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श्री वाराही (वार्ताली) मूल मन्त्र

Sri Varahi Vartali Moola Mantra — 114 अक्षरों का महामन्त्र

श्री वाराही (वार्ताली) मूल मन्त्र
॥ श्री वाराही (वार्ताली) मूल मन्त्र ॥ ॥ विनियोगः ॥ अस्य श्री वार्ताली मन्त्रस्य शिव ऋषिः जगती छन्दः वार्ताली देवता ग्लौं बीजं स्वाहा शक्तिः मम अखिलावाप्तये जपे विनियोगः ॥ ॥ ऋष्यादिन्यासः ॥ ओं शिव ऋषये नमः शिरसि । जगती छन्दसे नमः मुखे । वार्ताली देवतायै नमो हृदि । ग्लौं बीजाय नमो लिङ्गे । स्वाहा शक्तये नमः पादयोः । विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे । ॥ करन्यासः ॥ ओं वार्तालि अङ्गुष्ठाभ्यां नमः । ओं वाराहि तर्जनीभ्यां नमः । ओं वाराहमुखि मध्यमाभ्यां नमः । ओं अन्धे अन्धिनि अनामिकाभ्यां नमः । ओं रुन्धे रुन्धिनि कनिष्ठिकाभ्यां नमः । ओं जम्भे जम्भिनि करतल करपृष्ठाभ्यां नमः । ॥ हृदयादिन्यासः ॥ ओं वार्तालि हृदयाय नमः । ओं वाराहि शिरसे स्वाहा । ओं वाराहमुखि शिखायै वषट् । ओं अन्धे अन्धिनि कवचाय हुम् । ओं रुन्धे रुन्धिनि नेत्रत्रयाय वौषट् । ओं जम्भे जम्भिनि अस्त्राय फट् । ॥ ध्यानम् ॥ रक्ताम्भोरुहकर्णिकोपरिगते शावासने संस्थितां मुण्डस्रक्परिराजमानहृदयां नीलाश्मसद्रोचिषम् । हस्ताब्जैर्मुसलं हलाऽभयवरान् सम्बिभ्रतीं सत्कुचां वार्तालीमरुणाम्बरां त्रिनयनां वन्दे वराहाननाम् ॥ ॥ पञ्चपूजा ॥ लं – पृथिव्यात्मिकायै गन्धं परिकल्पयामि । हं – आकाशात्मिकायै पुष्पं परिकल्पयामि । यं – वाय्वात्मिकायै धूपं परिकल्पयामि । रं – अग्न्यात्मिकायै दीपं परिकल्पयामि । वं – अमृतात्मिकायै अमृतनैवेद्यं परिकल्पयामि । सं – सर्वात्मिकायै सर्वोपचारान् परिकल्पयामि । ॥ अथ चतुर्दशोत्तरशताक्षरि मन्त्रः ॥ ओं ऐं ग्लौं ऐं नमो भगवति वार्तालि वाराहि वाराहमुखि ऐं ग्लौं ऐं अन्धे अन्धिनि नमो रुन्धे रुन्धिनि नमो जम्भे जम्भिनि नमो मोहे मोहिनि नमः स्तम्भे स्तम्भिनि नमः ऐं ग्लौं ऐं सर्व दुष्ट प्रदुष्टानां सर्वेषां सर्व वाक् पद चित्त चक्षुर्मुख गति जिह्वा स्तम्भनं कुरु कुरु शीघ्रं वशं कुरु कुरु ऐं ग्लौं ऐं ठः ठः ठः ठः हुं फट् स्वाहा ॥ ॥ हृदयादिन्यासः (पुनः) ॥ ओं वार्तालि हृदयाय नमः । ओं वाराहि शिरसे स्वाहा । ओं वाराहमुखि शिखायै वषट् । ओं अन्धे अन्धिनि कवचाय हुम् । ओं रुन्धे रुन्धिनि नेत्रत्रयाय वौषट् । ओं जम्भे जम्भिनि अस्त्राय फट् । ॥ समर्पणम् ॥ गुह्यातिगुह्यगोप्त्री त्वं गृहाणास्मत् कृतं जपम् । सिद्धिर्भवतु मे देवि त्वत्प्रसादान्मयि स्थिरा ॥ ॥ इति श्री वाराही (वार्ताली) मूल मन्त्रः सम्पूर्णम् ॥

