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Sri Datta Ashtakam 2 – श्री दत्ताष्टकम् २ | Adi Shankaracharya

Sri Datta Ashtakam 2 – श्री दत्ताष्टकम् २ | Adi Shankaracharya
॥ श्री दत्ताष्टकम् २ ॥ आदौ ब्रह्ममुनीश्वरं हरिहरं सत्त्वं रजस्तामसं ब्रह्माण्डं च त्रिलोकपावनकरं त्रैमूर्तिरक्षाकरम् । भक्तानामभयार्थरूपसहितं सोऽहं स्वयं भावयन् सोऽहं दत्तदिगम्बरं वसतु मे चित्ते महत्सुन्दरम् ॥ १ ॥ विश्वं विष्णुमयं स्वयं शिवमयं ब्रह्मा मुनीन्द्रामयं ब्रह्मेन्द्रादिसुरोगणार्चितमयं सत्यं समुद्रामयम् । सप्तं लोकमयं स्वयं जनमयं मध्यादिवृक्षामयं सोऽहं दत्तदिगम्बरं वसतु मे चित्ते महत्सुन्दरम् ॥ २ ॥ आदित्यादिग्रहा स्वधा ऋषिगणं वेदोक्तमार्गे स्वयं वेदं शास्त्रपुराणपुण्यकथितं ज्योतिस्वरूपं शिवम् । एवं शास्त्रस्वरूपया त्रयगुणैस्त्रैलोक्यरक्षाकरं सोऽहं दत्तदिगम्बरं वसतु मे चित्ते महत्सुन्दरम् ॥ ३ ॥ उत्पत्तिस्थितिनाशकारणकरं कैवल्यमोक्षाकरं कैलासादिनिवासिनं शशिधरं रुद्राक्षमालागलम् । हस्ते चाप धनुःशरांश्च मुसलं खट्वाङ्गचर्माधरं सोऽहं दत्तदिगम्बरं वसतु मे चित्ते महत्सुन्दरम् ॥ ४ ॥ शुद्धं चित्तमयं सुवर्णमयदं बुद्धिं प्रकाशामयं भोग्यं भोगमयं निराहतमयं मुक्तिप्रसन्नामयम् । दत्तं दत्तमयं दिगम्बरमयं ब्रह्माण्डसाक्षात्करं सोऽहं दत्तदिगम्बरं वसतु मे चित्ते महत्सुन्दरम् ॥ ५ ॥ सोऽहंरूपमयं परात्परमयं निःसङ्गनिर्लिप्तकं नित्यं शुद्धनिरञ्जनं निजगुरुं नित्योत्सवं मङ्गलम् । सत्यं ज्ञानमनन्तब्रह्महृदयं व्याप्तं परोदैवतं सोऽहं दत्तदिगम्बरं वसतु मे चित्ते महत्सुन्दरम् ॥ ६ ॥ काषायं करदण्डधारपुरुषं रुद्राक्षमालागलं भस्मोद्धूलितलोचनं कमलजं कोल्हापुरीभिक्षणम् । काशीस्नानजपादिकं यतिगुरुं तन्माहुरीवासितं सोऽहं दत्तदिगम्बरं वसतु मे चित्ते महत्सुन्दरम् ॥ ७ ॥ कृष्णातीरनिवासिनं निजपदं भक्तार्थसिद्धिप्रदं मुक्तिं दत्तदिगम्बरं यतिगुरुं नास्तीति लोकाञ्जनम् । सत्यं सत्यमसत्यलोकमहिमा प्राप्तव्यभाग्योदयं सोऽहं दत्तदिगम्बरं वसतु मे चित्ते महत्सुन्दरम् ॥ ८ ॥ ॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं श्री दत्ताष्टकम् सम्पूर्णम् ॥

परिचय: श्री दत्ताष्टकम् २ एवं आदि शंकराचार्य की अद्वैत दृष्टि (Introduction)

