायै नमः ।
ॐ श्रीदुर्गादेव्यै नमः । १०८
॥ इति श्रीदुर्गाष्टोत्तरशतनामावलिः समाप्ता ॥
संलिखित ग्रंथ (Related Content)
श्रीदुर्गाष्टोत्तरशतनामावली (नारद ऋषि): तात्विक परिचय एवं रहस्य (Introduction & Mystical Secrets)
सनातन धर्म में माँ भगवती दुर्गा की अनेक सहस्रनामावलियां और अष्टोत्तरशतनामावलियां (108 नाम) उपलब्ध हैं, परंतु देवर्षि नारद द्वारा दृष्ट यह नामावली अपने आप में अत्यंत विशिष्ट और शक्तिशाली है। देवर्षि नारद भगवान विष्णु के परम भक्त होने के साथ-साथ शक्ति की भी परम उपासना करते थे। यह नामावली उसी परम भक्ति और ज्ञान का परिणाम है। इस महामंत्र के ऋषि नारद हैं, गायत्री छन्द है, 'परमेश्वरी' बीज है, 'कृष्णानुजा' (भगवान कृष्ण की बहन अर्थात् योगमाया) शक्ति है और 'शाङ्करी' इसका कीलक है।
ध्यान श्लोक का अद्वैत रहस्य: इस स्तोत्र का ध्यान श्लोक शाक्त दर्शन के सर्वोच्च वेदांत को प्रस्तुत करता है—"प्रकाशमध्यस्थितचित्स्वरूपां..."। इसका अर्थ है कि देवी उस परम प्रकाश (परमात्मा) के मध्य में स्थित साक्षात् 'चित्-शक्ति' (Pure Consciousness) हैं। वे वराभये (वरदान और अभय) मुद्रा धारण किए हुए हैं, उनके तीन नेत्र हैं। "सिन्दूरवर्णामतिकोमलाङ्गीं" — उनकी आभा सिंदूर के समान लाल और अति कोमल अंगों वाली है। वे ही मायामयी (सृष्टि रचने वाली) और तत्त्वमयी (परम सत्य) हैं। यह ध्यान देवी को केवल एक रूप में नहीं, बल्कि सम्पूर्ण ब्रह्मांड की मूल चेतना के रूप में स्थापित करता है।
ज्ञान और शक्ति का अद्भुत समन्वय: इस नामावली में देवी के रणचंडी और विद्यादायिनी दोनों रूपों का एकीकरण है। एक ओर वे 'सरस्वत्यै', 'मेधायै', 'वाण्यै' और 'हंसवाहिन्यै' हैं, जो ज्ञान, मेधा और कला की सर्वोच्च अधिष्ठात्री हैं। दूसरी ओर, वे 'महिषघ्न्यै' (महिषासुर को मारने वाली), 'शुम्भघ्न्यै', 'निशुम्भप्राणहारिण्यै' और 'रक्तबीजनिपातिन्यै' हैं, जो घोर युद्ध में दानवों का संहार कर धर्म की रक्षा करती हैं।
नामावली का विशिष्ट महत्व और तांत्रिक बीज (Significance of the 108 Names)
नारद ऋषि कृत यह नामावली इसलिए भी विशेष है क्योंकि इसके आरम्भिक नामों में ही जीवन की सबसे बड़ी समस्या (दरिद्रता और पाप) के निवारण का अमोघ उपाय दिया गया है।
- दरिद्रता और पापों का समूल नाश: नामावली का दूसरा ही नाम 'दारिद्र्यशमन्यै नमः' (दरिद्रता का शमन/नाश करने वाली) है, और तीसरा नाम 'दुरितघ्न्यै नमः' (समस्त पापों और दुखों को हरने वाली) है। जो साधक भयंकर आर्थिक संकट में फंसा हो, उसके लिए यह नामावली कल्पवृक्ष के समान है।
- त्रिगुणात्मक स्वरूप: देवी को 'त्रय्यै' (तीनों वेद), 'त्रयतमायै' और 'तामस्यै' कहा गया है। यह दर्शाता है कि सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण—ये तीनों उसी महामाया के ही स्वरूप हैं। वे ही सृष्टि, स्थिति और प्रलय का कारण हैं।
- ब्रह्मांडीय नाद और संगीत: नारद जी स्वयं संगीत के महान विद्वान हैं, इसलिए उन्होंने इस स्तोत्र में देवी को 'वीणाधरायै', 'गीतघनस्वनायै' (गीत और संगीत के घने स्वरों वाली) और 'छन्दोमयायै' (वेदों के छन्दों से युक्त) कहकर पुकारा है। कला और संगीत के साधकों के लिए यह अत्यंत फलदायी है।
