Sri Pitambari Sahasranama Stotram – श्री पीताम्बरी सहस्रनाम स्तोत्रम्

श्री पीताम्बरी सहस्रनाम स्तोत्रम् — परिचय एवं रहस्य (Introduction)
श्री पीताम्बरी (बगलामुखी) सहस्रनाम स्तोत्रम् दश महाविद्याओं में अष्टम महाविद्या माँ बगलामुखी का एक अत्यंत उग्र, गुप्त और महाशक्तिशाली तांत्रिक स्तोत्र है। यह दुर्लभ स्तोत्र 'उत्कट शम्बर नागेन्द्रप्रयाण तंत्र' के 'षोडश सहस्र' ग्रंथ से उद्धृत है। इस स्तोत्र का प्राकट्य देवों के देव महादेव (शिव) और माता पार्वती के संवाद के रूप में हुआ है, जिसमें भगवान शिव ने पार्वती को उस परम रहस्य का उपदेश दिया जो स्वयं भगवान विष्णु ने उन्हें बताया था।
स्तोत्र की पृष्ठभूमि: श्लोक 7-10 के अनुसार, प्रलय काल (एकार्णव) में जब भगवान केशव (विष्णु) शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में लीन थे, तब उनके मुख से यह सनातन महास्तम्भन स्तोत्र प्रकट हुआ था। भगवान शिव कहते हैं कि "अजोहं यत्प्रसादेन विष्णुः सर्वेश्वरेश्वरः" (श्लोक 11) — इसी विद्या के प्रभाव से ब्रह्मा जी अजन्मा हैं और विष्णु जी सर्वेश्वरों के ईश्वर बने हुए हैं।
माँ का पीताम्बरी स्वरूप: श्लोक 12-13 में माता के स्वरूप का अद्भुत ध्यान (Dhyana) वर्णित है। माता पीले वस्त्र धारण किए हुए हैं, पीत (पीले) आसन पर विराजमान हैं, और उनके एक हाथ में मुदगर (गदा) तथा दूसरे हाथ में शत्रु की जिह्वा (जीभ) है। वे सृष्टि, स्थिति और विनाश की आदि-कारण महेश्वरी हैं।
ब्रह्मास्त्र विद्या का रहस्य: तंत्र शास्त्र में बगलामुखी को साक्षात 'परब्रह्मास्त्र विद्या' (श्लोक 3) कहा गया है। यह विद्या "रोधिनी विघ्नसङ्घानां मोहिनी परयोषिताम्। स्तम्भिनी राजसैन्यानावादिनी परवादिनाम्॥" (श्लोक 6-7) अर्थात् यह सभी विघ्नों को रोकने वाली, विरोधी वादियों की वाणी को मूक करने वाली और राजाओं की विशाल सेनाओं को भी स्तम्भित (जड़वत) करने वाली सर्वोच्च शक्ति है।
सहस्रनाम का विशिष्ट महत्व (Significance of 1000 Names)
सहस्रनाम (1000 नाम) केवल एक स्तुति नहीं है, बल्कि यह एक प्रचंड तांत्रिक मंत्र-माला है। इसमें प्रयुक्त प्रत्येक नाम माँ पीताम्बरा के एक विशिष्ट गुण, शक्ति और बीजाक्षर को जाग्रत करता है। श्लोक 124-128 में स्पष्ट रूप से 'ह्रीं', 'क्लीं', 'श्रीं', 'ऐं' जैसे महाबीज मंत्रों को देवी के स्वरूप के रूप में वर्णित किया गया है।
इन 1000 नामों में देवी को सौम्य और उग्र दोनों रूपों में पूजा गया है। जहाँ एक ओर वे 'कमला विमला नीला' (सौम्य) हैं, वहीं दूसरी ओर वे 'खड्गहस्ता खड्गरता खड्गिनी खर्परप्रिया' (श्लोक 26) जैसे अति उग्र और संहारक रूपों में भी विद्यमान हैं। यह स्तोत्र चतुर्वर्ग (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) का फल प्रदान करने वाला और कलियुग में तुरंत सिद्धि देने वाला (कलियुगे महासिद्ध्यौघदायिनी) अमोघ अस्त्र है।
