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Sri Bagalamukhi Kavacham (Rudra Yamala Tantra) – श्री बगलामुखी कवचम्

Sri Bagalamukhi Kavacham (Rudra Yamala Tantra) – श्री बगलामुखी कवचम्
॥ श्रीबगलामुखीकवचम् (रुद्रयामले महातन्त्रे) ॥ श्री गणेशाय नमः । श्री बगलायै नमः । प्रथमं गुरुं ध्यात्वा प्राणायामं कृत्वा कवचं पठेत् । ॥ विनियोगः ॥ ॐ अस्य श्रीपीताम्बराबगलामुखीकवचस्य महादेव ऋषिः, उष्णिक् छन्दः, श्रीपीताम्बरा देवता, स्थिरमाया बीजम्, स्वाहा शक्तिः, अं ठः कीलकम्, मम सन्निहितानां दूरस्थानां सर्वदुष्टानां वाङ्मुखपदजिह्वापवर्गाणां स्तम्भनपूर्वकं सर्वसम्पत्तिप्राप्तिचतुर्वर्गफलसाधनार्थे जपे विनियोगः । ॥ ध्यानम् ॥ मध्येसुधाब्धि मणिमण्डपरत्नवेद्यां सिंहासनोपरि गतां परिपीतवर्णाम् । पीताम्बराभरणमाल्यविभूषिताङ्गीं देवीं भजामि धृतमुद्गरवैरिजिह्वाम् ॥ १॥ जिह्वाग्रमादाय करेण देवीं वामेन शत्रून् परिपीडयन्तीम् । गदाभिघातेन च दक्षिणेन पीताम्बराढ्यां द्विभुजां नमामि ॥ २॥ इति ध्यात्वा पठेत् । ॥ पूर्वपीठिका ॥ हिमवत्तनया गौरी कैलासेऽथ शिलोच्चये । अपृच्छद् गिरिशं देवी साधकानुग्रहेच्छया ॥ १॥ श्रीपार्वत्युवाच । देवदेव महादेव भक्तानुग्रहकारक । श‍ृणु विज्ञाप्यते यत्तु श्रुत्वा सर्वं निवेदय ॥ २॥ विशुद्धाः कौलिका लोके ये मत्कर्मपरायणाः । तेषां निन्दाकरा लोके बहवः किल दुर्जनाः ॥ ३॥ मनोबाधां विदधते मुहुः कटुभिरुक्तिभिः तेषामाशु विनाशाय त्वया देव प्रकाशितः ॥ ४॥ यो मन्त्रो बगलामुख्याः सर्वकामसमृद्धिदः । कवचं तस्य मन्त्रस्य प्रकाशय दयानिधे ॥ ५॥ यस्य स्मरणमात्रेण पशूनां निग्रहो भवेत् । आत्मानं सततं रक्षेद् व्याघ्राग्निरिपुराजतः ॥ ६॥ श्रुत्वाऽथ पार्वतीवाक्यं ज्ञात्वा तस्या मनोगतम् । विहस्य तां परिष्वज्य साधु साध्वित्यपूजयत् ॥ ७॥ तदाह कवचं देव्यै कृपया करुणानिधिः । श्रीशङ्कर उवाच । श‍ृणु त्वं बगलामुख्याः कवचं सर्वकामदम् ॥ ८॥ यस्य स्मरणमात्रेण बगलामुखी प्रसीदति । ॥ अथ कवचपाठः ॥ सर्वसिद्धिप्रदा प्राच्यां पातु मां बगलामुखी ॥ ९॥ पीताम्बरा तु चाग्नेय्यां याम्यां महिषमर्दिनी । नैरृत्यां चण्डिका पातु भक्तानुग्रहकारिणी ॥ १०॥ पातु नित्यं महादेवी प्रतीच्यां शूकरानना । वायव्ये पातु मां काली कौवेर्यां त्रिपुराऽवतु ॥ ११॥ ईशान्यां भैरवी पातु पातु नित्यं सुरप्रिया । ऊर्ध्वं वागीश्वरी पातु मध्ये मां ललिताऽवतु ॥ १२॥ अधस्ताद् अपि मां पातु वाराही चक्रधारिणि । मस्तकं पातु मे नित्यं श्रीदेवी बगलामुखी ॥ १३॥ भालं पीताम्बरा पातु नेत्रे त्रिपुरभैरवी । श्रवणौ विजया पातु नासिकायुगलं जया ॥ १४॥ शारदा वचनं पातु जिह्वां पातु सुरेश्वरी । कण्ठं रक्षतु रुद्राणी स्कन्धौ मे विन्ध्यवासिनी ॥ १५॥ सुन्दरी पातु बाहू मे जया पातु करौ सदा । भवानी हृदयं पातु मध्यं मे भुवनेश्वरी ॥ १६॥ नाभिं पातु महामाया कटिं कमललोचना । ऊरू मे पातु मातङ्गी जानुनी चापराजिता ॥ १७॥ जङ्घे कपालिनी पातु चरणौ चञ्चलेक्षणा । सर्वतः पातु मां तारा योगिनी पातु चाग्रतः ॥ १८॥ पृष्ठं मे पातु कौमारी दक्षपार्श्वे शिवाऽवतु । रुद्राणी वामपार्श्वे तु पातु मां सर्वदेष्टदा ॥ १९॥ ॥ फलश्रुति ॥ स्तुता सर्वेषु देवेषु रक्तबीजविनाशिनी । इत्येतत् कवचं दिव्यं धर्मकामार्थसाधनम् ॥ २०॥ गोपनीयं प्रयत्नेन कस्यचिन्न प्रकाशयेत् । यः सकृच्छृणुयाद् एतत् कवचं मन्मुखोदितम् ॥ २१॥ स सर्वान् लभते कामान् मूर्खो विद्यामवाप्नुयात् । तस्याशु शत्रवो यान्ति यमस्य भवते शिवे ॥ २२॥ ॥ इति श्रीरुद्रयामले महातन्त्रे श्रीमहाविद्यापीताम्बरा बगलामुखीकवचं समाप्तम् ॥