- प्रकृति और वनस्पति का रक्षण: देवी को 'वल्लर्यै' (लता), 'वल्ल्यै' और 'हरीतक्यै' (हरड़/औषधि रूप) कहा गया है। वे संपूर्ण वनस्पतियों और औषधियों में निवास करने वाली प्राण शक्ति हैं, जो रोगों को दूर कर आरोग्य प्रदान करती हैं।
फलश्रुति: पाठ से प्राप्त होने वाले सिद्ध लाभ (Benefits of Recitation)
इस शक्तिशाली अष्टोत्तरशतनामावली का पूर्ण निष्ठा के साथ पाठ करने से साधक को जीवन के सभी आयामों में अप्रत्याशित सफलता और कृपा प्राप्त होती है:
- घोर दरिद्रता से मुक्ति: 'दारिद्र्यशमन्यै' और 'लक्ष्म्यै' नामों के प्रभाव से जीवन में छाई हुई घोर दरिद्रता, कर्ज और आर्थिक विफलता जड़ से समाप्त हो जाती है। घर में अखंड श्री (धन) का वास होता है।
- शत्रु और बाधाओं पर विजय: जो व्यक्ति गुप्त शत्रुओं, षड्यंत्रों या कोर्ट-कचहरी के मामलों से परेशान हो, उसे 'हतराक्षस्यै', 'महिषघ्न्यै' और 'रक्तबीजनिपातिन्यै' नामों के जप से शत्रुओं पर निश्चित विजय प्राप्त होती है।
- असीम ज्ञान और मेधा की प्राप्ति: विद्यार्थियों और ज्ञान पिपासुओं के लिए यह नामावली अत्यंत लाभप्रद है। 'सरस्वत्यै', 'मेधायै', और 'विद्यायै' नामों के उच्चारण से स्मरण शक्ति और कुशाग्र बुद्धि का विकास होता है।
- सर्वसिद्धि और मनोकामना पूर्ति: 105वाँ नाम 'सर्वसिद्ध्यै नमः' और 106वाँ 'वरप्रदायै नमः' स्पष्ट करता है कि माता दुर्गा अपने भक्तों की हर सात्विक इच्छा को पूर्ण कर उन्हें सभी कार्यों में सिद्धि प्रदान करती हैं।
- आरोग्य और तेज की प्राप्ति: 'पुष्ट्यै', 'प्रभायै', और 'द्युतये' नामों के नित्य जप से शारीरिक बीमारियां दूर होती हैं और साधक के चेहरे पर एक अलौकिक तेज (Aura) आ जाता है।
- मानसिक शांति और भयमुक्ति: 'शान्तायै' और 'नारायण्यै' नामों के प्रभाव से मन में उठने वाले व्यर्थ के विचार, डिप्रेशन (अवसाद) और हर प्रकार का अनजाना भय शांत हो जाता है।
पाठ विधि एवं अनुष्ठान के नियम (Ritual Method & Guidelines)
इस नामावली का पाठ अत्यधिक सरल है परंतु इसके नियम अत्यंत पवित्र और सात्विक हैं। इसका नित्य पाठ जीवन में एक अभेद्य सुरक्षा चक्र का निर्माण करता है।
दैनिक अर्चन विधि:
प्रातः स्नानादि के पश्चात लाल या पीले आसन पर बैठें। माँ दुर्गा का चित्र या यंत्र स्थापित करें। सबसे पहले विनियोग हेतु जल छोड़ें। ध्यान श्लोक (प्रकाशमध्यस्थितचित्स्वरूपां...) पढ़ें और माता के उस सिंदूरी आभा वाले रूप का मानसिक ध्यान करें। तत्पश्चात 108 नामों का 'ॐ' और 'नमः' के साथ उच्चारण करें।
सिंदूर और पुष्प अर्पण:
चूँकि ध्यान श्लोक और नामावली (सिन्दूरवर्णायै नमः) में देवी को सिंदूर के वर्ण वाला बताया गया है, इसलिए प्रत्येक नाम के उच्चारण के साथ सिंदूर (कुमकुम) या लाल पुष्प (गुड़हल/गुलाब) देवी को अर्पित करना सर्वोत्तम माना गया है।
विशिष्ट अनुष्ठान के अवसर:
नवरात्रि (चैत्र एवं शारदीय), प्रति माह की अष्टमी और नवमी तिथि, तथा शुक्रवार के दिन इस नामावली का पाठ और हवन अत्यंत फलदायी होता है। जो व्यक्ति कर्ज मुक्ति के लिए प्रयास कर रहा हो, उसे शुक्रवार के दिन माता को लाल चुनरी और सिंदूर अर्पित कर इस नामावली का 11 बार पाठ करना चाहिए।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. इस श्रीदुर्गाष्टोत्तरशतनामावली के द्रष्टा ऋषि कौन हैं?
