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श्री सूर्यकवचम् (वज्रपञ्जर)

Sri Vajrapanjara Surya Kavacham (Rudrayamala Tantra)

श्री सूर्यकवचम् (वज्रपञ्जर)
॥ वज्रपञ्जराख्य सूर्यकवचम् ॥ ॥ श्रीभैरव उवाच ॥ यो देवदेवो भगवान् भास्करो महसां निधिः । गायत्रीनायको भास्वान् सवितेति प्रगीयते ॥ १॥ तस्याहं कवचं दिव्यं वज्रपञ्जरकाभिधम् । सर्वमन्त्रमयं गुह्यं मूलविद्यारहस्यकम् ॥ २॥ सर्वपापापहं देवि दुःखदारिद्र्यनाशनम् । महाकुष्ठहरं पुण्यं सर्वरोगनिबर्हणम् ॥ ३॥ सर्वशत्रुसमूहघ्नं सङ्ग्रामे विजयप्रदम् । सर्वतेजोमयं सर्वदेवदानवपूजितम् ॥ ४॥ रणे राजभये घोरे सर्वोपद्रवनाशनम् । मातृकावेष्टितं वर्म भैरवानननिर्गतम् ॥ ५॥ ग्रहपीडाहरं देवि सर्वसङ्कटनाशनम् । धारणादस्य देवेशि ब्रह्मा लोकपितामहः ॥ ६॥ विष्णुर्नारायणो देवि रणे दैत्याञ्जेष्यति । शङ्करः सर्वलोकेशो वासवोऽपि दिवस्पतिः ॥ ७॥ ओषधीशः शशी देवि शिवोऽहं भैरवेश्वरः । मन्त्रात्मकं परं वर्म सवितुः सारमुत्तमम् ॥ ८॥ यो धारयेद् भुजे मूर्ध्नि रविवारे महेश्वरि । स राजवल्लभो लोके तेजस्वी वैरिमर्दनः ॥ ९॥ बहुनोक्तेन किं देवि कवचस्यास्य धारणात् । इह लक्ष्मीधनारोग्य-वृद्धिर्भवति नान्यथा ॥ १०॥ परत्र परमा मुक्तिर्देवानामपि दुर्लभा । कवचस्यास्य देवेशि मूलविद्यामयस्य च ॥ ११॥ ॥ विनियोगः ॥ वज्रपञ्जरकाख्यस्य मुनिर्ब्रह्मा समीरितः । गायत्र्यं छन्द इत्युक्तं देवता सविता स्मृतः ॥ १२॥ माया बीजं शरत् शक्तिर्नमः कीलकमीश्वरि । सर्वार्थसाधने देवि विनियोगः प्रकीर्तितः ॥ १३॥ ॥ मातृका एवं बीजमन्त्र युक्त कवच पाठ ॥ ओं अं आं इं ईं शिरः पातु ओं सूर्यो मन्त्रविग्रहः । उं ऊं ऋं ॠं ललाटं मे ह्रां रविः पातु चिन्मयः ॥ १४॥ ऌं ॡं एं ऐं पातु नेत्रे ह्रीं ममारुणसारथिः । ओं औं अं अः श्रुती पातु सः सर्वजगदीश्वरः ॥ १५॥ कं खं गं घं पातु गण्डौ सूं सूरः सुरपूजितः । चं छं जं झं च नासां मे पातु यां अर्यमा प्रभुः ॥ १६॥ टं ठं डं ढं मुखं पायाद् यं योगीश्वरपूजितः । तं थं दं धं गलं पातु नं नारायणवल्लभः ॥ १७॥ पं फं बं भं मम स्कन्धौ पातु मं महसां निधिः । यं रं लं वं भुजौ पातु मूलं सकनायकः ॥ १८॥ शं षं सं हं पातु वक्षो मूलमन्त्रमयो ध्रुवः । ळं क्षः कुक्षिं सदा पातु ग्रहाथो दिनेश्वरः ॥ १९॥ ङं ञं णं नं मं मे पातु पृष्ठं दिवसनायकः । अं आं इं ईं उं ऊं ऋं ॠं नाभिं पातु तमोपहः ॥ २०॥ ऌं ॡं एं ऐं ओं औं अं अः लिङ्गं मेऽव्याद् ग्रहेश्वरः । कं खं गं घं चं छं जं झं कटिं भानुर्ममावतु ॥ २१॥ टं ठं डं ढं तं थं दं धं जानू भास्वान् ममावतु । पं फं बं भं यं रं लं वं जङ्घे मेऽव्याद् विभाकरः ॥ २२॥ शं षं सं हं ळं क्षः पातु मूलं पादौ त्रयितनुः । ङं ञं णं नं मं मे पातु सविता सकलं वपुः ॥ २३॥ ॥ अष्टदिक् रक्षण ॥ सोमः पूर्वे च मां पातु भौमोऽग्नौ मां सदावतु । बुधो मां दक्षिणे पातु नैर्ऋृत्यां गुरुरेव माम् ॥ २४॥ पश्चिमे मां सितः पातु वायव्यां मां शनैश्चरः । उत्तरे मां तमः पायादैशान्यां मां शिखी तथा ॥ २५॥ ऊर्ध्वं मां पातु मिहिरो मामधस्ताञ्जगत्पतिः । प्रभाते भास्करः पातु मध्याह्ने मां दिनेश्वरः ॥ २६॥ सायं वेदप्रियः पातु निशीथे विस्फुरापतिः । सर्वत्र सर्वदा सूर्यः पातु मां चक्रनायकः ॥ २७॥ रणे राजकुले द्यूते विवादे शत्रुसङ्कटे । सङ्ग्रामे च ज्वरे रोगे पातु मां सविता प्रभुः ॥ २८॥ ॥ गुह्य बीजाक्षर रक्षण ॥ ओं ओं ओं उत ओं उ ॐ ह स म यः सूरोऽवतान्मां भयाद् । ह्रां ह्रीं ह्रुं हहहा हसौः हसहसौः हंसोऽवतात् सर्वतः । सः सः सः सससा नृपाद्वनचराच्चौराद्रणात् संकटात् । पायान्मां कुलनायकोऽपि सविता ओं ह्रीं ह सौः सर्वदा ॥ २९॥ द्रां द्रीं द्रूं दधनं तथा च तरणिर्भांभैर्भयाद् भास्करो रां रीं रूं रुरुरूं रविर्ज्वरभयात् कुष्ठाच्च शूलामयात् । अं अं आं विविवीं महामयभयं मां पातु मार्तण्डको मूलव्याप्ततनुः सदावतु परं हंसः सहस्रांशुमान् ॥ ३0॥ ॥ फलश्रुतिः एवं यन्त्र धारण विधि ॥ इति श्रीकवचं दिव्यं वज्रपञ्जरकाभिधम् । सर्वदेवरहस्यं च मातृकामन्त्रवेष्टितम् ॥ ३१॥ महारोगभयघ्नं च पापघ्नं मन्मुखोदितम् । गुह्यं यशस्करं पुण्यं सर्वश्रेयस्करं शिवे ॥ ३२॥ लिखित्वा रविवारे तु तिष्ये वा जन्मभे प्रिये । अष्टगन्धेन दिव्येन सुधाक्षीरेण पार्वति ॥ ३३॥ अर्कक्षीरेण पुण्येन भूर्जत्वचि महेश्वरि । कनकीकाष्ठलेखन्या कवचं भास्करोदये ॥ ३४॥ श्वेतसूत्रेण रक्तेन श्यामेनावेष्टयेद् गुटीम् । सौवर्णेनाथ संवेष्ट्य धारयेन्मूर्ध्नि वा भुजे ॥ ३५॥ रणे रिपूञ्जयेद् देवि वादे सदसि जेष्यति । राजमान्यो भवेन्नित्यं सर्वतेजोमयो भवेत् ॥ ३६॥ कण्ठस्था पुत्रदा देवि कुक्षिस्था रोगनाशिनी । शिरःस्था गुटिका दिव्या राजलोकवशङ्करी ॥ ३७॥ भुजस्था धनदा नित्यं तेजोबुद्धिविवर्धिनी । वन्ध्या वा काकवन्ध्या वा मृतवत्सा च याङ्गना ॥ ३८॥ कण्ठे सा धारयेन्नित्यं बहुपुत्रा प्रजायते । यस्य देहे भवेन्नित्यं गुटिकैषा महेश्वरि ॥ ३९॥ महास्त्राणीन्द्रमुक्तानि ब्रह्मास्त्रादीनि पार्वति । तद्देहं प्राप्य व्यर्थानि भविष्यन्ति न संशयः ॥ ४०॥ त्रिकालं यः पठेन्नित्यं कवचं वज्रपञ्जरम् । तस्य सद्यो महादेवि सविता वरदो भवेत् ॥ ४१॥ अज्ञात्वा कवचं देवि पूजयेद् यस्त्रयीतनुम् । तस्य पूजार्जितं पुण्यं जन्मकोटिषु निष्फलम् ॥ ४२॥ शतावर्तं पठेद्वर्म सप्तम्यां रविवासरे । महाकुष्ठार्दितो देवि मुच्यते नात्र संशयः ॥ ४३॥ निरोगो यः पठेद्वर्म दरिद्रो वज्रपञ्जरम् । लक्ष्मीवाञ्जायते देवि सद्यः सूर्यप्रसादतः ॥ ४४॥ भक्त्या यः प्रपठेद् देवि कवचं प्रत्यहं प्रिये । इह लोके श्रियं भुक्त्वा देहान्ते मुक्तिमाप्नुयात् ॥ ४५॥ ॥ इति श्रीरुद्रयामले तन्त्रे श्रीदेवीरहस्ये वज्रपञ्जराख्यसूर्यकवचनिरूपणं त्रयस्त्रिंशः पटलः सम्पूर्णम् ॥

