॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ नवग्रहकृतयः (मुत्तुस्वामिदीक्षितविरचित) ॥
१. सूर्यः (राग: सौराष्ट्र | ताल: ध्रुव)
सूर्यमूर्ते नमोऽस्तु ते सुन्दर छायाधिपते ।
कार्यकारणत्मक जगत्प्रकाशक सिंह-राश्यधिपते
आर्यविनुत तेजःस्फूर्ते आरोग्यादि-फलद-कीर्ते ।
सारसमित्र मित्र भानो सहस्रकिरण कर्णसूनो
क्रूर-पाप-हर कृशानो गुरुगुह-मोदित-स्वभानो
सूरिजनेडित सुदिनमणे सोमादिग्रह-शिखामणे
धीरार्चित कर्मसाक्षिणे दिव्यतर-सप्ताश्व-रथिने
सौर-अष्टार्ण-मन्त्रात्मने सौवर्ण-स्वरूपात्मने
भारतीश-हरि-हरात्मने भुक्ति-मुक्ति-वितरणात्मने ॥
२. चन्द्रः (राग: असावेरी | ताल: मट्य)
चन्द्रं भज मानस साधु-हृदय-सदृशम् ।
इन्द्रादि-लोकपालेडित-तारेशं
कमनीय-कटक-राश्यादीपम् ।
इन्दुं षोडश-कला-धरं निशाकरं
इन्दिरा-सहोदरं सुधाकरं अनिशम् ।
शङ्कर-मौळि-विभूषणं शीत-किरणं
चतुर्भुजं मदन-छत्रं क्षपाकरं
वेङ्कटेश-नयनं विराण्मनो-जननं
विधुं कुमुद-मित्रं विधि-गुरुगुह-वक्त्रं
शशाङ्कं गीष्पति-शापानुग्रह-पात्रं
शरच्चन्द्रिका-धवळ-प्रकाश-गात्रं
कङ्कण-केयूर-हार-मकुटादि-धरं
पङ्कजरिपुं रोहिणी-प्रियकर-चतुरम् ॥
३. अङ्गारकः (मङ्गल) (राग: सुरटि | ताल: रूपक)
अङ्गारकमाश्रयाम्यहं विनताश्रितजनमन्दारं
मङ्गळवारं भूमिकुमारं वारं वारम् ।
भृङ्गारकं मेष-वृश्चिक-राश्यधिपतिं
रक्ताङ्गं रक्ताम्बरादि-धरं शक्ति-शूल-धरं
मङ्गळं कम्बु-गळं मञ्जुळ-तर-कर-युगळं
मङ्गळ-दायक-मेष-तुरङ्गं मकरोत्तुङ्गम् ।
दानव-सुर-सेवितं मन्दस्मित-विलसित-वक्त्रं
धरणी-प्रदं भ्रातृ-कारकं रक्त-नेत्रं
दीन-रक्षकं पूजित-वैद्यनाथ-क्षेत्रं
दिव्यौघादि-गुरुगुह-कटाक्षानुग्रह-पात्रं
भानु-चन्द्र-गुरु-मित्रं भासमान-सुकळत्रं
जानुस्थ-हस्त-चित्रं चतुर्भुजमतिविचित्रम् ॥
४. बुधः (राग: नाटकुरञ्जि | ताल: झम्प)
बुधमाश्रयामि सततं
सुरविनुतं छन्द्र-तारा-सुतम् ।
बुधजनैर्-वेदितं भूसुरैर्-मोदितं
मधुर-कविता-प्रदं महनीय-सम्पदम् ।
कुङ्कुम-समद्युतिं गुरुगुह-मुदाकृतिं
कुजवैरिणं मणि-मकुट-हार-केयूर-
कङ्कणादि-धरणं कमनीय-तर-मिथुन-
कन्याधिपं पुस्तक-करं नपुंसकं
किङ्कर-जन-महितं किल्बिषादि-रहितं
शङ्कर-भक्त-हितं सदानन्द-सहितम् ॥
५. बृहस्पतिः (राग: अठाण | ताल: त्रिपुट)
बृहस्पते तारापते ब्रह्मजाते नमोऽस्तु ते ।
महाबल विभो गीष्पते मञ्जु-धनुर्-मीनाधिपते
महेन्द्राद्युपासित-कृते माधवादि-विनुत-धीमते ।
सुराचार्य-वर्य वज्रधर शुभलक्षण जगत्-त्रय-गुरो
जरादि-वर्जित अक्रोध कच-जनक आश्रित-जन-कल्पतरो
पुरारि-गुरुगुह-संमोदित पुत्र-कारक दीन-बन्धो
परादि-चत्वारि-वाक्-स्वरूप-प्रकाशक दया-सिन्धो
निरामयाय नीतिकर्त्रे निरङ्कुशाय विश्व-भर्त्रे
