॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्री निग्रह वाराही मन्त्र जप प्रयोगः ॥
१. विनियोगः
अस्य शत्रुघातिनः मन्त्रस्य । कपिल ऋषिः । अनुष्टुप् छन्दः ।
वाराही वार्ताली देवता । ममभीष्ट सिद्धये जपे विनियोगः ॥
२. कर न्यासः
ऐँ ग्लौँ अङ्गुष्ठाभ्यं नमः ।दोनों तर्जनी (Index Fingers) को दोनों अंगूठों पर चलाएं। ठँ तर्जनीभ्यां नमः ।दोनों अंगूठों को दोनों तर्जनी पर चलाएं। ठँ मध्यमाभ्यां नमः ।दोनों अंगूठों को मध्यमा (Middle Fingers) पर चलाएं। ठँ अनामिकाभ्यां नमः ।दोनों अंगूठों को अनामिका (Ring Fingers) पर चलाएं। हूँ कनिष्टिखाभ्यां नमः ।दोनों अंगूठों को कनिष्ठा (Little Fingers) पर चलाएं। स्वाहा करतलकर पृष्ठाभ्यां नमः ।दाहिनी हथेली को बाईं हथेली के आगे और पीछे स्पर्श करें।
३. षडङ्ग न्यासः
ऐँ ग्लौँ हृदयाय नमः ।दाहिने हाथ की उंगलियों से हृदय का स्पर्श करें। ठँ शिरसे स्वाहा ।सिर के ऊपरी भाग का स्पर्श करें। ठँ शिखायै वषट् ।सिर के पीछे (शिखा स्थान) स्पर्श करें। ठँ कवचाय हुं ।दोनों हाथों को क्रॉस करके कंधों को स्पर्श करें। हूँ नेत्रत्रयाय वौषट् ।आँखों और आज्ञा चक्र का स्पर्श करें। स्वाहा अस्त्राय फट् ।बाईं हथेली पर दाहिने हाथ से तीन बार प्रहार करें। भूर्भुवस्सुवरोमिति दिग्बन्धः ॥चुटकी बजाते हुए दिशा बंधन करें।
४. ध्यानम्
विद्युद्रोचिर्हस्तपद्मैर्दधाना पाशं शक्तिं मुद्गरं चांकुशं च ।
नेत्रोद्भूतैर्वीतिहोत्रैस्त्रिनेत्रा वाराही नःशत्रुवर्घं क्षिणोतु ॥
(अर्थ: बिजली के समान कांति वाली, अपने करकमलों में पाश, शक्ति, मुद्गर और अंकुश धारण करने वाली, तीन नेत्रों वाली देवी निग्रह वाराही को नमन है। उनके नेत्रों से निकलने वाली अग्नि हमारे सभी शत्रुओं (नकारात्मकता) को जलाकर भस्म करे।)
५. पञ्चपूजा
लँ - पृथिव्यात्मिकायै गन्धं समर्पयामि।कनिष्ठा उंगली को अंगूठे से स्पर्श करें (गंध मुद्रा)। हँ - आकाशात्मिकायै पुष्पैः पूजयामि।अंगूठे को तर्जनी के नाखून से स्पर्श करें (पुष्प मुद्रा)। यँ - वाय्वात्मिकायै धूपमाघ्रापयामि।तर्जनी को अंगूठे से स्पर्श करें (धूप मुद्रा)। रँ - अग्न्यात्मिकायै दीपं दर्शयामि।मध्यमा को अंगूठे से स्पर्श करें (दीप मुद्रा)। वँ - अमृतात्मिकायै अमृतं महानैवेद्यं निवेदयामि।अनामिका को अंगूठे से स्पर्श करें (नैवेद्य मुद्रा)। सँ - सर्वात्मिकायै सर्वोपचार पूजाम् समर्पयामि॥दोनों हाथ जोड़कर नमस्कार करें।
६. जपमाला मन्त्रं
(माला पूजन)
ॐ मां माले महामाये सर्वमन्त्र स्वरूपिणि।
चतुर्वर्ग स्त्वयिन्यस्त स्तस्मान्ये सिद्धिदा भव॥
७. गुरु मन्त्र
ॐ ह्रीं सिद्धगुरो प्रसीद ह्रीं ॐ
८. मूल मन्त्र
(८ अक्षरों वाला शत्रु-निग्रह मंत्र)
ऐँ ग्लौँ ठँ ठँ ठँ हूँ स्वाहा ॥
