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Chandikashtakam (Umapati Dvivedi) – चण्डिकाष्टकम्

Chandikashtakam (Umapati Dvivedi) – चण्डिकाष्टकम्
॥ चण्डिकाष्टकम् ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ सहस्रचन्द्रनित्दकातिकान्त-चन्द्रिकाचयै- दिशोऽभिपूरयद् विदूरयद् दुराग्रहं कलेः । कृतामलाऽवलाकलेवरं वरं भजामहे महेशमानसाश्रयन्वहो महो महोदयम् ॥ १॥ विशाल-शैलकन्दरान्तराल-वासशालिनीं त्रिलोकपालिनीं कपालिनी मनोरमामिमाम् । उमामुपासितां सुरैरूपास्महे महेश्वरीं परां गणेश्वरप्रसू नगेश्वरस्य नन्दिनीम् ॥ २॥ अये महेशि! ते महेन्द्रमुख्यनिर्जराः समे समानयन्ति मूर्द्धरागत परागमंघ्रिजम् । महाविरागिशंकराऽनुरागिणीं नुरागिणी स्मरामि चेतसाऽतसीमुमामवाससं नुताम् ॥ ३॥ भजेऽमरांगनाकरोच्छलत्सुचाम रोच्चलन् निचोल-लोलकुन्तलां स्वलोक-शोक-नाशिनीम् । अदभ्र-सम्भृतातिसम्भ्रम-प्रभूत-विभ्रम- प्रवृत-ताण्डव-प्रकाण्ड-पण्डितीकृतेश्वराम् ॥ ४॥ अपीह पामरं विधाय चामरं तथाऽमरं नुपामरं परेशिदृग्-विभाविता-वितत्रिके । प्रवर्तते प्रतोष-रोष-खेलन तव स्वदोष- मोषहेतवे समृद्धिमेलनं पदन्नुमः ॥ ५॥ भभूव्-भभव्-भभव्-भभाभितो-विभासि भास्वर- प्रभाभर-प्रभासिताग-गह्वराधिभासिनीम् । मिलत्तर-ज्वलत्तरोद्वलत्तर-क्षपाकर प्रमूत-भाभर-प्रभासि-भालपट्टिकां भजे ॥ ६॥ कपोतकम्बु-काम्यकण्ठ-कण्ठयकंकणांगदा- दिकान्त-काश्चिकाश्चितां कपालिकामिनीमहम् । वरांघ्रिनूपुरध्वनि-प्रवृत्तिसम्भवद् विशेष- काव्यकल्पकौशलां कपालकुण्डलां भजे ॥ ७॥ भवाभय-प्रभावितद्भवोत्तरप्रभावि भव्य भूमिभूतिभावन प्रभूतिभावुकं भवे । भवानि नेति ते भवानि! पादपंकजं भजे भवन्ति तत्र शत्रुवो न यत्र तद्विभावनम् ॥ ८॥ ॥ फलश्रुतिः ॥ दुर्गाग्रतोऽतिगरिमप्रभवां भवान्या भव्यामिमां स्तुतिमुमापतिना प्रणीताम् । यः श्रावयेत् सपुरूहूतपुराधिपत्य भाग्यं लभेत रिपवश्च तृणानि तस्य ॥ ९॥ रामाष्टांक शशांकेऽब्देऽष्टम्यां शुक्लाश्विने गुरौ । शाक्तश्रीजगदानन्दशर्मण्युपहृता स्तुतिः ॥ १०॥ ॥ इति कविपत्युपनामक-श्री उमापतिद्विवेदि-विरचितं चण्डिकाष्टकं सम्पूर्णम् ॥

चण्डिकाष्टकम् — काव्यात्मक सौंदर्य और तांत्रिक महत्व

चण्डिकाष्टकम् एक अत्यंत विलक्षण और उच्च कोटि की साहित्यिक कृति है, जिसकी रचना 'कविपति' उपनाम से प्रसिद्ध श्री उमापतिद्विवेदी ने की है। यह स्तोत्र अपनी जटिल संस्कृत, गहन अलंकारों और अद्भुत ध्वनि-विज्ञान के लिए जाना जाता है। सामान्य भक्ति स्तोत्रों से भिन्न, यह एक विद्वत्तापूर्ण काव्य है जो माँ दुर्गा के 'चण्डिका' स्वरूप के तेज, सौंदर्य और पराक्रम का गान करता है।

