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Sri Bagalamukhi Kavacham (Vairinashakaram) – श्री बगलामुखी कवचम् (वैरिनाशकरम्)

Sri Bagalamukhi Kavacham (Vairinashakaram) – श्री बगलामुखी कवचम् (वैरिनाशकरम्)
॥ अथ श्रीबगलामुखीकवचम् (वैरिनाशकरम्) ॥ श्रीभैरव्युवाच ॥ श्रुत्वा च बगलापूजां स्तोत्रं चापि महेश्वर । इदानीं श्रोतुमिच्छामि कवचं वद मे प्रभो ॥ १॥ वैरिनाशकरं दिव्यं सर्वाशुभविनाशनम् । शुभदं स्मरणात्पुण्यं त्राहि मां दुःखनाशनम् ॥ २॥ श्रीभैरव उवाच ॥ कवचं श‍ृणु वक्ष्यामि भैरवी प्राणवल्लभे । पठित्वा धारयित्वा तु त्रैलौक्ये विजयी भवेत् ॥ ३॥ ॥ विनियोगः ॥ ॐ अस्य श्रीबगलामुखीकवचस्य नारदऋषिरनुष्टुप्छन्दः श्रीबगलामुखी देवता लं बीजं ऐं कीलकं पुरुषार्थचतुष्टये जपे विनियोगः ॥ ॥ अथ कवचपाठः ॥ शिरो मे बगला पातु हृदयैकाक्षरी परा । ॐ ह्रीं ॐ मे ललाटे च बगला वैरिनाशिनी ॥ ४॥ गदाहस्ता सदा पातु मुखं मे मोक्षदायिनी । वैरिजिह्वान्धरा पातु कण्ठं मे बगलामुखी ॥ ५॥ उदरं नाभिदेशं च पातु नित्यं परात्परा । परात्परपरा पातु मम गुह्यं सुरेश्वरी ॥ ६॥ हस्तौ चैव तथा पातु पार्वतीपरिपातु मे । विवादे विषमे घोरे सङ्ग्रामे रिपुसङ्कटे ॥ ७॥ पीताम्बरधरा पातु सर्वाङ्गं शिवनर्तकी । श्रीविद्यासमयो पातु मातङ्गीदुरिताशिवा ॥ ८॥ पातुपुत्रं सुतां चैव कलत्रं कालिका मम । पातु नित्यं भ्रातरं मे पितरं शूलिनी सदा ॥ ९॥ सन्देहि बगलादेव्याः कवचं मन्मुखोदितम् । नैव देयममुख्याय सर्वसिद्धिप्रदायकम् ॥ १०॥ ॥ फलश्रुति ॥ पठनाद्धारणादस्य पूजनाद्वाञ्छितं लभेत् । इदं कवचमज्ञात्वा यो जपेद् बगलामुखीम् ॥ ११॥ पिबन्ति शोणितं तस्य योगिन्यः प्राप्यसादराः । वश्ये चाकर्षणे चैव मारणे मोहने तथा ॥ १२॥ महाभये विपत्तौ च पठेद्वापाठयेत्तु यः । तस्य सर्वार्थसिद्धिः स्याद्भक्तियुक्तस्य पार्वती ॥ १३॥ ॥ इति श्रीरुद्रयामले बगलामुखीकवचं (वैरिनाशकरम्) सम्पूर्णम् ॥

श्री बगलामुखी कवचम् (वैरिनाशकरम्) — परिचय एवं महत्व (Introduction)

श्री बगलामुखी कवचम् (वैरिनाशकरम्) तंत्र शास्त्र के सुप्रसिद्ध ग्रंथ 'रुद्रयामल तंत्र' (Rudrayamala Tantra) से उद्धृत एक अत्यंत शक्तिशाली और अचूक रक्षा-कवच है। तांत्रिक ग्रंथों में बगलामुखी के कई कवच मिलते हैं, परंतु इसे विशेष रूप से 'वैरिनाशकरं' (शत्रुओं का नाश करने वाला) कहा गया है। यह कवच भगवान शिव (भैरव रूप में) और माता पार्वती (भैरवी रूप में) के एक अत्यंत गूढ़ तांत्रिक संवाद के रूप में प्रकट हुआ है।

कवच का प्राकट्य: श्लोक 1-2 में माता भैरवी भगवान महेश्वर से निवेदन करती हैं कि— "हे प्रभो! मैंने बगलामुखी की पूजा और स्तोत्र तो सुन लिया, अब मुझे वह दिव्य कवच सुनाएं जो शत्रुओं का नाश करने वाला, समस्त अशुभों का विनाशक और दुःखों को हरने वाला हो।" माता के इस कल्याणकारी प्रश्न के उत्तर में भगवान भैरव ने इस अमोघ कवच का उपदेश दिया।

