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Sri Ambika Ashtottara Shatanamavali – श्रीअम्बिकाष्टोत्तरशतनामावली

Sri Ambika Ashtottara Shatanamavali – श्रीअम्बिकाष्टोत्तरशतनामावली
॥ श्रीअम्बिकाष्टोत्तरशतनामावली ॥ ॥ विनियोगः ॥ ॐ अस्यश्री अम्बिकामहामन्त्रस्य मार्कण्डेय ऋषिः उष्णिक् छन्दः अम्बिका दुर्गा देवता ॥[ श्रां - श्रीं इत्यादिना न्यासमाचरेत् ] ॥ ध्यानम् ॥ या सा पद्मासनस्था विपुलकटतटी पद्मपत्रायताक्षी गम्भीरावर्तनाभिः स्तनभरनमिता शुभ्रवस्त्रोत्तरीया । लक्ष्मीर्दिव्यैर्गजेन्द्रैर्मणिगणखचितैः स्नापिता हेमकुम्भैः नित्यं सा पद्महस्ता मम वसतु गृहे सर्वमाङ्गल्ययुक्ता ॥ मन्त्रः - ॐ ह्रीं श्रीं अम्बिकायै नमः ॐ ॥ ॥ अथ श्री अम्बिकायाः नामावलिः ॥ ॐ अम्बिकायै नमः । ॐ सिद्धेश्वर्यै नमः । ॐ चतुराश्रमवाण्यै नमः । ॐ ब्राह्मण्यै नमः । ॐ क्षत्रियायै नमः । ॐ वैश्यायै नमः । ॐ शूद्रायै नमः । ॐ वेदमार्गरतायै नमः । ॐ वज्रायै नमः । ॐ वेदविश्वविभागिन्यै नमः । १० ॐ अस्त्रशस्त्रमयायै नमः । ॐ वीर्यवत्यै नमः । ॐ वरशस्त्रधारिण्यै नमः । ॐ सुमेधसे नमः । ॐ भद्रकाल्यै नमः । ॐ अपराजितायै नमः । ॐ गायत्र्यै नमः । ॐ संकृत्यै नमः । ॐ सन्ध्यायै नमः । ॐ सावित्र्यै नमः । २० ॐ त्रिपदाश्रयायै नमः । ॐ त्रिसन्ध्यायै नमः । ॐ त्रिपद्यै नमः । ॐ धात्र्यै नमः । ॐ सुपथायै नमः । ॐ सामगायन्यै नमः । ॐ पाञ्चाल्यै नमः । ॐ कालिकायै नमः । ॐ बालायै नमः । ॐ बालक्रीडायै नमः । ३० ॐ सनातन्यै नमः । ॐ गर्भाधारायै नमः । ॐ आधारशून्यायै नमः । ॐ जलाशयनिवासिन्यै नमः । ॐ सुरारिघातिन्यै नमः । ॐ कृत्यायै नमः । ॐ पूतनायै नमः । ॐ चरितोत्तमायै नमः । ॐ लज्जारसवत्यै नमः । ॐ नन्दायै नमः । ४० ॐ भवायै नमः । ॐ पापनाशिन्यै नमः । ॐ पीतम्बरधरायै नमः । ॐ गीतसङ्गीतायै नमः । ॐ गानगोचरायै नमः । ॐ सप्तस्वरमयायै नमः । ॐ षद्जमध्यमधैवतायै नमः । ॐ मुख्यग्रामसंस्थितायै नमः । ॐ स्वस्थायै नमः । ॐ स्वस्थानवासिन्यै नमः । ५० ॐ आनन्दनादिन्यै नमः । ॐ प्रोतायै नमः । ॐ प्रेतालयनिवासिन्यै नमः । ॐ गीतनृत्यप्रियायै नमः । ॐ कामिन्यै नमः । ॐ तुष्टिदायिन्यै नमः । ॐ पुष्टिदायै नमः । ॐ निष्ठायै नमः । ॐ सत्यप्रियायै नमः । ॐ प्रज्ञायै नमः । ६० ॐ लोकेशायै नमः । ॐ संशोभनायै नमः । ॐ संविषयायै नमः । ॐ ज्वालिन्यै नमः । ॐ ज्वालायै नमः । ॐ विमूर्त्यै नमः । ॐ विषनाशिन्यै नमः । ॐ विषनागदम्न्यै नमः । ॐ कुरुकुल्लायै नमः । ॐ अमृतोद्भवायै नमः । ७० ॐ भूतभीतिहरायै नमः । ॐ रक्षायै नमः । ॐ राक्षस्यै नमः । ॐ रात्र्यै नमः । ॐ दीर्घनिद्रायै नमः । ॐ दिवागतायै नमः । ॐ चन्द्रिकायै नमः । ॐ चन्द्रकान्त्यै नमः । ॐ सूर्यकान्त्यै नमः । ॐ निशाचरायै नमः । ८० ॐ डाकिन्यै नमः । ॐ शाकिन्यै नमः । ॐ हाकिन्यै नमः । ॐ चक्रवासिन्यै नमः । ॐ सीतायै नमः । ॐ सीताप्रियायै नमः । ॐ शान्तायै नमः । ॐ सकलायै नमः । ॐ वनदेवतायै नमः । ॐ गुरुरूपधारिण्यै नमः । ९० ॐ गोष्ठ्यै नमः । ॐ मृत्युमारणायै नमः । ॐ शारदायै नमः । ॐ महामायायै नमः । ॐ विनिद्रायै नमः । ॐ चन्द्रधरायै नमः । ॐ मृत्युविनाशिन्यै नमः । ॐ चन्द्रमण्डलसङ्काशायै नमः । ॐ चन्द्रमण्डलवर्तिन्यै नमः । ॐ अणिमाद्यै नमः । १०० ॐ गुणोपेतायै नमः । ॐ कामरूपिण्यै नमः । ॐ कान्त्यै नमः । ॐ श्रद्धायै नमः । ॐ पद्मपत्रायताक्ष्यै नमः । ॐ पद्महस्तायै नमः । ॐ पद्मासनस्थायै नमः । ॐ श्रीमहालक्ष्म्यै नमः । १०८ ॥ इति श्री अम्बिकायाः नामावलिः सम्पूर्णम् ॥