श्री बगलामुखी कवचम् (रुद्रयामल तंत्र) — परिचय एवं प्रासंगिकता

श्री बगलामुखी कवचम् तंत्र शास्त्र के महान ग्रंथ 'रुद्रयामल महातंत्र' (Rudra Yamala Maha Tantra) से उद्धृत एक परम दुर्लभ और अत्यंत शक्तिशाली रक्षा-कवच है। दश महाविद्याओं में आठवीं विद्या 'माँ बगलामुखी' (पीताम्बरा) स्तम्भन की देवी हैं। यह विशेष कवच भगवान शिव और माता पार्वती (गौरी) के अत्यंत मार्मिक और कल्याणकारी संवाद के रूप में प्रकट हुआ है।

कवच के प्राकट्य का कारण (निंदा और कटु वचनों से रक्षा): इस कवच की पृष्ठभूमि बहुत ही विशेष और आज के युग में प्रासंगिक है। श्लोक 3-4 में माता पार्वती भगवान शिव से कहती हैं— "विशुद्धाः कौलिका लोके... मनोबाधां विदधते मुहुः कटुभिरुक्तिभिः।" अर्थात् 'हे प्रभो! संसार में जो विशुद्ध कौलिक (भक्त) मेरे कर्मों और साधना में लीन हैं, बहुत से दुर्जन लोग उनकी निंदा करते हैं और अपने कटु वचनों (Harsh words / Slander) से उन्हें बार-बार मानसिक पीड़ा (मनोबाधा) पहुँचाते हैं।'

माता पार्वती की इस चिंता को सुनकर, करुणानिधि भगवान शंकर ने साधकों को निंदकों के षड्यंत्र, झूठे आरोपों (Defamation), और मानसिक प्रताड़ना से बचाने के लिए इस 'बगलामुखी कवच' का उपदेश दिया। यह कवच केवल शारीरिक शत्रुओं से ही नहीं बचाता, बल्कि सामाजिक बदनामी और मानसिक कष्ट देने वाले शत्रुओं की वाणी और बुद्धि का भी पूर्ण स्तम्भन कर देता है।

ध्यान और विनियोग: पाठ के आरंभ में स्पष्ट किया गया है कि इसके ऋषि 'महादेव' हैं और छंद 'उष्णिक्' है। ध्यान (श्लोक 1-2) में साधक माँ पीताम्बरा का स्मरण करता है जो सुधा-सागर (अमृत के समुद्र) के मध्य मणिमंडप में स्वर्ण सिंहासन पर विराजमान हैं। उन्होंने पीले वस्त्र धारण किए हैं, एक हाथ से वे शत्रु की जीभ खींच रही हैं और दूसरे हाथ से मुदगर (गदा) द्वारा उस पर प्रहार कर रही हैं।

कवच का स्वरूप — सर्वांग और दिग्बन्धन रक्षा (Total Protection Shield)

रुद्रयामल तंत्र के इस कवच की विशेषता यह है कि इसमें केवल माँ बगलामुखी ही नहीं, बल्कि विभिन्न महाविद्याओं और देवी के उग्र स्वरूपों का आवाहन शरीर के अंगों और दिशाओं की रक्षा के लिए किया गया है। यह साधक को एक अभेद्य ऊर्जा-घेरे में सुरक्षित कर देता है:

दिशाओं की रक्षा (Digbandhana)

