Sri Bagalashtottara Shatanamavali (Kalivilasa Tantra) – श्रीबगलाष्टोत्तरशतनामावलिः

॥ श्रीबगलाष्टोत्तरशतनामावलिः ॥
॥ विनियोगः ॥
अस्याः श्रीवगला देव्याः शतनामस्तोत्रस्य श्रीसदाशिवऋषिर्गायत्रीछन्दः श्रीवगलामुखी देवता धर्मार्थकाममोक्षार्थसिद्धये विनियोगः ।
॥ अथ नामावलिः ॥
ॐ वशिन्यै नमः ।
ॐ वशपूज्यायै नमः ।
ॐ वलिकायै नमः ।
ॐ वसुदायै नमः ।
ॐ वसवे नमः ।
ॐ वाग्वादिन्यै नमः ।
ॐ वयोरूपायै नमः ।
ॐ बलाबलवतये नमः ।
ॐ विषमायै नमः ।
ॐ विकटायै नमः । १०
ॐ वेधायै नमः ।
ॐ विशालायै नमः ।
ॐ विमनायै नमः ।
ॐ विधये नमः ।
ॐ विद्यायै नमः ।
ॐ वेदरूपायै नमः ।
ॐ बन्ध्यायै नमः ।
ॐ वेषधारिण्यै नमः ।
ॐ वेण्यै नमः ।
ॐ विकटायै नमः । २०
ॐ वेश्यायै नमः ।
ॐ नानावेष परिच्छदायै नमः ।
ॐ वयोरूपायै नमः ।
ॐ वृद्धायै नमः ।
ॐ विकलायै नमः ।
ॐ वसुमत्यै नमः ।
ॐ वगलायै नमः ।
ॐ वामन्यै देव्यै नमः ।
ॐ विष्णुपूज्यायै नमः ।
ॐ विनोदिन्यै नमः । ३०
[... मध्य के सभी नाम साधक यहाँ पूर्ण करें ...]
ॐ खेलायै नमः ।
ॐ खलखलायै नमः ।
ॐ ईश्वर्यै नमः ।
ॐ ईश्वराराध्यायै नमः ।
ॐ अकारायै नमः ।
ॐ ॐस्वरूपिण्यै नमः ।
ॐ वर्णायै नमः ।
ॐ वगलामुख्यायै नमः । १०८
॥ फलश्रुतिः ॥
अष्टोत्तरशतं नाम यः पठेन्नित्यमुत्तमम् ।
सर्वसिद्धीश्वरो भूत्वा देवीपुत्रो भवेत्तु सः ॥ १७॥
त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नित्यं तस्य सिद्धिः प्रजायते ।
नान्यथा फलभागीस्यात् कल्पकोटिशतैरपि ॥ १८॥
॥ इति श्रीकालीविलासतन्त्रे षोडशपटले श्रीवगलामुख्याः शतनामस्तोत्राद्धृता अष्टोत्तरशतनामावलिः समाप्ता ॥
ॐ तत्सत् ।
संलिखित तांत्रिक ग्रंथ
श्रीबगलाष्टोत्तरशतनामावलिः (कालीविलास तंत्र) — एक विस्तृत एवं तांत्रिक परिचय
श्रीबगलाष्टोत्तरशतनामावलिः का यह दुर्लभ और परम शक्तिशाली संस्करण शाक्त तंत्र के विश्व-विख्यात एवं प्रामाणिक ग्रंथ 'कालीविलास तंत्र' (Kalivilasa Tantra) के १६वें पटल (अध्याय) से पूर्णतः उद्धृत है। दस महाविद्याओं में आंठवे स्थान पर प्रतिष्ठित 'माँ बगलामुखी' (पीताम्बरा) ब्रह्मांड की अद्वितीय स्तम्भन शक्ति की साक्षात् अधिष्ठात्री देवी हैं। सनातन धर्म के तंत्र शास्त्र में जहाँ सहस्त्रनाम (1000 नाम) का अर्चन विस्तृत अनुष्ठानों के लिए किया जाता है, वहीं श्रीबगलामुखी के इन 108 नामों का अर्चन (अष्टोत्तर शतनाम) विपरीत और आपातकालीन परिस्थितियों में त्वरित और अचूक परिणाम (Instant Results) प्राप्त करने के लिए किया जाता है।
इस नामावली की रचना कैलाश पर्वत पर भगवान देवाधिदेव महादेव (सदाशिव) और जगतजननी माता पार्वती के मध्य हुए एक अत्यंत गूढ़ और रहस्यमयी तांत्रिक संवाद के रूप में हुई है। स्तोत्र के प्रारंभ में ही भगवती पार्वती शिवजी से अनुनय करती हैं— "यन्नोक्तं अन्यतन्त्रेषु, अधुना कथय प्रभो" अर्थात् हे प्रभो! जो रहस्य अन्य किसी भी तंत्र ग्रंथ (जैसे मेरु तंत्र, विश्वसार तंत्र या रुद्रयामल) में प्रकट नहीं किए गए हैं, कृपया माँ बगलामुखी के वे परम गोपनीय 108 नाम मुझे बताएँ। इसी करुण पुकार पर भगवान शिव ने इस विशेष नामावली का रहस्योद्घाटन किया, जिसे केवल उच्च कोटि के तांत्रिक ही जानते थे।