(अर्थ: हे देवी निग्रह वाराही! ज्ञान (ऐँ) और स्थिरता (ग्लौँ) की शक्ति से, मेरे शत्रुओं को रोक दें (ठँ ठँ ठँ) और 'हूँ' कार से उनकी नकारात्मक शक्ति का शमन करें। मैं आपको समर्पित (स्वाहा) हूँ।)
९. षडङ्ग न्यासः
(जप के बाद पुन: न्यास करें - विधि पूर्ववत है)
१०. ध्यानम्
(जप के बाद पुन: ध्यान करें - विधि पूर्ववत है)
११. पञ्चपूजा
(जप के बाद पुन: पंचपूजा करें - विधि पूर्ववत है)
१२. समर्पणम्
गुह्यातिगुह्यगोप्त्री त्वं गृहाणास्मात्कृतं जपम्।
सिद्धिर्भवतु मे देवि त्वत्प्रसादान्मयि स्तिरा॥
(जप का फल देवी को अर्पित करें)
१३. जपानंतरं मालामन्त्रं
श्लोक॥ ॐ त्वं माले सर्वदेवानां प्रीतिदा शुभदा भव। शुभं कुरुष्य मे भद्रे यशो वीर्यं च देहिमे॥
मन्त्र॥ ॐ ह्रीं सिद्ध्यै नमः॥
१४. पुरश्चरण विधि
जप: ८,००,००० (आठ लाख) - सिद्धि के लिए। होम: ८०,००० (तर्पण, मार्जन और ब्राह्मण भोजन दशांश क्रम में)। सामान्य रूप से प्रतिदिन १०८ बार (१ माला) जाप पर्याप्त है।
निग्रह वाराही का रहस्य (Significance)
'निग्रह' (Nigraha) का अर्थ है—रोकना, दमन करना या पकड़ लेना। श्री निग्रह वाराही देवी का वह पुलिसिया (Commander) स्वरूप है जो अपराधियों (दुष्ट शक्तियों) को पकड़कर दंडित करती हैं। जब शत्रु हावी हो जाएँ, विरोध प्रबल हो जाए या कोई तांत्रिक प्रयोग पर हावी हो रहा हो, तब 'निग्रह वाराही' की शरण ली जाती है।
यह न केवल बाहरी शत्रुओं का निग्रह करती हैं, बल्कि हमारे आंतरिक शत्रुओं—क्रोध, घमंड, ईर्ष्या और लालच—को भी नियंत्रित करती हैं, ताकि हम आध्यात्मिक पथ से विचलित न हों।
मंत्र के बीजों का अर्थ (Decoding the Seeds)
यह ८ अक्षरों का लघु मंत्र परमाणु बम जैसी शक्ति रखता है:
- ऐँ (Aim): यह सरस्वती बीज है, जो ज्ञान और बुद्धि देता है ताकि हम संकट के समय सही निर्णय ले सकें।
- ग्लौँ (Glaum): यह पृथ्वी बीज है, जो स्तम्भन (रोकने) की शक्ति देता है। यह शत्रु की गति को जड़वत कर देता है।
- ठः ठः ठः (Tham): यह 'चंद्र बीज' का उग्र रूप है जो मानसिक शांति देते हुए भी शत्रुओं के लिए कठोर प्रहार है।
- हूँ (Hum): यह 'कवच' बीज है, जो साधक के चारों ओर अभेद्य सुरक्षा घेरा बनाता है।
साधना के लाभ (Benefits)
- शत्रु विजय: यह मंत्र विरोधियों को पूरी तरह से शांत और शक्तिहीन कर देता है। कोर्ट-कचहरी और वाद-विवाद में विजय मिलती है।
- बुरी नजर से रक्षा: यदि किसी ने कोई अभिचार (Black Magic) कर्म किया है, तो यह मंत्र उसे कर्ता के पास वापस भेज देता है।
- आत्म-नियंत्रण: यह साधक को अपनी इंद्रियों और मन पर नियंत्रण (Self-control) प्रदान करता है।
- भय मुक्ति: जीवन के किसी भी क्षेत्र में—चाहे वह परीक्षा हो, इंटरव्यू हो या युद्ध—यह मंत्र निर्भयता प्रदान करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. 'निग्रह' और 'अस्त्र' वाराही में क्या अंतर है?
