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Sri Artatrana Parayana Narayana Stotram – श्री आर्तत्राणपरायण नारायण स्तोत्रम्

Sri Artatrana Parayana Narayana Stotram – श्री आर्तत्राणपरायण नारायण स्तोत्रम्
॥ श्री आर्तत्राणपरायण नारायण स्तोत्रम् ॥ प्रह्लाद प्रभुरस्ति चेत्तव हरिः सर्वत्र मे दर्शय स्तम्भे चैनमिति ब्रुवन्तमसुरं तत्राविरासीद्धरिः । वक्षस्तस्य विदारयन्निजनखैर्वात्सल्यमावेदय- -न्नार्तत्राणपरायणः स भगवान् नारायणो मे गतिः ॥ १ ॥ श्रीरामात्र विभीषणोऽयमधुना त्वार्तो भयादागतः सुग्रीवानय पालयेऽहमधुना पौलस्त्यमेवागतम् । एवं योऽभयमस्य सर्वविदितं लङ्काधिपत्यं ददा- -वार्तत्राणपरायणः स भगवान् नारायणो मे गतिः ॥ २ ॥ नक्रग्रस्तपदं समुद्यतकरं ब्रह्मेश देवेश मां पाहीति प्रचुरार्तरावकरिणं देवेश शक्तीश च । मा शोचेति ररक्ष नक्रवदनाञ्चक्रश्रिया तत्क्षणा- -दार्तत्राणपरायणः स भगवान् नारायणो मे गतिः ॥ ३ ॥ हा कृष्णाच्युत हा कृपाजलनिधे हा पाण्डवानां गते क्वासि क्वासि सुयोधनादवगतां हा रक्ष मां द्रौपदीम् । इत्युक्तोऽक्षयवस्त्ररक्षिततनुं योरक्षदापद्गणा- -दार्तत्राणपरायणः स भगवान् नारायणो मे गतिः ॥ ४ ॥ यत्पादाब्जनखोदकं त्रिजगतां पापौघविध्वसनं यन्नामामृतपूरणं च पिबतां सन्तापसंहारकम् । पाषाणश्च यदङ्घ्रितो निजवधूरूपं मुनेराप्तवा- -नार्तत्राणपरायणः स भगवान् नारायणो मे गतिः ॥ ५ ॥ यन्नामश्रुतिमात्रतोऽपरिमितं संसारवारान्निधिं त्यक्त्वा गच्छति दुर्जनोऽपि परमं विष्णोः पदं शाश्वतम् । तन्नैवाद्भुतकारणं त्रिजगतां नाथस्य दासोऽस्म्यह- -मार्तत्राणपरायणः स भगवान् नारायणो मे गतिः ॥ ६ ॥ पित्रा भ्रातरमुत्तमाङ्कगमितं भक्तोत्तमं यो ध्रुवं दृष्ट्वा तत्सममारुरुक्षुमुदितं मात्रावमानं गतम् । योऽदात् तं शरणागतं तु तपसा हेमाद्रिसिंहासनं ह्यार्तत्राणपरायणः स भगवान् नारायणो मे गतिः ॥ ७ ॥ नाथेति श्रुतयो न तत्त्वमतयो घोषस्थिता गोपिका जारिण्यः कुलजातिधर्मविमुखा अध्यात्मभावं ययुः । भक्तिर्यस्य ददाति मुक्तिमतुलां जारस्य यः सद्गति- -र्ह्यार्तत्राणपरायणः स भगवान् नारायणो मे गतिः ॥ ८ ॥ क्षुत्तृष्णार्तसहस्रशिष्यसहितं दुर्वाससं क्षोभितं द्रौपद्या भयभक्तियुक्तमनसा शाकं स्वहस्तार्पितम् । भुक्त्वा तर्पयदात्मवृत्तिमखिलामावेदयन् यः पुमा- -नार्तत्राणपरायणः स भगवान् नारायणो मे गतिः ॥ ९ ॥ येनाराक्षि रघूत्तमेन जलधेस्तीरे दशास्यानुज- -स्त्वायातं शरणं रघूत्तम विभो रक्षातुरं मामिति । पौलस्त्येन निराकृतोऽथ सदसि भ्रात्रा च लङ्कापुरे ह्यार्तत्राणपरायणः स भगवान् नारायणो मे गतिः ॥ १० ॥ येनावाहि महाहवे वसुमती संवर्तकाले महा- -लीलाक्रोडवपुर्धरेण हरिणा नारायणेन स्वयम् । यः पापिद्रुमसम्प्रवर्तमचिराद्धत्त्वा च योऽगात् प्रिया- -मार्तत्राणपरायणः स भगवान् नारायणो मे गतिः ॥ ११ ॥ योद्धासौ भुवनत्रये मधुपतिर्भर्ता नराणां बले राधाया अकरोद्रते रतिमनःपूर्तिं सुरेन्द्रानुजः । यो वा रक्षति दीनपाण्डुतनयान्नाथेति भीतिं गता- -नार्तत्राणपरायणः स भगवान् नारायणो मे गतिः ॥ १२ ॥ यः सान्दीपिनिदेशतश्च तनयं लोकान्तरात् सन्नतं चानीय प्रतिपाद्य पुत्रमरणादुज्जृम्भमाणार्तये । सन्तोषं जनयन्नमेयमहिमा पुत्रार्थसम्पादना- -दार्तत्राणपरायणः स भगवान् नारायणो मे गतिः ॥ १३ ॥ यन्नामस्मरणादघौघसहितो विप्रः पुराऽजामिलः प्राणान्मुक्तिमशेषितामनु च यः पापौघतापार्तियुक् । सद्यो भागवतोत्तमात्मनि मतिं प्रापाम्बरीषाभिध- -श्चार्तत्राणपरायणः स भगवान् नारायणो मे गतिः ॥ १४ ॥ योरक्षद्वसनादिनित्यरहितं विप्रं कुचैलाभिधं दीनादीनचकोरपालनपरः श्रीशङ्खचक्रोज्ज्वलः । तज्जीर्णाम्बरमुष्टिपात्रपृथुकानादाय भुक्त्वा क्षणा- -दार्तत्राणपरायणः स भगवान् नारायणो मे गतिः ॥ १५ ॥ यत्कल्याणगुणाभिरामममलं मन्त्राणि संशिक्षते यत्संशेतिपतिप्रतिष्ठितमिदं विश्वं वदत्यागमः । यो योगीन्द्रमनःसरोरुहतमःप्रध्वंसविद्भानुमा- -नार्तत्राणपरायणः स भगवान् नारायणो मे गतिः ॥ १६ ॥ कालिन्दीहृदयाभिरामपुलिने पुण्ये जगन्मङ्गले चन्द्राम्भोजवटे पुटे परिसरे धात्रा समाराधिते । श्रीरङ्गे भुजगेन्द्रभोगशयने शेते सदा यः पुमा- -नार्तत्राणपरायणः स भगवान् नारायणो मे गतिः ॥ १७ ॥ वात्सल्यादभयप्रदानसमयादार्तार्तिनिर्वापणा- -दौदार्यादघशोषणादगणितश्रेयः पदप्रापणात् । सेव्यःश्रीपतिरेव सर्वजगतामेते हि तत्साक्षिणः प्रह्लादश्च विभीषणश्च करिराट् पाञ्चाल्यहल्याध्रुवः ॥ १८ ॥ ॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्य विरचितं श्री आर्तत्राणपरायण नारायण स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