निरञ्जनाय भुवन-भोक्त्रे निरंशाय महा-प्रदात्रे ॥
६. शुक्रः (राग: परशु | ताल: अट)
श्रीशुक्र-भगवन्तं चिन्तयामि सन्ततं सकल-तत्त्वज्ञम् ।
हे शुक्र-भगवन् मा-
माशु पालय वृषतुला-
धीश दैत्य-हितोपदेश
केशव-कटाक्षैक-नेत्रं किरीटधरं धवळ-गात्रम् ।
विंशति-वत्सरोडु-दशा-विभागं अष्टवर्गं
कविं कळत्र-कारकं रवि-निर्जर-गुरु-वैरिणं
नवांश-होरा-द्रेक्काणादि-वर्गोत्तमावसर-समये
वक्रोच्च-नीच-स्वक्षेत्र-वर-केन्द्र-मूल-त्रिकोणे
त्रिंशांश-षष्ठ्यंशैरावतांश-पारिजातांश-
गोपुरांश-राजयोग-कारकं राज्यप्रदं गुरुगुहमुदम् ॥
७. शनैश्चरः (राग: यदुकुलकांभोधि | ताल: एक)
दिवाकर-तनूजं शनैश्चरं धीरतरं सन्ततं चिन्तयेऽहम् ।
भवाम्बु-निधौ निमग्न-जनानां भयंकरं अति-क्रूर-फलदं
भवानीश-कटाक्ष-पात्र-भूत-भक्तिमतां अतिशय-शुभ-फलदम् ।
कालाञ्जन-कान्ति-युक्त-देहं काल-सहोदरं काक-वाहं
नीलांशुक-पुष्प-मालावृतं नील-रत्न-भूषणालङ्कृतं
मालिनी-नुतं गुरुगुह-मुदितं मकर-कुम्भ-राशि- नाथं तिल-
तैल-मिश्रितान्न-दीप-प्रियं दया-सुधा-सागरं निर्भयं
काल-दण्ड-परिपीडित-जानुं कामितार्थ-फलद-कामधेनुं
काल-चक्र-भेद-चित्र-भानुं कल्पित-छाया-देवी-सूनुम् ॥
८. राहुः (राग: रामप्रिय | ताल: रूपक)
स्मराम्यहं सदा राहुं सूर्य-चन्द्र-वीक्ष्यं विकृत-देहम् ।
सुरासुरं रोग-हरं सर्पादि-भीति-हरं
शूर्पासन-सुखकरं शूलायुध-धर-करम् ।
कराळ-वदनं कठिनं कयानार्ण-करुणार्द्र-अपाङ्गं
चतुर्भुजं खड्ग-खेटादि-धरणं
चर्मादि-नीलवस्त्रं गोमेदकाभरणं
शनि-शुक्र-मित्र-गुरुगुह-सन्तोषकरणम् ॥
९. केतुः (राग: चामर | ताल: रूपक)
महासुरं केतुमहं भजामि छायाग्रहं वरम् ।
महा-विचित्र-मकुट-धरं मङ्गल-वस्त्रादि-धरं
नर-पीठ-स्थितं सुखं नवग्रह-युतं सखम् ।
केतुं कृण्वन्-मन्त्रिणं क्रोध-निधि-जैमिनं
कुलुत्तादि-भक्षणं कोण-ध्वज-पताकिनं
गुरुगुह-चामर-भरणं गुणदोष- जिताभरणं
ग्रहणादि-कार्य-कारणं ग्रहापसव्य-सञ्चारिणम् ॥
संबंधित पाठ (Related Texts)
नवग्रह कृतियाँ (Navagraha Kritis) — संगीत और चिकित्सा का दिव्य संगम
भारतीय शास्त्रीय संगीत परंपरा में नाद (ध्वनि) को साक्षात् ब्रह्म माना गया है। नाद-योग की इसी महान परंपरा के शिखर पुरुष श्री मुत्तुस्वामी दीक्षितर (Muthuswami Dikshitar) जो कि कर्नाटक संगीत के प्रसिद्ध 'त्रिमूर्ति' (त्यागराज, श्यामा शास्त्री और मुत्तुस्वामी दीक्षितर) में से एक थे, उन्होंने संगीत और ज्योतिष का एक ऐसा अभूतपूर्व संगम प्रस्तुत किया, जिसे विश्व नवग्रह कृतियों (Navagraha Kritis) के नाम से जानता है।
