॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्री वश्यवाराही महामन्त्र जप प्रयोगः ॥
१. विनियोगः
अस्य श्री वश्यवाराही महामन्त्रस्य । नारद ऋषिः । अनुष्टुप् छन्दः ।
श्री वश्यवाराही देवता । ऐँ बीजं । क्लीँ शक्तिः । ग्लौँ कीलकं ।
मम सर्व वशार्थे जपे विनियोगः ।
२. ऋष्यादि न्यासः
नारद ऋषये नमः शिरसि ।दाहिने हाथ की अनामिका (Ring Finger) और अंगूठे को मिलाकर सिर का स्पर्श करें। अनुष्टुप् छन्दसे नमः मुखे ।उसी मुद्रा (अनामिका-अंगूठा) से मुख (होठों) का स्पर्श करें। श्री वश्यवाराही देवतायै नमः हृदि ।दाहिनी हथेली (Right Palm) से हृदय का स्पर्श करें। ऐँ बीजाय नमः गुह्ये ।अनामिका और अंगूठे से गुप्तांग (Genitals) का स्पर्श करें। क्लीँ शक्तये नमः पादयोः ।अनामिका और अंगूठे से पैरों का स्पर्श करें। ग्लौँ कीलकाय नमः नाभौ ।अनामिका और अंगूठे से नाभि (Navel) का स्पर्श करें। मम सर्व वशार्थे जपे विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे ।दोनों हथेलियों को पूरे शरीर पर घुमाएं।
३. कर न्यासः
ॐ ऐँ अङ्गुष्ठाभ्यं नमः ।दोनों तर्जनी (Index Fingers) से दोनों अंगूठों को स्पर्श करें/चलाएं। ॐ क्लीँ तर्जनीभ्यां नमः ।दोनों अंगूठों से दोनों तर्जनी (Index Fingers) को स्पर्श करें। ॐ ग्लौँ मध्यमाभ्यां नमः ।दोनों अंगूठों से मध्यमा (Middle Fingers) को स्पर्श करें। ॐ अश्वरूढां अनामिकाभ्यां नमः ।दोनों अंगूठों से अनामिका (Ring Fingers) को स्पर्श करें। ॐ सर्ववश्यवाराह्यै कनिष्टिखाभ्यां नमः ।दोनों अंगूठों से कनिष्ठा (Little Fingers) को स्पर्श करें। ॐ मम सर्ववशङ्करि कुरु कुरु ठः ठः करतलकर पृष्ठाभ्यां नमः ।दोनों हथेलियों को खोलकर एक-दूसरे के आगे और पीछे स्पर्श करें (ताली बजाने जैसी मुद्रा लेकिन ध्वनि नहीं)।
४. षडङ्ग न्यासः
ॐ ऐँ हृदयाय नमः ।दाहिने हाथ की तर्जनी, मध्यमा और अनामिका से हृदय का स्पर्श करें। ॐ क्लीँ शिरसे स्वाहा ।मध्यमा और अनामिका से सिर के ऊपरी भाग का स्पर्श करें। ॐ ग्लौँ शिखायै वषट् ।दाहिने अंगूठे से सिर के पीछे (शिखा स्थान) स्पर्श करें। ॐ अश्वरूढां कवचाय हुं ।दोनों हाथों को क्रॉस करके कंधों को स्पर्श करें (कवच मुद्रा)। ॐ सर्ववश्यवाराह्यै नेत्रत्रयाय वौषट् ।तर्जनी और अनामिका से दोनों आँखों को और मध्यमा से आज्ञा चक्र (तीसरा नेत्र) को स्पर्श करें। ॐ मम सर्ववशङ्करि कुरु कुरु ठः ठः अस्त्राय फट् ।बाईं हथेली पर दाहिने हाथ की तर्जनी और मध्यमा से तीन बार हल्का प्रहार करें। भूर्भुवस्सुवरोमिति दिग्बन्धः ॥चुटकी बजाते हुए दसों दिशाओं को बांधें।
५. ध्यानम्
तारे तारिणि देवि विश्वजननी प्रौढप्रतापान्विते ।
तारे दिक्षु विपक्ष पक्ष दलिनि वाचाचलावारुणि ॥
लक्ष्मीकारिणीकीर्तिधारिणि महासौभाग्य सन्दायिनि ।
रूपं देहि यशश्च सततं वश्य जगत्यावृतम् ॥
(अर्थ: मैं उन ब्रह्मांडीय दिव्य माँ श्री वश्य वाराही को नमन करता हूँ जो महान पराक्रम रखती हैं, जो हमें हर प्रकार की कठिनाई और संकट से उबारने के लिए किसी भी प्रकार के घातक अस्त्रों को धारण करती हैं और चलाती हैं। वह सभी दिशाओं से अपनी कृपा प्रकट करती हैं, सभी विरोधों को कुचल देती हैं और विरोधियों को हमारे पक्ष में कर देती हैं, साथ ही हमारी वाणी को स्थिर करती हैं और भीतर मस्तिष्क द्रव को जागृत करती हैं, जो परम आनंद की गहरी अनुभूति प्रदान करता है। वह हमें विशाल और असीमित धन, शिक्षा, पद, उत्तम स्वास्थ्य और सभी प्रकार की समृद्धि प्रदान करती हैं और हमारी इच्छित हर वस्तु को आकर्षित करती हैं! वह सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञ हैं। हम उन पर ध्यान करें ताकि वे हमारी सभी इच्छाओं और कामनाओं को आकर्षित करें और पूरा करें।)