श्री वज्रपञ्जर सूर्य कवच: एक तांत्रिक महाकवच

वज्रपञ्जर सूर्य कवच (Vajrapanjara Surya Kavacham) तन्त्र शास्त्र का एक अत्यंत गोपनीय और सिद्ध कवच है। इसका विस्तृत वर्णन रुद्रयामल तन्त्र (Rudrayamala Tantra) के 'श्रीदेवीरहस्य' (Sri Devi Rahasya) के 33वें पटल में मिलता है। इस कवच का उपदेश भगवान पाताल-भैरव (शिव) ने माता पार्वती को दिया था।

'वज्रपञ्जर' (Vajrapanjara) का अर्थ है - वज्र (Diamonds/Thunderbolt) का पिंजरा। जो साधक इस कवच का पाठ करता है या इसे धारण करता है, उसके चारों ओर सूर्य के अदृश्य तेज का एक ऐसा अभेद्य पिंजरा बन जाता है जिसे कोई भी अस्त्र-शस्त्र, रोग, शत्रु या तांत्रिक प्रयोग भेद नहीं सकता।

"मातृकावेष्टितं वर्म भैरवानननिर्गतम्" - भगवान शिव के मुख से निकला यह कवच 'मातृका' (संस्कृत के 50 बीजाक्षरों) से वेष्टित है, जो इसे अन्य पौराणिक कवचों से कहीं अधिक तीव्र और फलदायी बनाता है।

मातृका और सूर्य बीज मन्त्रों का रहस्य (Secrets of Bija Mantras)

इस कवच की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह संस्कृत की 'मातृका' (अ अ आ इ ई उ ऊ...) को सूर्य के बीजों (ह्रां, ह्रीं, ह्रूं, हसौः) के साथ जोड़कर शरीर के प्रत्येक चक्र और अंग में स्थापित करता है। श्लोक 14 से 23 तक के ध्यान से साधक का साधारण शरीर एक 'मन्त्रमय देह' (Mantramaya Deha) में परिवर्तित हो जाता है। तन्त्र शास्त्र में शरीर के 50 प्रमुख अंगों में मातृका का विशेष न्यास (Nyasa) किया जाता है जो कुण्डलिनी शक्ति को जाग्रत करने में सहायक होता है।

