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Sri Anantha Padmanabha Ashtottara Shatanamavali – श्री अनन्तपद्मनाभ अष्टोत्तरशतनामावलिः

Sri Anantha Padmanabha Ashtottara Shatanamavali – श्री अनन्तपद्मनाभ अष्टोत्तरशतनामावलिः
॥ श्री अनन्तपद्मनाभ अष्टोत्तरशतनामावलिः ॥ ॐ अनन्ताय नमः । ॐ पद्मनाभाय नमः । ॐ शेषाय नमः । ॐ सप्तफणान्विताय नमः । ॐ तल्पात्मकाय नमः । ॐ पद्मकराय नमः । ॐ पिङ्गप्रसन्नलोचनाय नमः । ॐ गदाधराय नमः । ॐ चतुर्बाहवे नमः । ॐ शङ्खचक्रधराय नमः । १० ॐ अव्ययाय नमः । ॐ नवाम्रपल्लवाभासाय नमः । ॐ ब्रह्मसूत्रविराजिताय नमः । ॐ शिलासुपूजिताय नमः । ॐ देवाय नमः । ॐ कौण्डिन्यव्रततोषिताय नमः । ॐ नभस्यशुक्लस्तचतुर्दशीपूज्याय नमः । ॐ फणेश्वराय नमः । ॐ सङ्कर्षणाय नमः । ॐ चित्स्वरूपाय नमः । २० ॐ सूत्रग्रन्धिसुसंस्थिताय नमः । ॐ कौण्डिन्यवरदाय नमः । ॐ पृथ्वीधारिणे नमः । ॐ पातालनायकाय नमः । ॐ सहस्राक्षाय नमः । ॐ अखिलाधाराय नमः । ॐ सर्वयोगिकृपाकराय नमः । ॐ सहस्रपद्मसम्पूज्याय नमः । ॐ केतकीकुसुमप्रियाय नमः । ॐ सहस्रबाहवे नमः । ३० ॐ सहस्रशिरसे नमः । ॐ श्रितजनप्रियाय नमः । ॐ भक्तदुःखहराय नमः । ॐ श्रीमते नमः । ॐ भवसागरतारकाय नमः । ॐ यमुनातीरसदृष्टाय नमः । ॐ सर्वनागेन्द्रवन्दिताय नमः । ॐ यमुनाराध्यपादाब्जाय नमः । ॐ युधिष्ठिरसुपूजिताय नमः । ॐ ध्येयाय नमः । ४० ॐ विष्णुपर्यङ्काय नमः । ॐ चक्षुश्रवणवल्लभाय नमः । ॐ सर्वकामप्रदाय नमः । ॐ सेव्याय नमः । ॐ भीमसेनामृतप्रदाय नमः । ॐ सुरासुरेन्द्रसम्पूज्याय नमः । ॐ फणामणिविभूषिताय नमः । ॐ सत्यमूर्तये नमः । ॐ शुक्लतनवे नमः । ॐ नीलवाससे नमः । ५० ॐ जगद्गुरवे नमः । ॐ अव्यक्तपादाय नमः । ॐ ब्रह्मण्याय नमः । ॐ सुब्रह्मण्यनिवासभुवे नमः । ॐ अनन्तभोगशयनाय नमः । ॐ दिवाकरमुनीडिताय नमः । ॐ मधुकवृक्षसंस्थानाय नमः । ॐ दिवाकरवरप्रदाय नमः । ॐ दक्षहस्तसदापूज्याय नमः । ॐ शिवलिङ्गनिवष्टधिये नमः । ६० ॐ त्रिप्रतीहारसन्दृश्याय नमः । ॐ मुखदापिपदाम्बुजाय नमः । ॐ नृसिंहक्षेत्रनिलयाय नमः । ॐ दुर्गासमन्विताय नमः । ॐ मत्स्यतीर्थविहारिणे नमः । ॐ धर्माधर्मादिरूपवते नमः । ॐ महारोगायुधाय नमः । ॐ वार्थितीरस्थाय नमः । ॐ करुणानिधये नमः । ॐ ताम्रपर्णीपार्श्ववर्तिने नमः । ७० ॐ धर्मपरायणाय नमः । ॐ महाकाव्यप्रणेत्रे नमः । ॐ नागलोकेश्वराय नमः । ॐ स्वभुवे नमः । ॐ रत्नसिंहासनासीनाय नमः । ॐ स्फुरन्मकरकुण्डलाय नमः । ॐ सहस्रादित्यसङ्काशाय नमः । ॐ पुराणपुरुषाय नमः । ॐ ज्वलत्रत्नकिरीटाढ्याय नमः । ॐ सर्वाभरणभूषिताय नमः । ८० ॐ नागकन्याष्टतप्रान्ताय नमः । ॐ दिक्पालकपरिपूजिताय नमः । ॐ गन्धर्वगानसन्तुष्टाय नमः । ॐ योगशास्त्रप्रवर्तकाय नमः । ॐ देववैणिकसम्पूज्याय नमः । ॐ वैकुण्ठाय नमः । ॐ सर्वतोमुखाय नमः । ॐ रत्नाङ्गदलसद्बाहवे नमः । ॐ बलभद्राय नमः । ॐ प्रलम्बघ्ने नमः । ९० ॐ कान्तीकर्षणाय नमः । ॐ भक्तवत्सलाय नमः । ॐ रेवतीप्रियाय नमः । ॐ निराधाराय नमः । ॐ कपिलाय नमः । ॐ कामपालाय नमः । ॐ अच्युताग्रजाय नमः । ॐ अव्यग्राय नमः । ॐ बलदेवाय नमः । ॐ महाबलाय नमः । १०० ॐ अजाय नमः । ॐ वाताशनाधीशाय नमः । ॐ महातेजसे नमः । ॐ निरञ्जनाय नमः । ॐ सर्वलोकप्रतापनाय नमः । ॐ सज्वालप्रलयाग्निमुखे नमः । ॐ सर्वलोकैकसंहर्त्रे नमः । ॐ सर्वेष्टार्थप्रदायकाय नमः । १०८ ॥ इति श्री अनन्तपद्मनाभ अष्टोत्तरशतनामावलिः ॥

