Sri Guhya Kali Vajra Kavacham – श्री गुह्यकाली वज्र कवचम् (विश्वमङ्गलम्)

॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्री गुह्यकाली वज्र कवचम् ॥
(विश्वमङ्गलम्)
॥ विनियोग ॥
अस्य विश्वमङ्गलं नाम श्री गुह्यकाली महावज्रकवचस्य
संवर्त ऋषिः अनुष्टुप् छन्दः,
एकवक्त्रादि शतवक्त्रान्ता गुह्यकाली देवता,
फ्रें बीजं, स्फ्रें शक्तिः, छ्रीं कीलकं
सर्वाभीष्टसिद्धि पूर्वक आत्मरक्षणे जपे विनियोगः ॥
॥ अथ कवचम् ॥
ओं फ्रें पातु शिरः सिद्धिकराली कालिका मम ।
ह्रीं छ्रीं ललाटं मे सिद्धिविकरालि सदाऽवतु ॥ १ ॥
श्रीं क्लीं मुखं चण्डयोगेश्वरी रक्षतु सर्वदा ।
हूं स्त्रीं कर्णौ वज्रकापालिनी मे कालिकाऽवतु ॥ २ ॥
ऐं क्रौं हनू कालसङ्कर्षणा मे पातु कालिका ।
क्रीं क्रौं भ्रुवावुग्रचण्डा कालिका मे सदाऽवतु ॥ ३ ॥
हां क्षौं नेत्रे सिद्धिलक्ष्मीरवतु प्रत्यहं मम ।
हूं ह्रौं नासां चण्डकापालिनी मे सर्वदाऽवतु ॥ ४ ॥
आं ईं ओष्ठाधरौ पातु सदा समयकुब्जिका ।
ग्लूं ग्लौं दन्तान् राजराजेश्वरी मे रक्षतात् सदा ॥ ५ ॥
जूं सः सदा मे रसनां पातु श्रीजयभैरवी ।
स्फ्रें स्फ्रें पातु स्वर्णकूटेश्वरी मे चिबुकं सदा ॥ ६ ॥
ब्लूं ब्लौं कण्ठं रक्षतु मे सर्वदा तुम्बुरेश्वरी ।
क्ष्रूं क्ष्रौं मे राजमातङ्गी स्कन्धौ रक्षतु सर्वदा ॥ ७ ॥
फ्रां फ्रौं भुजौ वज्रचण्डेश्वरी रक्षतु मे सदा ।
स्त्रें स्त्रौं वक्षःस्थलं पातु जयझङ्केश्वरी मम ॥ ८ ॥
फिं फां करौ रक्षतु मे शिवदूती च सर्वदा ।
छ्रैं छ्रौं मे जठरं पातु फेत्कारी घोरराविणी ॥ ९ ॥
स्त्रैं स्त्रौं गुह्येश्वरि नाभिं मम रक्षतु सर्वदा ।
क्षुं क्षौं पार्श्वो सदा पातु बाभुवी घोररूपिणी ॥ १० ॥
ग्रूं ग्रौं कुलेश्वरी पातु मम पृष्ठं च सर्वदा ।
क्लूं क्लौं कटिं रक्षतु मे भीमादेवी भयानका ॥ ११ ॥
हैं हौं मे रक्षतादूरू सर्वदा चण्डखेचरी ।
स्फ्रों स्फ्रौं मे जानुनी पातु कोरङ्गी भीषणानना ॥ १२ ॥
त्रीं थ्रीं जङ्घायुगं पातु तामसी सर्वदा मम ।
ज्रैं ज्रौं पादौ महाविद्या सर्वदा मम रक्षतु ॥ १३ ॥
ड्रीं ठ्रीं वागीश्वरी सर्वान् सन्धीन् देहस्य मेऽवतु ।
ख्रें ख्रौं शरीरधातून्मे कामाख्या सर्वदाऽवतु ॥ १४ ॥
ब्रीं ब्रूं कात्यायनी पातु दशवायूंस्तनूद्भवान् ।
ज्लूं ज्लौं पातु महालक्ष्मीः खान्येकादश सर्वदा ॥ १५ ॥
ऐं औं अनूक्तं यत् स्थानं शरीरेऽन्तर्बहिश्च मे ।
तत्सर्वं सर्वदा पातु हरसिद्धा हरप्रिया ॥ १६ ॥
फ्रें छ्रीं ह्रीं स्त्रीं हूं शरीरसकलं सर्वदा मम ।
गुह्यकाली दिवारात्रौ सन्ध्यासु परिरक्षतु ॥ १७ ॥
॥ फलश्रुति ॥
इति ते कवचं प्रोक्तं नाम्ना च विश्वमङ्गलम् ।