श्री आर्तत्राणपरायण नारायण स्तोत्रम्: परिचय एवं दार्शनिक स्वरूप (Introduction)

श्री आर्तत्राणपरायण नारायण स्तोत्रम् (Sri Artatrana Parayana Narayana Stotram) सनातन धर्म के भक्ति साहित्य का एक परम तेजस्वी और प्रभावशाली रत्न है। इस दिव्य स्तोत्र की रचना अद्वैत वेदांत के महान प्रणेता जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा की गई है। 'आर्तत्राणपरायण' शब्द का अर्थ अत्यंत गहन है: 'आर्त' का अर्थ है दुखी या पीड़ित, 'त्राण' का अर्थ है रक्षा करना, और 'परायण' का अर्थ है तत्पर रहना। इस प्रकार, यह स्तोत्र भगवान नारायण के उस स्वरूप की वंदना करता है जो अपने शरण में आए हुए पीड़ित भक्तों की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहते हैं।

इस स्तोत्र की अद्वितीयता इसकी संरचना में है। १८ श्लोकों के इस पाठ में प्रत्येक श्लोक का समापन "आर्तत्राणपरायणः स भगवान् नारायणो मे गतिः" (पीड़ितों की रक्षा में तत्पर वे भगवान नारायण ही मेरी एकमात्र गति हैं) के मंत्रमुग्ध कर देने वाले उद्घोष के साथ होता है। शंकराचार्य जी ने इस रचना में श्रीमद्भागवत, रामायण और महाभारत की उन प्रमुख घटनाओं को पिरोया है, जहाँ भगवान ने विधि-विधान या मर्यादा की प्रतीक्षा किए बिना केवल भक्त की आर्त पुकार पर अपना सिंहासन छोड़ दिया और साक्षात् प्रकट होकर रक्षा की।

परिचय के ५०० से अधिक शब्दों के इस विस्तृत विवेचन में यह समझना अनिवार्य है कि यह स्तोत्र केवल एक प्रार्थना नहीं, बल्कि 'शरणागति' (Total Surrender) का साक्षात् प्रमाण है। प्रथम श्लोक में ही प्रह्लाद की रक्षा के लिए स्तंभ से नृसिंह अवतार के रूप में प्रकट होने वाली लीला का वर्णन है। शंकराचार्य जी स्पष्ट करते हैं कि ईश्वर कहीं बाहर नहीं, बल्कि भक्त के अटूट विश्वास में ही प्रकट होता है। इसके बाद विभीषण की शरणागति, गजेन्द्र का उद्धार, द्रौपदी की लाज बचाना और अहल्या का उद्धार जैसी कथाओं के माध्यम से यह विश्वास दिलाया गया है कि नारायण की करुणा असीम है।

साधना की दृष्टि से, यह स्तोत्र उन लोगों के लिए रामबाण है जो जीवन के कठिन संघर्षों, मानसिक अशांति या घोर संकटों से घिरे हैं। आदि शंकराचार्य, जो निर्गुण ब्रह्म के उपासक थे, उन्होंने इस स्तोत्र में सगुण साकार विष्णु की भक्ति का जो रस घोला है, वह सिद्ध करता है कि ज्ञान और भक्ति एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। आधुनिक काल में, जहाँ असुरक्षा की भावना बढ़ रही है, वहाँ नारायण के इस रक्षा कवच का पाठ मन को वज्र के समान अटूट शांति और सुरक्षा प्रदान करता है। यह पाठ हमें सिखाता है कि जब संसार के सभी द्वार बंद हो जाते हैं, तब नारायण का द्वार सदैव खुला रहता है।

स्तोत्र का विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व एवं लीला चित्रण (Significance)

श्री आर्तत्राणपरायण नारायण स्तोत्रम् का विशिष्ट महत्व इसकी 'सर्व-समावेशी' प्रकृति में है। यह स्तोत्र किसी एक अवतार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राम, कृष्ण, नृसिंह, वराह और कूर्म जैसे विभिन्न अवतारों की शक्ति को एक ही सूत्र में पिरोता है। श्लोक ४ में द्रौपदी की पुकार — "हा कृष्णाच्युत हा कृपाजलनिधे" — और उसके बाद मिलने वाले 'अक्षय वस्त्र' का वर्णन भगवान की उस सूक्ष्म शक्ति को दर्शाता है जो असंभव को भी संभव कर देती है।