श्री अनन्तपद्मनाभ अष्टोत्तरशतनामावलिः: अनंत सत्ता का परिचय (Introduction)

श्री अनन्तपद्मनाभ अष्टोत्तरशतनामावलिः (Sri Anantha Padmanabha Ashtottara Shatanamavali) भगवान विष्णु के उस विराट और शांत स्वरूप की वंदना है, जो क्षीर सागर (Cosmic Ocean) में अनंत काल से शेषनाग की शय्या पर विराजमान हैं। 'अनन्तपद्मनाभ' शब्द तीन गहन तत्वों का संगम है—'अनन्त' (जिसका कोई अंत न हो, जो आदि और अंत से रहित हो), 'पद्म' (कमल) और 'नाभ' (नाभि)। भगवान विष्णु की नाभि से निकले कमल पर ही ब्रह्मा जी विराजमान हैं, जो सृष्टि के सृजन का प्रतीक है। अतः अनन्तपद्मनाभ स्वरूप संपूर्ण ब्रह्मांड के उद्गम और पालन का प्रतिनिधित्व करता है।
इस नामावली का आध्यात्मिक महत्व विशेष रूप से अनंत चतुर्दशी (Anant Chaturdashi) के व्रत के साथ जुड़ा हुआ है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार, जब पांडव वनवास में कष्ट भोग रहे थे, तब भगवान कृष्ण ने उन्हें भगवान अनंत (विष्णु) के व्रत और इस नामावली के पाठ का उपदेश दिया था। इस व्रत के प्रभाव से ही युधिष्ठिर ने अपना खोया हुआ राज्य पुनः प्राप्त किया था। नामावली में आने वाला नाम "कौण्डिन्यव्रततोषिताय नमः" ऋषि कौण्डिन्य और उनकी पत्नी शीला की प्रसिद्ध कथा की ओर संकेत करता है, जिन्होंने अनंत सूत्र धारण कर सुख-समृद्धि प्राप्त की थी।
आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो भगवान अनन्तपद्मनाभ की यह मुद्रा 'योगनिद्रा' कहलाती है। यह निष्क्रियता नहीं, बल्कि पूर्ण चेतना (Pure Consciousness) की अवस्था है। भगवान का एक हाथ नीचे की ओर भूमि की रक्षा का संकेत देता है और दूसरा हाथ नाभि के कमल का आधार है। तिरुवनंतपुरम (केरल) में स्थित सुप्रसिद्ध पद्मनाभस्वामी मंदिर इसी स्वरूप को समर्पित है, जहाँ भगवान की प्रतिमा १०८ दिव्य नामों की शक्ति से अभिमंत्रित मानी जाती है। यह नामावली उसी मंदिर की आध्यात्मिक ऊर्जा और विष्णु के 'शेषशायी' रूप का सार है।
इस नामावली में १०८ नाम केवल संबोधन नहीं हैं, बल्कि वे ब्रह्मांडीय शक्तियों के 'बीज' हैं। जैसे "पातालनायकाय नमः" भगवान को पाताल का स्वामी बताता है, वहीं "सहस्रशिरसे नमः" उनके अनंत ज्ञान (Infinite Intelligence) को प्रकट करता है। जो भक्त पूर्ण शरणागति के साथ इन नामों का उच्चारण करता है, उसके भीतर का 'अज्ञान' भगवान के सुदर्शन चक्र और गदा के प्रहार से नष्ट हो जाता है। यह नामावली न केवल पापों का नाश करती है, बल्कि साधक को उस 'अनंत' की ओर ले जाती है जहाँ दुःख और अभाव का कोई अस्तित्व नहीं है।

