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श्री सूर्य दिव्य कवच स्तोत्रम्

Sri Surya Divya Kavacha Stotram (Hiranyagarbha Samhita)

श्री सूर्य दिव्य कवच स्तोत्रम्
॥ श्री सूर्यनारायण दिव्य कवच स्तोत्रम् ॥ ॥ विनियोगः ॥ ॐ अस्य श्रीसूर्यनारायणदिव्यकवचस्तोत्रमहामन्त्रस्य हिरण्यगर्भ ऋषिः । अनुष्टुप्छन्दः श्रीसूर्यनारायणो देवता । सूं बीजं, र्यां शक्तिः, यां कीलकम् । श्रीसूर्यनारायणप्रसादसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः । ॥ करन्यासः ॥ ॐ श्रीसूर्यनारायणाय अङ्गुष्ठाभ्यां नमः पद्मिनीवल्लभाय तर्जनीभ्यां नमः दिवाकराय मध्यमाभ्यां नमः ॥ भास्कराय अनामिकाभ्यां नमः ॥ मार्ताण्डाय कनिष्ठिकाभ्यां नमः ॥ आदित्याय करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ॥ ॥ हृदन्यासः ॥ ॐ श्रीसूर्यनारायणाय हृदयाय नमः । पद्मिनीवल्लभाय शिरसे स्वाहा । दिवाकराय शिखायै वषट् । भास्कराय कवचाय हुम् । मार्ताण्डाय नेत्रत्रयाय वौषट् । आदित्याय अस्त्राय फट् । लोकत्रयेति दिग्बन्धः । (दसों दिशाओं को बांधें) ॥ ध्यानम् ॥ त्रिमूर्तिरूपं विश्वेशं शूलमुद्गरधारिणम् । हिरण्यवर्णं सुमुखं छायायुक्तं रविं भजे ॥ ॥ अथ कवचम् ॥ भास्करो मे शिरः पातु ललाटं लोकबान्धवः । कपोलौ त्रयीमयः पातु नासिकां विश्वरूपभृत् ॥ १॥ नेत्रे चाधोक्षजः पातु कण्ठं सप्ताश्ववाहनः । मार्ताण्डो मे भुजौ पातु कक्षौ पातु दिवाकरः ॥ २॥ पातु मे हृदयं पूषा वक्षः पातु तमोहरः । कुक्षिं मे पातु मिहिरो नाभिं वेदान्तगोचरः ॥ ३॥ द्युमणिर्मे कटिं पातु गुह्यं मे अब्जबान्धवः । पातु मे जानुनी सूर्यो ऊरू पात्वुरुविक्रमः ॥ ४॥ चित्रभानुस्सदा पातु जानुनी पद्मिनीप्रियः । जङ्घे पातु सहस्रांशुः पादौ सर्वसुरार्चितः ॥ ५॥ सर्वाङ्गं पातु लोकेशो बुद्धिसिद्धिगुणप्रदः । सहस्रभानुर्मे विद्यां पातु तेजः प्रभाकरः ॥ ६॥ अहोरात्रौ सदा पातु कर्मसाक्षी परन्तपः । आदित्यकवचं पुण्यं यः पठेत्सततं शुचिः ॥ ७॥ ॥ फलश्रुतिः ॥ सर्वरोगविनिर्मुक्तो सर्वोपद्रववर्जितः । तापत्रयविहीनस्सन् सर्वसिद्धिमवाप्नुयात् ॥ ८॥ संवत्सरेण कालेन सुवर्णतनुतां व्रजेत् । क्षयापस्मारकुष्ठादि गुल्मव्याधिविवर्जितः ॥ ९॥ सूर्यप्रसादसिद्धात्मा सर्वाभीष्टफलं लभेत् । आदित्यवासरे स्नात्वा कृत्वा पायसमुत्तमम् ॥ १०॥ अर्कपत्रे तु निक्षिप्य दानं कुर्याद्विचक्षणः । एकभुक्तं व्रतं सम्यक्संवत्सरमथाचरेत् । पुत्रपौत्रान् लभेल्लोके चिरञ्जीवी भविष्यति ॥ ११॥ ॥ दिग्विमोकः ॥ स्वर्भुवर्भूरोमिति दिग्विमोकः । (दिशाओं का बंधन खोलें) ॥ इति श्रीहिरण्यगर्भसंहितायां श्रीसूर्यनारायणदिव्यकवचस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