श्री वाराही (वार्ताली) मूल मन्त्र — तंत्र का सबसे गोपनीय महामन्त्र

श्री वाराही मूल मन्त्र (Sri Varahi Moola Mantra) तंत्र शास्त्र के सबसे गोपनीय और उग्र मंत्रों में से एक है। इसे 'चतुर्दशोत्तरशताक्षरि' कहते हैं — अर्थात 114 अक्षरों वाला महामन्त्र। देवी वाराही को 'दंडनाथ' (प्रधान सेनापति) कहा जाता है — वे ललिता त्रिपुरसुंदरी की शक्ति (सेना) को नियंत्रित करती हैं।
इस मंत्र में 'वार्ताली' नाम का विशेष महत्व है — वार्ता = संवाद/Communication। वार्ताली = सभी जीवों की वाणी और संवाद को नियंत्रित करने वाली देवी। इसीलिए यह मंत्र विशेष रूप से 'स्तम्भन' (Stambhan) — रोकने की क्रिया — के लिए प्रसिद्ध है। मन्त्र में स्पष्ट कहा गया है — "सर्व वाक् पद चित्त चक्षुर्मुख गति जिह्वा स्तम्भनं कुरु कुरु" — शत्रुओं की वाणी, पैर, बुद्धि, आँखें, मुख, गति और जिह्वा — सब रोक दो!
इस मन्त्र की विशेषता यह है कि इसमें 5 देवी नामों के जोड़े हैं: अन्धे-अन्धिनि (अंधा करने वाली), रुन्धे-रुन्धिनि (रोकने वाली), जम्भे-जम्भिनि (जंभासुर नाशक), मोहे-मोहिनि (मोहित करने वाली), स्तम्भे-स्तम्भिनि (स्तब्ध करने वाली) — प्रत्येक जोड़ा शत्रु की एक-एक शक्ति को नष्ट करता है।
विनियोग: ऋषि — शिव। छन्द — जगती। देवता — वार्ताली। बीज — ग्लौं। शक्ति — स्वाहा। प्रयोजन — अखिल मनोरथ प्राप्ति। 'ग्लौं' पृथ्वी का बीज मंत्र है — स्थिरता, स्तम्भन और भूमि-लाभ प्रदान करता है।

मन्त्र जप के 5 चमत्कारी लाभ

1. शत्रु स्तम्भन: "स्तम्भनं कुरु कुरु" — शत्रुओं की वाणी, बुद्धि, गति सब बांध देता है। कोर्ट केस में विरोधी की गवाही विफल।
2. वशीकरण: "वशं कुरु कुरु" — अद्भुत आकर्षण और सम्मोहन शक्ति। लोगों को अनुकूल बनाता है।
3. तांत्रिक बाधा निवारण: "अन्धे अन्धिनि, रुन्धे रुन्धिनि" — दुष्ट शक्तियों को अंधा और अवरुद्ध करता है। तन्त्र-मंत्र, बुरी नज़र तुरंत कटती है।
4. कोर्ट केस विजय: वार्ताली देवी की कृपा से विरोधी पक्ष की गवाही, दलील और रणनीति विफल हो जाती है। कानूनी विवादों में अचूक।
5. सर्व मनोरथ सिद्धि: विनियोग में स्पष्ट — "मम अखिलावाप्तये" — मेरी सम्पूर्ण इच्छाओं की पूर्ति हेतु।