इस स्तोत्र का दार्शनिक आधार यह है कि ईश्वर केवल योग्यता नहीं, बल्कि 'आकुलता' देखते हैं। श्लोक ८ में उन गोपियों का वर्णन है जो शास्त्र ज्ञाता नहीं थीं, बल्कि केवल प्रेम के वश में थीं और उन्हें भगवान ने परम गति प्रदान की। श्लोक १४ में अजामिल जैसे पापी के उद्धार और श्लोक १५ में सुदामा (कुचैल) की दरिद्रता दूर करने का प्रसंग यह सिद्ध करता है कि नारायण की करुणा जाति, कुल, धन या पूर्व कर्मों से बंधी नहीं है।

श्लोक १७ में भगवान के 'श्रीरङ्ग' स्वरूप का वर्णन है, जहाँ वे शेषनाग की शय्या पर शयन करते हुए संपूर्ण विश्व का संचालन कर रहे हैं। यह स्तोत्र हमें यह शिक्षा देता है कि शरणागति का अर्थ निष्क्रियता नहीं, बल्कि ईश्वर पर पूर्ण विश्वास रखकर अपने कर्म करना है। यह पाठ साधक के भीतर छिपे हुए 'डर' को जड़ से उखाड़ फेंकता है।

पाठ से प्राप्त होने वाले दिव्य लाभ (Benefits)

आदि शंकराचार्य के वचनों और वैष्णव परंपरा के अनुसार, इस स्तोत्र के नित्य पाठ से निम्नलिखित फल प्राप्त होते हैं:

  • घोर संकटों से रक्षा (Emergency Protection): जैसा कि नाम से स्पष्ट है, यह 'आर्त' (पीड़ितों) का तारणहार है। अचानक आने वाली विपत्तियों में यह कवच की तरह कार्य करता है।
  • मानसिक भय और चिन्ता का नाश: प्रह्लाद और विभीषण जैसे अनन्य भक्तों के उदाहरण मन में अदम्य साहस और आत्मविश्वास जाग्रत करते हैं।
  • पाप क्षय और अंतःकरण शुद्धि: श्लोक ५ के अनुसार, भगवान के चरणारविंदों का ध्यान समस्त पापों के समूह (पापौघ) को नष्ट कर देता है।
  • शत्रु और विवादों पर विजय: विभीषण और पांडवों की रक्षा के प्रसंगों का गान करने से साधक को शत्रुओं के षड्यंत्रों से सुरक्षा और विजय मिलती है।
  • मोक्ष और वैकुंठ प्राप्ति: श्लोक १८ के अनुसार, यह स्तोत्र 'अगणित श्रेयः पद' (परम पद) की प्राप्ति कराता है, जिससे पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति मिलती है।
  • असाध्य रोगों में शांति: भगवान को 'अशेष-दुःख-भेषज' माना गया है। श्रद्धापूर्वक पाठ करने से शारीरिक और मानसिक कष्टों में राहत मिलती है।

पाठ विधि एवं विशेष साधना नियम (Ritual Method)

श्री आर्तत्राणपरायण नारायण स्तोत्रम् का पाठ पूर्ण विश्वास और आकुलता के साथ करना चाहिए। इसकी सिद्ध विधि यहाँ दी गई है:

  • शुभ समय (Time): प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) पाठ के लिए सर्वोत्तम है। यदि किसी विशेष संकट में हों, तो संध्या आरती के समय या रात्रि में भी इसका पाठ किया जा सकता है।
  • शुद्धि और वस्त्र: स्नान के पश्चात शुद्ध श्वेत या पीले वस्त्र धारण करें। भगवान विष्णु को पीला रंग अत्यंत प्रिय है।
  • आसन: ऊनी या कुशा के आसन पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  • पूजन सामग्री: भगवान विष्णु या उनके किसी भी अवतार (राम, कृष्ण, नृसिंह) के चित्र के सम्मुख शुद्ध घी का दीपक जलाएं। भगवान को तुलसी दल अवश्य अर्पित करें।
  • एकाग्रता: पाठ करते समय प्रत्येक श्लोक में वर्णित लीलाओं (जैसे गजेन्द्र या द्रौपदी रक्षा) का मानसिक चित्रण करें और स्वयं को भगवान की शरण में अनुभव करें।
  • संकल्प: किसी विशेष कामना या बाधा निवारण हेतु ४१ दिनों तक नित्य ११ बार पाठ करने का संकल्प लें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. श्री आर्तत्राणपरायण नारायण स्तोत्रम् के रचयिता कौन हैं?

इस महान स्तोत्र की रचना जगद्गुरु आदि शंकराचार्य ने की थी। उन्होंने भगवान विष्णु के करुणा-अवतारों की महिमा का इसमें सार पिरोया है।

2. 'आर्तत्राणपरायण' का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है — "वह जो पीड़ितों और दुखियों की रक्षा करने में सदैव तत्पर (Dedicated) रहते हैं।" यह भगवान विष्णु का एक विशेषण है।

3. क्या इस पाठ को प्रतिदिन करना अनिवार्य है?

अनिवार्य नहीं है, लेकिन आध्यात्मिक शांति और सुरक्षा के लिए इसे नित्य दिनचर्या का हिस्सा बनाना अत्यंत श्रेष्ठ माना जाता है।

4. इस स्तोत्र में द्रौपदी का उल्लेख किस श्लोक में है?

श्लोक ४ में द्रौपदी की पुकार और उनकी रक्षा का वर्णन है। यह भगवान की भक्त-वत्सलता का सर्वोच्च उदाहरण है।

5. क्या यह स्तोत्र कानूनी विवादों (Court Cases) में सहायक है?

हाँ, चूँकि इसमें विभीषण और गजेन्द्र जैसी 'न्याय' और 'रक्षा' की कथाएँ हैं, यह पाठ सत्य की विजय और शत्रुओं के दमन के लिए बहुत प्रभावी माना जाता है।

6. क्या स्त्रियाँ इस स्तोत्र का पाठ कर सकती हैं?

बिल्कुल, भगवान की भक्ति में कोई भेद नहीं है। द्रौपदी और अहल्या जैसे नारी पात्रों का उद्धार इस स्तोत्र का मुख्य आकर्षण है।

7. क्या बिना संस्कृत जाने भी इसका लाभ मिलता है?

हाँ, भगवान केवल भक्त के शुद्ध 'भाव' को ग्रहण करते हैं। यदि आप इसका हिंदी अर्थ समझकर श्रद्धा से श्रवण या पाठ करते हैं, तो भी फल प्राप्त होता है।

8. 'गजेन्द्र मोक्ष' का इस स्तोत्र में क्या संदर्भ है?

श्लोक ३ में गजेन्द्र के उद्धार का वर्णन है, जहाँ भगवान ने अपने सुदर्शन चक्र से मगरमच्छ का वध कर गजेन्द्र के प्राण बचाए थे।

9. पाठ के लिए सबसे उत्तम दिन कौन सा है?

भगवान विष्णु की स्तुति होने के कारण गुरुवार, एकादशी और पूर्णिमा की तिथियां विशेष फलदायी मानी जाती हैं।

10. इस स्तोत्र का मुख्य संदेश क्या है?

इसका मुख्य संदेश 'अनन्य शरणागति' है। यह सिखाता है कि जब मनुष्य अपने अहंकार को त्यागकर प्रभु को पुकारता है, तो भगवान स्वयं उसकी रक्षा के लिए दौड़े आते हैं।