Logoपवित्र ग्रंथ

Sri Tripura Bhairavi Kavacham – श्री त्रिपुरभैरवी कवचम्

Sri Tripura Bhairavi Kavacham: The Supreme Armor (51 Verses)

Sri Tripura Bhairavi Kavacham – श्री त्रिपुरभैरवी कवचम्
॥ श्री त्रिपुरभैरवी कवचम् ॥ ॥ विनियोगः ॥ ॐ अस्य श्रीत्रिपुरभैरवीकवचस्य श्रीदक्षिणामूर्तिऋषिः, पङ्क्तिश्छन्दः, श्रीत्रिपुरभैरवी देवता, ह्रीं बीजम्, स्वाहा शक्तिः, पुरुषार्थचतुष्टयसिद्धयर्थे पाठे विनियोगः ॥ ॥ ऋष्यादि न्यासः ॥ श्रीदक्षिणामूर्तिऋषये नमः शिरसि । पङ्क्तिश्छन्दसे नमः मुखे । श्रीत्रिपुरभैरवीदेवतायै नमः हृदि । ह्रीं बीजाय नमः गुह्ये । स्वाहा शक्तये नमः पादयोः । विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे ॥ ॥ ध्यानम् ॥ उद्यद्भानुसहस्राभां रक्तमाल्याम्बरधराम् । रक्तचन्दनलिप्ताङ्गीं रक्तपुष्पोपशोभिताम् ॥ चतुर्भुजां त्रिनेत्रां च वरदाभयपाणिकाम् । त्रिपुरभैरवीं वन्दे सर्वसम्पत्प्रदायिनीम् ॥ ॥ कवचम् ॥ श्रीपार्वत्युवाच देवदेव महादेव सर्वशास्त्रविशारद । कृपां कुरु जगन्नाथ धर्मज्ञोसि महामते ॥ १ ॥ भैरवी या पुरा प्रोक्ता विद्या त्रिपुरपूर्विका । तस्यास्तु कवचं दिव्यं मह्यं कथय तत्त्वतः ॥ २ ॥ तस्यास्तु वचनं श्रुत्वा जगाद जगदीश्वरः । अद्भुतं कवचं देव्या भैरव्या दिव्यरूपि वै ॥ ३ ॥ ईश्वर उवाच कथयामि महाविद्याकवचं सर्वदुर्लभम् । शृणुष्व त्वं च विधिना श्रुत्वा गोप्यं तवापि तत् ॥ ४ ॥ यस्याः प्रसादात्सकलं बिभर्मि भुवनत्रयम् । यस्याः सर्वं समुत्पन्नं यस्यामद्यापि तिष्ठति ॥ ५ ॥ माता पिता जगद्धन्या जगद्ब्रह्मस्वरूपिणी । सिद्धिदात्री च सिद्धास्स्यादसिद्धा दुष्टजन्तुषु ॥ ६ ॥ सर्वभूतप्रियङ्करी सर्वभूतस्वरूपिणी । ककारी पातु मां देवी कामिनी कामदायिनी ॥ ७ ॥ एकारी पातु मां देवी मूलाधारस्वरूपिणी । ईकारी पातु मां देवी भूरिसर्वसुखप्रदा ॥ ८ ॥ लकारी पातु मां देवी इन्द्राणीवरवल्लभा । ह्रीङ्कारी पातु मां देवी सर्वदा शम्भुसुन्दरी ॥ ९ ॥ एतैर्वर्णैर्महामाया शाम्भवी पातु मस्तकम् । ककारी पातु मां देवी शर्वाणी हरगेहिनी ॥ १० ॥ मकारी पातु मां देवी सर्वपापप्रणाशिनी । ककारी पातु मां देवी कामरूपधरा सदा ॥ ११ ॥ काकारी पातु मां देवी शम्बरारिप्रिया सदा । पकारी पातु मां देवी धराधरणिरूपधृक् ॥ १२ ॥ ह्रीङ्कारी पातु मां देवी आकारार्धशरीरिणी । एतैर्वर्णैर्महामाया कामराहुप्रियाऽवतु ॥ १३ ॥ मकारः पातु मां देवी सावित्री सर्वदायिनी । ककारः पातु सर्वत्र कलाम्बा सर्वरूपिणी ॥ १४ ॥ लकारः पातु मां देवी लक्ष्मीः सर्वसुलक्षणा । ओं ह्रीं मां पातु सर्वत्र देवी त्रिभुवनेश्वरी ॥ १५ ॥ एतैर्वर्णैर्महामाया पातु शक्तिस्वरूपिणी । वाग्भवा मस्तकं पातु वदनं कामराजिता ॥ १६ ॥ शक्तिस्वरूपिणी पातु हृदयं यन्त्रसिद्धिदा । सुन्दरी सर्वदा पातु सुन्दरी परिरक्षतु ॥ १७ ॥ रक्तवर्णा सदा पातु सुन्दरी सर्वदायिनी । नानालङ्कारसम्युक्ता सुन्दरी पातु सर्वदा ॥ १८ ॥ सर्वाङ्गसुन्दरी पातु सर्वत्र शिवदायिनी । जगदाह्लादजननी शम्भुरूपा च मां सदा ॥ १९ ॥ सर्वमन्त्रमयी पातु सर्वसौभाग्यदायिनी । सर्वलक्ष्मीमयी देवी परमानन्ददायिनी ॥ २० ॥ पातु मां सर्वदा देवी नानाशङ्खनिधिः शिवा । पातु पद्मनिधिर्देवी सर्वदा शिवदायिनी ॥ २१ ॥ पातु मां दक्षिणामूर्ति ऋषिः सर्वत्र मस्तके । पङ्क्तिश्छन्दः स्वरूपा तु मुखे पातु सुरेश्वरी ॥ २२ ॥ गन्धाष्टकात्मिका पातु हृदयं शङ्करी सदा । सर्वसंमोहिनी पातु पातु सङ्क्षोभिणी सदा ॥ २३ ॥ सर्वसिद्धिप्रदा पातु सर्वाकर्षणकारिणी । क्षोभिणी सर्वदा पातु वशिनी सर्वदावतु ॥ २४ ॥ आकर्षिणी सदा पातु सदा संमोहिनी तथा । रतिदेवी सदा पातु भगाङ्गा सर्वदावतु ॥ २५ ॥ माहेश्वरी सदा पातु कौमारी सर्वदावतु । सर्वाह्लादनकारी मां पातु सर्ववशङ्करी ॥ २६ ॥ क्षेमङ्करी सदा पातु सर्वाङ्गं सुन्दरी तथा । सर्वाङ्गं युवती सर्वं सर्वसौभाग्यदायिनी ॥ २७ ॥ वाग्देवी सर्वदा पातु वाणी मां सर्वदावतु । वशिनी सर्वदा पातु महासिद्धिप्रदावतु ॥ २८ ॥ सर्वविद्राविणी पातु गणनाथा सदावतु । दुर्गादेवी सदा पातु वटुकः सर्वदावतु ॥ २९ ॥ क्षेत्रपालः सदा पातु पातु चाशान्तिदा । अनन्तः सर्वदा पातु वराहः सर्वदावतु ॥ ३० ॥ पृथिवी सर्वदा पातु स्वर्णसिंहासनस्तथा । रक्तामृतश्च सततं पातु मां सर्वकालतः ॥ ३१ ॥ सुधार्णवः सदा पातु कल्पवृक्षः सदावतु । श्वेतच्छत्रं सदा पातु रत्नदीपः सदावतु ॥ ३२ ॥ सततं नन्दनोद्यानं पातु मां सर्वसिद्धये । दिक्पालाः सर्वदा पान्तु द्वन्द्वौघाः सकलास्तथा ॥ ३३ ॥ वाहनानि सदा पान्तु सर्वदाऽस्त्राणि पान्तु मां । शस्त्राणि सर्वदा पान्तु योगिन्यः पान्तु सर्वदा ॥ ३४ ॥ सिद्धाः पान्तु सदा देवी सर्वसिद्धिप्रदावतु । सर्वाङ्गसुन्दरी देवी सर्वदावतु मां तथा ॥ ३५ ॥ आनन्दरूपिणी देवी चित्स्वरूपा चिदात्मिका । सर्वदा सुन्दरी पातु सुन्दरी भवसुन्दरी ॥ ३६ ॥ पृथग्देवालये घोरे सङ्कटे दुर्गमे गिरौ । अरण्ये प्रान्तरे वाऽपि पातु मां सुन्दरी सदा ॥ ३७ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ इदं कवचमित्युक्तं मन्त्रोद्धारश्च पार्वति । यः पठेत्प्रयतो भूत्वा त्रिसन्ध्यं नियतः शुचिः ॥ ३८ ॥ तस्य सर्वार्थसिद्धिः स्याद्यद्यन्मनसि वर्तते । गोरोचनाकुङ्कुमेन रक्तचन्दनकेन वा ॥ ३९ ॥ स्वयम्भूकुसुमैश्शुक्लैः भूमिपुत्रे शनौ सुरे । श्मशाने प्रान्तरे वापि शून्यागारे शिवालये ॥ ४० ॥ स्वशक्त्या गुरुणा यन्त्रं पूजयित्वा कुमारिकां । तन्मनुं पूजयित्वा च गुरुपङ्क्तिं तथैव च ॥ ४१ ॥ देव्यै बलिं निवेद्याथ नरमार्जारसूकरैः । नकुलैर्महिषैर्मेषैः पूजयित्वा विधानतः ॥ ४२ ॥ धृत्वा सुवर्णमध्यस्थं कण्ठे वा दक्षिणे भुजे । सुतिथौ शुभनक्षत्रे सूर्यस्योदयने तथा ॥ ४३ ॥ धारयित्वा च कवचं सर्वसिद्धिं लभेन्नरः । कवचस्य च माहात्म्यं नाहं वर्षशतैरपि ॥ ४४ ॥ शक्नोमि तु महेशानि वक्तुं तस्य फलं तु यत् । न दुर्भिक्षफलं तत्र न शत्रोः पीडनं तथा ॥ ४५ ॥ सर्वविघ्नप्रशमनं सर्वव्याधिविनाशनम् । सर्वरक्षाकरं जन्तोश्चतुर्वर्गफलप्रदम् ॥ ४६ ॥ यत्र कुत्र न वक्तव्यं न दातव्यं कदाचन । मन्त्रप्राप्य विधानेन पूजयेत्सततं सुधीः ॥ ४७ ॥ तत्रापि दुर्लभं मन्ये कवचं देवरूपिणम् । गुरोः प्रसादमासाद्य विद्यां प्राप्य सुगोपिताम् ॥ ४८ ॥ तत्रापि कवचं दिव्यं दुर्लभं भुवनत्रये । श्लोकं वा स्तवमेकं वा यः पठेत्प्रयतः शुचिः ॥ ४९ ॥ तस्य सर्वार्थसिद्धिः स्याच्छङ्करेण प्रभाषितम् । गुरुर्देवो हरः साक्षात्पत्नी तस्य च पार्वती ॥ ५० ॥ अभेदेन यजेद्यस्तु तस्य सिद्धिरदूरतः ॥ ५१ ॥ ॥ इति श्रीरुद्रयामले भैरवभैरवीसंवादे श्री त्रिपुरभैरवी कवचम् ॥