श्लोक 29 और 30 में तो 'ह्रां ह्रीं ह्रुं हहहा हसौः' जैसे अत्यंत प्रबल तांत्रिक बीजों का प्रयोग हुआ है। ये बीज 'हंस' (परमात्मा) स्वरूप सूर्य की उस अग्नि को जाग्रत करते हैं जो कुष्ठ रोग (Severe Leprosy), शूल रोग (Extreme Pain) और अकाल मृत्यु के महाभय (Great Fear) को तत्काल नष्ट कर देती है। इन बीजाक्षरों के नियमित उच्चारण से शरीर की आभा (Aura) स्वर्ण के समान दमकने लगती है और साधक के भीतर एक दिव्य चुम्बकीय आकर्षण पैदा हो जाता है।

अष्टदिक् (आठों दिशाओं) की रक्षा

दिशा (Direction)रक्षक ग्रह/देव (Protector)दिशा (Direction)रक्षक ग्रह/देव (Protector)
पूर्व (East)सोम (Chandra)अग्निकोण (South-East)भौम (Mangal)
दक्षिण (South)बुध (Budha)नैर्ऋत्य (South-West)गुरु (Brihaspati)
पश्चिम (West)सित (Shukra)वायव्य (North-West)शनैश्चर (Shani)
उत्तर (North)तम (Rahu)ईशान (North-East)शिखी (Ketu)
ऊपर (Above)मिहिर (Surya)नीचे (Below)जगत्पति (Lord of World)

ताबीज़ रूप में धारण करने की विधि एवं लाभ (Amulet Benefits)

इस कवच को केवल पढ़ने से ही नहीं, बल्कि एक विशेष विधि से भोजपत्र पर लिखकर अंगों में धारण (Wearing as an Amulet/Tabeez) करने का भी विधान शिव जी ने बताया है:

रचना विधि (How to make it):

रविवार के दिन या पुष्य नक्षत्र / जन्म नक्षत्र में, सूर्योदय के समय, भोजपत्र (Birch Bark) पर 'अष्टगंध' (Ashtagandha) और अर्क (मदार) के दूध की स्याही बनाकर, कनेर / पलाश की लकड़ी की कलम से इस कवच को लिखें। फिर उसे सफेद, लाल और काले धागे से लपेटकर सोने के ताबीज़ (Sauvarna Tabeez) में भर दें।

कण्ठ (गले) में धारण:

स्त्री गले में धारण करे तो "बहुपुत्रा प्रजायते" (उत्तम संतानों की प्राप्ति)। यदि पुत्र न हो रहे हों या मृत बच्चे होते हों (काकवन्ध्या), तो यह अचूक है।

कुक्षि (नाभि के पास/कमर):

"कुक्षिस्था रोगनाशिनी" - पेट के पास धारण करने से जन्मजात और भयंकर असाध्य रोगों का नाश होता है।

शिर (सिर) पर:

"राजलोकवशङ्करी" - यह राजाओं और उच्च पदस्थ अधिकारियों को वश में करने (सम्मान प्राप्ति) में सहायक है। ब्रह्मास्त्र भी इसके सामने व्यर्थ हो जाते हैं।

भुजा (बांह) पर:

"भुजस्था धनदा नित्यं" - पुरुषों को इसे दाहिनी भुजा पर बांधना चाहिए, जिससे नित्य धन की वर्षा और बुद्धि (तेज) की वृद्धि होती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. यह 'वज्रपञ्जर सूर्य कवच' किस ग्रंथ से लिया गया है?

यह महाकवच रुद्रयामल तन्त्र (Rudrayamala Tantra) के 'श्रीदेवीरहस्य' खण्ड के 33वें पटल से लिया गया है। इसे स्वयं भगवान शिव (भैरव) ने देवी पार्वती को उपदेशित किया था।

2. 'कुष्ठ रोग' (Leprosy/Skin Diseases) में यह कैसे लाभदायक है?

शिवजी के अनुसार - "शतावर्तं पठेद्वर्म सप्तम्यां रविवासरे। महाकुष्ठार्दितो देवि मुच्यते नात्र संशयः॥" अर्थात् यदि कोई भयंकर चर्म रोग (महाकुष्ठ) से पीड़ित हो, तो 'भानु सप्तमी' या रविवार को पूर्ण श्रद्धा के साथ 100 बार (शतावर्त) इसका पाठ करने से वह पूर्णतः रोगमुक्त हो जाता है।

3. क्या इस कवच का पाठ कोई भी साधारण व्यक्ति कर सकता है?