ध्वनि-विज्ञान (Sound Symbolism): इस अष्टक की सबसे बड़ी विशेषता इसके शब्दालंकार हैं। श्लोक 6 में "भभूव्-भभव्-भभव्-भभाभितो-विभासि" जैसे शब्दों का प्रयोग देवी के प्रकट होने की ध्वनि, उनके आभा-मंडल के विस्फोट और ब्रह्मांडीय ऊर्जा के कंपन को दर्शाने के लिए किया गया है। यह केवल स्तुति नहीं, बल्कि मंत्र-विज्ञान का एक नादात्मक रूप है।

तांडव और शिव से श्रेष्ठता: श्लोक 4 में कवि एक अद्भुत कल्पना करते हैं—"प्रवृत-ताण्डव-प्रकाण्ड-पण्डितीकृतेश्वराम्"। वे कहते हैं कि माँ के युद्ध-नृत्य को देखकर ही स्वयं ईश्वर (शिव) ने तांडव में 'पंडिताई' या निपुणता प्राप्त की। यह देवी को उनके पति भगवान शंकर से भी श्रेष्ठ स्थापित करता है, जो शाक्त दर्शन का मूल सिद्धांत है।

स्तोत्र के सिद्ध लाभ — फलश्रुति (Benefits)

इस अष्टक के अंतिम श्लोक (9 और 10) में इसकी फलश्रुति वर्णित है, जो अत्यंत प्रभावशाली है:

  • इन्द्र के समान राजयोग: "सपुरूहूतपुराधिपत्य भाग्यं लभेत" — जो इस स्तुति का पाठ करता या सुनता है, उसे साक्षात 'पुरूहूत' (देवराज इन्द्र) के समान राज्य और वैभव का सौभाग्य प्राप्त होता है। यह नौकरी में पदोन्नति, राजनीतिक सफलता और व्यापार में साम्राज्य स्थापित करने का आशीर्वाद है।
  • शत्रु का पूर्ण शमन: "रिपवश्च तृणानि तस्य" — इस कवच के साधक के शत्रु उसके सामने घास के तिनके के समान शक्तिहीन और महत्त्वहीन हो जाते हैं। श्लोक 8 में कहा गया है कि जहाँ माँ के चरणों का ध्यान होता है, वहाँ शत्रु उत्पन्न ही नहीं होते (भवन्ति तत्र शत्रुवो न)।
  • कलि के दुराग्रह का नाश: "विदूरयद् दुराग्रहं कलेः" (श्लोक 1) — यह स्तोत्र कलियुग के दुष्प्रभावों, जैसे-अकारण हठ, ईर्ष्या, और दुराग्रह का नाश कर मन को निर्मल बनाता है।
  • काव्य-कौशल और वाक-सिद्धि: "विशेष-काव्यकल्पकौशलां" (श्लोक 7) — माँ के नूपुरों की ध्वनि से ही विशेष काव्य रचने का कौशल उत्पन्न होता है। यह कवियों, वक्ताओं और कलाकारों के लिए एक वरदान है।

साधना विधि और नियम (Ritual Method)

इस काव्यात्मक और ऊर्जावान स्तोत्र का पूर्ण लाभ उठाने के लिए सही विधि का पालन आवश्यक है:

  • समय और दिन: यह एक उग्र स्तुति है, अतः इसका पाठ मंगलवार, अष्टमी, चतुर्दशी, या नवरात्रि की संध्या या रात्रि में करना सर्वोत्तम है।
  • आसन और दिशा: लाल ऊनी आसन पर बैठकर उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करें।
  • शुद्ध उच्चारण: चूँकि इस स्तोत्र की शक्ति इसके ध्वनि-विज्ञान में निहित है, इसलिए इसके कठिन शब्दों का स्पष्ट और शुद्ध उच्चारण करने का प्रयास करें। पाठ से पहले देवी से क्षमा मांग लें (जैसा कि श्लोक 8 में है)।
  • नैवेद्य: माँ चण्डिका को गुड़ से बने पदार्थ (गुड़हल के फूल) और अनार अत्यंत प्रिय हैं। आप अनार के रस या गुड़ की भेली का भोग लगा सकते हैं।
  • अनुष्ठान: विशेष कार्य सिद्धि (जैसे चुनाव या कोर्ट केस में विजय) के लिए 41 दिनों तक नित्य 11 पाठ का संकल्प लें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. चण्डिकाष्टकम् की रचना किसने की है?