सर्वेभ्यः कवचेभ्यस्तु श्रेष्ठं सारतरं परम् ॥ १८ ॥
इदं पठित्वा त्वं देहं भस्मनैवावगुण्ठ्य च ।
तत्तत् स्थानेषु विन्यस्य बद्धवादः कवचं दृढम् ॥ १९ ॥
दशवारान् मनुं जप्त्वा यत्र कुत्रापि गच्छतु ।
समरे निपतच्छस्त्रेऽरण्ये स्वापदसङ्कुले ॥ २० ॥
श्मशाने प्रेतभूताढ्यकान्तारे दस्युसङ्कुले ।
राजद्वारे सपिशुने गह्वरे सर्पवेष्टिते ॥ २१ ॥
तस्य भीतिर्न कुत्रापि चरतः पृथिवीमिमाम् ।
न च व्याधिभयं तस्य नैव तस्करजं भयम् ॥ २२ ॥
नाग्न्युत्पातो नैव भूतप्रेतजः सङ्कटस्तथा ।
विद्युद्वर्षोपलभयं न कदापि प्रबाधते ॥ २३ ॥
न दुर्भिक्षभयं चास्य न च मारिभयं तथा ।
कृत्याभिचारजा दोषाः स्पृशन्त्येनं कदापि न ॥ २४ ॥
॥ पुरश्चरण ॥
सहस्रं जपतश्चास्य पुरश्चरणमुच्यते ।
तत्कृत्वा तु प्रयुञ्जीत सर्वस्मिन्नपि कर्मणि ॥ २५ ॥
॥ प्रयोग ॥
वश्यकार्यो मोहने च मारणोच्चाटने तथा ।
स्तम्भने च तथा द्वेषे तथा कृत्याभिचारयोः ॥ २६ ॥
दुर्गभङ्गे तथा युद्धे परचक्र निवारणे ।
एतत् प्रयोगात् सर्वाणि कार्याणि परिसाधयेत् ॥ २७ ॥
भूतावेशं नाशयति विवादे जयति द्विषः ।
सङ्कटं तरति क्षिप्रं कलहे जयमाप्नुयात् ॥ २८ ॥
॥ सर्वाभीष्ट प्राप्ति ॥
यदीच्छेत् महतीं लक्ष्मीं तनयानायुरेव च ।
विद्यां कान्तिं तथौन्नत्यं यशं आरोग्यमेव च ॥ २९ ॥
भोगान् सौख्यं विघ्नहानिमनालस्यं महोदयम् ।
अधीहि कवचं नित्यममुनामुञ्च च प्रिये ॥ ३० ॥
कवचेनामुना सर्वं संसाधयति साधकः ।
यद्यद्ध्यायति चित्तेन सिद्धं तत्तत्पुरः स्थितम् ॥ ३१ ॥
दुर्धटं घटयत्येतत् कवचं विश्वमङ्गलम् ।
विश्वस्य मङ्गलं यस्मादतो वै विश्वमङ्गलम् ॥ ३२ ॥
सान्निध्यकारकं गुह्यकाल्या एतत् प्रकीर्तितम् ।
भुक्त्वा भोगानघं हत्वा देहान्ते मोक्षमाप्नुयात् ॥ ३३ ॥
॥ इति श्री गुह्यकाली विश्वमङ्गल वज्र कवचम् सम्पूर्णम् ॥
संलिखित ग्रंथ
परिचय
श्री गुह्यकाली वज्र कवचम् का दूसरा नाम "विश्वमङ्गलम्" है। फलश्रुति में स्पष्ट कहा गया है - "विश्वस्य मङ्गलं यस्मात् अतो वै विश्वमङ्गलम्" - क्योंकि यह समस्त विश्व का मंगल करता है, इसलिए इसे विश्वमङ्गल कहते हैं।
यह ३३ श्लोकों का अत्यंत शक्तिशाली कवच है जो शरीर के प्रत्येक अंग की रक्षा करता है। इसमें एकवक्त्र से लेकर शतवक्त्र (एक मुख से सौ मुख वाली) गुह्यकाली देवता हैं।
विशेष तत्त्व:
- ऋषि: संवर्त
- छन्द: अनुष्टुप्
- देवता: एकवक्त्रादि शतवक्त्रान्ता गुह्यकाली
- बीज: फ्रें
- शक्ति: स्फ्रें
- कीलक: छ्रीं
- विनियोग: सर्वाभीष्ट सिद्धि एवं आत्मरक्षा
अंग रक्षा विवरण
| अंग | रक्षक देवी | बीज मंत्र |
|---|---|---|
