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श्री वाराही निग्रहाष्टकम्

Sri Varahi Nigraha Ashtakam — शत्रुनाश का अमोघ उग्र स्तोत्र

श्री वाराही निग्रहाष्टकम्
॥ श्री वाराही निग्रहाष्टकम् ॥ देवि क्रोडमुखि त्वदङ्घ्रिकमलद्वन्द्वानुरक्तात्मने मह्यं द्रुह्यति यो महेशि मनसा कायेन वाचा नरः । तस्याशु त्वदयोग्रनिष्ठुरहलाघातप्रभूतव्यथा- -पर्यस्यन्मनसो भवन्तु वपुषः प्राणाः प्रयाणोन्मुखाः ॥ १॥ देवि त्वत्पदपद्मभक्तिविभवप्रक्षीणदुष्कर्मणि प्रादुर्भूतनृशंसभावमलिनां वृत्तिं विधत्ते मयि । यो देही भुवने तदीयहृदयान्निर्गत्वरैर्लोहितैः सद्यः पूरयसे कराब्जचषकं वाञ्छाफलैर्मामपि ॥ २॥ चण्डोत्तुण्डविदीर्णदंष्ट्रहृदयप्रोद्भिन्नरक्तच्छटा हालापानमदाट्‍टहासनिनदाटोपप्रतापोत्कटम् । मातर्मत्परिपन्थिनामपहृतैः प्राणैस्त्वदङ्घ्रिद्वयं ध्यानोद्दामरवैर्भवोदयवशात्सन्तर्पयामि क्षणात् ॥ ३॥ श्यामां तामरसाननाङ्घ्रिनयनां सोमार्धचूडां जग- -त्त्राणव्यग्रहलायुधाग्रमुसलां सन्त्रासमुद्रावतीम् । ये त्वां रक्तकपालिनीं हरवरारोहे वराहाननां भावैः सन्दधते कथं क्षणमपि प्राणन्ति तेषां द्विषः ॥ ४॥ विश्वाधीश्वरवल्लभे विजयसे या त्वं नियन्त्र्यात्मिका भूतान्ता पुरुषायुषावधिकरी पाकप्रदाकर्मणाम् । त्वां याचे भवतीं किमप्यवितथं यो मद्विरोधीजन- -स्तस्यायुर्मम वाञ्छितावधिभवेन्मातस्तवैवाज्ञया ॥ ५॥ मातः सम्यगुपासितुं जडमतिस्त्वां नैव शक्नोम्यहं यद्यप्यन्वितदैशिकाङ्घ्रिकमलानुक्रोशपात्रस्य मे । जन्तुः कश्चन चिन्तयत्यकुशलं यस्तस्य तद्वैशसं भूयाद्देवि विरोधिनो मम च ते श्रेयः पदासङ्गिनः ॥ ६॥ वाराही व्यथमानमानसगलत्सौख्यं तदाशाबलिं सीदन्तं यमपाकृताध्यवसितं प्राप्ताखिलोत्पादितम् । क्रन्दद्बन्धुजनैः कलङ्किततुलं कण्ठव्रणोद्यत्कृमि पश्यामि प्रतिपक्षमाशु पतितं भ्रान्तं लुठन्तं मुहुः ॥ ७॥ वाराही त्वमशेषजन्तुषु पुनः प्राणात्मिका स्पन्दसे शक्तिव्याप्तचराचरा खलु यतस्त्वामेतदभ्यर्थये । त्वत्पादाम्बुजसङ्गिनो मम सकृत्पापं चिकीर्षन्ति ये तेषां मा कुरु शङ्करप्रियतमे देहान्तरावस्थितिम् ॥ ८॥ ॥ इति श्रीवाराहीनिग्रहाष्टकम् सम्पूर्णम् ॥

अति-आवश्यक चेतावनी (Critical Warning)

यह 'निग्रह' अष्टकम है, जिसका प्रयोग केवल प्राण-रक्षा के लिए किया जाना चाहिए। छोटी-मोटी शत्रुता के लिए पाठ करने से उल्टा प्रभाव हो सकता है। बिना गुरु आज्ञा के न पढ़ें। सामान्य कल्याण हेतु वाराही अनुग्रह अष्टकम पढ़ें।

श्री वाराही निग्रहाष्टकम् — तंत्र जगत का सबसे उग्र शत्रुनाश स्तोत्र

श्री वाराही निग्रहाष्टकम् (Sri Varahi Nigraha Ashtakam) तंत्र शास्त्र का एक अत्यंत विस्फोटक और शक्तिशाली स्तोत्र है। 'निग्रह' शब्द संस्कृत में 'नि' (पूर्णतः) + 'ग्रह' (पकड़ना/नियंत्रित करना) से बना है — अर्थात शत्रुओं को पूरी तरह नष्ट या नियंत्रित करना। यह वाराही देवी के क्रोडमुखी (वराह मुख वाली) उग्र स्वरूप का आह्वान करता है।
जब जीवन में शत्रुओं का भय इतना बढ़ जाए कि प्राणों पर संकट आ जाए, या कोई तांत्रिक प्रयोग (अभिचार/Black Magic) से परिवार को नष्ट कर रहा हो, तब इस अष्टकम का प्रयोग 'ब्रह्मास्त्र' के समान अंतिम उपाय के रूप में किया जाता है। इसमें देवी से शत्रुओं के सीधे विनाश की प्रार्थना है — कोई भी श्लोक क्षमा या शांति की बात नहीं करता।
यह अष्टकम अनुग्रहाष्टकम् का विपरीत (Counter) है। जहाँ अनुग्रहाष्टकम् में देवी की कृपा, सुख और समृद्धि माँगी जाती है, वहीं निग्रहाष्टकम् में शत्रु का रक्त, पतन और मृत्यु माँगी गई है। दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं — अनुग्रह = भक्तों पर कृपा, निग्रह = शत्रुओं पर प्रहार। तांत्रिक परंपरा में इन दोनों का संतुलन आवश्यक माना गया है।
शब्दार्थ — श्लोक 8: "तेषां मा कुरु शङ्करप्रियतमे देहान्तरावस्थितिम्" — "हे शंकर की प्रियतमे! मेरे शत्रुओं को देहान्तर (अगला जन्म) भी न दो।" यह सबसे उग्र प्रार्थना है — शत्रु को पुनर्जन्म से भी वंचित करने की माँग। इसीलिए बिना गुरु आज्ञा के पढ़ना वर्जित है।