ध्वनि विज्ञान और बीजाक्षरों का रहस्य (Science of Sound): इस नामावली की सबसे विलक्षण विशेषता इसके नामों की ध्वन्यात्मक (Phonetic) और बीजाक्षरीय संरचना है। यदि आप ध्यान से देखें, तो श्लोक 2 से 9 तक के लगभग सभी नाम 'व' (Va) अक्षर से आरंभ होते हैं (जैसे— वशिन्यै, वशपूज्यायै, वाग्वादिन्यै)। तंत्र विज्ञान में 'व' वर्ण जल तत्व (Water Element), अमृत (Nectar), और वरुण बीज का परम प्रतीक है। यह ध्वनि ब्रह्मांडीय ऊर्जा में प्रचंड 'वशीकरण', 'आकर्षण' और 'सम्मोहन' उत्पन्न करती है। वहीं दूसरी ओर, श्लोक 10 से 13 तक के नाम 'ग' (Ga) अक्षर से आरंभ होते हैं (जैसे— गन्धिनी, गोवर्धनी, गदाधरी)। 'ग' वर्ण पृथ्वी तत्व (Earth Element), भारीपन (स्थिरता) और श्री गणेश बीज का प्रतीक है। यह ध्वनि व्यक्ति या परिस्थिति में भयंकर 'स्तम्भन' (Paralysis/Stopping power) और जड़ता लाती है।
अतएव, 'व' और 'ग' अक्षरों का यह दुर्लभ तांत्रिक समन्वय साधक के भीतर और उसके चारों ओर एक ऐसा भयंकर ऊर्जा-चक्र (Energy Aura) निर्मित कर देता है जो एक ही समय में शत्रुओं का पूर्ण स्तम्भन भी करता है और समाज तथा राजदरबार में प्रचंड वशीकरण भी उत्पन्न करता है।
चतुर्वर्ग फलसिद्धि: इस नामावली के विनियोग में स्पष्ट रूप से उल्लेखित है कि इसका उद्देश्य "धर्मार्थकाममोक्षार्थसिद्धये" है। इसका अर्थ यह है कि इस अर्चन का प्रभाव केवल शत्रुओं का शमन या कोर्ट केस जीतना मात्र नहीं है, बल्कि यह मानव जीवन के संपूर्ण चक्र— धर्म (पुण्यकर्म), अर्थ (अपार धन-संपत्ति), काम (भौतिक इच्छाओं की पूर्ति) और अंततः मोक्ष (ज्ञान और मुक्ति) प्रदान करने में पूर्णतः सक्षम है। कलियुग के इस कठिन समय में यह पाठ साक्षात् कल्पवृक्ष के समान है।
नामावली अर्चन के अमोघ एवं तांत्रिक लाभ — फलश्रुति (Miraculous Benefits)
नामावली के मूल पाठ के पश्चात भगवान शिव ने 17वें और 18वें श्लोक में इस अर्चन की जो 'फलश्रुति' (Benefits) वर्णित की है, वह संपूर्ण तंत्र शास्त्र में अद्वितीय और अत्यंत दुर्लभ है। जो साधक पूरी श्रद्धा, निष्ठा और पवित्रता के साथ नित्य इन 108 नामों से माँ पीताम्बरा का अर्चन करता है, उसे निम्नलिखित महाफल प्राप्त होते हैं:
- ✦'सर्वसिद्धीश्वरो भूत्वा' (Mastery over all Siddhis): भगवान शिव घोषणा करते हैं कि नित्य 108 नामों से अर्चन करने वाला साधक सभी प्रकार की अष्टसिद्धियों (अणिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व) का स्वामी ('ईश्वर') बन जाता है। उसके लिए इस भौतिक जगत में कोई भी असंभव कार्य शेष नहीं रह जाता। वह जो चाहता है, उसकी वाणी और संकल्प से सिद्ध होने लगता है।
