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श्री सूर्यकवचम् (याज्ञवल्क्य रचित)

Sri Surya Kavacham – Yajnavalkya Krutam (Aditya Purana)

श्री सूर्यकवचम् (याज्ञवल्क्य रचित)
॥ श्रीसूर्यकवचम् ॥ ॥ कवच पाठ ॥ घृणिर्मे शीर्षकं पातु सूर्यः पातु ललाटकम् । आदित्यः पातु नेत्रे द्वे श्रोत्रे पातु दिवाकरः ॥ १॥ नासिकां च त्रयी पातु पातु गण्डस्थले रविः । पातुत्तरोष्ठमुष्णांशुरधरोष्ठमहर्पतिः ॥ २॥ दन्तान्पातु जगच्चक्षुः जिह्वां पातु विभावसुः । वक्त्रं पातु सहस्रांशुः चिबुकं पातु शङ्करः ॥ ३॥ पार्शे पातु पतङ्गश्च पृष्ठं पातु प्रभाकरः । कुक्षिं दिनमणिः पातु मध्यं पातु प्रजेश्वरः ॥ ४॥ पात्वंशुमाली नाभिं मे कटिं पात्वमराग्रणीः । ऊरू पातु ग्रहपतिः जानुनी पातु सर्वगः ॥ ५॥ जङ्घे धामनिधिः पातु गुल्फौ पातु प्रभाकरः । मार्ताण्डः पातु पादौ मे पातु मित्रोऽखिलं वपुः ॥ ६॥ ॥ फलश्रुतिः ॥ इदमादित्यनामाख्यं कवचं धारयेत्सुधीः । सदीर्घायुस्सदा भोगी स्थिरसम्पद्विजायते ॥ ७॥ धर्मसञ्चारिणो लोके त्रयीश्री सूर्यवर्मणा । आवृतं पुरुषं द्रष्टुमशक्ता भयविह्वलाः ॥ ८॥ मित्रयन्तोद्भवन्तस्तं तिरस्कर्तुं तदक्षमम् । विरोधिनस्तु सर्वत्र तदाचरणतत्पराः ॥ ९॥ दारिद्र्यं चैव दौर्भाग्यं मारकस्त्विह दह्यते । सूर्येति सुरराजेति मित्रेति सुमनास्स्मरन् ॥ १०॥ पुमान्न प्राप्नुयाद्दुःखं शाश्वतं सुखमश्नुते । सर्वोन्नतगुणाधारं सूर्येणाशु प्रकल्पितम् ॥ ११॥ कवचं धारयेद्यस्तु तस्य स्यादखिलं वशम् । सदा गदाधरस्यापि छेत्तुं किं च तदक्षयम् ॥ १२॥ तस्य हस्ते च सर्वापि सिद्धीः प्रत्ययदायिनीः । सुखस्वपे यदा सूरः स्वस्य वर्मोपविष्टवान् ॥ १३॥ याज्ञवल्क्यो स्तवान् सप्त समक्षं हृदये मुदा । स घृणिस्सूर्य आदित्यस्तपनस्सविता रविः ॥ १४॥ कर्मसाक्षी दिनमणिर्मित्रो भानुर्विभुर्हरिः । द्वादशैतानि नामानि त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः ॥ १५॥ तस्य मृत्युभयं नास्ति सपुत्रो विजयी भवेत् । द्वाभ्यां त्रिभिस्त्रिभिर्वर्णैः सन्मन्त्रपद्धतिम् ॥ १६॥ विज्ञायाष्टाक्षरीमेतां ओङ्कारादि जपेत्कृती । मन्त्रात्मकमिदं वर्म मन्त्रवद्गोपयेत्तथा ॥ १७॥ अमन्दविदुषः पुंसो दातुं तद्दुर्लभं खलु । दुर्लभं भक्तिहीनानां सुलभं पुण्यजीविनाम् ॥ १८॥ य इदं पठते भक्त्या शृणुयाद्वा समाहितः । तस्य पुण्यफलं वक्तुमशक्यं वर्षकोटिभिः ॥ १९॥ ॥ इत्यादित्यपुराणे उत्तरखण्डे याज्ञवल्क्य विरचितं श्रीसूर्यकवचं सम्पूर्णम् ॥ स्वर्भुवर्भूरोमिति दिग्विमोकः श्री सूर्यनारायण परब्रह्मार्पणमस्तु ।