  • पूर्व: बगलामुखी
  • आग्नेय (South-East): पीताम्बरा
  • दक्षिण: महिषमर्दिनी
  • नैरृत्य (South-West): चण्डिका
  • पश्चिम: शूकरानना (वाराही रूप)
  • वायव्य (North-West): काली
  • उत्तर (कौवेरी): त्रिपुरा
  • ईशान (North-East): भैरवी
  • ऊर्ध्व (ऊपर): वागीश्वरी
  • अधो (नीचे): चक्रधारिणी वाराही
  • मध्य में: माँ ललिता

शरीर के अंगों की रक्षा (Anga Raksha)

  • मस्तक और भाल (Head & Forehead): बगलामुखी और पीताम्बरा।
  • नेत्र और कान (Eyes & Ears): त्रिपुरभैरवी और विजया।
  • नासिका और जिह्वा (Nose & Tongue): जया और सुरेश्वरी।
  • वचन (Speech): शारदा (ज्ञान और वाक् सिद्धि के लिए)।
  • कंठ, स्कंध और हृदय (Throat, Shoulders & Heart): रुद्राणी, विन्ध्यवासिनी और भवानी।
  • कटि, ऊरु और जंघा (Waist, Thighs & Calves): कमललोचना, मातङ्गी और कपालिनी।

इस प्रकार, विभिन्न सिद्ध शक्तियों के आवरण से साधक का संपूर्ण आभामंडल (Aura) अजेय और अछेद्य हो जाता है।

कवच पाठ के लाभ — फलश्रुति (Benefits of the Kavacham)

श्लोक 20 से 22 में भगवान शिव ने इस कवच की महिमा और इसके चमत्कारी परिणामों (फलश्रुति) का वर्णन किया है:

  • चतुर्वर्ग की सिद्धि: "इत्येतत् कवचं दिव्यं धर्मकामार्थसाधनम्" — यह दिव्य कवच मनुष्य जीवन के मुख्य लक्ष्यों: धर्म, अर्थ (धन), काम (इच्छापूर्ति) और अंततः मोक्ष का साधन है।
  • शत्रुओं का सर्वनाश: "तस्याशु शत्रवो यान्ति यमस्य भवते शिवे" — जो इस कवच का पाठ करता है, उसके घोर शत्रु शीघ्र ही यमलोक (मृत्यु) को प्राप्त हो जाते हैं, अर्थात् उनके षड्यंत्र उन्हीं को नष्ट कर देते हैं।
  • मूर्ख को भी विद्या प्राप्ति: "मूर्खो विद्यामवाप्नुयात्" — इस कवच की अधिष्ठात्री वागीश्वरी और शारदा भी हैं। अतः यदि कोई अज्ञानी या मूर्ख भी श्रद्धा से इसे सुन ले या पढ़ ले, तो वह ज्ञान और विद्या का भंडार बन जाता है।
  • मानसिक संताप से मुक्ति: माता पार्वती के प्रश्न के अनुसार, यह कवच झूठे मुकदमों, कार्यस्थल की राजनीति (Office politics), और समाज में फैलाई गई झूठी अफवाहों से होने वाले मानसिक कष्ट को पूरी तरह समाप्त कर देता है।

कवच पाठ की तांत्रिक विधि (Ritual Method for Recitation)

इस कवच के आरंभ में ही स्पष्ट निर्देश दिया गया है: "प्रथमं गुरुं ध्यात्वा प्राणायामं कृत्वा कवचं पठेत्।" अर्थात् इस पाठ से पहले गुरु का ध्यान और प्राणायाम अनिवार्य है।

कवच पाठ के नियम

  • गुरु स्मरण: सर्वप्रथम अपने गुरु और भगवान शिव (जो आदिगुरु हैं) का स्मरण करें। तंत्र में गुरु की आज्ञा सुरक्षा का पहला घेरा है।
  • प्राणायाम: तीन बार अनुलोम-विलोम या सामान्य प्राणायाम कर शरीर की नाड़ियों को शुद्ध करें।
  • वेशभूषा: पीताम्बरा साधना में पीला रंग सर्वोपरि है। पीले वस्त्र पहनें, पीले आसन पर बैठें और माथे पर हल्दी का तिलक लगाएं।
  • विनियोग एवं संकल्प: जल लेकर विनियोग पढ़ें। संकल्प लें कि "मैं अपनी मानसिक शांति, निंदकों के स्तम्भन और अकारण विरोधियों के नाश के लिए यह रुद्रयामल तंत्रोक्त कवच पढ़ रहा हूँ।"
  • गोपनीयता (Secrecy): श्लोक 21 में शिव जी कहते हैं— "गोपनीयं प्रयत्नेन कस्यचिन्न प्रकाशयेत्।" अपने इस पाठ और साधना को गुप्त रखें। अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने से कवच का प्रभाव क्षीण हो जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions)

1. यह बगलामुखी कवच किस ग्रंथ से लिया गया है?