कवच का अर्थ और आवश्यकता: 'कवच' का अर्थ है वह ढाल या आवरण जो युद्ध क्षेत्र में योद्धा की रक्षा करता है। तंत्र मार्ग में जब साधक किसी उग्र शक्ति (जैसे बगलामुखी) की साधना करता है, तो उसके चारों ओर नकारात्मक ऊर्जाओं और शत्रु-शक्तियों का दबाव बढ़ जाता है। ऐसे समय में यह कवच साधक के सूक्ष्म और स्थूल शरीर पर एक अभेद्य सुरक्षा आवरण (Impenetrable Aura) बना देता है, जिसे कोई भी तंत्र-मंत्र या शत्रु का प्रहार भेद नहीं सकता।

विशिष्ट महत्व — अंग रक्षा और परिवार सुरक्षा (Body & Family Protection)

इस कवच की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह केवल साधक के शरीर की ही नहीं, बल्कि उसके संपूर्ण परिवार की भी रक्षा करता है। इसमें विभिन्न महाविद्याओं का आवाहन किया गया है:

शारीरिक अंगों की रक्षा

  • सिर और हृदय: सिर की रक्षा स्वयं बगलामुखी करती हैं और हृदय की रक्षा 'एकाक्षरी परा' शक्ति करती हैं।
  • ललाट (माथा): 'ॐ ह्रीं ॐ' बीजाक्षर और वैरिनाशिनी बगलामुखी ललाट की रक्षा करती हैं।
  • मुख और कंठ: गदा धारण करने वाली देवी मुख की, और 'वैरिजिह्वान्धरा' (शत्रु की जीभ पकड़ने वाली) देवी कंठ की रक्षा करती हैं।
  • सर्वांग रक्षा: "विवादे विषमे घोरे सङ्ग्रामे रिपुसङ्कटे। पीताम्बरधरा पातु सर्वाङ्गं शिवनर्तकी॥" — भयंकर विवाद, कोर्ट केस, युद्ध और शत्रु-संकट में पीताम्बरा देवी साधक के पूरे शरीर की रक्षा करती हैं।

परिवार की तांत्रिक सुरक्षा

श्लोक 8-9 में स्पष्ट रूप से परिवार के सदस्यों की रक्षा का भार अन्य उग्र शक्तियों को सौंपा गया है:

  • मातङ्गी: माता मातंगी सभी प्रकार के अशुभों (दुरिताशिवा) से रक्षा करती हैं।
  • कालिका: महाकाली पुत्र, पुत्री और कलत्र (पत्नी/जीवनसाथी) की रक्षा करती हैं।
  • शूलिनी: माता शूलिनी (दुर्गा का उग्र रूप) भाई और पिता की सदैव रक्षा करती हैं।

कवच के लाभ और कठोर तांत्रिक चेतावनी (Benefits & Severe Warning)

इस कवच के अंत (फलश्रुति) में इसके अद्भुत लाभों के साथ-साथ एक अत्यंत गंभीर चेतावनी भी दी गई है, जिसे हर बगलामुखी साधक को जानना चाहिए:

  • भयंकर चेतावनी (योगिनियों का प्रकोप): "इदं कवचमज्ञात्वा यो जपेद् बगलामुखीम्। पिबन्ति शोणितं तस्य योगिन्यः प्राप्यसादराः॥" (श्लोक 11-12) — जो साधक इस कवच को जाने बिना (या इसका पाठ किए बिना) माँ बगलामुखी के मंत्र का जप करता है, योगिनियां उसका रक्त (शोणित/Energy) पी जाती हैं। अर्थात्, बिना कवच के उग्र साधना करने से साधक को भारी शारीरिक और मानसिक हानि हो सकती है।
  • त्रैलोक्य विजय: (श्लोक 3) इस कवच को पढ़ने और भोजपत्र पर लिखकर धारण करने (यंत्र रूप में पहनने) से व्यक्ति तीनों लोकों में विजयी होता है।
  • षट्कर्मों में सफलता: (श्लोक 12) वशीकरण, आकर्षण, मारण, और मोहन जैसे तांत्रिक षट्कर्मों में इस कवच के प्रभाव से निर्विघ्न सफलता प्राप्त होती है।
  • महाभय और विपत्ति नाश: (श्लोक 13) बड़े से बड़े भय, संकट, और अचानक आई विपत्तियों के समय इस कवच का पाठ करने से भगवान भैरव और माता पार्वती के आशीर्वाद से 'सर्वार्थसिद्धि' प्राप्त होती है।

पाठ विधि एवं धारण विधान (Ritual Method & Dharana)

यह कवच तंत्र की सुरक्षा का मूल आधार है। इसे नित्य पूजा में पढ़ा जा सकता है और ताबीज (Amulet) के रूप में पहना भी जा सकता है।

दैनिक पाठ की विधि

  • स्नान एवं वस्त्र: प्रातःकाल या मध्यरात्रि में स्नानादि से निवृत्त होकर पीले वस्त्र धारण करें। पीला आसन बिछाकर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करें।
  • विनियोग: हाथ में जल लेकर "ॐ अस्य श्रीबगलामुखीकवचस्य..." पढ़ें और जल को ज़मीन पर छोड़ दें।
  • नियम: बगलामुखी माता के किसी भी मंत्र (जैसे 36 अक्षरी मंत्र) का जप करने से ठीक पहले इस कवच का कम से कम एक बार पाठ अवश्य करें, ताकि योगिनियों के प्रकोप से बचा जा सके।