श्री सूर्य दिव्य कवच स्तोत्र का परिचय

श्री सूर्य दिव्य कवच स्तोत्र (Sri Surya Divya Kavacha Stotram) 'हिरण्यगर्भ संहिता' (Hiranyagarbha Samhita) का एक अत्यंत पावन और चमत्कारी श्लोकबद्ध स्तोत्र है। इस स्तोत्र में भगवान सूर्यनारायण के विभिन्न नामों का स्मरण करते हुए शारीरिक स्वास्थ्य और दीर्घायु की प्रार्थना की जाती है। 'हिरण्यगर्भ' स्वयं ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति का वह स्वर्णमयी अंड या प्रकाश है, जिससे समस्त भौतिक जगत की रचना हुई है। इसी आदि-प्रकाश की स्तुति इस स्तोत्र में निहित है।

अन्य सादे कवचों से सर्वथा भिन्न, इस दिव्य कवच में पाठ शुरू करने से पहले करन्यास, हृदन्यास (Nyasa) और दिग्बन्ध (Digbandha) की पूर्ण शास्त्रीय विधि दी गई है। न्यास के अन्तर्गत शरीर के विभिन्न अंगों (हृदय, शिर, शिखा, नेत्र) में सूर्य के बीजाक्षरों और नामों की स्थापना की जाती है, जिससे साधक के भीतर सोई हुई कुण्डलिनी ऊर्जा (Kundalini Energy) जाग्रत होती है। दिग्बन्ध के माध्यम से दसों दिशाओं को बांधा जाता है, जिससे पूजा या जप के दौरान बाहरी नकारात्मक शक्तियों (Negative Entities/Obstacles) से साधक की पूर्णतया रक्षा होती है।

अंग रक्षा विवरण (Protection by Various Names)

इस कवच में भगवान सूर्य के अनेक विशेषणों का उपयोग शरीर के भिन्न-भिन्न अंगों की सुरक्षा के लिए किया गया है:

अंग (Body Part)सूर्य का स्वरूप (Surya's Form)अंग (Body Part)सूर्य का स्वरूप (Surya's Form)
सिर (Head)भास्करवक्षस्थल (Chest)तमोहर (अन्धकार नाशक)
ललाट (Forehead)लोकबान्धवकुक्षि (Belly)मिहिर
कपोल (Cheeks)त्रयीमय (वेद रूप)नाभि (Navel)वेदान्तगोचर
नासिका (Nose)विश्वरूपभृत्कमर (Waist)द्युमणि
नेत्र (Eyes)अधोक्षजगुह्यांग (Privates)अब्जबान्धव
कंठ (Neck)सप्ताश्ववाहनऊरु (Thighs)उरुविक्रम
भुजाएँ (Arms)मार्ताण्डघुटने (Knees)सूर्य / पद्मिनीप्रिय
हृदय (Heart)पूषापैर (Feet)सर्वसुरार्चित

दिव्य कवच पाठ के चमत्कारिक लाभ (Benefits)

  • असाध्य रोगों से मुक्ति: फलश्रुति के अनुसार इसके नियमित पाठ से 'क्षय (TB)', 'अपस्मार (Epilepsy)', 'कुष्ठ (Leprosy)' और 'गुल्म (Tumor)' जैसे भयंकर रोग नष्ट हो जाते हैं।
  • सुवर्ण जैसी कांति: जो व्यक्ति एक वर्ष (संवत्सरेण कालेन) तक इसका निरंतर पाठ करता है, उसकी देह सुवर्ण (सोने) के समान चमकने लगती है (सुवर्णतनुतां व्रजेत्)।
  • तापत्रय से रक्षा: यह कवच आधीदैविक, आधीभौतिक और आध्यात्मिक ताप (दुःख) से बचाकर सर्वरोग और सर्वोपद्रव का नाश करता है।
  • संतान सुख: एकांत और एकभुक्त (एक समय भोजन) व्रत रखते हुए जो व्यक्ति इस स्तोत्र का अनुष्ठान पूरा करता है, उसे उत्तम पुत्र और पौत्रों की प्राप्ति होती है और वह चिरंजीवी बनता है।

रविवार का विशेष अनुष्ठान एवं दान विधि (Ritual Guidelines)

स्तोत्र के अंत में एक विशेष व्रत अनुष्ठान का वर्णन है (श्लोक 10 और 11):
  • विशेष रूप से रविवार (आदित्य वासर) को स्नानादि से शुद्ध हो जाएं।
  • उत्तम पायस (खीर) का निर्माण करें।
  • इस पायस को 'अर्क' (मदार/आक) के पत्तों पर रखकर सूर्यनारायण को अर्पित करें और योग्य ब्राह्मण या जरूरतमंद को दान करें।
  • इस दिन 'एकभुक्त' व्रत (दिन में केवल एक बार सात्विक भोजन) करें।
  • इस प्रकार एक वर्ष तक नियमपूर्वक करने से व्यक्ति सिद्ध हो जाता है और सूर्यनारायण का साक्षात् आशीर्वाद प्राप्त करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. यह 'श्री सूर्य दिव्य कवच स्तोत्र' किस प्रामाणिक ग्रंथ से लिया गया है?