स्तोत्र के फलश्रुति लाभ (Benefits from Phala Shruti)
भगवान शिव ने श्लोक 177 से 188 तक इस स्तोत्र की अत्यंत विस्तृत फलश्रुति का वर्णन किया है। यह फलश्रुति प्रमाणित करती है कि इस पाठ से हर प्रकार की लौकिक और अलौकिक सिद्धि प्राप्त की जा सकती है:
- ✦पाप नाश एवं सिद्धि प्राप्ति: (श्लोक 179-180) जो साधक इसे एक बार पढ़ता है, उसके सभी पापों का क्षय हो जाता है। दो बार पढ़ने से वह विघ्नेश्वर (गणेश) के समान विघ्नों को हरने वाला बन जाता है, और तीन बार पढ़ने से सभी प्रकार की सिद्धियां निश्चित रूप से प्राप्त हो जाती हैं।
- ✦मनोवांछित फल: (श्लोक 181-182) मोक्ष की इच्छा रखने वाले को मोक्ष, धन चाहने वाले को धन, और विद्या चाहने वाले को तर्क और व्याकरण से युक्त महान विद्या प्राप्त होती है।
- ✦शत्रु और राज भय से मुक्ति: (श्लोक 182-183) एक वर्ष तक इसका निरंतर पाठ करने से बड़े से बड़े शत्रु का नाश हो जाता है और क्षोणीपति (राजा या प्रशासन) भी वशीभूत हो जाते हैं।
- ✦शिव-तुल्य अवस्था (जीवन्मुक्ति): (श्लोक 185-186) जो नित्य इसका पाठ करता है, वह साक्षात शिव के समान हो जाता है। वह जीवित रहते हुए धर्म और अर्थ का भोग करता है और मृत्यु के पश्चात मोक्ष का अधिकारी बनता है।
पाठ विधि एवं तांत्रिक रहस्य (Ritual Method & Secret Practices)
यह 'परब्रह्मास्त्र विद्या' है, अतः इसके पठन-पाठन में कुछ विशिष्ट नियमों का कड़ाई से पालन करना अनिवार्य है।
साधना के नियम एवं विधि
- पाठ का समय: (श्लोक 178) "प्रातः काले च मध्याह्ने सन्ध्याकाले च पार्वति" — इस स्तोत्र का पाठ दिन के तीनों प्रहर (सुबह, दोपहर, शाम) में किया जा सकता है। विशेष तांत्रिक प्रयोगों के लिए मध्यरात्रि (निशीथ काल) उत्तम मानी जाती है।
- वेशभूषा एवं सामग्री: (श्लोक 188) "पीताम्बरपरीधाना पीतगन्धानुलेपना" — साधक को पीले वस्त्र (पीताम्बर) धारण करने चाहिए। माथे पर पीला चंदन या हल्दी का लेप लगाना चाहिए। आसन और जप की माला (हल्दी की माला) भी पीली होनी चाहिए।
- माँ का ध्यान: देवी का ध्यान करते समय कल्पना करें कि उन्होंने शत्रु की जीभ अपने बाएँ हाथ से पकड़ी है और दाएँ हाथ में मुदगर (गदा) उठाया हुआ है, जिससे वे शत्रु की बुद्धि को कुंठित कर रही हैं।
- परम गोपन (अति-गोपनीयता): (श्लोक 5, 184) "गोपनीयं प्रयत्नेन जननीजारवत्सदा" — भगवान शिव बार-बार चेतावनी देते हैं कि यह विद्या अत्यंत गुप्त है। इसे समाज में, अयोग्य व्यक्तियों के सामने या बिना श्रद्धा वालों के सामने प्रकट नहीं करना चाहिए, अन्यथा सिद्धि की हानि (सिद्धिहानिकृत्) होती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions)