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Sri Bhadrakali Kavacham – श्री भद्रकाली कवचम्

Sri Bhadrakali Kavacham – श्री भद्रकाली कवचम्
॥ श्री गणेशाय नमः ॥ ॥ श्री भद्रकाली कवचम् ॥ नारद उवाच । कवचं श्रोतुमिच्छामि तां च विद्यां दशाक्षरीम् । नाथ त्वत्तो हि सर्वज्ञ भद्रकाल्याश्च साम्प्रतम् ॥ १ ॥ नारायण उवाच । शृणु नारद वक्ष्यामि महाविद्यां दशाक्षरीम् । गोपनीयं च कवचं त्रिषु लोकेषु दुर्लभम् ॥ २ ॥ ॥ दशाक्षरी विद्या ॥ ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं कालिकायै स्वाहा ओं ह्रीं श्रीं क्लीं कालिकायै स्वाहेति च दशाक्षरीम् । दुर्वासा हि ददौ राज्ञे पुष्करे सूर्यपर्वणि ॥ ३ ॥ दशलक्षजपेनैव मन्त्रसिद्धिः कृता पुरा । पञ्चलक्षजपेनैव पठन् कवचमुत्तमम् ॥ ४ ॥ बभूव सिद्धकवचोऽप्ययोध्यामाजगाम सः । कृत्स्नां हि पृथिवीं जिग्ये कवचस्य प्रसादतः ॥ ५ ॥ नारद उवाच । श्रुता दशाक्षरी विद्या त्रिषु लोकेषु दुर्लभा । अधुना श्रोतुमिच्छामि कवचं ब्रूहि मे प्रभो ॥ ६ ॥ नारायण उवाच । शृणु वक्ष्यामि विप्रेन्द्र कवचं परमाद्भुतम् । नारायणेन यद्दत्तं कृपया शूलिने पुरा ॥ ७ ॥ त्रिपुरस्य वधे घोरे शिवस्य विजयाय च । तदेव शूलिना दत्तं पुरा दुर्वाससे मुने ॥ ८ ॥ दुर्वाससा च यद्दत्तं सुचन्द्राय महात्मने । अतिगुह्यतरं तत्त्वं सर्वमन्त्रौघविग्रहम् ॥ ९ ॥ ॥ अथ कवचम् ॥ ओं ह्रीं श्रीं क्लीं कालिकायै स्वाहा मे पातु मस्तकम् । क्लीं कपालं सदा पातु ह्रीं ह्रीं ह्रीमिति लोचने ॥ १० ॥ ओं ह्रीं त्रिलोचने स्वाहा नासिकां मे सदावतु । क्लीं कालिके रक्ष रक्ष स्वाहा दन्तं सदावतु ॥ ११ ॥ ह्रीं भद्रकालिके स्वाहा पातु मेऽधरयुग्मकम् । ओं ह्रीं ह्रीं क्लीं कालिकायै स्वाहा कण्ठं सदावतु ॥ १२ ॥ ओं ह्रीं कालिकायै स्वाहा कर्णयुग्मं सदावतु । ओं क्रीं क्रीं क्लीं काल्यै स्वाहा स्कन्धं पातु सदा मम ॥ १३ ॥ ओं क्रीं भद्रकाल्यै स्वाहा मम वक्षः सदावतु । ओं क्रीं कालिकायै स्वाहा मम नाभिं सदावतु ॥ १४ ॥ ओं ह्रीं कालिकायै स्वाहा मम पृष्ठं सदावतु । रक्तबीजविनाशिन्यै स्वाहा हस्तौ सदावतु ॥ १५ ॥ ओं ह्रीं क्लीं मुण्डमालिन्यै स्वाहा पादौ सदावतु । ओं ह्रीं चामुण्डायै स्वाहा सर्वाङ्गं मे सदावतु ॥ १६ ॥ ॥ दिग्बन्धन ॥ प्राच्यां पातु महाकाली आग्नेय्यां रक्तदन्तिका । दक्षिणे पातु चामुण्डा नैरृत्यां पातु कालिका ॥ १७ ॥ श्यामा च वारुणे पातु वायव्यां पातु चण्डिका । उत्तरे विकटास्या च ऐशान्यां साट्‍टहासिनी ॥ १८ ॥ ऊर्ध्वं पातु लोलजिह्वा मायाद्या पात्वधः सदा । जले स्थले चान्तरिक्षे पातु विश्वप्रसूः सदा ॥ १९ ॥ ॥ फलश्रुतिः ॥ इति ते कथितं वत्स सर्वमन्त्रौघविग्रहम् । सर्वेषां कवचानां च सारभूतं परात्परम् ॥ २० ॥ सप्तद्वीपेश्वरो राजा सुचन्द्रोऽस्य प्रसादतः । कवचस्य प्रसादेन मान्धाता पृथिवीपतिः ॥ २१ ॥ प्रचेता लोमशश्चैव यतः सिद्धो बभूव ह । यतो हि योगिनां श्रेष्ठः सौभरिः पिप्पलायनः ॥ २२ ॥ यदि स्यात् सिद्धकवचः सर्वसिद्धीश्वरो भवेत् । महादानानि सर्वाणि तपांसि च व्रतानि च । निश्चितं कवचस्यास्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ २३ ॥ इदं कवचमज्ञात्वा भजेत् कालीं जगत्प्रसूम् । शतलक्षप्रजप्तोऽपि न मन्त्रः सिद्धिदायकः ॥ २४ ॥ ॥ इति श्री भद्रकाली कवचम् सम्पूर्णम् ॥