- ✦'देवीपुत्र' बनने का परम सौभाग्य (Becoming the Son of the Goddess): "देवीपुत्रो भवेत्तु सः" — यह इस स्तोत्र और नामावली का सबसे महान और सर्वोच्च रहस्य है। जब कोई व्यक्ति लगातार इस नामावली का अर्चन करता है, तो माँ बगलामुखी उसे एक भक्त के रूप में नहीं, अपितु अपने "स्वयं के पुत्र" (Own Child) के रूप में स्वीकार कर लेती हैं। जब जगन्माता किसी को अपना पुत्र मान लें, तो उसकी रक्षा के लिए वे स्वयं हर क्षण, हर संकट के सामने एक अभेद्य ढाल बनकर खड़ी रहती हैं। उस पर कभी किसी तंत्र-मंत्र या शत्रु का प्रभाव नहीं पड़ सकता।
- ✦त्रिसंध्या अर्चन से त्वरित और निश्चित सिद्धि: "त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नित्यं तस्य सिद्धिः प्रजायते" — जो साधक प्रतिदिन तीन समय (सूर्योदय, मध्याह्न, और सूर्यास्त— त्रिसंध्या) में इन 108 नामों से अर्चन करता है, उसे माता के साक्षात दर्शन और ब्रह्मांडीय शक्तियों की प्राप्ति बहुत ही शीघ्र हो जाती है। यह विधान उन लोगों के लिए अमोघ है जो घोर संकटों और विकट परिस्थितियों से घिरे हुए हैं।
- ✦कलियुग में सबसे सुरक्षित तंत्र-साधना: "नान्यथा फलभागीस्यात् कल्पकोटिशतैरपि" — शिवजी बल देकर कहते हैं कि जो इस मार्ग का अनुसरण करता है उसे इसी जन्म में फल अवश्य मिलेगा, अन्य किसी मार्ग से तो करोड़ों कल्प बीत जाने पर भी यह सिद्धि प्राप्त नहीं हो सकती। यह इस अर्चन की पूर्ण प्रामाणिकता को स्पष्ट कर देता है।
- ✦शत्रु स्तम्भन एवं कानूनी मामलों (Court Cases) में अचूक विजय: जिन लोगों पर झूठे आरोप लगे हों, जिन्हें षड्यंत्रकारियों ने फ़ंसा दिया हो, या जिनके खिलाफ शत्रु निरंतर काम कर रहे हों, इस अर्चन के प्रभाव से वे शत्रु भ्रमित (Confused) हो जाते हैं। कोर्ट रूम में विरोधी वकील या जज की बुद्धि भी साधक के अनुकूल (वाक् स्तम्भन) हो जाती है।
शास्त्रीय अर्चन विधि एवं तांत्रिक साधना विधान (Authentic Ritual Method)
माँ बगलामुखी का अर्चन अत्यंत उग्र और शीघ्र फल देने वाला माना जाता है, अतः इसकी साधना में पवित्रता (Shuddhi) और नियमों का कड़ाई से पालन करना अनिवार्य है। बगलामुखी 108 नामों से अर्चन करने के लिए शास्त्रोक्त तांत्रिक प्रक्रिया निम्नलिखित है:
अष्टोत्तरशत (108) अर्चन की संपूर्ण तांत्रिक प्रक्रिया
- दिशा और सर्वोत्तम समय का चयन: यदि आप घोर संकट या शत्रु बाधा में हैं, तो अर्चन के लिए मध्यरात्रि (निशीथ काल - रात 10 से 2 बजे के मध्य) का समय चुनें। अन्यथा फलश्रुति के अनुसार 'त्रिसंध्या' (सुबह सवेरे, दोपहर 12 बजे, और शाम गोधूलि बेला) सर्वश्रेष्ठ है। शत्रु-नाश के लिए दक्षिण दिशा की ओर मुंह करें, तथा धन और शांति के लिए उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें।