श्री त्रिपुरभैरवी कवचम् - परिचय (Introduction)

श्री त्रिपुरभैरवी कवचम् (Sri Tripura Bhairavi Kavacham) तंत्र साधना के जगत में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और शक्तिशाली रक्षा विधान है। यह स्तोत्र 'रुद्र यामल तंत्र' के अंतर्गत भगवान शिव और माता पार्वती के संवाद के रूप में प्रकट हुआ है। जब देवी पार्वती ने शिवजी से पूछा कि घोर कलयुग में भक्तों की रक्षा कैसे होगी, विशेषकर जब वे उग्र शक्तियों की साधना कर रहे हों, तब महादेव ने करुणावश इस परम गोपनीय 'त्रैलोक्य विजय' कवच का उपदेश दिया। यह कवच केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि यह ध्न्यात्मक ऊर्जा (Sonic Energy) का एक ऐसा अभेद्य घेरा है जो साधक को ब्रह्मांड की नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षित रखता है।

भैरवी का स्वरूप: दश महाविद्याओं में छठी महाविद्या 'भैरवी' हैं। 'भैरवी' का अर्थ है - 'भय का विनाश करने वाली' (Destroyer of Fear)। वे 'तेजस' (Tejas) और 'तपस' (Tapas) की साक्षात मूर्ति हैं। उनका वर्ण हजारों उगते हुए सूर्यों (Rising Suns) के समान रक्तवर्ण (Red) है, जो उनकी असीम ऊर्जा का प्रतीक है। भैरवी वह शक्ति हैं जो साधक के भीतर की अशुद्धियों, काम, क्रोध और अज्ञान को अपनी 'चिदग्नि' (Fire of Consciousness) में भस्म कर देती हैं। जब कोई साधक इतनी प्रचंड ऊर्जा का आह्वान करता है, तो उसका शरीर और मन उस उच्च 'वोल्टेज' को सहन करने में सक्षम होना चाहिए। यदि बिना तैयारी के इतनी शक्ति आ जाए, तो साधक का तंत्रिका तंत्र (Nervous System) प्रभावित हो सकता है। यहीं पर 'कवच' की भूमिका आती है।

कवच की आवश्यकता क्यों? जैसे बिजली के नंगे तारों को छूने से पहले 'इन्सुलेशन' (Insulation) की जरूरत होती है, वैसे ही भैरवी साधना में यह कवच 'आध्यात्मिक इन्सुलेशन' का काम करता है। यह साधक की ऊर्जा को बिखरने से रोकता है और उसे एक दिशा (Direction) प्रदान करता है। कवच का पाठ करने से साधक के चारों ओर 'दिग्बंधन' (Locking of Directions) हो जाता है, जिससे बाहरी बाधाएं - चाहे वे भूत-प्रेत हों, ग्रह दोष हों, या ईर्ष्यालु शत्रुओं के विचार - उस घेरे को भेद नहीं पाते। तंत्र शास्त्र स्पष्ट चेतावनी देता है - जो साधक इस कवच को जाने बिना भैरवी मंत्र का जप करता है, उसे सिद्धि प्राप्त नहीं होती।

त्रैलोक्य विजय: इस कवच को 'त्रैलोक्य विजय' भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है तीनों लोकों (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति) पर विजय प्राप्त करना। यह कवच साधक को 'अभय' (Fearlessness) प्रदान करता है। भैरवी का साधक श्मशान में भी निर्भय होकर विचरण कर सकता है, राजदरबारों में सम्मान पाता है और वाद-विवाद में अजेय रहता है। यह कवच साधक को 'मृत्युंजय' (Conqueror of Death) की स्थिति की ओर ले जाता है, जहाँ उसे शारीरिक मृत्यु का भय नहीं रहता, क्योंकि वह जान जाता है कि वह स्वयं 'शिव स्वरूप' है।

कवच का महत्व (Significance)

  • पूर्ण सुरक्षा (Total Protection): इस कवच के ५१ श्लोक शरीर के सूक्ष्म से सूक्ष्म अंगों और चक्रों की रक्षा करते हैं। यह एक पूर्ण सुरक्षा चक्र है।

  • आत्मविश्वास और वाक सिद्धि: भैरवी 'वाणी' की अधिष्ठात्री भी हैं। इस कवच के नियमित पाठ से साधक की वाणी में ओज (Power) आ जाता है। वह जो कहता है, वह सत्य होने लगता है (वाक सिद्धि)।

  • सर्व बाधा मुक्ति: श्लोक ४६ में कहा गया है - 'सर्वविघ्नप्रशमनं सर्वव्याधिविनाशनम्'। यह सभी प्रकार के विघ्नों और व्याधियों (Diseases) का नाश करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. इस कवच का मुख्य उद्देश्य क्या है?