यह सम्पूर्ण महाकवच 'हिरण्यगर्भ संहिता' (Hiranyagarbha Samhita) से उद्धृत है। इस संहिता में भगवान सूर्यनारायण (हिरण्यगर्भ) के परम तेज, उनकी उपासना विधि और चमत्कारी कवचों का विस्तृत वर्णन मिलता है।

2. इसमें 'करन्यास' और 'हृदन्यास' करने का क्या आध्यात्मिक महत्व है?

न्यास एक योगिक एवं तान्त्रिक क्रिया है जिसमें मन्त्रों का उच्चारण करते हुए शरीर के विभिन्न अंगों (उंगलियों, हृदय, मस्तक, शिखा आदि) को स्पर्श किया जाता है। इससे शरीर 'मन्त्रमय' व 'तेजोमय' होकर पूर्ण रूप से शुद्ध और सुरक्षित हो जाता है।

3. 'दिग्बन्ध' और पाठ के अंत में 'दिग्विमोक' का क्या अर्थ है?

पाठ शुरू करने से पहले 'दिग्बन्ध' (दसों दिशाओं को बांधना) किया जाता है ताकि अनुष्ठान के दौरान कोई भी नकारात्मक या आसुरी शक्ति (Negative Energy) बाधा न डाल सके। पाठ पूरा होने के बाद 'दिग्विमोक' (दिशाओं को खोलना) मन्त्र (स्वर्भुवर्भूरोमिति दिग्विमोकः) बोलकर दिशाओं का बंधन खोला जाता है।

4. इस कवच का पाठ विशेष रूप से किन शारीरिक कष्टों व रोगों में किया जाता है?

फलश्रुति (श्लोक 9) के अनुसार क्षय रोग (Tuberculosis/TB), अपस्मार (मिर्गी/Epilepsy), भयंकर कुष्ठ रोग (Leprosy) और गुल्म (Tumor/Ulcer) जैसे असाध्य शारीरिक रोगों के समूल नाश के लिए यह स्तोत्र बहुत ही शक्तिशाली माना गया है।

5. कवच में बताया गया 'एकभुक्त व्रत' क्या होता है?

एकभुक्त व्रत का अर्थ है पूरे दिन-रात (24 घंटे) की अवधि में केवल एक ही बार सात्विक भोजन/अन्न ग्रहण करना। रविवार के दिन यह व्रत रखकर इस स्तोत्र का अनुष्ठान करने से सूर्य देव की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

6. सूर्य कवच का अनुष्ठान कितने समय तक करना चाहिए?

श्लोक 11 के अनुसार यदि कोई व्यक्ति एक वर्ष (संवत्सर) तक एकभुक्त व्रत रखकर नियमित रूप से इस कवच का पाठ करता है, तो उसके सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं और वह चिरंजीवी बनता है।

7. रविवार को दान की क्या विशेष विधि बताई गई है?

स्तोत्र (श्लोक 10-11) के अनुसार, आदित्यवार (रविवार) को स्नानादि करके उत्तम पायस (खीर) बनानी चाहिए। फिर अर्क (मदार/आक) के पत्तों पर वह खीर रखकर सूर्यनारायण को निवेदित कर उसे दान करना चाहिए।

8. 'सुवर्णतनुतां व्रजेत्' का क्या तात्पर्य है?

'सुवर्णतनुतां व्रजेत्' का अर्थ है - शरीर का 'सुवर्ण' (सोने) के समान तेजवान और निरोगी हो जाना। इस कवच के निरंतर पाठ से शरीर की सारी मलिनता और व्याधियां दूर हो जाती हैं और व्यक्ति कांतिमय हो जाता है।

9. क्या स्त्रियां या साधारण गृहस्थ इसका पाठ कर सकते हैं?

जी हां, कोई भी पवित्र आचरण करने वाला व्यक्ति (सततं शुचिः) पूर्ण श्रद्धा भाव से इसका पाठ कर सकता है। स्त्रियों, पुरुषों एवं गृहस्थों सभी के लिए रोगों से मुक्ति और आयु वृद्धि हेतु यह अत्यंत कल्याणकारी है।

10. पाठ करते समय किस दिशा की ओर मुख करना चाहिए?

भगवान सूर्य की उपासना सदैव पूर्व दिशा (East) की ओर मुख करके करनी चाहिए। प्रातःकाल (सूर्योदय के समय) लाल ऊनी या कुशा के आसन पर बैठकर इसका पाठ करना सर्वोत्तम सिद्ध होता है।