श्री सूर्यकवचम्: एक शक्तिशाली रक्षा स्तोत्र

श्री सूर्यकवचम् (Sri Surya Kavacham) सूर्य भगवान की स्तुति और रक्षा का एक परम सिद्ध मन्त्र-समूह है। यह कवच आदित्य पुराण के उत्तरखण्ड से लिया गया है और इसकी रचना स्वयं महर्षि याज्ञवल्क्य (Sage Yajnavalkya) ने की थी, जिन्हें सूर्य देव ने ही साक्षात वेदों का ज्ञान दिया था।

यह कवच कोई साधारण स्तुति नहीं है। इसमें सूर्य के विभिन्न नामों (जैसे घृणि, आदित्य, दिवाकर, मार्ताण्ड, मित्र) द्वारा शरीर के मस्तक से लेकर चरणों तक प्रत्येक अंग की सुरक्षा (Body Protection) मांगी गई है। माना जाता है कि जो व्यक्ति इस कवच को धारण (पाठ) करता है, उसके चारों ओर सूर्य के प्रकाश का एक अभेद्य घेरा (Aura) बन जाता है जिसे कोई भी शत्रु या नकारात्मक ऊर्जा भेद नहीं सकती।

"इदमादित्यनामाख्यं कवचं धारयेत्सुधीः। सदीर्घायुस्सदा भोगी स्थिरसम्पद्विजायते ॥" अर्थात्, जो बुद्धिमान मनुष्य इस आदित्य कवच का पाठ करता है, वह दीर्घायु प्राप्त करता है और जीवन में स्थिर सम्पत्ति तथा सम्पूर्ण सुखों को भोगता है।

अंग रक्षा विवरण (Body Part Protection)

अंग (Body Part)रक्षक देव (Protector)अंग (Body Part)रक्षक देव (Protector)
मस्तक (Head)घृणि (Ghrini)ललाट (Forehead)सूर्य (Surya)
नेत्र (Eyes)आदित्य (Aditya)कान (Ears)दिवाकर (Divakara)
नासिका (Nose)त्रयी (Trayi)गाल (Cheeks)रवि (Ravi)
ऊपरी होंठ (Upper Lip)उष्णांशु (Ushnanshu)निचला होंठ (Lower Lip)अहर्पति (Aharpati)
दांत (Teeth)जगच्चक्षु (Jagatchakshu)जीभ (Tongue)विभावसु (Vibhavasu)
हृदय (Heart/Chest)नभोमणि (Nabhomani)पैर (Feet)मित्र (Mitra)

पाठ के दिव्य लाभ (Phalashruti & Benefits)

महर्षि याज्ञवल्क्य ने इस कवच के पाठकों के लिए कई अद्भुत लाभ बताए हैं (श्लोक 7 से 19):

🛡️ अभेद्य सुरक्षा

जो यह सूर्य कवच धारण करता है, उसे देखकर विरोधी भी भयभीत हो जाते हैं। यह कवच भगवान गदाधर (विष्णु) द्वारा भी भेदा नहीं जा सकता (तदक्षयम्)।

💰 दरिद्रता का नाश

"दारिद्र्यं चैव दौर्भाग्यं मारकस्त्विह दह्यते" - दरिद्रता और दुर्भाग्य जलकर भस्म हो जाते हैं। व्यक्ति स्थिर संपत्ति (Stable Wealth) प्राप्त करता है।

