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Sri Vishnu Sahasranama Stotram Poorvapeetika – श्री विष्णुसहस्रनाम स्तोत्रम् – पूर्वपीठिका

Sri Vishnu Sahasranama Stotram Poorvapeetika – श्री विष्णुसहस्रनाम स्तोत्रम् – पूर्वपीठिका
॥ श्री विष्णुसहस्रनाम स्तोत्रम् – पूर्वपीठिका ॥ शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥ १ ॥ यस्य द्विरदवक्त्राद्याः पारिषद्याः परः शतम् । विघ्नं निघ्नन्ति सततं विष्वक्सेनं तमाश्रये ॥ २ ॥ व्यासं वसिष्ठनप्तारं शक्तेः पौत्रमकल्मषम् । पराशरात्मजं वन्दे शुकतातं तपोनिधिम् ॥ ३ ॥ व्यासाय विष्णुरूपाय व्यासरूपाय विष्णवे । नमो वै ब्रह्मनिधये वासिष्ठाय नमो नमः ॥ ४ ॥ अविकाराय शुद्धाय नित्याय परमात्मने । सदैकरूपरूपाय विष्णवे सर्वजिष्णवे ॥ ५ ॥ यस्य स्मरणमात्रेण जन्मसंसारबन्धनात् । विमुच्यते नमस्तस्मै विष्णवे प्रभविष्णवे ॥ ६ ॥ ओं नमो विष्णवे प्रभविष्णवे । श्रीवैशम्पायन उवाच – श्रुत्वा धर्मानशेषेण पावनानि च सर्वशः । युधिष्ठिरः शान्तनवं पुनरेवाभ्यभाषत ॥ ७ ॥ युधिष्ठिर उवाच – किमेकं दैवतं लोके किं वाप्येकं परायणम् । स्तुवन्तः कं कमर्चन्तः प्राप्नुयुर्मानवाः शुभम् ॥ ८ ॥ को धर्मः सर्वधर्माणां भवतः परमो मतः । किं जपन्मुच्यते जन्तुर्जन्मसंसारबन्धनात् ॥ ९ ॥ श्री भीष्म उवाच – जगत्प्रभुं देवदेवमनन्तं पुरुषोत्तमम् । स्तुवन्नामसहस्रेण पुरुषः सततोत्थितः ॥ १० ॥ तमेव चार्चयन्नित्यं भक्त्या पुरुषमव्ययम् । ध्यायन्स्तुवन्नमस्यंश्च यजमानस्तमेव च ॥ ११ ॥ अनादिनिधनं विष्णुं सर्वलोकमहेश्वरम् । लोकाध्यक्षं स्तुवन्नित्यं सर्वदुःखातिगो भवेत् ॥ १२ ॥ ब्रह्मण्यं सर्वधर्मज्ञं लोकानां कीर्तिवर्धनम् । लोकनाथं महद्भूतं सर्वभूतभवोद्भवम् ॥ १३ ॥ एष मे सर्वधर्माणां धर्मोऽधिकतमो मतः । यद्भक्त्या पुण्डरीकाक्षं स्तवैरर्चेन्नरः सदा ॥ १४ ॥ परमं यो महत्तेजः परमं यो महत्तपः । परमं यो महद्ब्रह्म परमं यः परायणम् ॥ १५ ॥ पवित्राणां पवित्रं यो मङ्गलानां च मङ्गलम् । दैवतं दैवतानां च भूतानां योऽव्ययः पिता ॥ १६ ॥ यतः सर्वाणि भूतानि भवन्त्यादियुगागमे । यस्मिंश्च प्रलयं यान्ति पुनरेव युगक्षये ॥ १७ ॥ तस्य लोकप्रधानस्य जगन्नाथस्य भूपते । विष्णोर्नामसहस्रं मे शृणु पापभयापहम् ॥ १८ ॥ यानि नामानि गौणानि विख्यातानि महात्मनः । ऋषिभिः परिगीतानि तानि वक्ष्यामि भूतये ॥ १९ ॥ ॥ विनियोगः ॥ ऋषिर्नाम्नां सहस्रस्य वेदव्यासो महामुनिः । छन्दोऽनुष्टुप् तथा देवो भगवान्देवकीसुतः ॥ २० ॥ अमृतांशूद्भवो बीजं शक्तिर्देवकिनन्दनः । त्रिसामा हृदयं तस्य शान्त्यर्थे विनियोज्यते ॥ २१ ॥ विष्णुं जिष्णुं महाविष्णुं प्रभविष्णुं महेश्वरम् । अनेकरूप दैत्यान्तं नमामि पुरुषोत्तमम् ॥ २२ ॥ ॥ इति श्री विष्णुसहस्रनाम स्तोत्रम् – पूर्वपीठिका सम्पूर्णम् ॥