विशिष्ट महत्व: अनन्त चतुर्दशी और शेषशायी स्वरूप (Significance)

भगवान अनन्तपद्मनाभ की उपासना का विशिष्ट महत्व उनके 'नाग-शय्या' स्वरूप में है। शेषनाग (अनंत) समय (Time) का प्रतीक हैं और विष्णु उस समय के अधिपति हैं। यह स्वरूप हमें सिखाता है कि काल की लहरों के बीच भी हमें भगवान की भांति शांत और स्थिर रहना चाहिए।
भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि (Anant Chaturdashi) को इस नामावली का पाठ 'अक्षय' फल देता है। इस दिन भक्त अपनी भुजा पर चौदह गांठों वाला 'अनंत सूत्र' (Sacred Thread) बांधते हैं, जो भगवान के १०८ नामों की शक्ति से अभिमंत्रित होता है। यह नामावली 'नाग दोष' और 'कालसर्प दोष' की शांति के लिए भी सर्वश्रेष्ठ मानी गई है, क्योंकि इसमें नागराज अनंत और भगवान विष्णु की संयुक्त वंदना है।

नामावली पाठ के लाभ — फलश्रुति (Benefits from Phala Shruti)

प्राचीन ग्रंथों और भक्तों के अनुभव के अनुसार, श्री अनन्तपद्मनाभ नामावली के नित्य पाठ से निम्नलिखित फल प्राप्त होते हैं:
  • पाप नाश और प्रायश्चित: यह नामावली संचित पापों का शमन करती है और आत्मा को शुद्ध कर सात्विक बुद्धि प्रदान करती है।
  • खोए हुए ऐश्वर्य की प्राप्ति: जिस प्रकार युधिष्ठिर ने अपना राज्य पुनः प्राप्त किया, उसी प्रकार यह पाठ रुके हुए कार्यों और प्रतिष्ठा की पुनर्स्थापना में सहायक है।
  • नाग दोष शांति: शेषनाग की कृपा से कुंडली के नाग दोष और राहु-केतु जनित बाधाएं शांत होती हैं।
  • पारिवारिक समृद्धि: "कौण्डिन्यवरदाय नमः" के प्रभाव से गृहस्थ जीवन में सुख, शांति और संतान सुख की प्राप्ति होती है।
  • मानसिक शांति: भगवान की योगनिद्रा मुद्रा का ध्यान करते हुए पाठ करने से चिंता, भय और अनिद्रा (Insomnia) जैसे रोगों का अंत होता है।
  • मोक्ष की ओर अग्रसर: यह पाठ भक्त को जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त कर 'विष्णु लोक' की प्राप्ति कराता है।

पाठ विधि एवं अनंत चतुर्दशी विधान (Ritual Method)