जप विधि — क्रमबद्ध साधना पद्धति

समय: मध्यरात्रि (रात 10 बजे के बाद) — सबसे फलदायी।
वस्त्र: लाल या काले वस्त्र। लाल ऊनी आसन।
माला: लाल चंदन, मूंगा (Coral), या रुद्राक्ष।
क्रम:
  1. हाथ में जल लेकर विनियोग पढ़ें, जल छोड़ दें।
  2. ऋष्यादि न्यास — शिर, मुख, हृदय, लिङ्ग, पाद, सर्वांग स्पर्श करें।
  3. कर न्यास — 6 उंगलियों पर मन्त्र स्थापित करें।
  4. हृदयादि न्यास — हृदय, शिर, शिखा, कवच, नेत्र, अस्त्र स्पर्श।
  5. ध्यान — रक्त कमल पर, नीली कांति वाली, त्रिनेत्रा, मुसल-हल धारिणी देवी का ध्यान।
  6. पञ्चपूजा — 5 तत्वों से देवी की पूजा।
  7. मूल मन्त्र — 108 बार जाप।
  8. पुनः हृदयादि न्यास करें।
  9. समर्पण श्लोक पढ़ें।
भोग: उड़द दाल के लड्डू, शहद, या अनार अर्पित करें।

FAQ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. क्या बिना गुरु दीक्षा के जप सकते हैं?

यह तांत्रिक 'माला मन्त्र' है जिसमें 'ठः ठः', 'फट्' जैसे पल्लव हैं। बिना गुरु दीक्षा के न जपें। पहले नाम मंत्र (ॐ ऐं ग्लौं ऐं नमो वाराह्यै नमः) का सवा लाख जाप कर सिद्धि प्राप्त करें, फिर मूल मंत्र पर जाएं।

2. 'ग्लौं' बीज का क्या अर्थ है?

ग्लौं (Glaum) = पृथ्वी का बीज मंत्र। स्थिरता, स्तम्भन और भूमि-लाभ प्रदान करता है। वाराही पृथ्वी धारिणी शक्ति हैं — इसलिए यह उनका मुख्य बीज।

3. 'वार्ताली' नाम का अर्थ?

वार्ता = संवाद। वार्ताली = सभी जीवों की वाणी नियंत्रित करने वाली। इसीलिए वाक्-स्तम्भन (मुँह बंद करना) में सबसे प्रभावी मन्त्र।

4. क्या महिलाएं साधना कर सकती हैं?

हाँ। वाराही स्वयं स्त्री-शक्ति हैं, महिलाएं भी पूर्ण अधिकार के साथ साधना कर सकती हैं।

5. न्यास क्या होता है?

न्यास = शरीर के अंगों पर मन्त्र स्थापित करना। कर न्यास (6 उंगलियों पर) और हृदयादि न्यास (हृदय, शिर, शिखा, कवच, नेत्र, अस्त्र) — दोनों जप से पहले और बाद में करें।

6. कोर्ट केस में कैसे लाभ?

वार्ताली विरोधी की वाक्, गति, बुद्धि स्तम्भित करती हैं। "सर्व वाक् पद चित्त... स्तम्भनं कुरु कुरु" — गवाही विफल, निर्णय आपके पक्ष में।

7. पञ्चपूजा क्या है?

5 तत्वों से पूजा: लं (पृथ्वी-गन्ध), हं (आकाश-पुष्प), यं (वायु-धूप), रं (अग्नि-दीप), वं (जल-नैवेद्य)। सं = सर्वोपचार।

8. उच्चारण गलत हो जाए तो?

भाव शुद्ध हो तो छोटी गलतियाँ क्षमा होती हैं। फिर भी मन्त्र ध्वनि-आधारित है — गुरुमुख से सही उच्चारण सीखना अनिवार्य।

9. 'शीघ्रं वशं कुरु कुरु' का अर्थ?

"शीघ्र (तुरंत) वश में करो, वश में करो" — मन्त्र में देवी से तत्काल कार्य सिद्धि की प्रार्थना। 'कुरु कुरु' = जल्दी करो।

10. समर्पण श्लोक क्यों आवश्यक?

"गुह्यातिगुह्यगोप्त्री त्वं" — हे गोपनीय से भी गोपनीय रक्षा करने वाली! मेरे जप स्वीकार करो और स्थिर सिद्धि प्रदान करो। बिना समर्पण के जप अधूरा माना जाता है।