8 श्लोकों का विश्लेषण — निग्रह के 4 स्तर

श्लोक 1-2 — शारीरिक विनाश: "प्राणाः प्रयाणोन्मुखाः" — जो मुझसे द्रोह करे, उसके प्राण निकलने लगें। श्लोक 2 में देवी के कराब्ज चषक शत्रु के रक्त से भरने की प्रार्थना।
श्लोक 3-4 — उग्र रूप ध्यान: "चण्डोत्तुण्ड... हालापानमदाट्‍टहास" — भयंकर दाँतों वाली, हाला पीकर अट्टहास करती, रक्तकपालिनी, श्यामवर्णा देवी। जो इस रूप का ध्यान करे, उसके शत्रु एक क्षण भी जीवित नहीं रहते
श्लोक 5-6 — आयु नियंत्रण: "भूतान्ता पुरुषायुषावधिकरी" — देवी सबकी आयु सीमा निर्धारित करती हैं। शत्रु की आयु मेरी इच्छानुसार समाप्त हो। जो मेरा अकुशल सोचे, वही बुराई उस पर लौटे
श्लोक 7-8 — पूर्ण विनाश: "पश्यामि प्रतिपक्षमाशु पतितं भ्रान्तं लुठन्तं मुहुः" — शत्रुओं को गिरते, तड़पते, पागल, लुढ़कते देखूं। श्लोक 8 — शत्रु को पुनर्जन्म भी न मिले

गोपनीय पाठ विधि — अनुग्रह से पूर्णतः भिन्न

समय: केवल मध्यरात्रि (11 PM - 1 AM) या अमावस्या। (अनुग्रह सूर्योदय/संध्या में, निग्रह अँधेरे में।)
दीपक: सरसों तेल का दीपक। (अनुग्रह = घी/तिल, निग्रह = सरसों — तांत्रिक नियम।)
दिशा: दक्षिण (South) — यमराज की दिशा। (सामान्य पूजा में उत्तर/पूर्व।)
वस्त्र: काले या लाल वस्त्र। ऊनी आसन। काले तिल, राई, खट्टे फल अर्पित।
अवधि: 3, 5 या 7 दिन (विषम संख्या)। समस्या सुलझते ही तुरंत बंद करें और अनुग्रह अष्टकम पर लौटें।

FAQ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. वाराही निग्रहाष्टकम् क्या है?

शत्रुओं के पूर्ण विनाश हेतु देवी वाराही का उग्र 8 श्लोकों वाला स्तोत्र। प्राण-रक्षा और तांत्रिक बाधा निवारण के लिए अंतिम उपाय — 'ब्रह्मास्त्र' के समान।

2. निग्रह और अनुग्रह अष्टकम में क्या अंतर है?

अनुग्रह = कृपा, सुख, नित्य पाठ, घी/तिल, प्रातः/संध्या, उत्तर दिशा। निग्रह = शत्रु दमन, आपातकालीन, सरसों तेल, मध्यरात्रि, दक्षिण दिशा।

3. क्या इसे रोज पढ़ सकते हैं?

बिलकुल नहीं। केवल 3, 5 या 7 दिन विपत्ति काल में। समस्या सुलझते ही अनुग्रह अष्टकम पर लौटें।

4. पाठ कब और कैसे करें?

मध्यरात्रि (11 PM - 1 AM) या अमावस्या। दक्षिण दिशा, सरसों तेल दीपक, काले/लाल वस्त्र, ऊनी आसन।

5. क्या गर्भवती महिलाएं पढ़ सकती हैं?

बिल्कुल नहीं। पाठ और श्रवण दोनों से पूर्णतः दूर रहें।

6. क्रोडमुखी का क्या अर्थ है?

क्रोड = वराह मुख। क्रोडमुखी = वराह मुख वाली देवी — उग्र शत्रुसंहारक स्वरूप। हलायुध और मुसल धारण करती हैं।

7. "देहान्तरावस्थितिम्" का अर्थ?

श्लोक 8 — "शत्रुओं को अगला शरीर (पुनर्जन्म) भी न दो।" सबसे उग्र प्रार्थना — इस जन्म और अगले जन्म दोनों में विनाश।

8. सरसों का तेल क्यों?

तांत्रिक नियम: अनुग्रह में घी/तिल, निग्रह में सरसों, उच्चाटन में अरण्डी। कार्य के अनुसार तेल बदलता है।

9. क्या बिना गुरु दीक्षा के पढ़ सकते हैं?

सामान्य पाठ भक्तिपूर्वक कर सकते हैं। विशेष निग्रह प्रयोग हेतु गुरु अनिवार्य — यह 'दोधारी तलवार' है।

10. तांत्रिक बाधा निवारण कैसे?

मारण/विद्वेषण प्रयोग पलटकर प्रेषक पर लौटता है। श्लोक 6: "तद्वैशसं भूयात्" — वही विनाश उस पर हो। साधक के चारों ओर अग्नि-कवच बनता है।