श्री विष्णुसहस्रनाम पूर्वपीठिका: एक दार्शनिक परिचय (Introduction)

श्री विष्णुसहस्रनाम स्तोत्रम् (Sri Vishnu Sahasranama Stotram) की पूर्वपीठिका सनातन धर्म के सबसे गहन और प्रभावशाली आध्यात्मिक संवादों में से एक है। यह पावन स्तोत्र महर्षि वेदव्यास रचित कालजयी महाकाव्य 'महाभारत' के 'अनुशासन पर्व' के १४९वें अध्याय का हिस्सा है। इसकी ऐतिहासिकता और महत्ता इस तथ्य में निहित है कि यह उपदेश कुरुक्षेत्र युद्ध के उपरांत, शरशय्या पर लेटे हुए भीष्म पितामह ने धर्मराज युधिष्ठिर को दिया था। पूर्वपीठिका वास्तव में इस सहस्रनाम रूपी महायज्ञ की आधारशिला है, जहाँ धर्म, ईश्वर और मोक्ष की जिज्ञासाओं को अत्यंत स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है।

महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था, परंतु युधिष्ठिर का मन अशांत था। वे धर्म की सूक्ष्मताओं और संसार के दुखों से मुक्ति का मार्ग जानना चाहते थे। भगवान श्रीकृष्ण के निर्देश पर युधिष्ठिर भीष्म पितामह के पास पहुँचे। पूर्वपीठिका में युधिष्ठिर द्वारा पूछे गए ६ मौलिक प्रश्न न केवल उस समय के लिए, बल्कि आज के आधुनिक युग के मनुष्यों के लिए भी उतने ही प्रासंगिक हैं। ये प्रश्न ईश्वर के वास्तविक स्वरूप और 'परम धर्म' की खोज के बारे में हैं। भीष्म पितामह, जो स्वयं धर्म के साक्षात् विग्रह थे, उन्होंने इन प्रश्नों के उत्तर में भगवान विष्णु के १००० दिव्य नामों के गान को 'सर्वोच्च धर्म' घोषित किया।

आध्यात्मिक दृष्टिकोण से, पूर्वपीठिका साधक को मानसिक रूप से उस विराट पुरुष के साक्षात्कार के लिए तैयार करती है। इसमें भगवान विष्णु को 'पवित्राणां पवित्रं' (पवित्रों में भी पवित्र) और 'मङ्गलानां च मङ्गलम्' (मंगलों का भी मंगल) कहा गया है। यह स्तोत्र हमें यह बोध कराता है कि परमात्मा ही सृष्टि का आदि कारण है और अंततः सब कुछ उन्हीं में विलीन होना है। जो साधक इस पूर्वपीठिका का श्रद्धापूर्वक पाठ करता है, उसका अंतःकरण शुद्ध होता है और वह भगवान विष्णु की असीम कृपा प्राप्त करने का पात्र बन जाता है।

विशिष्ट महत्व: युधिष्ठिर के ६ प्रश्न और भीष्म का समाधान (Significance)

विष्णु सहस्रनाम की पूर्वपीठिका का महत्व मुख्य रूप से उन ६ प्रश्नों में निहित है, जो जीवन के सार को प्रकट करते हैं। युधिष्ठिर भीष्म पितामह से पूछते हैं:

  • किमेकं दैवतं लोके? — इस जगत में एकमात्र परम देवता कौन है?
  • किं वाप्येकं परायणम्? — एकमात्र सर्वश्रेष्ठ आश्रय (परम गति) क्या है?
  • स्तुवन्तः कं? — किसकी स्तुति करने से कल्याण होता है?
  • कमर्चन्तः? — किसकी पूजा करने से मानव को शुभ फल मिलते हैं?
  • को धर्मः सर्वधर्माणां भवतः परमो मतः? — आपके मत में सभी धर्मों में श्रेष्ठ धर्म कौन सा है?
  • किं जपन्मुच्यते जन्तुर्जन्मसंसारबन्धनात्? — किसके नाम का जप करने से जीव जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाता है?

भीष्म पितामह इन सभी का एक ही उत्तर देते हैं— "जगत्प्रभुं देवदेवमनन्तं पुरुषोत्तमम्"। वे स्पष्ट करते हैं कि अनादि और अनंत भगवान विष्णु की स्तुति और उनके नामों का गान ही सबसे बड़ा यज्ञ और सबसे ऊँचा धर्म है। यह पूर्वपीठिका हमें यह सिखाती है कि केवल पूजा और दान ही धर्म नहीं है, बल्कि निरंतर ईश्वर का स्मरण और उनके गुणों का कीर्तन ही आत्मा की वास्तविक उन्नति का मार्ग है। आदि शंकराचार्य जी ने इस स्तोत्र पर अपना पहला भाष्य लिखा था, जो इसकी दार्शनिक प्रगाढ़ता को सिद्ध करता है।

पूर्वपीठिका पाठ के अमोघ लाभ: फलश्रुति (Benefits)

महाभारत और पूर्वपीठिका के श्लोकों के अनुसार, इस पाठ के प्रारंभ से ही साधक को निम्नलिखित लाभ प्राप्त होने लगते हैं:

  • समस्त विघ्नों का नाश: "सर्वविघ्नोपशान्तये" — प्रथम श्लोक में भगवान विष्णु के ध्यान से समस्त बाधाओं और विघ्नों के शांत होने का वचन दिया गया है।
  • भवसागर से मुक्ति: 'किं जपन्मुच्यते जन्तुः' — इस प्रश्न के उत्तर में भीष्म जी बताते हैं कि प्रभु के १००० नामों के जप से जीव जन्म-मृत्यु के दुष्चक्र (Samsara) से मुक्त हो जाता है।
  • मानसिक शुद्धि और एकाग्रता: यह पाठ चित्त को शांत करता है और साधक के भीतर सात्विक ऊर्जा का संचार करता है, जिससे निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है।
  • पाप मुक्ति: 'पापभयापहम्' — भगवान विष्णु के नामों का कीर्तन करोड़ों जन्मों के संचित पापों को भस्म करने की सामर्थ्य रखता है।
  • सर्वोत्तम धर्म की प्राप्ति: इसे 'अधिकतमो मतः' (श्रेष्ठतम धर्म) कहा गया है, जो साधक को भौतिक समृद्धि के साथ-साथ आध्यात्मिक वैभव प्रदान करता है।

पाठ विधि एवं ध्यान विधान (Ritual Method & Dhyanam)

विष्णु सहस्रनाम की पूर्वपीठिका का पाठ अत्यंत पवित्र माना जाता है। पूर्ण लाभ हेतु निम्नलिखित विधि का पालन करें:

१. श्रेष्ठ समय एवं शुद्धि:

पाठ के लिए ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः ४ से ६ बजे) सर्वोत्तम है। 'भक्तिमान् यः सदोत्थाय शुचिः' — अर्थात् प्रातः काल उठकर, स्नान कर, पवित्र होकर ही पाठ करना चाहिए। गुरुवार और एकादशी तिथि इसके लिए विशेष शुभ मानी जाती है।

२. आसन एवं दिशा:

पूजा स्थान पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। कुशा का आसन या पीले ऊनी आसन का प्रयोग करें। भगवान विष्णु को पीला रंग प्रिय है, अतः संभव हो तो पीले वस्त्र धारण करें।

३. विनियोग एवं ध्यान:

पाठ आरंभ करने से पूर्व 'विनियोग' का जल भूमि पर छोड़ें। 'शुक्लाम्बरधरं विष्णुं...' मन्त्र का उच्चारण करते हुए भगवान के चतुर्भुज स्वरूप का हृदय में ध्यान करें। प्रभु के मुख मंडल पर मंद मुस्कान और हाथों में शङ्ख, चक्र, गदा, पद्म का चित्रण करें।

४. मानसिक स्थिति:

पाठ करते समय युधिष्ठिर की जिज्ञासा और भीष्म के ज्ञान का अनुभव करें। यह 'भाव' पाठ की ऊर्जा को कई गुना बढ़ा देता है। पाठ के अंत में 'नारायणाय' समर्पण अवश्य करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. विष्णु सहस्रनाम पूर्वपीठिका क्या है?

यह विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र का प्रारंभिक भाग है, जिसमें महाभारत के प्रसंग, युधिष्ठिर के प्रश्न और भीष्म पितामह का उपदेशात्मक प्रारंभ समाहित है।

2. युधिष्ठिर ने भीष्म पितामह से कितने प्रश्न पूछे थे?

युधिष्ठिर ने कुल ६ मौलिक प्रश्न पूछे थे, जो परम देवता, परम आश्रय, सर्वोत्तम धर्म और मोक्ष के मार्ग के बारे में थे।

3. क्या पूर्वपीठिका का पाठ अकेले किया जा सकता है?

हाँ, यदि समय की कमी हो तो पूर्वपीठिका और मुख्य १००० नामों का पाठ किया जा सकता है। परंतु पूर्ण फल हेतु पूर्वपीठिका, स्तोत्र और उत्तरपीठिका का संयुक्त पाठ सर्वोत्तम है।

4. 'शुक्लाम्बरधरं विष्णुं' मन्त्र का क्या महत्व है?

यह इस स्तोत्र का प्रथम वंदना मंत्र है। इसमें भगवान विष्णु को सफेद वस्त्रधारी और प्रसन्न मुख वाला बताया गया है, जिनका ध्यान समस्त विघ्नों को शांत करने वाला है।

5. क्या महिलाएं विष्णु सहस्रनाम का पाठ कर सकती हैं?

निश्चित रूप से। भगवान विष्णु की भक्ति में कोई भेद नहीं है। महिलाएं पूर्ण शुद्धि और श्रद्धा के साथ अपने परिवार के कल्याण हेतु इसका पाठ कर सकती हैं।

6. भीष्म पितामह ने 'सर्वश्रेष्ठ धर्म' किसे माना है?

भीष्म जी के अनुसार, भक्तिपूर्वक भगवान पुण्डरीकाक्ष (विष्णु) की स्तुति और उनके सहस्र नामों का निरंतर गान ही सभी धर्मों में श्रेष्ठ धर्म है।

7. पाठ के लिए कौन सी माला सर्वोत्तम है?

भगवान विष्णु की साधना के लिए तुलसी की माला सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। मंत्र जप हेतु इसका प्रयोग करें।

8. 'अमृतांशूद्भवो' शब्द का विनियोग में क्या अर्थ है?

यह स्तोत्र का 'बीज' है। इसका अर्थ है वह जो अमृतमयी किरणों (चंद्रमा) से उत्पन्न है या स्वयं अमृत का स्रोत है।

9. क्या इस पाठ से अकाल मृत्यु का भय दूर होता है?

जी हाँ, 'पापभयापहम्' होने के कारण यह अकाल मृत्यु और यम के भय से साधक को अभय दान प्रदान करता है।

10. पाठ का फल कितने दिनों में प्राप्त होता है?

यह साधक की निष्ठा पर निर्भर है। २१ या ४१ दिनों तक निरंतर पाठ करने से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और भगवान की कृपा का प्रत्यक्ष अनुभव होने लगता है।