श्रीअम्बिकाष्टोत्तरशतनामावली: परिचय एवं आध्यात्मिक विवेचन (Introduction & Spiritual Discourse)

सनातन धर्म में शक्ति की उपासना सर्वोच्च मानी गई है। श्रीअम्बिकाष्टोत्तरशतनामावली उसी परम शक्ति, आद्या भगवती अम्बिका (दुर्गा) के 108 अत्यंत प्रभावशाली और रहस्यमयी नामों का एक संकलन है। 'अम्बिका' शब्द का मूल अर्थ 'माता' (Mother of the Universe) है। यह वह परम चेतना है जिससे समस्त चराचर जगत की उत्पत्ति हुई है। इस विशिष्ट नामावली के ऋषि मार्कण्डेय हैं, जो दुर्गा सप्तशती (देवी महात्म्य) के भी मुख्य द्रष्टा हैं। उष्णिक् छन्द में रचित इस महामंत्र की मुख्य अधिष्ठात्री देवता अम्बिका दुर्गा हैं।
ध्यान श्लोक का रहस्य: नामावली के प्रारंभ में दिया गया ध्यान अत्यंत मनोहारी है। "या सा पद्मासनस्था विपुलकटतटी..." — जो देवी कमल पर विराजमान हैं, जिनकी कमलदल जैसी विशाल आँखें हैं, जो श्वेत वस्त्र धारण किए हुए हैं, और जिन्हें मणियों से जड़े स्वर्ण कलशों से दिव्य गजेन्द्र (हाथी) स्नान करा रहे हैं। यह ध्यान साक्षात गजलक्ष्मी और महामाया का एकीकार रूप प्रस्तुत करता है। अंतिम पंक्ति "नित्यं सा पद्महस्ता मम वसतु गृहे सर्वमाङ्गल्ययुक्ता" में भक्त देवी से प्रार्थना करता है कि 'कमल धारण करने वाली, सर्वमङ्गला माता नित्य मेरे घर में निवास करें।' यह ध्यान स्पष्ट करता है कि यह नामावली केवल मोक्ष के लिए नहीं, अपितु घर में अखंड श्री (धन-धान्य और मंगल) की स्थापना के लिए भी है।
बीज मंत्र की महिमा: इस नामावली का प्राण इसका मंत्र है — "ॐ ह्रीं श्रीं अम्बिकायै नमः ॐ"। इसमें 'ह्रीं' (माया बीज / भुवनेश्वरी बीज) और 'श्रीं' (लक्ष्मी बीज) का अद्भुत समन्वय है। 'ह्रीं' जहाँ शक्ति, पराक्रम और अज्ञान-नाश का प्रतीक है, वहीं 'श्रीं' ऐश्वर्य, समृद्धि और शांति का प्रतीक है। जब साधक इन बीजाक्षरों के साथ 108 नामों का उच्चारण करता है, तो उसके भीतर की सुप्त ऊर्जा (कुण्डलिनी) जाग्रत होने लगती है।
नामों की विविधता और सर्वव्यापकता: इन 108 नामों में देवी की सर्वव्यापकता (Omnipresence) के दर्शन होते हैं। एक ओर वे 'सिद्धेश्वरी', 'ब्राह्मणी', 'क्षत्रिया', 'वैश्या', 'शूद्रा' हैं, जो यह सिद्ध करता है कि देवी सम्पूर्ण समाज और चारों वर्णों की आदिमाता हैं। दूसरी ओर वे 'गायत्री', 'सावित्री', 'शारदा' (विद्या का स्वरूप) हैं। तंत्र मार्ग के साधकों के लिए वे 'डाकिनी', 'शाकिनी', 'हाकिनी' और 'कुरुकुल्ला' (तंत्र की सर्वोच्च देवियां) भी हैं। यह स्तोत्र संगीत साधकों के लिए भी अद्भुत है क्योंकि इसमें देवी को 'गीतसङ्गीतायै', 'सप्तस्वरमयायै' और 'षद्जमध्यमधैवतायै' कहकर पुकारा गया है, अर्थात वे ही सातों स्वरों का मूल हैं।

श्रीअम्बिका नामावली का विशिष्ट महत्व (Significance of the 108 Names)

यह नामावली अपने आप में तंत्र, वेद और पुराण तीनों का सार समेटे हुए है। इसका विशिष्ट महत्व इस बात में है कि यह देवी के 'उग्र' (Fierce) और 'सौम्य' (Gentle) दोनों रूपों का सामंजस्य स्थापित करती है।
  • भय पर पूर्ण विजय (Conquest Over Fear): इसमें 'मृत्युमारणायै' (मृत्यु को भी मारने वाली), 'मृत्युविनाशिन्यै' और 'भूतभीतिहरायै' जैसे नाम हैं। जो साधक किसी गंभीर रोग, अकाल मृत्यु या अनजाने भय से ग्रसित है, उसके लिए ये नाम संजीवनी का कार्य करते हैं।
  • तंत्र और नकारात्मक ऊर्जा का नाश: 'विषनाशिन्यै' और 'विषनागदम्न्यै' नाम विषैले तत्वों (शारीरिक और मानसिक दोनों) को नष्ट करते हैं। 'पूतनायै' और 'राक्षस्यै' जैसे नाम यह दर्शाते हैं कि देवी नकारात्मक शक्तियों को भी अपने अधीन रखती हैं।
  • सर्वविद्या और कला की प्राप्ति: देवी को 'सुमेधसे' (उत्तम बुद्धि वाली) और 'सामगायन्यै' कहा गया है। कला, संगीत और साहित्य के विद्यार्थियों के लिए इन नामों का उच्चारण मेधा और प्रज्ञा (बुद्धि) का तीव्र विकास करता है।
  • आध्यात्मिक शून्यता और पूर्णता: 'आधारशून्यायै' (जिनका कोई भौतिक आधार नहीं, जो निराकार हैं) से लेकर 'गुणोपेतायै' (सभी सगुण गुणों से युक्त) तक की यात्रा, साधक को अद्वैत वेदांत के सर्वोच्च सत्य का अनुभव कराती है।