| शिर (मस्तक) | सिद्धिकराली कालिका | ॐ फ्रें |
| ललाट (माथा) | सिद्धिविकरालि | ह्रीं छ्रीं |
| मुख | चण्डयोगेश्वरी | श्रीं क्लीं |
| कर्ण | वज्रकापालिनी | हूं स्त्रीं |
| नेत्र | सिद्धिलक्ष्मी | हां क्षौं |
| कण्ठ | तुम्बुरेश्वरी | ब्लूं ब्लौं |
| वक्षस्थल | जयझङ्केश्वरी | स्त्रें स्त्रौं |
| पृष्ठ (पीठ) | कुलेश्वरी | ग्रूं ग्रौं |
| पाद | महाविद्या | ज्रैं ज्रौं |
| सम्पूर्ण शरीर | गुह्यकाली | फ्रें छ्रीं ह्रीं स्त्रीं हूं |
कवच का फल
भय-निवारण (श्लोक 20-24):
- युद्ध में शस्त्र भय नहीं
- अरण्य में हिंसक पशु भय नहीं
- श्मशान में भूत-प्रेत भय नहीं
- राजद्वार में शत्रु भय नहीं
- गुफा में सर्प भय नहीं
- व्याधि, चोर, अग्नि, विद्युत, ओले का भय नहीं
- दुर्भिक्ष, महामारी, कृत्या-अभिचार का प्रभाव नहीं
सर्वाभीष्ट प्राप्ति (श्लोक 29-31):
- महालक्ष्मी (धन-सम्पत्ति)
- संतान और दीर्घायु
- विद्या, कान्ति, उन्नति
- यश और आरोग्य
- भोग, सुख, विघ्न-नाश
"यद्यद्ध्यायति चित्तेन सिद्धं तत्तत्पुरः स्थितम्"
जो कुछ भी मन में ध्यान करे, वह सब सिद्ध होकर सामने उपस्थित हो जाता है।
पुरश्चरण विधि
श्लोक 25 के अनुसार:
- पुरश्चरण: 1000 बार कवच पाठ
- नित्य पाठ: 10 बार मंत्र जप के बाद कहीं भी जाएं
- प्रयोग: वशीकरण, मोहन, मारण, उच्चाटन, स्तम्भन, द्वेष, कृत्या-निवारण, दुर्ग-भंग, युद्ध-विजय में
FAQ
1. विश्वमङ्गल नाम क्यों है?
श्लोक 32 में स्पष्ट है - "विश्वस्य मङ्गलं यस्मात्" - क्योंकि यह समस्त विश्व का मंगल करता है, इसलिए विश्वमङ्गल नाम है।
2. वज्र कवच का क्या अर्थ है?
"वज्र" का अर्थ है अत्यंत कठोर और अभेद्य। यह कवच इतना शक्तिशाली है कि कोई भी बुरी शक्ति इसे भेद नहीं सकती।
3. एकवक्त्रादि शतवक्त्र का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है एक मुख से लेकर सौ मुख वाली गुह्यकाली। यह देवी के विभिन्न उग्र स्वरूपों को दर्शाता है।
4. पाठ के समय भस्म क्यों लगाएं?
श्लोक 19 में कहा है - "देहं भस्मनैव अवगुण्ठ्य च" - शरीर पर भस्म लगाकर कवच पाठ करने से यह अधिक प्रभावी होता है। भस्म शुद्धि और रक्षा का प्रतीक है।
5. क्या बिना पुरश्चरण के पढ़ सकते हैं?
हाँ, नित्य पाठ के लिए पुरश्चरण अनिवार्य नहीं। सामान्य रक्षा हेतु भक्तिभाव से पढ़ सकते हैं। विशेष कार्यों के लिए पुरश्चरण उचित है।
6. यात्रा से पहले कैसे पढ़ें?
श्लोक 20 के अनुसार - "दशवारान् मनुं जप्त्वा यत्र कुत्रापि गच्छतु" - 10 बार मूल मंत्र (फ्रें छ्रीं ह्रीं स्त्रीं हूं) जप करके कहीं भी सुरक्षित जा सकते हैं।