॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्री काली सहस्राक्षरी ॥
ओं क्रीं क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं हूं हूं दक्षिणे कालिके क्रीं क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं हूं हूं स्वाहा शुचिजाया महापिशाचिनी दुष्टचित्तनिवारिणी क्रीं कामेश्वरी वीं हं वाराहिके ह्रीं महामाये खं खः क्रोधाधिपे श्रीमहालक्ष्यै सर्वहृदयरञ्जनि वाग्वादिनीविधे त्रिपुरे हस्रिं हसकहलह्रीं हस्रैं ओं ह्रीं क्लीं मे स्वाहा ओं ओं ह्रीं ईं स्वाहा दक्षिण कालिके क्रीं हूं ह्रीं स्वाहा खड्गमुण्डधरे कुरुकुल्ले तारे ओं ह्रीं नमः भयोन्मादिनी भयं मम हन हन पच पच मथ मथ फ्रें विमोहिनी सर्वदुष्टान् मोहय मोहय हयग्रीवे सिंहवाहिनी सिंहस्थे अश्वारुढे अश्वमुरिप विद्राविणी विद्रावय मम शत्रून् ये मां हिंसितुमुद्यतास्तान् ग्रस ग्रस महानीले बलाकिनी नीलपताके क्रें क्रीं क्रें कामे सङ्क्षोभिणी उच्छिष्टचाण्डालिके सर्वजगद्वशमानय वशमानय मातङ्गिनी उच्छिष्टचाण्डालिनी मातङ्गिनी सर्ववशङ्करी नमः स्वाहा विस्फारिणी कपालधरे घोरे घोरनादिनी भूर शत्रून् विनाशिनी उन्मादिनी रों रों रों रीं ह्रीं श्रीं ह्सौः सौं वद वद क्लीं क्लीं क्लीं क्रीं क्रीं क्रीं कति कति स्वाहा काहि काहि कालिके शम्बरघातिनी कामेश्वरी कामिके ह्रं ह्रं क्रीं स्वाहा हृदयाहये ओं ह्रीं क्रीं मे स्वाहा ठः ठः ठः क्रीं ह्रं ह्रीं चामुण्डे हृदयजनाभि असूनवग्रस ग्रस दुष्टजनान् अमून शङ्खिनी क्षतजचर्चितस्तने उन्नतस्तने विष्टम्भकारिणि विद्याधिके श्मशानवासिनी कलय कलय विकलय विकलय कालग्राहिके सिंहे दक्षिणकालिके अनिरुद्धये ब्रूहि ब्रूहि जगच्चित्रिरे चमत्कारिणि हं कालिके करालिके घोरे कह कह तडागे तोये गहने कानने शत्रुपक्षे शरीरे मर्दिनि पाहि पाहि अम्बिके तुभ्यं कल विकलायै बलप्रमथनायै योगमार्ग गच्छ गच्छ निदर्शिके, देहिनि, दर्शनं देहि देहि मर्दिनि महिषमर्दिन्यै स्वाहा, रिपून् दर्शने दर्शय दर्शय सिंहपूरप्रवेशिनि वीरकारिणि क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं फट् स्वाहा शक्तिरूपायै रों वा गणपायै रों रों रों व्यामोहिनि यन्त्रनिके महाकायायै प्रकटवदनायै लोलजिह्वायै मुण्डमालिनि महाकालरसिकायै नमो नमः ब्रह्मरन्ध्रमेदिन्यै नमो नमः शत्रुविग्रहकलहान् त्रिपुरभोगिन्यै विषज्वालामालिनी तन्त्रनिके मेघप्रभे शवावतंसे हंसिके कालि कपालिनि कुल्ले कुरुकुल्ले चैतन्यप्रभे प्रज्ञे तु साम्राज्ञि ज्ञान ह्रीं ह्रीं रक्ष रक्ष ज्वालाप्रचण्डचण्डिकेयं शक्तिमार्तण्डभैरवि विप्रचित्तिके विरोधिनि आकर्णय आकर्णय पिशिते पिशितप्रिये नमो नमः खः खः खः मर्दय मर्दय शत्रून् ठः ठः ठः कालिकायै नमो नमः ब्राह्म्यै नमो नमः माहेश्वर्यै नमो नमः कौमार्यै नमो नमः वैष्णव्यै नमो नमः वाराह्यै नमो नमः इन्द्राण्यै नमो नमः चामुण्डायै नमो नमः अपराजितायै नमो नमः नारसिंहिकायै नमो नमः कालि महाकालिके अनिरुद्धके सरस्वति फट् स्वाहा पाहि पाहि ललाटं भल्लाटनी अस्त्रीकले जीववहे वाचं रक्ष रक्ष परविद्यां क्षोभय क्षोभय आकृष्य आकृष्य कट कट महामोहिनिके चीरसिद्धिके कृष्णरूपिणी अञ्जनसिद्धिके स्तम्भिनि मोहिनि मोक्षमार्गानि दर्शय दर्शय स्वाहा ॥