इस शक्तिशाली 108 नामों की नामावली के द्रष्टा देवर्षि नारद हैं। यह उनकी गहन तपस्या और माता भगवती के प्रति असीम भक्ति का परिणाम है।
2. ध्यान श्लोक (प्रकाशमध्यस्थितचित्स्वरूपां) का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है कि देवी उस परम प्रकाश (परमात्मा) के मध्य में स्थित साक्षात् 'चित्-शक्ति' (Pure Consciousness) हैं। वे ही मायामयी (सृष्टि रचने वाली) और तत्त्वमयी (परम सत्य) हैं।
3. इस नामावली के बीज, शक्ति और कीलक क्या हैं?
विनियोग के अनुसार इस महामंत्र का बीज 'परमेश्वरी' है, शक्ति 'कृष्णानुजा' (श्री कृष्ण की बहन/योगमाया) है और कीलक 'शाङ्करी' है।
4. 'दारिद्र्यशमन्यै' और 'दुरितघ्न्यै' का क्या अर्थ है?
दारिद्र्यशमन्यै का अर्थ है घोर दरिद्रता और गरीबी का समूल नाश करने वाली, और दुरितघ्न्यै का अर्थ है सभी पापों, दुखों और संकटों को हरने वाली माता।
5. देवी को 'सिन्दूरवर्णामतिकोमलाङ्गीं' क्यों कहा गया है?
सिंदूर सुहाग, सौभाग्य, तेज और उग्र शक्ति का प्रतीक है। देवी की आभा सिंदूर के समान लाल है, जो शत्रुओं के लिए उग्र है, परंतु उनके अंग अति कोमल हैं, जो भक्तों के लिए उनकी अपार करुणा को दर्शाते हैं।
6. इस स्तोत्र में किन-किन असुरों के वध का उल्लेख है?
इस नामावली में महिषासुर (महिषघ्न्यै), शुम्भ (शुम्भघ्न्यै), निशुम्भ (निशुम्भप्राणहारिण्यै), और रक्तबीज (रक्तबीजनिपातिन्यै) जैसे महाभयंकर असुरों के वध का उल्लेख है।
7. क्या संगीत और कला से जुड़े लोग इसका पाठ कर सकते हैं?
अवश्य। चूँकि यह नारद जी द्वारा रचित है, इसमें देवी को 'वीणाधरायै', 'गीतघनस्वनायै', और 'सरस्वत्यै' कहा गया है। यह कला और ज्ञान के साधकों के लिए मेधा प्रदायक है।
8. 'हतराक्षस्यै' का क्या अर्थ है?
हतराक्षस्यै का अर्थ है—जिन्होंने राक्षसों (असुरों) का हनन (वध) किया है। यह नाम नकारात्मक शक्तियों और बुरे विचारों के नाश का भी प्रतीक है।
9. पाठ करते समय कौन सी वस्तु अर्पित करना सबसे उत्तम है?
ध्यान श्लोक और नामावली (सिन्दूरवर्णायै नमः) के अनुसार देवी को सिंदूर (कुमकुम) और लाल गुड़हल या गुलाब के फूल अर्पित करना सबसे उत्तम और शीघ्र फलदायी है।
10. क्या यह नामावली अन्य दुर्गा अष्टोत्तरशतनामावलियों से अलग है?
हाँ, सनातन धर्म में अनेक अष्टोत्तरशतनामावलियाँ हैं (जैसे शिव रहस्य या स्कन्द पुराण से)। यह नामावली विशेष रूप से देवर्षि नारद द्वारा दृष्ट है, जिसमें दरिद्रता नाश और ज्ञान (सरस्वती) दोनों का अद्भुत समन्वय है।