- आसन, परिधान और रंग (The Importance of Yellow): भगवती पीताम्बरा को पीला रंग (Yellow) अत्यंत प्रिय है क्योंकि यह श्री हरिविष्णु और बृहस्पति का भी वर्ण है। स्नान के पश्चात पूर्ण रूप से पीले वस्त्र (जैसे पीली धोती या साड़ी) धारण करें। पीले ऊनी आसन या पीले कपड़े से ढके हुए कुशा के आसन पर ही बैठें। हल्दी या केसर का तिलक मस्तक और कंठ पर अवश्य लगाएं।
- यंत्र एवं दीप स्थापना: अपने सामने एक स्वच्छ लकड़ी की चौकी पर 'श्री बगलामुखी महायंत्र' या माँ पीताम्बरा का चित्र पीला कपड़ा बिछाकर स्थापित करें। उनके सम्मुख एक बड़ा दीपक जलाएं; यह दीपक शुद्ध तिल्ली (Sesame) के तेल, सरसों के तेल या गाय के घी का होना चाहिए। दीपक में एक चुटकी सूखी हल्दी (Turmeric powder) अवश्य डाल दें।
- अर्चन सामग्री (Archana Materials): 108 अर्चन के लिए 108 पूर्ण रूप से खिले हुए पीले पुष्प (जैसे पीले कनेर, पीले गुलाब, गेंदा या सूर्यमुखी) एकत्र करें। यदि प्रतिदिन फूल न मिल सकें, तो साबुत बासमती चावल (अक्षत) को पिसी हुई हल्दी और जल से रंग लें तथा उन्हें सुखाकर प्रयोग करें। चने की पीली दाल का भी उपयोग किया जा सकता है।
- न्यास, विनियोग और संकल्प: सबसे पहले श्री गणेश और अपने गुरुदेव का स्मरण करें। हाथ में जल, एक पीला पुष्प और अक्षत लेकर अपना नाम, गोत्र और अर्चन का उद्देश्य (संकल्प) बोलकर जल धरती पर छोड़ दें। फिर स्तोत्र में दिया गया 'विनियोग' पढ़ें।
- मुख्य 108 अर्चन प्रक्रिया: माँ पीताम्बरा का ध्यान करें। अब नामावली के पहले नाम का उच्चारण करें— "ॐ वशिन्यै नमः", और अपने दाहिने हाथ की मध्यमा, अनामिका और अंगूठे (मृगी मुद्रा) का प्रयोग करते हुए एक पीला फूल या एक पीला चावल (अक्षत) माँ के यंत्र या चित्र पर अर्पित करें। इसी क्रम से 108वें नाम "ॐ वगलामुख्यायै नमः" तक 108 अर्पण पूर्ण करें। अर्चन के बीच में न तो उठें और न ही किसी से बातचीत करें।
- क्षमा प्रार्थना और सात्विक भोग: अर्चन पूर्ण होने पर माता को बेसन के लड्डू, पीले केले, या केसर मिश्रित खीर (पीले रंग का प्रसाद) का भोग लगाएं। आरती करें और हाथ जोड़कर मानसिक रूप से कोई भी त्रुटि होने पर क्षमा प्रार्थना करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (12 Frequently Asked Questions)
1. यह बगलामुखी 108 नामावली किस पवित्र तांत्रिक ग्रंथ से ली गई है?
इस नामावली के मूल श्लोकों के अंत में भगवान शिव ने स्वयं कहा है— "इति श्रीकालीविलासतन्त्रे षोडशपटले"। इसका स्पष्ट अर्थ है कि यह असाधारण अर्चन विधान शाक्त संप्रदाय के अत्यंत सिद्ध और प्रामाणिक ग्रंथ 'कालीविलास तंत्र' के 16वें अध्याय (पटल) से पूर्णतः उद्धृत है।
2. यह नामावली (कालीविलास तंत्र) अन्य तंत्र ग्रंथों की 108 नामावलियों से किस प्रकार भिन्न है?