६. पञ्चपूजा
लँ - पृथिव्यात्मिकायै गन्धं समर्पयामि।दोनों हाथों की कनिष्ठा (Little Finger) के मूल (निचले पोर) को अंगूठे के अग्र भाग से स्पर्श करें। हँ - आकाशात्मिकायै पुष्पैः पूजयामि।दोनों हाथों के अंगूठों के मूल को तर्जनी (Index Finger) के नाखूनों से स्पर्श करें। यँ - वाय्वात्मिकायै धूपमाघ्रापयामि।दोनों हाथों की तर्जनी (Index Finger) के मूल को अंगूठे के अग्र भाग से स्पर्श करें। रँ - अग्न्यात्मिकायै दीपं दर्शयामि।दोनों हाथों की मध्यमा (Middle Finger) के मूल को अंगूठे के अग्र भाग से स्पर्श करें। वँ - अमृतात्मिकायै अमृतं महानैवेद्यं निवेदयामि।दोनों हाथों की अनामिका (Ring Finger) के मूल को अंगूठे के अग्र भाग से स्पर्श करें। सँ - सर्वात्मिकायै सर्वोपचार पूजाम् समर्पयामि॥दोनों हाथों को जोड़कर (नमस्ते मुद्रा) हृदय के पास रखें।
७. जपमाला मन्त्रं
(माला पूजन के लिए)
ॐ मां माले महामाये सर्वमन्त्र स्वरूपिणि ।
चतुर्वर्ग स्त्वयिन्यस्त स्तस्मान्ये सिद्धिदा भव ॥
८. गुरु मन्त्र
(गुरु आशीर्वाद के लिए)
ॐ ह्रीं सिद्धगुरो प्रसीद ह्रीं ॐ
९. मूल मन्त्र
(29 अक्षरों वाला महामंत्र)
ॐ ऐँ क्लीँ ग्लौँ अश्वरूढं सर्ववश्यवाराह्यै मम सर्ववशङ्करि कुरु कुरु ठः ठः ॥
(अर्थ: हे देवी वाराही! जो ज्ञान (ऐँ), आकर्षण (क्लीँ) और स्थिरता (ग्लौँ) की अधिष्ठात्री हैं और अश्व पर विराजमान होकर इंद्रियों और मन को नियंत्रित करती हैं। आप 'सर्व वश्य वाराही' के रूप में समस्त संसार को वश में करने वाली हैं। मेरे लिए सभी परिस्थितियों, जनों और बाधाओं को वश में करें और मुझे पूर्ण नियंत्रण व सिद्धि प्रदान करें। मेरी सभी नकारात्मकताओं को तत्काल दूर करें।)
१०. समर्पणम्
गुह्यातिगुह्यगोप्त्री त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपम्।
सिद्धिर्भवतु मे देवि त्वत्प्रसादान्मयि स्थिरा॥
(जप के अंत में जल छोड़ते हुए बोले)
११. जपानंतरं मालामन्त्रं
(माला को सिर पर लगाकर वापस झोली में रखते समय बोले)
॥ ॐ त्वं माले सर्वदेवानां प्रीतिदा शुभदा भव ।
शुभं कुरुष्य मे भद्रे यशो वीर्यं च देहिमे ॥
मन्त्र
॥ ॐ ह्रीं सिद्ध्यै नमः ॥
१२. पुरश्चरण विधि
इस मंत्र की सिद्धि के लिए ४८ दिनों (एक मंडल) की साधना विशेष फलदायी मानी जाती है। समय: ब्रह्म मुहूर्त (सुबह ४ से ६ बजे) या रात्रि १० बजे के बाद। जप संख्या: प्रतिदिन १०८ या १००८ बार (१ या १० माला)। नैवेद्य (भोग): अनार, नींबू चावल (लोमन राइस), शकरकंद या उबले हुए चने। नियम: साधना काल में ब्रह्मचर्य का पालन करें, भूमि पर शयन करें (यदि संभव हो) और सात्विक भोजन ग्रहण करें।
श्री वश्यवाराही महामन्त्र: शक्ति, साधना और रहस्य
श्री वश्यवाराही महामन्त्र (Sri Vasya Varahi Maha Mantra) केवल एक प्रार्थना नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय ऊर्जा का एक शक्तिशाली स्त्रोत है। ललिता सहस्रनाम और तंत्र शास्त्रों में वर्णित, देवी वाराही (Goddess Varahi) भगवान विष्णु के वराह अवतार की स्त्री शक्ति हैं और श्री ललिता त्रिपुरसुन्दरी की सेना की 'दंडिनी' (Commander-in-Chief) हैं।