ये 9 कृतियाँ केवल सुरीले गीत मात्र नहीं हैं; ये अत्यंत शक्तिशाली संस्कृत मंत्र हैं जिन्हें विशिष्ट रागों और तालों की फ्रीक्वेंसी में पिरोया गया है। ऐसा माना जाता है कि इन गानों का सही उच्चारण और श्रवण करने से शारीरिक और मानसिक रोगों का विनाश होता है, साथ ही जन्म कुंडली (Horoscope) में मौजूद ग्रह दोष शांत होते हैं।
ऐतिहासिक उत्पत्ति और चमत्कार: इन कृतियों की रचना कोई सामान्य साहित्यिक कार्य नहीं था। किंवदंती है कि दीक्षितर के शिष्य 'तम्बियप्पन' 'शूलव्याधि' (गंभीर पेट दर्द / Colic) से पीड़ित थे। जब सभी औषधियां विफल हो गईं, तो दीक्षितर ने ध्यान केंद्रित किया और पाया कि गोचर में बृहस्पति ग्रह (जो पेट और पाचन का कारक है) प्रतिकूल स्थिति में है। शिष्य के प्राणों की रक्षा के लिए उन्होंने तत्काल "बृहस्पते तारापते" नामक कृति की रचना की और शिष्य को इसे गाने की आज्ञा दी। यह कहा जाता है कि इस नाद-चिकित्सा के निरंतर प्रयोग से शिष्य पूर्णतः स्वस्थ हो गया। इसी घटना ने अन्य 8 ग्रहों पर कृतियाँ रचने की प्रेरणा दी।
सभी 9 नवग्रह कृतियों का सूक्ष्म विश्लेषण (In-depth Analysis)
1. सूर्य कृति: सूर्यमूर्ते नमोऽस्तु ते (Suryamurte Namostu Te)
राग: सौराष्ट्र (Saurashtra) | ताल: चतुश्र जाति ध्रुव (Dhruva)
यह नवग्रह शृंखला की प्रथम कृति है। सूर्यदेव को 'आरोग्यादि फलद कीर्ते' (स्वास्थ्य और यश देने वाले) कहकर संबोधित किया गया है। राग 'सौराष्ट्र' में अत्यधिक तेज और उष्णता (Warmth) छिपी है। सूर्य सभी ग्रहों के राजा हैं, अतः इस गाने में प्रयुक्त 'ध्रुव ताल' (जो सबसे लंबा ताल है) सूर्य की गाम्भीर्य और धीरता को दर्शाता है। हृदय रोगों, आंखों की रोशनी, और निराशा (Depression) को दूर करने के लिए इस विरल कृति का श्रवण अत्यंत लाभकारी माना जाता है।
2. चन्द्र कृति: चन्द्रं भज मानस (Chandram Bhaja Manasa)
राग: असावेरी (Asaveri) | ताल: मट्य (Matya)
चन्द्रमा मन और संवेदनाओं का स्वामी है। "चन्द्रं भज मानस साधु-हृदय-सदृशम्" (हे मन! उस चन्द्रमा का भजन कर जिसका हृदय संतों के समान निर्मल है)। राग असावेरी में करुणा, शीतलता और वात्सल्य कूट-कूट कर भरा है। जिन लोगों को मानसिक तनाव, नींद न आना (Insomnia) या अत्यधिक चिंता (Anxiety) रहती है, उनके लिए यह स्तोत्र रामबाण है। यह मन की चंचलता को शांत कर वैराग्य और ध्यान की ओर ले जाता है।
3. मंगल कृति: अङ्गारकमाश्रयाम्यहं (Angarakam Ashrayamyaham)
राग: सुरटि (Surati) | ताल: रूपक (Rupaka)
मंगल (Angaraka) को क्रोध, साहसिक कार्य और सेना का कारक माना जाता है। लेकिन इस कृति में मंगल के सौम्य रूप (मङ्गलदायक) का वर्णन है। राग सुरटि अत्यंत मंगलकारी (Auspicious) राग है। मुत्तुस्वामी दीक्षितर ने इसे रूपक ताल (जिसमें एक तीव्र गति होती है) में बांधकर मंगल के ओज को दर्शाया है। भूमि विवाद, रक्त संबंधी बीमारियां, और भाई-बहनों में क्लेश दूर करने के लिए इस रचना का गान मंगलवार को करना उत्तम है।