अनन्तपद्मनाभ स्वामी की उपासना अत्यंत सात्विक और प्रभावशाली है। पूर्ण लाभ के लिए निम्नलिखित विधि अपनाएं:
  • समय: प्रातःकाल स्नान के बाद सूर्योदय के समय पाठ करना सर्वोत्तम है। अनंत चतुर्दशी के दिन इसका पाठ विशेष महत्व रखता है।
  • दिशा: पूर्व (East) या उत्तर (North) दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  • वस्त्र: भगवान विष्णु को पीला रंग प्रिय है, अतः संभव हो तो पीले वस्त्र धारण करें।
  • पूजन: भगवान की शेषशायी प्रतिमा या चित्र के सम्मुख घी का दीपक प्रज्वलित करें।
  • अनंत सूत्र: यदि आप अनंत चतुर्दशी का व्रत कर रहे हैं, तो चौदह गांठों वाले सूत्र को भगवान के चरणों में रखकर इस नामावली के साथ उसका पूजन करें।
  • नैवेद्य: भगवान को खीर, पीले फल या तुलसी दल मिश्रित प्रसाद अर्पित करें।
  • एकाग्रता: प्रत्येक "ॐ ... नमः" के साथ भगवान के नामों का उच्चारण करते हुए उनकी छवि का नाभि-कमल से लेकर मुख-मंडल तक ध्यान करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. 'अनन्तपद्मनाभ' का क्या अर्थ है?

'अनन्त' का अर्थ है शाश्वत, 'पद्म' का अर्थ है कमल और 'नाभ' का अर्थ नाभि है। इसका अर्थ है—वे भगवान जिनकी नाभि से ब्रह्मांड-रूपी कमल निकला है और जो समय से परे (अनंत) हैं।

2. इस नामावली का पाठ किस दिन विशेष फलदायी है?

अनंत चतुर्दशी (Anant Chaturdashi) के दिन इसका पाठ करना सर्वश्रेष्ठ माना गया है। इसके अलावा गुरुवार और एकादशी को भी इसका विशेष फल मिलता है।

3. क्या यह नामावली नाग दोष दूर कर सकती है?

जी हाँ, भगवान विष्णु शेषनाग (नागराज) पर विराजमान हैं। "सप्तफणान्विताय" और "नागलोकेश्वराय" जैसे नामों का जप नाग दोष की शांति में अत्यंत प्रभावी है।

4. पद्मनाभस्वामी मंदिर में भगवान की मुद्रा क्या है?

तिरुवनंतपुरम के मंदिर में भगवान 'अनंत शयन' मुद्रा में हैं, जहाँ वे शेषनाग पर लेटे हुए हैं और उनकी नाभि से ब्रह्मा जी का कमल निकल रहा है।

5. 'कौण्डिन्यव्रततोषिताय' नाम का क्या संदर्भ है?

यह नाम ऋषि कौण्डिन्य की कथा से जुड़ा है, जिन्होंने दरिद्रता से मुक्ति पाने के लिए भगवान अनंत का व्रत किया था। यह नाम दर्शाता है कि भगवान सच्चे भक्तों के व्रत से शीघ्र प्रसन्न होते हैं।

6. क्या स्त्रियाँ भी यह नामावली पढ़ सकती हैं?

निश्चित रूप से। भगवान की भक्ति में कोई भेद नहीं है। गृहस्थ महिलाएँ अपने परिवार की सुख-समृद्धि के लिए इसका पाठ कर सकती हैं।

7. पाठ के दौरान किस फूल का प्रयोग करना चाहिए?

"सहस्रपद्मसम्पूज्याय" के अनुसार भगवान को कमल का फूल अत्यंत प्रिय है। यदि कमल न हो, तो पीले फूल (गेंदा) या "केतकी" (केतकीकुसुमप्रियाय) का प्रयोग किया जा सकता है।

8. 'अनंत सूत्र' में चौदह गांठें क्यों होती हैं?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ये चौदह गांठें भगवान विष्णु द्वारा बनाए गए चौदह लोकों (भुवन) का प्रतीक हैं, जिनकी रक्षा भगवान स्वयं करते हैं।

9. क्या यह पाठ मुकदमों या विवादों में विजय दिलाता है?

भगवान विष्णु धर्म के रक्षक हैं। "युधिष्ठिरसुपूजिताय" के प्रभाव से यह पाठ सत्य के मार्ग पर चलने वालों को जीत दिलाने में सहायक माना जाता है।

10. पाठ के लिए कौन सी माला सर्वोत्तम है?

भगवान विष्णु के लिए 'तुलसी की माला' सर्वश्रेष्ठ है। यदि वह न हो, तो चन्दन या कमलगट्टे की माला का प्रयोग भी किया जा सकता है।