यह २९ अक्षरों का महामंत्र साधक के जीवन में असंभव को संभव बनाने की क्षमता रखता है। यह मंत्र मुख्य रूप से आकर्षण, शत्रुओं पर विजय और भौतिक अभिलाषाओं की पूर्ति के लिए जाना जाता है।
देवी वश्य वाराही कौन हैं? (Significance)
'सप्तमातृकाओं' में प्रमुख, देवी वाराही का मुख वराह (wild boar) का है, जो उनकी 'अजेयता' और 'भूमि तत्व' पर पकड़ को दर्शाता है।
तंत्र शास्त्र में 'वश्य' (Vasya) का अर्थ है—सम्मोहन या आकर्षण। वश्य वाराही वह स्वरूप है जो:
- साधक को ब्रह्मांड की सकारात्मक ऊर्जाओं के केंद्र में ले आता है।
- अश्वारूढ़ा (घोड़े पर सवार) होकर मन और इंद्रियों की चंचलता को नियंत्रित करती हैं।
- शत्रुओं की वाणी, बुद्धि और गति का स्तम्भन (रोकना) करती हैं।
२९ अक्षरों के मंत्र का रहस्य (The 29-Syllable Mantra)
इस महामंत्र—"ॐ ऐँ क्लीँ ग्लौँ अश्वरूढं सर्ववश्यवाराह्यै मम सर्ववशङ्करि कुरु कुरु ठः ठः"—में समाहित बीज मंत्र अत्यंत शक्तिशाली हैं:
- ऐँ (Aim): सरस्वती बीज। यह साधक को वाक-सिद्धि, बुद्धि और ज्ञान प्रदान करता है।
- क्लीँ (Kleem): काम बीज। यह आकर्षण, चुंबकीय व्यक्तित्व और इच्छा पूर्ति की शक्ति देता है।
- ग्लौँ (Glaum): पृथ्वी/स्तम्भन बीज। यह स्थिरता, भूमि-भवन सुख और शत्रुओं को रोकने की क्षमता देता है।
- ठः ठः (Thah Thah): यह अस्त्र बीज है, जो नकारात्मकता को जलाकर भस्म कर देता है और सुरक्षा घेरा बनाता है।
मंत्र साधना के विस्तृत लाभ (Comprehensive Benefits)
- शत्रु पराजय और सुरक्षा: यह मंत्र गुप्त और प्रत्यक्ष शत्रुओं का नाश करता है। कोर्ट-कचहरी के मामलों और विरोधियों के षड्यंत्रों से यह अचूक सुरक्षा प्रदान करता है।
- प्रचंड वशीकरण और आकर्षण: साधक के व्यक्तित्व में सूर्य जैसा तेज और चंद्रमा जैसी शीतलता आती है। समाज, परिवार और कार्यक्षेत्र में लोग आपकी बातों से प्रभावित होते हैं।
- आर्थिक समृद्धि और भूमि लाभ: चूंकि वाराही 'भूमि देवी' हैं, इसलिए रियल एस्टेट, खेती और संपत्ति से जुड़े विवादों में यह मंत्र चमत्कारिक फल देता है।
- तंत्र बाधा और नजर दोष निवारण: काले जादू, बुरी नजर या किसी भी प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा को यह मंत्र तत्काल नष्ट कर देता है।
४८ दिवसीय साधना विधि (48-Day Sadhana Procedure)
इस मंत्र की पूर्ण सिद्धि के लिए 'मंडल साधना' (४८ दिन) का विधान है। इसे किसी भी शुक्ल पक्ष की पंचमी, अष्टमी या शुक्रवार से शुरू करें।
- संकल्प: पहले दिन हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर अपनी मनोकामना बोलें और ४८ दिनों तक नियम पालन का संकल्प लें।
- समय: मंत्र जाप के लिए मध्य रात्रि (१० बजे के बाद) या ब्रह्म मुहूर्त (सुबह ४-६) सबसे शक्तिशाली समय है। वाराही 'रात्रि देवता' हैं, इसलिए रात की साधना शीघ्र फलदायी होती है।
- दिशा और आसन: उत्तर दिशा की ओर मुख करें। लाल रंग के ऊनी आसन का प्रयोग करें।
- वस्त्र और माला: लाल वस्त्र धारण करना अनिवार्य है। लाल चंदन या रुद्राक्ष की माला से ही जाप करें।
- दीपक: साधना काल में घी का दीपक (दाहिनी ओर) और तेल का दीपक (बाईं ओर) जलाएं।
- नैवेद्य (Bhog): उन्हें खट्टी चीजें पसंद हैं। भोग में नींबू भात (Lemon Rice), अनार, शकरकंद, उड़द दाल का बड़ा या गुड़-चना अर्पित करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. क्या श्री वश्यवाराही मंत्र का जाप कोई भी कर सकता है?