यह एक तान्त्रिक कवच है जिसमें अत्यंत उग्र 'बीज मन्त्रों' का प्रयोग हुआ है। इसे स्पष्ट उच्चारण और पूर्ण शारीरिक-मानसिक शुद्धि के साथ ही पढ़ा जाना चाहिए। बिना स्नान किए या अशुद्ध अवस्था में इसे पढ़ना वर्जित है। किसी योग्य गुरु से इसे ग्रहण करना उत्तम माना गया है।

4. क्या स्त्रियाँ इसका पाठ व धारण कर सकती हैं?

हाँ, शिवजी ने देवी पार्वती को बताया है कि "वन्ध्या व मृतवत्सा" (जिनके बच्चे नहीं होते) स्त्रियाँ यदि इस ताबीज़ को अपने गले (कंठ) में धारण करें तो उन्हें बहुपुत्र (उत्तम संतान) की प्राप्ति होती है। स्त्रियों को इसे सामान्यतः अपने बाएँ (Left) गले/बांह में धारण करना चाहिए।

5. इसका पाठ करते समय मुख किस दिशा में होना चाहिए?

सूर्य देवता की उपासना के लिए पूर्व दिशा (East) सर्वोत्तम है। लाल ऊनी और कुशा के आसन पर बैठकर, विशेषकर सूर्योदय या मध्याह्न (दोपहर) के समय इसका पठन सर्वाधिक फलदायी माना जाता है।

6. इसे ताबीज़ के रूप में भोजपत्र पर लिखने की क्या विधि है?

इसे रविवार, शुभ नक्षत्र (पुष्य) या साधक के जन्म नक्षत्र में अष्टगंध और अर्क (मदार) के दूध की स्याही से, कनेर की कलम द्वारा भोजपत्र पर लिखना चाहिए। फिर इसे सोने के ताबीज़ (अथवा तांबे) में भरकर धारण किया जाता है।

7. युद्ध या मुकदमेबाजी (Legal disputes) में यह कैसे मदद करता है?

श्लोक 36 (रणे रिपूञ्जयेद् देवि वादे सदसि जेष्यति) के अनुसार, जो इस कवच को धारण करता है या इसे नित्य जपता है, वह युद्ध भूमि में शत्रुओं को और न्यायालय (वाद) में विपक्षियों को पराजित करता है। यह कवच 'राजमान्यता' (सम्मान और सिद्धि) दिलाता है।

8. 'वज्रपञ्जर' का क्या अर्थ है?

वज्रपञ्जर (Vajrapanjara) दो शब्दों से बना है: वज्र (अत्यंत कठोर/हीरा) और पञ्जर (पिंजरा)। यह कवच पाठ करने वाले के चारों ओर सूर्य के तेज का एक ऐसा अभेद्य आध्यात्मिक पिंजरा बना देता है, जिसे कोई शत्रु, रोग या नकारात्मक शक्ति तोड़ नहीं सकती।

9. क्या यह कुंडली में सूर्य दोष व दरिद्रता दूर करने में सक्षम है?

जी हाँ। श्लोक 44 (निरोगो यः पठेद्वर्म दरिद्रो वज्रपञ्जरम्) स्पष्ट करता है कि सूर्य दोष से पीड़ित या अत्यंत दरिद्र व्यक्ति भी यदि इस कवच का पाठ करे, तो वह सूर्य की कृपा से तुरंत लक्ष्मीवान (धनवान) और निरोगी हो जाता है।

10. क्या इसके पाठ से मोक्ष की प्राप्ति सम्भव है?

बिल्कुल। श्लोक 11 और 45 के अनुसार, जो व्यक्ति भक्तिपूर्वक प्रतिदिन इस मूल-विद्यामयी कवच का पाठ करता है, वह इस लोक में (इह) धन-दौलत व श्री भोगकर अंत (देहान्ते) में उस परम मोक्ष को प्राप्त करता है जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है (परमा मुक्तिर्देवानामपि दुर्लभा)।