यह विशेष और अत्यंत प्रामाणिक कवच 'रुद्रयामल महातंत्र' (Rudra Yamala Maha Tantra) से उद्धृत है। यह भगवान शंकर और माता पार्वती के संवाद के रूप में है।

2. माता पार्वती ने भगवान शिव से इस कवच का अनुरोध क्यों किया था?

श्लोक 3-4 के अनुसार, समाज में कई दुर्जन लोग शुद्ध साधकों (कौल भक्तों) की निंदा करते थे और उन्हें कटु वचन बोलकर मानसिक पीड़ा देते थे। भक्तों को इस अकारण निंदा और मानसिक संताप से बचाने के लिए माता ने यह कवच माँगा था।

3. क्या यह कवच केवल शारीरिक रक्षा करता है?

नहीं, यह कवच बहुआयामी (Multi-dimensional) है। यह शारीरिक प्रहारों के साथ-साथ 'मनोबाधा' (Mental stress), निंदा (Slander), बदनामी, और कोर्ट-कचहरी के झूठे मुकदमों से भी रक्षा करता है। यह शत्रु की 'वाणी' को कीलित कर देता है।

4. इस कवच का ऋषि और छंद क्या है?

विनियोग के अनुसार, इस कवच के ऋषि स्वयं 'महादेव' हैं, इसका छंद 'उष्णिक्' है, और इसकी अधिष्ठात्री देवता 'श्रीपीताम्बरा' (बगलामुखी) हैं।

5. कवच के पाठ से पहले प्राणायाम क्यों बताया गया है?

कवच के आरंभ में लिखा है "प्राणायामं कृत्वा"। तंत्र में मंत्रों की शक्ति को धारण करने के लिए नाड़ियों का शुद्ध होना आवश्यक है। प्राणायाम से शरीर का ऊर्जा-तंत्र (Nervous system) जाग्रत होता है और कवच का पूर्ण प्रभाव मिलता है।

6. क्या इस कवच में अन्य देवियों का भी आवाहन है?

हाँ, यह इस कवच की बड़ी विशेषता है। इसमें बगलामुखी के साथ महिषमर्दिनी, चण्डिका, काली, त्रिपुरा, भैरवी, वागीश्वरी, ललिता, मातंगी और तारा जैसी महाशक्तियों को शरीर के अलग-अलग हिस्सों की रक्षा का भार सौंपा गया है।

7. फलश्रुति में 'मूर्खो विद्यामवाप्नुयात्' का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है कि इस कवच के प्रभाव से एक अज्ञानी या मूर्ख व्यक्ति भी महान विद्या और ज्ञान को प्राप्त कर लेता है। क्योंकि इसमें वागीश्वरी और शारदा माता (सरस्वती) भी साधक की वाणी और जिह्वा की रक्षा करती हैं।

8. क्या इस कवच का पाठ बिना गुरु दीक्षा के किया जा सकता है?

रक्षा और मानसिक शांति (निंदकों से बचाव) के लिए कोई भी श्रद्धालु इसका पाठ कर सकता है। परंतु यदि किसी घोर शत्रु के सर्वनाश (मारण) के संकल्प से इसे पढ़ना हो, तो तांत्रिक दीक्षा और गुरु-मार्गदर्शन अनिवार्य है।

9. पाठ करते समय किस दिशा में बैठना शुभ होता है?

माँ पीताम्बरा की साधना के लिए सामान्यतः पूर्व दिशा (ज्ञान और शांति के लिए) या उत्तर दिशा (धन, विजय और शत्रु दमन के लिए) की ओर मुख करके बैठना चाहिए।

10. 'गोपनीयं प्रयत्नेन' का निर्देश क्यों दिया गया है?

भगवान शिव कहते हैं कि इस कवच को प्रयत्नपूर्वक गुप्त रखना चाहिए। तांत्रिक शक्तियां 'गुप्त' रहने पर ही बढ़ती हैं। यदि आप अपनी साधना का अहंकार-वश प्रदर्शन करेंगे, तो कवच की ऊर्जा छिन्न-भिन्न हो जाती है।

11. क्या इसे ऑफिस की राजनीति या विरोधियों से बचने के लिए पढ़ा जा सकता है?

बिल्कुल। यह कवच विशेष रूप से उन्हीं के लिए बताया गया है जो 'मुहुः कटुभिरुक्तिभिः' (बार-बार कटु वचन या ऑफिस पॉलिटिक्स) से परेशान हैं। यह विरोधी के मन को बदलकर उसे शांत (स्तम्भित) कर देता है।