भैरवी 'तपस' (Heat) की देवी हैं। उनकी ऊर्जा अत्यंत तीव्र होती है। इस कवच का मुख्य उद्देश्य साधक के शरीर और मन को उस तीव्र ऊर्जा को सहन करने योग्य बनाना (To withstand the energy) और बाहरी बाधाओं से रक्षा करना है।

2. 'त्रैलोक्य विजय' का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है - 'तीनों लोकों को जीतने वाला'। यह कवच साधक को भौतिक (Physical), मानसिक (Mental) और आध्यात्मिक (Spiritual) तीनों स्तरों पर विजय दिलाता है।

3. क्या इसे बिना दीक्षा के पढ़ा जा सकता है?

कवच का पाठ सुरक्षा के लिए कोई भी कर सकता है। लेकिन तंत्र में दीक्षा के बाद इसका प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है। सामान्य साधक इसे देवी की कृपा पाने के लिए श्रद्धा से पढ़ सकते हैं।

4. भैरवी कवच और दुर्गा कवच में क्या अंतर है?

दुर्गा कवच 'दुर्गति' (Misfortune) से बचाता है और सौम्य सुरक्षा देता है। भैरवी कवच 'तेज' (Radiance) और 'वाक सिद्धि' (Power of Speech) प्रदान करता है और मृत्यु भय (Fear of Death) को जड़ से मिटा देता है।

5. पाठ करने की सही विधि क्या है?

स्नान के बाद लाल वस्त्र धारण करें। पूर्व या उत्तर की ओर मुख करें। पहले विनियोग, फिर न्यास, और अंत में कवच का पाठ करें। इसे गुप्त रखना (Not discussing with everyone) इसकी शक्ति बढ़ाता है।

6. क्या स्त्रियाँ इसका पाठ कर सकती हैं?

हाँ, स्त्रियाँ निस्संदेह इसका पाठ कर सकती हैं। माँ भैरवी की शक्ति स्त्रियों में naturally (स्वाभाविक रूप से) विद्यमान है। यह उन्हें विशेष सुरक्षा और आत्मविश्वास देता है।

7. श्लोक ३३ में 'दिक्पालाः' का क्या महत्व है?

श्लोक ३३ में 'दिक्पालाः सर्वदा पान्तु' कहा गया है। यह 'दिग्बंधन' है, जिससे दसों दिशाओं (इन्द्र, अग्नि, यम, आदि) के स्वामी साधक की रक्षा करते हैं और कोई नकारात्मक शक्ति प्रवेश नहीं कर पाती।

8. क्या यह ग्रह दोषों को दूर करता है?

हाँ, विशेष रूप से 'राहु' और 'केतु' के दुष्प्रभावों को। भैरवी उग्र शक्ति हैं, जो क्रूर ग्रहों के प्रभाव को तत्काल भस्म कर देती हैं। श्लोक १३ में यह 'कामराहुप्रिया' भी कही गई हैं।

9. कितने दिन में सिद्धि मिलती है?

तंत्र ग्रंथों के अनुसार, ४१ दिनों तक नियमित पाठ करने से कवच 'सिद्ध' हो जाता है। अर्थात, साधक के चारों ओर एक अदृश्य सुरक्षा चक्र (Aura) बन जाता है।

10. पाठ के बाद क्या करना चाहिए?

पाठ के बाद कम से कम ५ मिनट शांत बैठें ताकि कवच की ऊर्जा शरीर में समाहित (Absorb) हो सके। तुरंत किसी से बात न करें या क्रोध न करें।