4. बुध कृति: बुधमाश्रयामि सततं (Budham Ashrayami)
राग: नाटकुरञ्जि (Natakuranji) | ताल: मिश्र झम्प (Jhampa)
बुध ग्रह बुद्धि, तर्क, गणित और वाणी (Communication) का कारक है। गुरुगुह (भगवान कार्तिकेय) की कृपा प्राप्त बुध की यह स्तुति "मधुर-कविता-प्रदं" (मीठी कविता या वाणी देने वाले) के रूप में की गई है। राग नाटकुरञ्जि में एक प्रकार की बौद्धिक चंचलता और आनंद है। विद्यार्थियों, लेखकों और सार्वजनिक वक्ताओं (Public Speakers) को स्मरण शक्ति बढ़ाने और वाक्-सिद्धि के लिए यह कृति सुननी चाहिए।
5. गुरु कृति: बृहस्पते तारापते (Brihaspate Tarapate)
राग: अठाण (Athana) | ताल: त्रिपुट (Triputa)
बृहस्पति ज्ञान, विवेक और विस्तार के प्रतीक हैं। इसी रचना ने तम्बियप्पन के प्राणों की रक्षा की थी। राग 'अठाण' एक बहुत ही शक्तिशाली, वीर रस और सात्विक अहंकार (Spiritual Authority) से भरा राग है। इस रचना में देवगुरु बृहस्पति को 'निरामयाय' (रोगरहित करने वाले) कहा गया है। यह रचना गुरु चंडाल योग, पेट की बीमारियों और विवाह में आ रही अड़चनों को दूर करने के लिए अचूक मानी जाती है।
6. शुक्र कृति: श्रीशुक्र-भगवन्तं (Shri Shukra Bhagavantam)
राग: परशु / परज (Paraju/Parasu) | ताल: अट (Ata)
शुक्र प्रेम, सौंदर्य, कला और दाम्पत्य जीवन का कारक है। यह कृति एक मात्र ऐसी रचना है जिसमें ज्योतिष विज्ञान के अत्यंत गूढ़ तकनीकी शब्दों का प्रयोग हुआ है जैसे— नवमांश, होरा, द्रेष्काण, वर्गोत्तम, उच्च, नीच, और राजयोग आदि। राग परशु के माध्यम से शुक्र की विलासिता और आकर्षण को एक पवित्र भक्ति (Devotion) में बदल दिया गया है। वैवाहिक सुख, करियर में 'राजयोग' और रचनात्मक कार्यों में सफलता के लिए यह सबसे शक्तिशाली स्तुति है।
7. शनि कृति: दिवाकर-तनूजं (Divakara Tanujam)
राग: यदुकुलकांभोधि (Yadukula Kambhoji) | ताल: एक (Eka)
शनि साढ़ेसाती और कर्मफल के देव हैं। इस कृति में उन्हें अति-क्रूर-फलदं (दृष्टों को कठोर दंड देने वाले) और अतिशय-शुभ-फलदं (भक्तों को श्रेष्ठ फल देने वाले) दोनों रूपों में दर्शाया गया है। राग यदुकुलकांभोधि अत्यंत करुणावान और समर्पण भाव जगाने वाला राग है। यह शनि के अंदर छिपे 'दुःख' (Sorrow) को भक्ति के आंसुओं में बदल देता है। भय (Fear), साढ़ेसाती के कष्ट और दुर्भाग्य को शांत करने के लिए शनिवार के दिन दीप जलाकर इसका श्रवण करना चाहिए।
8. राहु कृति: स्मराम्यहं सदा राहुं (Smaramyaham Sada Rahum)
