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Sri Bagalamukhi Shatru Vinashaka Kavacham – श्री बगलामुखी शत्रुविनाशक कवचम्

Sri Bagalamukhi Shatru Vinashaka Kavacham – श्री बगलामुखी शत्रुविनाशक कवचम्
॥ श्रीबगलामुखीशत्रुविनाशककवचम् ॥ श्रीगणेशाय नमः । श्रीपीताम्बरायै नमः । श्रीदेव्युवाच - नमस्ते शम्भवे तुभ्यं नमस्ते शशिशेखर । त्वत्प्रसादाच्छ्रुतं सर्वमधुना कवचं वद ॥ १॥ श्रीशिव उवाच - श‍ृणु देवि प्रवक्ष्यामि कवचं परमाद्भुतम् । यस्य स्मरणमात्रेण रिपोः स्तम्भो भवेत् क्षणात् ॥ २॥ कवचस्य च देवेशि महामायाप्रभावतः । पङ्क्तिः छन्दः समुद्दिष्टं देवता बगलामुखी ॥ ३॥ ॥ विनियोगः ॥ धर्मार्थकाममोक्षेषु विनियोगः प्रकीर्तितः । ॥ अथ कवचपाठः ॥ ॐकारो मे शिरः पातु ह्रीङ्कारो वदनेऽवतु ॥ ४॥ बगलामुखी दोर्युग्मं कण्ठे सर्वदाऽवतु । दुष्टानां पातु हृदयं वाचं मुखं ततः पदम् ॥ ५॥ उदरे सर्वदा पातु स्तम्भयेति सदा मम । जिह्वां कीलय मे मातर्बगला सर्वसदाऽवतु ॥ ६॥ बुद्धिं विनाशय पादौ तु ह्लीं ॐ मे दिग्विदिक्षु च । स्वाहा मे सर्वदा पातु सर्वत्र सर्वसन्धिषु ॥ ७॥ ॥ फलश्रुति ॥ इति ते कथितं देवि कवचं परमाद्भुतम् । यस्य स्मरणमात्रेण सर्वस्तम्भो भवेत् क्षणात् ॥ ८॥ यद् धृत्वा विविधा दैत्या वासवेन हताः पुरा । यस्य प्रसादात् सिद्धोऽहं हरिः सत्त्वगुणान्वितः ॥ ९॥ वेधा सृष्टिं वितनुते कामः सर्वजगज्जयी । लिखित्वा धारयेद्यस्तु कण्ठे वा दक्षिणे भुजे ॥ १०॥ षट्कर्मसिद्धीस्तस्याशु मम तुल्यो भवेद्ध्रुवम् । अज्ञात्वा कवचं देवि तस्य मन्त्रो न सिध्यति ॥ ११॥ ॥ इति श्रीबगलामुखीशत्रुविनाशकं कवचं समाप्तम् ॥

श्री बगलामुखी शत्रुविनाशक कवचम् — परिचय एवं तांत्रिक रहस्य (Introduction)

श्री बगलामुखी शत्रुविनाशक कवचम् दश महाविद्याओं में स्तम्भन और अजेय शक्ति की देवी माँ पीताम्बरा (बगलामुखी) का एक अत्यंत मारक और अचूक तांत्रिक कवच है। यह कवच भगवान सदाशिव और माता पार्वती के संवाद के रूप में प्रकट हुआ है। जब देवी पार्वती ने भगवान शिव (शशिशेखर) से शत्रुओं के तत्काल निवारण हेतु कोई अमोघ उपाय पूछा, तब महादेव ने उन्हें इस "परमाद्भुतम्" (अत्यंत अद्भुत) कवच का उपदेश दिया।

३६ अक्षरी मंत्र का शारीरिक न्यास: इस कवच की सबसे महान और रहस्यमयी विशेषता यह है कि यह माँ बगलामुखी के जगत्-प्रसिद्ध ३६ अक्षरी मूल मंत्र (ॐ ह्लीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय जिह्वां कीलय बुद्धिं विनाशय ह्लीं ॐ स्वाहा) से ही बुना गया है। श्लोक 4 से 7 तक ध्यान से देखने पर पता चलता है कि इस मंत्र के एक-एक शब्द को शरीर के विभिन्न अंगों की रक्षा के लिए 'कीलित' किया गया है।

जैसे— 'ॐ' सिर की रक्षा करता है, 'ह्लीं' वदन (मुख) की, 'बगलामुखी' दोनों भुजाओं की, 'दुष्टानां' हृदय की, 'स्तम्भय' उदर की, 'जिह्वां कीलय' संपूर्ण शरीर की, और 'बुद्धिं विनाशय' दोनों पैरों की रक्षा करता है। अंत में 'स्वाहा' सर्वत्र (सभी दिशाओं और संधियों में) रक्षा करता है। मंत्र को शरीर के आवरण में बदल देने की यह तांत्रिक प्रक्रिया इस कवच को अपराजेय बना देती है।