॥ इति श्री काली सहस्राक्षरी सम्पूर्णा ॥
संलिखित ग्रंथ
सहस्राक्षरी - परिचय
श्री काली सहस्राक्षरी का अर्थ है 1000 अक्षरों वाला मंत्र। यह अत्यंत शक्तिशाली तांत्रिक महामंत्र है।
विशेषता: इस एक मंत्र में अनेक देवी-शक्तियों का आह्वान है - दक्षिण काली, कामेश्वरी, वाराही, त्रिपुरा, मातंगी, चामुण्डा, अष्टमातृका और अनेक विद्याएं।
मंत्र में आह्वानित शक्तियाँ
| शक्ति | विशेषता |
|---|---|
| दक्षिण कालिके | मूल देवता, क्रीं ह्रीं हूं बीज |
| कामेश्वरी | काम(इच्छा)पूर्ति |
| वाराहिके | शत्रु संहार |
| महामाया | मोहन शक्ति |
| त्रिपुरे | त्रिपुरसुंदरी |
| कुरुकुल्ले तारे | आकर्षण, तारा देवी |
| मातंगिनी | वश्यकारिणी |
| चामुण्डे | दुष्ट संहार |
| महिषमर्दिनी | शत्रु मर्दन |
| हयग्रीवे | ज्ञान शक्ति |
अष्टमातृका - आठ माताएं
मंत्र के अंत में अष्टमातृकाओं को नमन है:
1. ब्राह्मी - ब्रह्मा शक्ति
2. माहेश्वरी - शिव शक्ति
3. कौमारी - कार्तिकेय शक्ति
4. वैष्णवी - विष्णु शक्ति
5. वाराही - वराह शक्ति
6. इन्द्राणी - इन्द्र शक्ति
7. चामुण्डा - देवी शक्ति
8. अपराजिता - अजेय शक्ति
इसके अतिरिक्त नारसिंहिका (नृसिंह शक्ति) को भी नमन।
मंत्र में प्रार्थनाएं
✓मोहय मोहय: शत्रुओं को मोहित करो
✓विद्रावय शत्रून्: शत्रुओं को भगाओ
✓ग्रस ग्रस: (शत्रुओं को) निगल जाओ
✓वशमानय: वश में करो
✓पाहि पाहि: रक्षा करो
✓रक्ष रक्ष: रक्षा करो
✓दर्शय दर्शय: दर्शन दो
✓मोक्षमार्गानि दर्शय: मोक्ष का मार्ग दिखाओ
मंत्र के प्रमुख बीज
| बीज | देवता | शक्ति |
|---|---|---|
| क्रीं | काली | संहार, शुद्धि |
| ह्रीं | भुवनेश्वरी | माया, आकर्षण |
| हूं | भैरव | उच्चाटन, कूर्च |
| क्लीं | कामदेव | आकर्षण, मोहन |
| श्रीं | लक्ष्मी | धन, ऐश्वर्य |
| फट् | अस्त्र | प्रहार, विनाश |
| स्वाहा | अग्नि | समर्पण, आहुति |
विशेष सिद्धियाँ
मंत्र में कुछ विशेष सिद्धियों का उल्लेख है:
- अञ्जनसिद्धि: अंजन (काजल) द्वारा सिद्धि - गुप्त वस्तुएं देखना
- चीरसिद्धि: वस्त्र द्वारा सिद्धि
- स्तम्भिनि: स्तम्भन शक्ति - शत्रु को जड़ करना
- मोहिनि: मोहन शक्ति
- मोक्षमार्ग दर्शन: मुक्ति का मार्ग
FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. "सहस्राक्षरी" का क्या अर्थ है?
सहस्र = 1000, अक्षरी = अक्षरों वाला। अर्थात 1000 अक्षरों वाला मंत्र।
2. क्या बिना दीक्षा के जप कर सकते हैं?
यह उच्च स्तरीय तांत्रिक मंत्र है। जप के लिए गुरु दीक्षा आवश्यक है। श्रवण और पाठ लाभकारी है।
3. इसमें कितनी देवियां हैं?
मुख्य रूप से दक्षिण काली, साथ में कामेश्वरी, वाराही, त्रिपुरा, मातंगी, चामुण्डा, अष्टमातृका आदि अनेक शक्तियां।
4. "उच्छिष्टचाण्डालिके" कौन हैं?
उच्छिष्ट मातंगी - दशमहाविद्या की एक विद्या। वश्यकारी शक्ति।
5. "कुरुकुल्ले" कौन हैं?
कुरुकुल्ला - आकर्षण की देवी, लाल तारा का स्वरूप।
6. मंत्र का मुख्य उद्देश्य क्या है?
शत्रु नाश, वशीकरण, रक्षा और अंततः मोक्षमार्ग दर्शन - मंत्र के अंतिम शब्द यही हैं।