श्री दत्ताष्टकम् २ (Sri Datta Ashtakam 2) हिंदू धर्म के महानतम दार्शनिक और अद्वैत वेदांत के पुनरुद्धारक जगतगुरु आदि शंकराचार्य द्वारा रचित एक अत्यंत प्रभावशाली स्तुति है। यह अष्टक भगवान दत्तात्रेय के "निर्गुण-सगुण" स्वरूप का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है। भगवान दत्तात्रेय को त्रिदेवों—ब्रह्मा (सृजन), विष्णु (पालन) और महेश (लय)—का संयुक्त अवतार माना जाता है। आचार्य शंकर ने इस रचना में सिद्ध किया है कि गुरु दत्तात्रेय केवल एक ऐतिहासिक व्यक्ति नहीं, बल्कि वह साक्षात परब्रह्म सत्ता हैं जो "सोऽहं" (वह मैं ही हूँ) के रूप में प्रत्येक जीव के भीतर स्पंदित हो रही है।

इस अष्टक की सबसे बड़ी विशेषता इसकी अंतिम पंक्ति का संपुट है— "सोऽहं दत्तदिगम्बरं वसतु मे चित्ते महत्सुन्दरम्"। यहाँ साधक भगवान से प्रार्थना करता है कि प्रभु का वह परम सुंदर और दिगंबर (आकाश जैसा व्यापक) स्वरूप उसके चित्त में सदैव वास करे। "दिगंबर" शब्द यहाँ नग्नता का सूचक नहीं, बल्कि पूर्ण वैराग्य और सर्वव्यापकता का प्रतीक है। भगवान दत्त को "आदि गुरु" माना जाता है, जिन्होंने प्रकृति के २४ गुरुओं से शिक्षा प्राप्त कर संसार को यह सिखाया कि ज्ञान का स्रोत हर कण में व्याप्त है।

आदि शंकराचार्य, जो स्वयं शिव के अवतार माने जाते हैं, ने दत्तात्रेय की उपासना को अद्वैत मार्ग की सिद्धि के लिए अनिवार्य माना। उनके अनुसार, बिना गुरु की कृपा के "ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या" के सिद्धांत को केवल बुद्धि से समझा जा सकता है, अनुभव नहीं किया जा सकता। यह अष्टक उसी 'अनुभूति' की सीढ़ी है। यह पाठ उन साधकों के लिए विशेष रूप से वरदान है जो मानसिक विक्षेपों, अज्ञान के अंधकार और संसार के द्वंद्वों से मुक्त होकर 'नित्य आनंद' प्राप्त करना चाहते हैं।

विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व: 'सोऽहं' और त्रिमूर्ति तत्व (Significance)

दत्ताष्टकम् २ का दार्शनिक महत्व इसके 'सर्वात्मक' दृष्टिकोण में निहित है। श्लोक २ में आचार्य कहते हैं— "विश्वं विष्णुमयं स्वयं शिवमयं ब्रह्मा मुनीन्द्रामयं"। इसका अर्थ है कि यह संपूर्ण विश्व विष्णु, शिव और ब्रह्मा का ही विस्तार है और इन तीनों का एकीकृत रूप दत्तात्रेय है। यह स्तोत्र सांप्रदायिक भेदों (जैसे शैव, वैष्णव) को समाप्त कर एकता का संदेश देता है।