विशिष्ट महत्व और ऐतिहासिक प्रमाण (Significance & History)

भगवान शिव श्लोक 8-10 में इस कवच की महिमा और इतिहास का वर्णन करते हैं, जो यह सिद्ध करता है कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश सभी इस विद्या के अधीन हैं:

  • इंद्र का दैत्यों पर विजय: "यद् धृत्वा विविधा दैत्या वासवेन हताः पुरा" — प्राचीन काल में देवराज इंद्र (वासव) ने इसी कवच को धारण करके अत्यंत भयंकर और विविध प्रकार के दैत्यों का संहार किया था।
  • त्रिदेवों की शक्ति का स्रोत: शिव जी कहते हैं कि इसी कवच के प्रसाद से वे स्वयं सिद्ध (महायोगी) बने, भगवान श्रीहरि (विष्णु) सत्त्वगुण से परिपूर्ण हुए, और भगवान ब्रह्मा (वेधा) इस सृष्टि का विस्तार कर पाते हैं।
  • कामदेव की विजय: "कामः सर्वजगज्जयी" — कामदेव जो संपूर्ण जगत को अपने वश में कर लेता है, वह सम्मोहन शक्ति भी उसे इसी कवच की कृपा से प्राप्त हुई है।

अतः यह स्पष्ट है कि यह कवच न केवल शत्रुओं का नाश करता है, बल्कि साधक के भीतर सत्वगुण, आकर्षण (मोहन), और सृष्टि निर्माण (क्रिएटिविटी) की शक्तियों को भी जाग्रत कर देता है।

कवच के फलश्रुति लाभ एवं तांत्रिक चेतावनी (Benefits & Warning)

इस संक्षिप्त परंतु महाशक्तिशाली कवच के लाभ और एक कठोर तांत्रिक नियम श्लोक 11 में स्पष्ट किए गए हैं:

  • तत्काल स्तम्भन: "यस्य स्मरणमात्रेण सर्वस्तम्भो भवेत् क्षणात्" — केवल इस कवच का स्मरण करने मात्र से ही पल भर में शत्रुओं के अस्त्र-शस्त्र, उनकी बुद्धि, और उनका क्रोध स्तम्भित (जड़वत) हो जाता है।
  • षट्कर्म की सिद्धि: जो इसे धारण करता है उसे तांत्रिक षट्कर्म (शांति, वशीकरण, स्तम्भन, विद्वेषण, उच्चाटन और मारण) में शीघ्र सफलता मिलती है और वह साक्षात् भगवान शिव के समान शक्तिशाली हो जाता है।
  • गंभीर चेतावनी: "अज्ञात्वा कवचं देवि तस्य मन्त्रो न सिध्यति" — भगवान शिव चेतावनी देते हैं कि जो व्यक्ति इस कवच को जाने बिना (या इसका पाठ किए बिना) माँ बगलामुखी के मंत्रों का जप करता है, उसका मंत्र कभी सिद्ध नहीं होता। साधना में सुरक्षा सर्वोपरि है।

कवच पाठ विधि एवं यंत्र धारण विधान (Ritual Method & Wearing)

इस कवच को केवल जपा ही नहीं जाता, बल्कि इसका 'यंत्र' बनाकर शरीर पर धारण करने का भी विशेष विधान श्लोक 10 में दिया गया है ("लिखित्वा धारयेद्यस्तु कण्ठे वा दक्षिणे भुजे")।

कवच धारण करने की विधि (How to Wear)

  • शुभ मुहूर्त: गुरु पुष्य योग, रवि पुष्य योग, अष्टमी, चतुर्दशी या किसी भी शुभ तांत्रिक मुहूर्त में स्नान कर पीले वस्त्र पहनें।
  • लेखन सामग्री: भोजपत्र (Bhojpatra) पर अष्टगंध या हल्दी (पीत गंध) की स्याही बनाएं और अनार की कलम (Pomegranate stick) का उपयोग करें।
  • लेखन: इस पूरे कवच (विशेषकर श्लोक 4 से 7 तक के मंत्रात्मक श्लोकों) को भोजपत्र पर लिखें।
  • पूजन: इस भोजपत्र को माँ बगलामुखी के चरणों में रखें। इसे पीले पुष्प, धूप, दीप और पीले नैवेद्य से पूजें।
  • धारण: पूजा के पश्चात इसे एक तांबे, चांदी या सोने के ताबीज (Tabeez) में भर लें। इसे पीले धागे में पिरोकर पुरुष अपनी दाहिनी भुजा (Right arm) या गले (Neck) में पहनें, और स्त्रियां अपनी बायीं भुजा या गले में धारण करें।

दैनिक पाठ का नियम

जो लोग माँ बगलामुखी के ३६ अक्षरी या एकाक्षरी मंत्र का अनुष्ठान कर रहे हैं, उन्हें मंत्र जप शुरू करने से ठीक पहले इस कवच का कम से कम एक बार पाठ अवश्य करना चाहिए। दिशा उत्तर या पूर्व होनी चाहिए और आसन पीला (Yellow) होना चाहिए।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions)

1. इस कवच को 'शत्रुविनाशक' क्यों कहा जाता है?