फलश्रुति लाभ (Benefits of Reciting Ambika Namavali)

मार्कण्डेय ऋषि द्वारा दृष्ट इस नामावली के निष्काम या सकाम भाव से पाठ करने पर साधक को जीवन के सभी आयामों में अप्रत्याशित लाभ प्राप्त होते हैं:
  • अष्टसिद्धियों की प्राप्ति: 'अणिमाद्यै नमः' के उच्चारण से साधक को अणिमा, महिमा आदि अष्टसिद्धियों की ओर बढ़ने का मार्ग प्रशस्त होता है।
  • दारिद्र्य का समूल नाश: 108वाँ नाम 'श्रीमहालक्ष्म्यै नमः' है। 'ह्रीं श्रीं' बीज के साथ इस नाम का समापन साधक के घर में अखंड लक्ष्मी और स्वर्ण (हेमकुम्भ) की स्थिरता प्रदान करता है।
  • शत्रु और बाधा शमन: 'सुरारिघातिन्यै' और 'अपराजितायै' नामों के प्रभाव से जीवन में आने वाली हर बाधा, शत्रु या कानूनी विवाद में साधक 'अपराजित' (जिसे हराया न जा सके) रहता है।
  • वाकसिद्धि और सौंदर्य: 'चन्द्रकान्त्यै' और 'कान्त्यै' नामों से साधक के मुखमंडल पर अद्वितीय तेज, आकर्षण और वाक्पटुता आती है।
  • पूर्ण सुरक्षा चक्र: 'वज्रायै' और 'रक्षायै' नाम साधक के चारों ओर वज्र के समान एक अभेद्य सुरक्षा कवच का निर्माण करते हैं, जिसे कोई भी तांत्रिक क्रिया भेद नहीं सकती।
  • सुखद निद्रा और मानसिक शांति: 'दीर्घनिद्रायै' और 'विनिद्रायै' नामों का स्मरण अनिद्रा, डिप्रेशन और मानसिक तनाव (Stress) को दूर कर गहरी शांति प्रदान करता है।

पाठ विधि और विशेष अवसर (Ritual Method & Occasions)