  • सोऽहं भाव: 'सोऽहं' मंत्र का निरंतर उच्चारण साधक को उसकी देह-बुद्धि से ऊपर उठाकर आत्म-बुद्धि में स्थापित करता है। यह अद्वैत का महावाक्य है।
  • तीर्थों का सार: श्लोक ७ में कोल्हापुर (भिक्षा), काशी (स्नान) और माहुर (निवास) का उल्लेख है। यह बताता है कि दत्तात्रेय भगवान आज भी इन क्षेत्रों में सूक्ष्म रूप में जाग्रत हैं।
  • आयुधों का रहस्य: श्लोक ४ में प्रभु के हाथों में धनुष-बाण, मूसल और खट्वांग का वर्णन है। ये अस्त्र केवल शत्रुओं के संहार के लिए नहीं, बल्कि साधक के भीतर के काम, क्रोध और अज्ञान रूपी विकारों को काटने के लिए हैं।
  • प्रकृति और पुरुष: भगवान को 'मध्यादिवृक्षामयं' (वृक्षों और प्रकृति में व्याप्त) और 'ज्योतिस्वरूपं' कहा गया है, जो उनकी सर्वव्यापकता को सिद्ध करता है।

यह अष्टक हमें यह सिखाता है कि जिस प्रकार स्वर्ण से बने विभिन्न आभूषण अंततः स्वर्ण ही हैं, उसी प्रकार संसार के विभिन्न रूप अंततः वह एक 'दत्त-तत्त्व' ही हैं। श्लोक ६ में उन्हें 'अनन्तब्रह्महृदयं' कहा गया है, जिसका अर्थ है कि वे उस अनंत ब्रह्म के हृदय हैं।

दत्ताष्टकम् पाठ के फलश्रुति लाभ (Benefits)

आदि शंकराचार्य की परंपरा और दत्त सम्प्रदाय के अनुसार, इस अष्टक के नियमित पाठ से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:

  • चित्त शुद्धि और एकाग्रता: "वसतु मे चित्ते महत्सुन्दरम्" — इस पंक्ति के निरंतर जाप से मन के कुसंस्कार जल जाते हैं और चित्त में निर्मलता आती है।
  • अज्ञान और मोह का नाश: यह पाठ अविद्या के परदे को हटाकर साधक को 'सत्य-असत्य' का विवेक प्रदान करता है।
  • भय और व्याधि से मुक्ति: 'भवतापहरणं' होने के कारण यह संसार के दुखों, मानसिक रोगों और अज्ञात भय को जड़ से मिटाने वाला है।
  • सद्गुरु की साक्षात कृपा: भगवान दत्तात्रेय "आदि गुरु" हैं, अतः उनके इस अष्टक का पाठ करने से साधक को अपने जीवन में उचित मार्गदर्शन प्राप्त होता है।
  • आर्थिक एवं भौतिक उन्नति: श्लोक ५ के अनुसार, यह 'सुवर्णमयदं' (ऐश्वर्य प्रदाता) है। गुरु की कृपा से दरिद्रता का नाश होता है और जीवन में समृद्धि आती है।
  • पितृ दोष शांति: दत्तात्रेय भगवान पितरों के अधिपति हैं। इस अष्टक का पाठ पूर्वजों को सद्गति प्रदान करता है और परिवार पर उनका आशीर्वाद लाता है।

पाठ विधि एवं विशेष अनुष्ठान (Ritual Method)

दत्तात्रेय साधना में सात्विकता और भाव का सर्वोच्च स्थान है। आदि शंकराचार्य विरचित इस अष्टक का पूर्ण लाभ प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित विधि अपनाना श्रेष्ठ है।

साधना के नियम

  • शुभ समय: गुरुवार (Thursday) भगवान दत्त का दिन है। इसके अतिरिक्त प्रदोष काल (सूर्यास्त के समय) या प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में पाठ करना विशेष फलदायी है।
  • शुद्धि: स्नान के पश्चात स्वच्छ पीले (Saffron/Yellow) या श्वेत वस्त्र धारण करें। भस्म (विभूति) का तिलक लगाना दत्त साधना में अत्यंत शुभ माना जाता है।
  • आसन: ऊनी आसन या कुशा के आसन पर उत्तर या पूर्व की ओर मुख करके बैठें।
  • दीप और नैवेद्य: शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें। भगवान को गुड़-चने, बेसन के लड्डू या दूध से बनी मिठाई का भोग लगाएं।
  • ध्यान: पाठ करते समय भगवान दत्तात्रेय के उस तेजस्वी रूप का ध्यान करें जिसमें वे तीन मुख और छह भुजाओं के साथ औदुम्बर (गूलर) वृक्ष के नीचे विराजित हैं।