हाँ, भक्ति भाव से कोई भी इसका जाप कर सकता है। लेकिन चूंकि यह एक 'तांत्रिक बीजाक्षर' युक्त मंत्र है, इसलिए किसी गुरु से दीक्षा लेना या कम से कम भगवान शिव/भैरव को गुरु मानकर अनुमति लेना सुरक्षित और अधिक फलदायी होता है।
2. क्या महिलाएं मासिक धर्म के दौरान यह साधना कर सकती हैं?
नहीं, मासिक धर्म के दौरान साधना को विराम देना चाहिए। उन दिनों की गिनती ४८ दिनों में नहीं की जाएगी। शुद्धि के बाद साधना को वहीं से आगे बढ़ाएं जहाँ छोड़ा था।
3. 'वश्य' (Vasya) का वास्तविक अर्थ क्या है, क्या यह किसी को जबरदस्ती वश में करना है?
नहीं। अध्यात्म में 'वश्य' का अर्थ है—अपने आंतरिक शत्रुओं (क्रोध, लोभ) को वश में करना और बाहरी दुनिया में सकारात्मक परिस्थितियों को आकर्षित करना। यह प्रेम और सम्मान पाने के लिए है, किसी की इच्छा शक्ति के विरुद्ध नियंत्रण के लिए नहीं।
4. साधना के दौरान किन नियमों का पालन अनिवार्य है?
साधना काल में पूर्ण ब्रह्मचर्य, सात्विक भोजन (लहसुन-प्याज का त्याग), भूमि शयन (यदि संभव हो) और वाणी में मधुरता रखना अनिवार्य है। किसी की निंदा या क्रोध करने से ऊर्जा नष्ट हो जाती है।
5. यदि ४८ दिन की साधना न कर सकें, तो सामान्य पूजा कैसे करें?
आप नित्य पूजा में १०८ बार (१ माला) जाप कर सकते हैं। यह भी धीरे-धीरे प्रभाव दिखाता है और जीवन में रक्षा कवच का काम करता है।
6. वाराही देवी को कौन से फूल सबसे प्रिय हैं?
उन्हें लाल रंग अति प्रिय है। लाल गुड़हल (Hibiscus), लाल गुलाब या लाल कनेर के पुष्प अर्पित करें। यदि फूल न मिलें तो लाल अक्षत (कुंकुम रंगे चावल) चढ़ाएं।
7. 'अश्वारूढा' (Ashwarudha) स्वरूप का क्या महत्व है?
घोड़ा 'मन' और 'इंद्रियों' का प्रतीक है। अश्वारूढा वाराही का अर्थ है—वह शक्ति जिसने मन की चंचलता पर विजय प्राप्त कर ली है। इस स्वरूप के ध्यान से मन एकाग्र होता है और निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है।
8. क्या यह मंत्र कर्ज मुक्ति में सहायक है?
जी हाँ, मंत्र में 'ग्लौँ' (Glaum) बीज है जो पृथ्वी तत्व का है। यह भूमि-संपत्ति और धन के प्रवाह को स्थिर करता है, जिससे कर्ज उतरने के रास्ते खुलते हैं।
9. साधना में अगर कोई गलती हो जाए तो क्या करें?
अंत में हमेशा 'क्षमा प्रार्थना' करें। "आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्..." का पाठ करें या सरल भाषा में माँ से अनजाने में हुई भूल के लिए क्षमा मांगें। माँ अपने भक्तों को क्षमा अवश्य करती हैं।
10. स्वप्न वाराही (Swapna Varahi) क्या है?
यह वाराही साधना की एक उच्च अवस्था है। जब साधक सिद्ध हो जाता है, तो देवी उसे स्वप्न में आकर भविष्य की घटनाओं, समस्याओं के समाधान और मार्गदर्शन प्रदान करती हैं।