राग: रामप्रिय (Ramapriya) | ताल: रूपक (Rupaka)
पारंपरिक रूप से दक्षिण भारत के नवग्रह मंदिरों में सूर्य से लेकर शनि तक 7 ग्रहों की मूर्तियां ही पूजी जाती थीं। राहु-केतु को छाया ग्रह माना जाता था। लेकिन दीक्षितर ने राहु के लिए यह विशिष्ट रचना की। राग 'रामप्रिय' में एक रहस्यमयी (Mysterious) और तीक्ष्ण (Sharp) स्वर संगति है। इस कृति में राहु को 'सर्पादि-भीति-हरं' (सांप आदि विषैले जंतुओं का भय मिटाने वाला) बताया गया है। कालसर्प दोष और अचानक आने वाले संकटों से रक्षा के लिए यह उपयोगी है।
9. केतु कृति: महासुरं केतुमहं (Mahasuram Ketum)
राग: चामर / षण्मुखप्रिया (Chamara/Shanmukhapriya) | ताल: रूपक (Rupaka)
केतु मोक्ष, वैराग्य और तंत्र-मंत्र का कारक है। यह कृति राग 'चामर' (जिसे अब षण्मुखप्रिया के नाम से जाना जाता है) में रचित है। षण्मुखप्रिया एक अत्यंत ध्यानमग्न और रहस्यपूर्ण राग है। इस रचना में मन्त्र: "ग्रहणादि कार्य कारणं" बताकर ग्रहण दोष की निवृत्ति का संकेत किया गया है। गुप्त रोगों, तंत्र बाधा (Black Magic) और मोक्ष की कामना करने वालों के लिए केतु की यह स्तुति अद्वितीय है।
संगीत चिकित्सा (Music/Raga Therapy) और नवग्रह
आधुनिक विज्ञान अब 'Vibrational Medicine' को मानता है। सप्त स्वर शरीर के सप्त चक्रों (Chakras) से जुड़े हैं। दीक्षितर की इन कृतियों का नाद शरीर के चक्रों को इस प्रकार उद्दीप्त (Stimulate) करता है कि ब्रह्मांडीय ऊर्जा (ग्रहों की रश्मियाँ) शरीर में संतुलित हो जाती हैं।
- ताल का रहस्य: कर्नाटक शास्त्रीय संगीत में 7 मुख्य ताल (सुलदि सप्त ताल) होते हैं — ध्रुव, मट्य, रूपक, झम्प, त्रिपुट, अट और एक। मुत्तुस्वामी दीक्षितर ने सूर्य से शनि तक 7 ग्रहों के लिए इन 7 अलग-अलग तालों का क्रम से उपयोग किया है। यह उनकी अतुलनीय गणितीय और सांगीतिक प्रतिभा को दर्शाता है।
- गुरुगुह मुद्रा: प्रत्येक कृति में 'गुरुगुह' (Guruguha) शब्द का प्रयोग हुआ है। यह मुत्तुस्वामी दीक्षितर का उपनाम था, जिसका अर्थ है 'भगवान कार्तिकेय'। यह प्रमाणित करता है कि सभी ग्रह अंततः परात्पर ब्रह्म की आज्ञा के अधीन कार्य करते हैं।
सुनने का सही तरीका: इन कृतियों का अधिकतम लाभ उठाने के लिए, प्रतिदिन प्रातःकाल ध्यान की अवस्था में बैठकर इन्हें सुनें। यदि आप साढ़ेसाती या किसी विशिष्ट महादशा से पीड़ित हैं, तो उस ग्रह के विशिष्ट दिन (जैसे गुरु के लिए गुरुवार) उस ग्रह की कृति का 108 बार गान या श्रवण करना चाहिए।
FAQ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. नवग्रह कृतियों की रचना किसने और क्यों की?