विशेष प्रयोग

यदि जीवन में कोई बहुत बड़ा संकट हो, तो संकल्प लेकर लगातार २१ या ४१ दिनों तक प्रतिदिन ११ बार इस अष्टक का पाठ करें। पाठ के अंत में 'दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा' महामंत्र का १०८ बार जाप अवश्य करें। इससे अष्टक की शक्ति कई गुना बढ़ जाती है।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (10+ Questions)

1. श्री दत्ताष्टकम् २ के रचयिता कौन हैं?

इस दिव्य अष्टक की रचना जगतगुरु आदि शंकराचार्य ने की थी। इसे दत्त संप्रदाय में अत्यंत प्रामाणिक माना जाता है।

2. 'सोऽहं' शब्द का आध्यात्मिक अर्थ क्या है?

'सोऽहं' (सः + अहम्) का अर्थ है— "वह (परमात्मा) मैं ही हूँ"। यह अद्वैत वेदांत का सार है जो जीव और ब्रह्म की एकता को दर्शाता है।

3. क्या इस पाठ से पितृ दोष सच में दूर होता है?

जी हाँ। भगवान दत्तात्रेय को पितरों का अधिपति माना जाता है। उनके इस सिद्ध अष्टक का पाठ पूर्वजों को शांति प्रदान करता है और परिवार के कलह को समाप्त करता है।

4. 'दिगम्बर' नाम का वास्तविक रहस्य क्या है?

'दिक्' (दिशाएं) ही जिनका 'अम्बर' (वस्त्र) हैं। यह उनके उस स्वरूप को दर्शाता है जो किसी भी मायावी बंधन या देह-बोध से सर्वथा मुक्त और अनंत है।

5. क्या स्त्रियाँ इस अष्टक का पाठ कर सकती हैं?

हाँ, भगवान दत्तात्रेय की भक्ति में कोई लिंग भेद नहीं है। शुद्ध चित्त और मर्यादा का पालन करते हुए कोई भी श्रद्धालु इसका पाठ कर सकता है।

6. पाठ के लिए सबसे उत्तम माला कौन सी है?

दत्तात्रेय साधना के लिए रुद्राक्ष की माला सर्वोत्तम मानी गई है। यदि माला न हो, तो भी श्रद्धापूर्वक पाठ स्वीकार्य है।

7. 'कोल्हापुरीभिक्षणम्' (श्लोक ७) का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है कि भगवान दत्तात्रेय कोल्हापुर में भिक्षा ग्रहण करते हैं। कोल्हापुर को 'दत्त भिक्षा लिंग' क्षेत्र माना जाता है, जहाँ माता महालक्ष्मी का निवास है।

8. क्या यह पाठ घर की नकारात्मक ऊर्जा को दूर करता है?

अवश्य। 'सदाशिव' और 'मङ्गल' स्वरूप प्रभु का नामोच्चार घर के वातावरण को सात्विक बनाता है और बुरी शक्तियों का शमन करता है।

9. क्या इसके पाठ के लिए गुरु दीक्षा अनिवार्य है?

साधारण भक्ति भाव से पाठ करने के लिए दीक्षा अनिवार्य नहीं है, लेकिन अद्वैत मार्ग की गहरी साधना के लिए गुरु मार्गदर्शन उचित रहता है।

10. पाठ के दौरान किस खाद्य पदार्थ का दान करना शुभ है?

दत्तात्रेय भगवान को अन्नदान अत्यंत प्रिय है। पाठ के पश्चात गाय को भोजन कराना या ज़रूरतमंद को अन्न देना महापुण्यदायी माना जाता है।