'अस्त्र' वाराही का प्रयोग 'विनाश' (Destruction) के लिए होता है, जबकि 'निग्रह' वाराही का प्रयोग 'नियंत्रण' (Control/Restraint) के लिए होता है। यदि आप चाहते हैं कि शत्रु आपको परेशान करना बंद कर दे (बिना उसका विनाश हुए), तो निग्रह वाराही उत्तम है।
2. क्या इस मंत्र के लिए दीक्षा अनिवार्य है?
हाँ, यह एक तांत्रिक मंत्र है। "मंत्र महोदधि" के अनुसार, गुरु दीक्षा श्रेष्ठ है। यदि गुरु उपलब्ध न हों, तो भगवान शिव/भैरव को गुरु मानकर मानसिक अनुमति लेकर ही जाप करें।
3. क्या मैं पूरी प्रक्रिया (न्यास, पूजा) के बिना केवल मंत्र जाप कर सकता हूँ?
यदि आपके पास समय का अभाव है या आप दीक्षित नहीं हैं, तो केवल 'विनियोग' और 'ध्यान' करके मंत्र जाप कर सकते हैं। लेकिन पूर्ण फल और सुरक्षा के लिए न्यास सहित विधि करना ही उत्तम है।
4. जाप के लिए सही समय क्या है?
निग्रह वाराही की साधना रात्रि १० बजे के बाद या ब्रह्म मुहूर्त में करनी चाहिए। अमावस्या और अष्टमी की रातें विशेष फलदायी होती हैं।
5. कौन सी माला प्रयोग करें?
शत्रु निग्रह के लिए काली हल्दी या रुद्राक्ष की माला सर्वश्रेष्ठ है। माला संस्कारित (प्राण-प्रतिष्ठित) होनी चाहिए।
6. क्या मैं इसे ऑफिस/कार्यस्थल पर मन में जप सकता हूँ?
हाँ, आपात स्थिति में (जैसे बॉस या सहकर्मी से विवाद के समय) आप मानसिक रूप से इस मंत्र का जाप कर सकते हैं। यह तत्काल रक्षा कवच बनाता है।
7. भोग में क्या अर्पित करें?
माँ को गुड़ मिला हुआ अदरक (Ginger with Jaggery), अनार, नींबू चावल या उड़द दाल के बड़े प्रिय हैं।
8. 'कपिल ऋषि' का इस मंत्र से क्या संबंध है?
विनियोग में 'कपिल ऋषि' का नाम है। कपिल मुनि सांख्य दर्शन के प्रणेता और भगवान विष्णु के अवतार माने जाते हैं। उनका तेज ही इस मंत्र में समाहित है।
9. क्या यह मंत्र स्वास्थ्य लाभ देता है?
हाँ, मंत्र में 'ऐँ' (ज्ञान) और 'ग्लौँ' (पृथ्वी) बीज हैं जो मानसिक स्थिरता और शारीरिक शमन देते हैं, जिससे तनावजनित रोग दूर होते हैं।
10. मंत्र सिद्धि के लक्षण क्या हैं?
जब आपको स्वप्न में वराह, सिंह या लाल वस्त्र पहने स्त्री दिखाई दे, या आपके शत्रु अचानक शांत हो जाएँ और आपसे मित्रता का प्रयास करें, तो समझें मंत्र सिद्ध हो रहा है।