इनकी रचना कर्नाटक संगीत के त्रिमूर्ति में से एक 'मुत्तुस्वामी दीक्षितर' ने की थी। किंवदंती है कि उनके शिष्य तम्बियप्पन को पेट का असाध्य रोग (Colic pain) था। गुरु (बृहस्पति) पेट के कारक हैं, इसलिए दीक्षितर ने 'बृहस्पते तारापते' कृति गाकर उन्हें स्वस्थ किया और बाद में अन्य ग्रहों की रचना की।
2. सूर्य कृति किस राग और ताल में है?
सूर्य कृति 'सूर्यमूर्ते नमोऽस्तु ते' राग 'सौराष्ट्र' (Saurashtra) और ताल 'चतुश्र जाति ध्रुव' में निबद्ध है। यह आरोग्यता प्रदान करती है।
3. शनि ग्रह की कृति का क्या महत्व है?
शनि की कृति 'दिवाकर तनुजं' राग 'यदुकाकुल काम्भोजि' में है। यह अत्यंत भावपूर्ण है और शनि की क्रूरता को शांत कर भय (Fear) को दूर करती है।
4. क्या इसे सामान्य व्यक्ति पाठ की तरह पढ़ सकता है?
हाँ, यद्यपि ये संगीत रचनाएँ हैं, किन्तु इनका साहित्य (Lyrics) शुद्ध संस्कृत मंत्रों से बना है। इन्हें स्तोत्र की तरह पढ़ने से भी ग्रह शांति का फल मिलता है।
5. इन कृतियों में 'गुरुगुह' शब्द बार-बार क्यों आता है?
'गुरुगुह' मुत्तुस्वामी दीक्षितर की 'मुद्रा' (Signature) है। साथ ही, यह भगवान कार्तिकेय (सुब्रह्मण्य) का नाम है, जो दीक्षितर के इष्ट देव और गुरु थे।
6. अंगारक (मंगल) कृति किस राग में है?
मंगल ग्रह की कृति 'अंगारकमाश्रयाम्यहं' राग 'सुरटि' (Surati) और ताल 'रूपक' में है। यह ऋण और भूमि विवादों को सुलझाने में सहायक है।
7. क्या राहु और केतु के लिए भी कृतियाँ हैं?
हाँ, दीक्षितर ने राहु के लिए 'स्मराम्यहं सदा राहुं' (राग रामप्रिय) और केतु के लिए 'महासुरं केतुमहं' (राग चामर/षण्मुखप्रिया) की रचना की है।
8. शुक्र ग्रह की कृति का क्या लाभ है?
शुक्र की कृति 'श्री शुक्र भगवन्तं' (राग परज/परशु) वैवाहिक सुख और राजयोग (Career Success) प्रदान करती है।
9. ये कृतियाँ किस भाषा में हैं?
ये सभी कृतियाँ शुद्ध 'संस्कृत' भाषा में रची गई हैं और इनमें ज्योतिषीय शब्दावली (जैसे उच्च, नीच, मित्र, शत्रु ग्रह) का अद्भुत प्रयोग हुआ है।
10. संगीत चिकित्सा (Music Therapy) में इनका क्या स्थान है?
यह माना जाता है कि विशिष्ट राग विशिष्ट चक्रों को प्रभावित करते हैं। नवग्रह कृतियाँ 7 मुख्य तालों (सप्त ताल) और विशिष्ट रागों का प्रयोग कर शरीर के ऊर्जा केंद्रों को संतुलित करती हैं।