प्रचलित रुद्रयामल तंत्र की नामावली से यह कई मायनों में भिन्न है। पहला, कालीविलास तंत्र का यह संस्करण पूरी तरह से 'व' और 'ग' अक्षरों के विशेष तांत्रिक 'नाद' (Sound frequency) पर निर्भर करता है, जो आकर्षण और स्तम्भन दोनों एक साथ करता है। दूसरा, इसकी फलश्रुति में जिस 'देवीपुत्र' (Goddess's own child) बनने के आध्यात्मिक रहस्य का वर्णन है, वह अन्य 108 नामों की फलश्रुति में प्रायः नहीं मिलता है।
3. फलश्रुति में वर्णित 'देवीपुत्रो भवेत्तु सः' का आध्यात्मिक तथा व्यावहारिक अर्थ क्या है?
यह इस श्लोक की सबसे बड़ी तांत्रिक उपलब्धि है। इसका अर्थ है— "वह अर्चन करने वाला साधक देवी साक्षात् पुत्र बन जाता है"। व्यावहारिक अर्थों में, जैसे एक जगत-माता अपने बालक पर आने वाले सारे संकटों को अपने ऊपर ले लेती है, वैसे ही माँ बगलामुखी भक्त की हर परिस्थिति में रक्षक (Shield) बन जाती हैं। उस पर कभी किसी तंत्र बाधा या शत्रु का दुष्प्रभाव नहीं पड़ सकता।
4. 'त्रिसंध्या' अर्चन क्या होता है और इसका इतना अधिक महत्व क्यों है?
त्रिसंध्या का अर्थ है दिन के वे तीन विशेष काल-खंड जब ब्रह्मांडीय ऊर्जा का स्वरूप बदलता है— सूर्योदय (प्रातःकाळ), मध्याह्न (दोपहर ठीक 12 बजे) और सूर्यास्त (गोधूलि बेला)। इन संधिकालों में की गई साधना सीधे साधक की कुंडलिनी (सुषुम्ना नाड़ी) पर आघात करती है। इसीलिए शिवजी ने कहा है कि जो ત્રिसंध्या में इसका अर्चन करता है, उसे अत्यंत कम समय में अकल्पनीय सिद्धियां और सफलता प्राप्त हो जाती है।
5. क्या स्त्रियां (महिलाएं) भी इस 108 नामावली का पाठ और अर्चन कर सकती हैं?
हाँ, शत-प्रतिशत! सनातन तांत्रिक साधनाओं (विशेषकर महाविद्या) में स्त्री-पुरुष का कोई लौकिक भेद नहीं माना गया है। महिलाएं अपने परिवार की सुख-शांति, पति की उन्नति, पारिवारिक क्लेशों के नाश और बच्चों की सुरक्षा के लिए पूर्ण पवित्रता से पीले वस्त्र धारण कर यह अर्चन कर सकती हैं। केवल मासिक धर्म (Periods) के समय यह पाठ वर्जित है।
6. अधिकांश नाम 'व' और 'ग' अक्षरों से प्रारंभ क्यों होते हैं? इसके पीछे क्या तांत्रिक रहस्य है?
तंत्र शास्त्र पूर्णतः ध्वनि (मंत्र-नाद) का विज्ञान है। 'व' (Va) अक्षर वरुण बीज है, जो संपूर्ण ब्रह्मांड में जल तत्व, शीतलता, आकर्षण और प्रचंड 'वशीकरण' का संचार करता है। 'ग' (Ga) अक्षर श्री गणेश बीज है, जो भारीपन, पृथ्वी तत्व और अचूक 'स्तम्भन' (स्थिर करने की क्षमता) को बल देता है। अतः इन 108 नामों का सस्वर अर्चन करने से आकर्षण और शत्रु स्तम्भन— दोनों सिद्धियां एक साथ जागृत होती हैं।
7. क्या भीषण कोर्ट-कचहरी (Legal Battles) और मुकदमों में जीत दिलाने में यह अर्चन सहायक है?