🕉️ अष्टाक्षरी मंत्र सिद्धि

इस कवच में सूर्य देव के 12 मुख्य नाम और एक 8 अक्षरों (अष्टाक्षरी) वाले विशेष मंत्र (ॐ घृणिः सूर्य आदित्यः) का रहस्य छिपा है। त्रिकाल संध्या इसे पढ़ने से मंत्र सिद्ध होता है।

👑 मृत्यु भय मुक्ति

"तस्य मृत्युभयं नास्ति सपुत्रो विजयी भवेत्" - साधक को अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता और वह विजय प्राप्त करता है।

कवच पाठ की विधि (Ritual Method)

इस कवच का पूरा लाभ प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित विधि का पालन करना चाहिए:

  • सही समय: सूर्योदय (Sunrise) का समय इस कवच के पाठ के लिए सर्वोत्तम है। यदि कोई विशेष बाधा हो, तो त्रिसंध्या (सुबह, दोपहर, शाम) में भी इसे पढ़ा जा सकता है।
  • पवित्रता: प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ (विशेष रूप से लाल या सफेद) वस्त्र धारण करें।
  • दिशा और आसन: पूर्व दिशा (East) की ओर मुख करके और लाल आसन (Red Asana) पर बैठकर पाठ करना चाहिए।
  • अर्घ्य (जल दान): पाठ से पूर्व या पश्चात् भगवान सूर्य को तांबे के लोटे में जल, लाल फूल, कुमकुम और अक्षत डालकर अर्घ्य दें।
  • गोपानीयता: श्लोक 17 के अनुसार (मन्त्रवद्गोपयेत्तथा) इस उत्तम कवच (रजाई/वर्म) को भक्तिहीन व्यक्तियों को नहीं बताना चाहिए, इसे गुप्त रखकर स्वयं नियमित अभ्यास में लाना चाहिए।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. यह सूर्यकवचम् किस पुराण से लिया गया है?

यह आदित्य पुराण के उत्तरखण्ड से लिया गया है। इसके रचयिता महर्षि याज्ञवल्क्य हैं।

2. अगस्त्य रचित 'आदित्य कवच' और याज्ञवल्क्य रचित 'सूर्य कवच' में क्या अंतर है?

अगस्त्य मुनि ने 'आदित्य कवच' (स्कन्द पुराण) की रचना की थी जिसमें शरीर के कुछ अंगों का वर्णन है। याज्ञवल्क्य मुनि द्वारा रचित इस 'सूर्य कवच' (आदित्य पुराण) में शरीर के আরও सूक्ष्म अंगों की रक्षा और सूर्य के 12 विशेष नामों (द्वादश नाम) के साथ 8 अक्षरों वाले सिद्ध मन्त्र का भी वर्णन है।

3. क्या इसे पढ़ने से नवग्रह शांति होती है?

हाँ। चूँकि सूर्य सभी ग्रहों (नवग्रहों) के राजा हैं, इसलिए सूर्य देव के इस शक्तिशाली कवच का पाठ करने से नवग्रहों की पीड़ा और कुंडली के समस्त दोष दूर हो जाते हैं (ग्रहपतिः पातु)।

4. श्लोक 14 और 15 में वर्णित 12 नाम (Dwadasa Nama) कौन से हैं?

वे नाम हैं: घृणि, सूर्य, आदित्य, तपन, सविता, रवि, कर्मसाक्षी, दिनमणि, मित्र, भानु, विभु, और हरि। जो व्यक्ति तीनों समय (त्रिसन्ध्यम) इन 12 नामों का पाठ करता है, उसकी अकाल मृत्यु कभी नहीं होती।

5. 'त्रयीश्री सूर्यवर्मणा' का क्या अर्थ है?

'त्रयी' का अर्थ है तीनों वेद (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद)। सूर्य भगवान वेदों के स्वरूप हैं। 'वर्म' का अर्थ है कवच। जो इस वैदिक सूर्य रूपी कवच को धारण करता है, उसे कोई भी बुरी शक्ति परास्त नहीं कर सकती।