108 नामों की यह नामावली अत्यंत शक्ति-सम्पन्न है, अतः इसका पाठ पूर्ण पवित्रता और श्रद्धा के साथ किया जाना चाहिए।
दैनिक पाठ विधि: स्नान के पश्चात स्वच्छ वस्त्र (विशेषकर लाल या पीले) धारण करें। पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके कुशा या लाल ऊनी आसन पर बैठें। सामने माँ दुर्गा (अम्बिका) का चित्र या यंत्र स्थापित करें। सबसे पहले शुद्ध जल, अक्षत और पुष्प से देवी का ध्यान (या सा पद्मासनस्था...) करते हुए पंचोपचार पूजन करें। उसके पश्चात "ॐ ह्रीं श्रीं अम्बिकायै नमः ॐ" का मानसिक जाप करते हुए प्रत्येक नाम के अंत में देवी को एक लाल पुष्प (गुड़हल/कमल) या कुमकुम मिश्रित अक्षत अर्पित करें।
माला का प्रयोग: यदि आप नामावली को मंत्र रूप में जपना चाहते हैं (जैसे अर्चन में), तो स्फटिक की माला (सौम्य और विद्या प्राप्ति के लिए), कमलगट्टे की माला (धन प्राप्ति के लिए), या रुद्राक्ष की माला (सभी कार्यों के लिए) का उपयोग सर्वोत्कृष्ट है।
विशेष अनुष्ठान के अवसर: यद्यपि यह पाठ नित्य किया जा सकता है, परंतु नवरात्रि (चैत्र एवं शारदीय), गुप्त नवरात्रि, प्रति माह की अष्टमी, नवमी तिथि और शुक्रवार के दिन इसका पाठ विशेष फलदायी होता है। दिवाली की रात्रि में महालक्ष्मी की प्रसन्नता के लिए इस नामावली से 108 कमल पुष्प अर्पित करने से अचूक धन प्राप्ति होती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. श्रीअम्बिकाष्टोत्तरशतनामावली के मूल द्रष्टा ऋषि कौन हैं?
इस दिव्य नामावली के दृष्टा (प्रकट करने वाले) मार्कण्डेय ऋषि हैं, जिन्होंने मार्कण्डेय पुराण और दुर्गा सप्तशती की भी रचना की थी।
2. 'ॐ ह्रीं श्रीं अम्बिकायै नमः' मंत्र में 'ह्रीं' और 'श्रीं' का क्या अर्थ है?
'ह्रीं' माया बीज है जो माता भुवनेश्वरी का प्रतिनिधित्व करता है और पराक्रम व शक्ति देता है। 'श्रीं' लक्ष्मी बीज है जो धन, ऐश्वर्य और शांति प्रदान करता है। दोनों के मिलन से यह महामंत्र बनता है।
3. इस नामावली के ध्यान श्लोक में देवी का स्वरूप कैसा बताया गया है?
ध्यान श्लोक (या सा पद्मासनस्था...) में देवी को कमल पर विराजमान, श्वेत वस्त्र धारण किए हुए, हाथ में कमल लिए हुए और दिव्य हाथियों द्वारा स्वर्ण कलशों से स्नान करते हुए (गजलक्ष्मी रूप में) वर्णित किया गया है।
4. क्या इस नामावली में चारों वर्णों के नाम आते हैं?
जी हाँ। इसमें ॐ ब्राह्मण्यै नमः, ॐ क्षत्रियायै नमः, ॐ वैश्यायै नमः, और ॐ शूद्रायै नमः जैसे नाम हैं, जो सिद्ध करते हैं कि माँ अम्बिका सम्पूर्ण समाज और चराचर जगत की आदिमाता हैं।
5. 'डाकिनी, शाकिनी, हाकिनी' नामों का यहाँ क्या रहस्य है?
ये तंत्र मार्ग की अत्यंत गूढ़ शक्तियां हैं और मानव शरीर के विभिन्न चक्रों (मूलाधार, अनाहत, आज्ञा आदि) की अधिष्ठात्री देवियां हैं। देवी अम्बिका इन सभी शक्तियों की परम स्वामिनी हैं।
6. जो व्यक्ति अकाल मृत्यु के भय से ग्रसित हो, उसे क्या लाभ होगा?
इस नामावली में 'मृत्युमारणायै' और 'मृत्युविनाशिन्यै' जैसे महाशक्तिशाली नाम हैं। इनका श्रद्धापूर्वक पाठ करने से अकाल मृत्यु का भय समाप्त होता है और दीर्घायु की प्राप्ति होती है।
7. क्या संगीत और कला से जुड़े लोग इसका पाठ कर सकते हैं?
अवश्य। देवी को 'गीतसङ्गीतायै', 'सप्तस्वरमयायै' और 'षद्जमध्यमधैवतायै' (सा रे ग म प ध नि सा की उत्पत्तिकर्ता) कहा गया है। कला साधकों के लिए यह मेधा और सुर सिद्धि देने वाला है।
8. नामावली का 108वाँ नाम क्या है और इसका क्या अर्थ है?
नामावली का अंतिम और 108वाँ नाम 'ॐ श्रीमहालक्ष्म्यै नमः' है। यह इस बात का प्रतीक है कि शक्ति की उपासना अंततः पूर्ण समृद्धि, वैभव और मंगल (महालक्ष्मी) की प्राप्ति पर पूर्ण होती है।
9. पाठ करते समय कौन से पुष्प चढ़ाना शुभ माना जाता है?
माँ अम्बिका और महालक्ष्मी रूप के लिए कमल (Lotus) का पुष्प सर्वश्रेष्ठ है। इसके अलावा लाल गुड़हल (Hibiscus) और लाल गुलाब चढ़ाना भी अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है।
10. क्या बिना दीक्षा के यह पाठ किया जा सकता है?
हाँ, नामावली का पाठ भक्ति मार्ग का हिस्सा है और इसे बिना किसी तांत्रिक दीक्षा के भी किया जा सकता है। केवल शारीरिक और मानसिक पवित्रता (सात्विकता) बनाए रखना आवश्यक है।