माँ बगलामुखी का मुख्य कार्य दुष्टों और शत्रुओं का स्तम्भन व नाश करना है। इस कवच में ३६ अक्षरी मंत्र के माध्यम से शरीर को कीलित किया गया है, जिससे शत्रु का हर प्रहार विफल हो जाता है और शत्रु स्वयं नष्ट हो जाता है।

2. इस कवच में ३६ अक्षरी मंत्र का क्या रहस्य है?

श्लोक 4 से 7 तक ध्यान दें— "ॐ... ह्रीं... बगलामुखी... दुष्टानां... वाचं मुखं पदं... स्तम्भय... जिह्वां कीलय... बुद्धिं विनाशय... ह्लीं ॐ... स्वाहा"। यह पूरा मूल मंत्र शरीर के अंगों के साथ गुंथा हुआ है। यही इस कवच का सबसे बड़ा तांत्रिक रहस्य है।

3. क्या इसे भोजपत्र पर लिखकर पहना जा सकता है?

जी हाँ, श्लोक 10 में भगवान शिव ने स्वयं कहा है— "लिखित्वा धारयेद्यस्तु कण्ठे वा दक्षिणे भुजे"। इसे भोजपत्र पर लिखकर ताबीज में गले या दाहिनी भुजा पर धारण करने से षट्कर्मों की सिद्धि होती है।

4. बगलामुखी मंत्र जप से पहले इसे पढ़ना क्यों अनिवार्य है?

श्लोक 11 के अनुसार (अज्ञात्वा कवचं देवि तस्य मन्त्रो न सिध्यति), इस कवच का पाठ किए बिना बगलामुखी का मंत्र कभी सिद्ध नहीं होता। कवच साधक की ऊर्जा को सुरक्षित रखता है।

5. इस कवच का छंद और देवता कौन हैं?

श्लोक 3 के अनुसार, इस कवच का छंद 'पङ्क्तिः' (Pankti) है और इसकी अधिष्ठात्री देवता स्वयं महामाया 'बगलामुखी' हैं।

6. क्या स्त्रियां इस कवच का पाठ और धारण कर सकती हैं?

हाँ, तांत्रिक साधनाओं में स्त्रियों को पूर्ण अधिकार है। वे अपने परिवार और अपनी रक्षा के लिए इसका पाठ कर सकती हैं और ताबीज को गले या बायीं भुजा में धारण कर सकती हैं।

7. क्या इस पाठ के लिए गुरु दीक्षा आवश्यक है?

यदि आप इसे केवल एक स्तोत्र के रूप में आत्मरक्षा के लिए पढ़ रहे हैं, तो आप इसे पूर्ण भक्ति से पढ़ सकते हैं। परंतु ३६ अक्षरी मंत्र का अनुष्ठान या शत्रु-मारण प्रयोग करने के लिए गुरु दीक्षा अनिवार्य है।

8. ऐतिहासिक रूप से इस कवच का उपयोग किसने किया था?

शिव जी के अनुसार, देवराज इंद्र ने दैत्यों को मारने के लिए, विष्णु जी ने सत्वगुण पाने के लिए, ब्रह्मा जी ने सृष्टि रचने के लिए और कामदेव ने जगत को जीतने के लिए इसी कवच की कृपा प्राप्त की थी।

9. क्या कोर्ट केस जीतने के लिए यह कवच लाभकारी है?

हाँ, यह कवच विरोधी की 'बुद्धि का विनाश' (बुद्धिं विनाशय) और 'जिह्वा का कीलन' (जिह्वां कीलय) करता है। इससे कोर्ट केस में विरोधी पक्ष निरुत्तर हो जाता है और साधक को विजय मिलती है।

10. पाठ करते समय कौन से रंग का प्रयोग करना चाहिए?

माँ पीताम्बरा (बगलामुखी) की साधना में 'पीला रंग' (Yellow) सबसे महत्वपूर्ण है। पीले वस्त्र, पीला आसन, पीला तिलक और पीले फूलों का ही प्रयोग करना चाहिए।

11. 'षट्कर्मसिद्धि' क्या है जिसका उल्लेख श्लोक 11 में है?

तंत्र शास्त्र के छह मुख्य कर्म— शांति (कल्याण), वशीकरण (आकर्षण), स्तम्भन (रोकना), विद्वेषण (शत्रुता कराना), उच्चाटन (भगा देना) और मारण (नाश करना) षट्कर्म कहलाते हैं। यह कवच इन सभी में सफलता दिलाता है।