कवच धारण विधि (Wearing the Kavach)

श्लोक 3 में "धारयित्वा तु" कहा गया है, जिसका अर्थ है इसे शरीर पर धारण करना।

  • शुभ मुहूर्त (जैसे गुरु पुष्य योग या अष्टमी/चतुर्दशी) में भोजपत्र पर अष्टगंध या हल्दी की स्याही और अनार की कलम से इस कवच को लिखें।
  • षोडशोपचार पूजा के बाद इसे एक चांदी या तांबे के ताबीज (Tabeez) में भरकर पीले धागे में पिरोकर गले या दाहिनी भुजा में धारण करें। यह मारण-प्रयोगों और दुर्घटनाओं से 24 घंटे रक्षा करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions)

1. इसे 'वैरिनाशकरम्' कवच क्यों कहा जाता है?

माता भैरवी ने श्लोक 2 में विशेष रूप से 'वैरिनाशकरं दिव्यं' कहकर इस कवच की मांग की थी। 'वैरि' अर्थात् शत्रु और 'नाशकरं' अर्थात् नाश करने वाला। यह कवच शत्रुओं के सर्वनाश और स्तम्भन के लिए अचूक है।

2. यह बगलामुखी के अन्य कवचों से कैसे भिन्न है?

तंत्र में कई कवच हैं, लेकिन यह विशिष्ट कवच (रुद्रयामल तंत्र से) बहुत संक्षिप्त होने के बावजूद साधक के साथ-साथ उसके पूरे परिवार (पुत्र, पुत्री, पत्नी, भाई, पिता) की सुरक्षा की गारंटी देता है, जो इसे अद्वितीय बनाता है।

3. मंत्र जप से पहले इस कवच का पाठ क्यों अनिवार्य है?

श्लोक 11-12 में स्पष्ट चेतावनी है कि जो व्यक्ति इस कवच को पढ़े बिना माँ बगलामुखी के उग्र मंत्र का जप करता है, उसकी ऊर्जा (रक्त) योगिनियां सोख लेती हैं। इसलिए आत्मरक्षा के लिए यह सबसे पहले पढ़ा जाता है।

4. 'वैरिजिह्वान्धरा' का क्या अर्थ है?

'वैरि' अर्थात् शत्रु, 'जिह्वा' अर्थात् जीभ और 'धरा' अर्थात् पकड़ने वाली। जो देवी शत्रु की जीभ को पकड़कर उसकी वाणी और षड्यंत्रों को रोक देती हैं, वे वैरिजिह्वान्धरा (बगलामुखी) हैं।

5. इस कवच का ऋषि, बीज और कीलक क्या है?

विनियोग के अनुसार, इस कवच के ऋषि 'नारद' हैं, छंद 'अनुष्टुप' है, बीज मंत्र 'लं' है और कीलक 'ऐं' है।

6. क्या मैं इस कवच को ताबीज के रूप में पहन सकता हूँ?

हाँ, भगवान शिव ने "पठित्वा धारयित्वा तु" कहकर इसे धारण करने की आज्ञा दी है। भोजपत्र पर लिखकर ताबीज में पहनने से यह हर क्षण दुर्घटनाओं और शत्रुओं से बचाता है।

7. क्या इस पाठ के लिए गुरु दीक्षा लेना ज़रूरी है?

अपनी और अपने परिवार की सामान्य रक्षा (भक्ति भाव) के लिए कोई भी इसका पाठ कर सकता है। परंतु मारण, मोहन या वशीकरण जैसे तांत्रिक प्रयोगों (षट्कर्म) के लिए गुरु दीक्षा अनिवार्य है।

8. कोर्ट केस और मुकदमों में यह कवच कैसे लाभ देता है?

श्लोक 7 में स्पष्ट कहा गया है— "विवादे विषमे घोरे सङ्ग्रामे रिपुसङ्कटे"। यह भयंकर विवादों और कोर्ट केस में विरोधी पक्ष की बुद्धि को भ्रमित कर साधक को विजय दिलाता है।

9. पाठ करते समय मुख किस दिशा में होना चाहिए?

बगलामुखी की साधना में उत्तर दिशा (धन और शत्रु विजय के लिए) अथवा पूर्व दिशा (ज्ञान और शांति के लिए) की ओर मुख करना सबसे श्रेष्ठ माना जाता है।

10. श्लोक 8 में 'शिवनर्तकी' किसे कहा गया है?

यहाँ 'शिवनर्तकी' का अर्थ है शिव के हृदय में या शिव के साथ नृत्य करने वाली आदि-शक्ति। यह माँ का वह आनंदमयी और सर्वव्यापी स्वरूप है जो साधक के सर्वांग की रक्षा करता है।

11. पाठ के दौरान किस रंग का महत्व है?

पीला (Yellow) रंग अनिवार्य है। 'पीताम्बरधरा पातु' के अनुसार देवी को पीला रंग प्रिय है। इसलिए पीले वस्त्र, पीला आसन और माथे पर पीला तिलक लगाकर ही पाठ करना चाहिए।