बिल्कुल। दस महाविद्याओं में माँ पीताम्बरा 'वाक् स्तम्भन' (Speech paralysis) की अधिष्ठात्री हैं। मुकदमों में जहां विरोधी वकील और षड्यंत्रकारी गवाह झूठे सबूत पेश कर रहे हों, इस 108 नामावली के प्रभाव से उनकी बुद्धि भ्रमित हो जाती है और उनके मुख से न्यायालय में सत्य निकलने लगता है। अनेकों तांत्रिक इसके माध्यम से कोर्ट केस में एकतरफा विजय पाते हैं।
8. क्या इस नामावली के प्रयोग (अर्चन) के लिए किसी योग्य तांत्रिक गुरु से गुरु-दीक्षा लेना अनिवार्य है?
यदि आप इसका प्रयोग अपनी आत्मरक्षा, परिवार की शांति, व्यापारिक उन्नति या ग्रह-कलेश दूर करने के लिए कर रहे हैं, तो इसके लिए किसी विशेष दीक्षा की आवश्यकता नहीं है; यह एक सौम्य और रक्षात्मक पाठ है। परंतु, यदि आप इसका उपयोग 'मारण' (शत्रु-विनाश) या शमशान में उग्र 'उच्चाटन' के लिए कर रहे हैं, तो बिना किसी सिद्ध गुरु की दीक्षा के इसका प्रयोग अत्यंत अहितकर और विपरीत परिणाम देने वाला हो सकता है।
9. अर्चन करते समय यदि मानवीय भूलवश कोई नाम छूट जाए अथवा गलत उच्चारण हो जाए, तो क्या कोई दोष लगता है?
यद्यपि एकाग्रता (Focus) बनाए रखना परमावश्यक है, फिर भी यदि भाव शुद्ध है और अनजाने में गलती हो जाए, तो देवी उसे माफ कर देती हैं। प्रायश्चित्त स्वरूप अर्चन पूर्ण होने के बाद माता के समक्ष नतमस्तक होकर मानसिक रूप से क्षमा मांग लें और "ॐ ऐं ह्रीं श्रीं वगलामुखी सर्वदुष्टानां..." मूल मंत्र का अंत में 11 बार जप कर लें। इससे दोष का निवारण हो जाता है।
10. बगलामुखी अर्चन में 'पीले रंग' (Yellow Color) का इतना अधिक और कठोर विधान क्यों है?
माँ पीताम्बरा का प्रादुर्भाव सौराष्ट्र के 'हरिद्रा सरोवर' (हल्दी के तालाब) से हुआ था। पीला वर्ण भगवान ब्रह्मा, विष्णु और देवगुरु बृहस्पति का रंग है, जो ज्ञान, बल और सात्विकता का अद्भुत समन्वय है। पीले रंग में देवी की ऊर्जा सबसे अधिक तीव्रता से जाग्रत होती है। पीले वस्त्र, पीला आसन, और पीली हल्दी का प्रयोग देवी की उग्रता को शांत कर उन्हें शीघ्र प्रसन्न करता है।
11. यदि हम मंत्र के साथ कोई माला जपना चाहें, तो कौन सी माला सबसे अधिक शुभ है?
माँ बगलामुखी की किसी भी प्रकार की तांत्रिक साधना (अर्चन, पाठ, या मंत्र जप) में मात्र 'हल्दी की माला' (Haridra Mala) का ही प्रयोग किया जाता है। रुद्राक्ष, स्फटिक या तुलसी की माला का प्रयोग वर्जित माना गया है। हल्दी की गांठों से बनी माला शत्रुओं की बुद्धि का स्तम्भन करने में सर्वाधिक सक्षम और सिद्ध मानी जाती है।
12. हम जानते हैं कि यह शत्रु नाश की नामावली है, पर क्या इससे अपार धन-संपत्ति (कर्ज-मुक्ति) की प्राप्ति भी हो सकती है?
शत-प्रतिशत सम्भव है! विनियोग में 'अर्थ' (धन) सिद्धि का स्पष्ट उल्लेख है। जब साधक के जीवन से 'शत्रु' रूपी विघ्नों और नकारात्मक ऊर्जा का स्तम्भन (Paralysis) होता है, तो उसका व्यापार और मार्ग स्वयमेव खुल जाते हैं। देवी को 'स्थिर लक्ष्मी' का रूप भी माना गया है। लगातार पीले अक्षत (चावल) चढ़ाने वाले साधक के जीवन में कभी आर्थिक दरिद्रता नहीं आ सकती और वह भयंकर कर्ज से मुक्त हो जाता है।