इस अद्वितीय और काव्यात्मक स्तोत्र की रचना 'कविपति' उपनाम से प्रसिद्ध महान विद्वान 'श्री उमापतिद्विवेदी' (Umapati Dvivedi) द्वारा की गई है, जैसा कि अंतिम श्लोक में वर्णित है।

2. इस अष्टक की भाषा इतनी जटिल और काव्यात्मक क्यों है?

यह अष्टक संस्कृत साहित्य के 'शब्दालंकार' और 'अनुप्रास' का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। श्लोक 6 में 'भभूव्-भभव्-भभव्-भभाभितो' जैसे शब्दों का प्रयोग देवी की महिमा के ध्वनि-विज्ञान (नाद) को प्रकट करने के लिए किया गया है।

3. चण्डिका और दुर्गा में क्या अंतर है?

चण्डिका, माँ दुर्गा का ही एक अत्यंत उग्र (रौद्र) स्वरूप है, जो विशेष रूप से चण्ड और मुण्ड जैसे असुरों का संहार करने के लिए प्रकट हुआ था। वे क्रोध और संहार की अधिष्ठात्री हैं।

4. फलश्रुति में 'पुरूहूतपुराधिपत्य भाग्यं' का क्या अर्थ है?

'पुरूहूत' देवराज इन्द्र का एक नाम है। फलश्रुति (श्लोक 9) में कहा गया है कि जो इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसे साक्षात 'इन्द्र के समान' राज्य और वैभव का सौभाग्य प्राप्त होता है।

5. क्या इस पाठ से शत्रुओं का नाश होता है?

हाँ, श्लोक 9 में स्पष्ट रूप से कहा गया है—'रिपवश्च तृणानि तस्य'। अर्थात् इस स्तोत्र का पाठ करने वाले के शत्रु उसके सामने घास के तिनके के समान शक्तिहीन और महत्त्वहीन हो जाते हैं।

6. श्लोक 4 में 'ताण्डव' का उल्लेख क्यों है?

कवि कल्पना करते हैं कि माँ दुर्गा के युद्ध-कौशल और थिरकते हुए रूप को देखकर ही स्वयं भगवान शिव ने ताण्डव में 'पंडिताई' या निपुणता प्राप्त की। यह देवी को शिव से भी श्रेष्ठ स्थापित करता है।

7. इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए?

जो व्यक्ति राजयोग, उच्च पद, शत्रु विजय, वाक-सिद्धि और अलौकिक आकर्षण प्राप्त करना चाहता है, उसे इस अष्टक का पाठ अवश्य करना चाहिए।

8. पाठ के लिए कौन सा दिन और समय श्रेष्ठ है?

चूँकि यह देवी का उग्र रूप है, इसलिए इसका पाठ मंगलवार, अष्टमी, चतुर्दशी या नवरात्रि की संध्या (गोधूलि बेला) या रात्रि में करना सर्वाधिक फलदायी होता है।

9. क्या सामान्य गृहस्थ इसका पाठ कर सकते हैं?

बिल्कुल। यद्यपि इसकी भाषा क्लिष्ट है, किंतु भावपूर्वक शुद्ध उच्चारण के साथ पाठ करने से कोई भी गृहस्थ इसकी ऊर्जा को अनुभव कर सकता है और माँ की कृपा प्राप्त कर सकता है।

10. कवि ने अंत में 'जगदानन्द शर्मण्युपहृता' क्यों कहा है?

यह कवि की विनम्रता है। श्लोक 10 में वे कहते हैं कि यह स्तुति उन्होंने विक्रम संवत् १८८९ (1889) की आश्विन शुक्ल अष्टमी, गुरुवार को 'जगदानन्द शर्मा' नामक किसी शाक्त भक्त को उपहार स्वरूप भेंट की थी।