परिचय: भद्रकाली कवच

श्री भद्रकाली कवचम् भगवान नारायण और देवर्षि नारद के संवाद में वर्णित अत्यंत गोपनीय और त्रिलोक दुर्लभ कवच है।

इस कवच की गुरु परम्परा अत्यंत महान है:

  • नारायण ने यह शिव को त्रिपुर वध के लिए दिया
  • शिव ने दुर्वासा ऋषि को दिया
  • दुर्वासा ने पुष्कर में सूर्य ग्रहण पर राजा सुचन्द्र को दिया

इस कवच के प्रभाव से राजा सुचन्द्र सप्तद्वीपों के स्वामी बने और मान्धाता पृथ्वीपति बने।

दशाक्षरी महाविद्या

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं कालिकायै स्वाहा
(10 अक्षरों का मंत्र = दशाक्षरी)
  • ॐ: प्रणव, ब्रह्म बीज
  • ह्रीं: माया बीज, भुवनेश्वरी बीज
  • श्रीं: लक्ष्मी बीज, ऐश्वर्य
  • क्लीं: काम बीज, आकर्षण
  • कालिकायै: काली देवी को
  • स्वाहा: समर्पण, आहुति
सिद्धि: 10 लाख जप से मंत्र सिद्ध, 5 लाख जप से कवच सिद्ध।

अंग न्यास (शरीर रक्षा)

अंगरक्षक मंत्र
मस्तकॐ ह्रीं श्रीं क्लीं कालिकायै स्वाहा
कपालक्लीं
नेत्रह्रीं ह्रीं ह्रीं
नासिकाॐ ह्रीं त्रिलोचने स्वाहा
सर्वांगॐ ह्रीं चामुण्डायै स्वाहा

दिग्बन्धन (दिशा रक्षा)

दिशारक्षक देवी
पूर्वमहाकाली
आग्नेयरक्तदन्तिका
दक्षिणचामुण्डा
नैर्ऋत्यकालिका
पश्चिमश्यामा
वायव्यचण्डिका
उत्तरविकटास्या
ईशानअट्टहासिनी
ऊर्ध्वलोलजिह्वा
अधःआद्या माया

कवच फल (फलश्रुति)

  • सर्वसिद्धीश्वर: सभी सिद्धियों के स्वामी बनते हैं
  • सप्तद्वीपेश्वर: राजा सुचन्द्र इसी से सप्तद्वीपों के स्वामी बने
  • पृथ्वीपति: मान्धाता इसी से पृथ्वी के राजा बने
  • योगी श्रेष्ठ: सौभरि, पिप्पलायन आदि योगी इसी से सिद्ध हुए
  • सर्वश्रेष्ठ: महादान, तप, व्रत भी इसकी सोलहवीं कला के बराबर नहीं

महत्वपूर्ण: "इदं कवचमज्ञात्वा भजेत् कालीं जगत्प्रसूम् । शतलक्षप्रजप्तोऽपि न मन्त्रः सिद्धिदायकः ॥" — इस कवच को जाने बिना करोड़ जप करने पर भी मंत्र सिद्ध नहीं होता।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. दशाक्षरी मंत्र क्या है?

"ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं कालिकायै स्वाहा" — यह 10 अक्षरों का मंत्र है जिसे दशाक्षरी कहते हैं।

2. कवच सिद्धि के लिए कितना जप करें?

मंत्र सिद्धि के लिए 10 लाख जप और कवच सिद्धि के लिए 5 लाख जप + कवच पाठ आवश्यक है।

3. राजा सुचन्द्र कौन थे?

सुचन्द्र एक प्राचीन राजा थे जिन्होंने दुर्वासा ऋषि से पुष्कर में सूर्य ग्रहण पर यह कवच प्राप्त किया और सप्तद्वीपों के स्वामी बने।

4. त्रिपुर वध का क्या सन्दर्भ है?

भगवान शिव ने त्रिपुरासुर के तीन नगरों का विनाश किया। इसके लिए नारायण ने उन्हें यह कवच दिया था।

5. क्या बिना दीक्षा पाठ कर सकते हैं?

कवच पाठ के लिए दीक्षा आवश्यक नहीं, परन्तु मंत्र सिद्धि के लिए गुरु दीक्षा लेना उत्तम है।

6. 'सर्वमन्त्रौघविग्रहम्' का क्या अर्थ है?

सर्व = सभी, मन्त्रौघ = मंत्रों का समूह, विग्रह = शरीर/मूर्ति। अर्थात् यह सभी मंत्रों का सार रूप है।

7. दिग्बन्धन क्यों आवश्यक है?

दिग्बन्धन से दसों दिशाओं से आने वाले नकारात्मक प्रभावों से रक्षा होती है। प्रत्येक दिशा में एक देवी स्वरूप रक्षा करता है।

8. 'शतलक्षप्रजप्त' का क्या अर्थ है?

शतलक्ष = सौ लाख = करोड़। अर्थात् करोड़ जप करने पर भी बिना कवच ज्ञान के मंत्र सिद्ध नहीं होता।

9. सौभरि और पिप्पलायन कौन थे?

ये प्राचीन महायोगी थे जो इसी कवच के प्रभाव से योगियों में श्रेष्ठ बने।

10. इसे कब पढ़ना शुभ है?

रात्रि में, अमावस्या को, मंगलवार/शनिवार को, नवरात्रि में और विशेषकर सूर्य/चन्द्र ग्रहण पर पाठ अत्यंत फलदायी है।