निर्जला एकादशी व्रत कथा
ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की एकादशी - 24 एकादशियों का फल
निर्जला एकादशी का महत्व
ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष में आने वाली इस एकादशी को निर्जला एकादशी कहा जाता है। इसे भीमसेनी एकादशी या पांडव एकादशी भी कहते हैं। इस एकादशी के आराध्य देव भगवान विष्णु हैं।
इस व्रत की विशेषता:
- केवल एक व्रत = 24 एकादशियों का फल - वर्षभर की सभी एकादशियों का पुण्य
- निर्जला (बिना जल का) - अत्यंत कठिन परंतु अत्यंत फलदायी
- केवल आचमन की अनुमति (6 माशे जल)
- करोड़ पल स्वर्ण दान के समान फल
- समस्त तीर्थों और दान के बराबर पुण्य
- विष्णुलोक की प्राप्ति - पुष्पक विमान पर
- ब्रह्महत्या, मद्यपान, चोरी आदि घोर पापों से मुक्ति
विशेष: भगवान विष्णु ने स्वयं व्यास जी से कहा था कि यह एकादशी का पुण्य समस्त तीर्थों और दान के बराबर है।
[!IMPORTANT] यह सबसे कठिन परंतु सबसे श्रेष्ठ एकादशी है। जो व्यक्ति 24 एकादशियाँ नहीं कर सकते, वे केवल इस एक निर्जला एकादशी का व्रत करके सभी एकादशियों का फल प्राप्त कर सकते हैं। मृत्यु के समय भयानक यमदूत नहीं आते, बल्कि विष्णु दूत स्वर्ग ले जाते हैं।
एकादशी व्रत विधि
पूजा सामग्री
- फूल और माला - तुलसी दल, सफेद और पीले फूल
- धूप-दीप - अगरबत्ती, घी का दीपक
- नैवेद्य - फल, मधु, मिष्ठान
- चंदन - लाल चंदन, केसर
- कलश - जल से भरा कलश (दान के लिए)
- तुलसी पत्र - पवित्र तुलसी के पत्ते
- पंचामृत - दूध, दही, घी, शहद, शक्कर
- अक्षत - चावल के दाने
- वस्त्र - भगवान और कलश को ढकने के लिए
- स्वर्ण - कलश दान के साथ
- गौ - गौ दान के लिए (यदि संभव हो)
- दक्षिणा - ब्राह्मणों के लिए
निर्जला व्रत की विशेष विधि
दशमी तिथि पर (एक दिन पहले):
- सात्त्विक भोजन करें
- मांस, प्याज, लहसुन से परहेज करें
- संकल्प लें - "मैं भगवान केशव की प्रसन्नता के लिए एकादशी को निराहार रहकर आचमन के सिवा दूसरे जल का भी त्याग करूंगा"
एकादशी के दिन - निर्जला व्रत:
- प्रातःकाल स्नान करें
- स्वच्छ वस्त्र धारण करें
- पूर्ण निर्जला - सूर्योदय से अगले दिन सूर्योदय तक
- आचमन की अनुमति - केवल 6 माशे जल (लगभग 12 ग्राम)
- स्नान में जल मुख में जाना - कोई दोष नहीं
- 6 माशे से अधिक जल = मद्यपान के समान पाप
- भगवान विष्णु की भक्तिपूर्वक पूजा करें
- 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जाप करें
- विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें
- पूर्ण उपवास - कोई भोजन या जल नहीं
निर्जला व्रत के लिए विशेष प्रार्थना:
दशमी की शाम या एकादशी की प्रातः इस प्रार्थना के साथ संकल्प लें:
"हे भगवान! आज मैं निर्जल व्रत करता/करती हूं। कल भोजन करूंगा/करूंगी। मैं इस व्रत को श्रद्धापूर्वक करूंगा/करूंगी। मेरे सब पाप नष्ट हो जाएं। मैं भगवान केशव की प्रसन्नता के लिए एकादशी को निराहार रहकर आचमन के सिवा दूसरे जल का भी त्याग करूंगा/करूंगी।"
रात्रि जागरण:
- रात्रि में जागरण करना अत्यंत फलदायी है
- भगवान विष्णु का भजन-कीर्तन करें
- हरि नाम का जाप करें
- व्रत कथा का श्रवण-पठन करें
द्वादशी पारण (अत्यंत महत्वपूर्ण):
- सूर्योदय से पहले उठें
- स्नान करें
- भगवान विष्णु की पूजा करें
- जल से भरा कलश दान - वस्त्र और स्वर्ण सहित सुपात्र ब्राह्मण को
- जल के घड़े का दान संकल्प मंत्र:
"संसार सागर से तारने वाले हे देव ह्रषीकेश! इस जल के घड़े का दान करने से आप मुझे परम गति की प्राप्ति कराइए।"
- ब्राह्मणों को भोजन कराएं - दक्षिणा और मिष्टान्न दें
- तत्पश्चात स्वयं भोजन करें
- त्रयोदशी से पूर्व पारण करें
निर्जला एकादशी पर विशेष दान:
- गौ दान - अत्यंत शुभ
- अन्न, वस्त्र दान
- छत्र (Umbrella) दान
- उपानह (जूता) दान - स्वर्ग में पुष्पक विमान की प्राप्ति
- जल का घड़ा (स्वर्ण सहित)
निर्जला एकादशी माहात्म्य कथा
ज्येष्ठ शुक्लपक्ष
श्री निर्जला एकादशी की संपूर्ण कथा
अट्ठासी हजार ऋषि-मुनि बड़ी तन्मयता से एकादशियों की पापनाशक व रोचक कथाएं सुनकर आनन्द विभोर हो रहे थे। अब सबने ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी की कथा सुनने की इच्छा व्यक्त की। तब सूत जी ने कहा -
भीमसेन की समस्या:
एक बार श्रीभीमसेन व्यास जी से बोले - "हे पितामह! भ्राता युधिष्ठिर, माता कुन्ती, द्रौपदी, अर्जुन, नकुल और सहदेव आदि एकादशी के दिन व्रत करते हैं और मुझे भी एकादशी के दिन अन्न खाने को मना करते हैं। मैं उनसे कहता हूं कि भाई, मैं भक्तिपूर्वक भगवान् की पूजा कर सकता हूं और दान दे सकता हूं, परन्तु मैं भूखा नहीं रह सकता।"
इस पर व्यासजी बोले – "हे भीमसेन! वे सही कहते हैं। शास्त्रों में वर्णन है कि एकादशी को अन्न नहीं खाना चाहिए। यदि तुम नरक को बुरा और स्वर्ग को अच्छा समझते हो, तो प्रत्येक मास की दोनों एकादशियों को अन्न न खाया करो।"
भीमसेन का निवेदन:
इस पर भीमसेन बोले! "हे पितामह, आपसे प्रथम कह चुका हूं कि मैं एक दिन एक समय भी भोजन किये बिना नहीं रह सकता फिर मेरे लिए पूरे दिन का उपवास करना तो बहुत ही कठिन है। मेरे पेट में अग्नि का वास है, जो अधिक अन्न खाने पर शान्त होती है। यदि मैं प्रयत्न करूं तो वर्ष में एक एकादशी का व्रत अवश्य कर सकता हूं। अतः आप मुझे कोई एक ऐसा व्रत बतलाइए, जिसके करने से मुझे स्वर्ग की प्राप्ति हो सके।"
व्यास जी का उत्तर:
श्री व्यासजी बोले – "हे वायुपुत्र! बड़े-बड़े ऋषि और महर्षियों ने बहुत से शास्त्र आदि बनाये हैं। यदि कलियुग में मनुष्य उन पर आचरण करे तो अवश्य ही मुक्ति को प्राप्त होता है। उनमें धन बहुत कम खर्च होता है। उनमें से जो पुराणों का सार है, वह यह है कि मनुष्य को दोनों पक्षों की एकादशियों का व्रत करना चाहिए। इससे उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति होती है।"
निर्जला एकादशी का उपदेश:
श्रीव्यासजी बोले – "हे भीमसेन! वृषभ और मिथुन संक्रांति के मध्य में ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी होती है, उसका निर्जल व्रत करना चाहिए। इस एकादशी के व्रत में स्नान और आचमन करते समय यदि मुख में जल चला जाए तो इसका कोई दोष नहीं है, लेकिन आचमन में ६ माशे जल से अधिक जल नहीं लेना चाहिए। इस आचमन से शरीर की शुद्धि हो जाती है। आचमन में ६ माशे से अधिक जल मद्यपान के समान है। इस दिन भोजन नहीं करना चाहिए। भोजन करने से व्रत नष्ट हो जाता है।
निर्जला व्रत का फल:
यदि सूर्योदय से सूर्यास्त तक मनुष्य जलपान न करे तो उससे बारह एकादशी के फल की प्राप्ति होती है। द्वादशी के दिन सूर्योदय से पहले ही उठना चाहिए। इसके पश्चात् भूखे ब्राह्मण को भोजन कराना चाहिए। तत्पश्चात् स्वयं भोजन करना चाहिए।
हे भीमसेन! स्वयं भगवान् ने मुझसे कहा था कि इस एकादशी का पुण्य समस्त तीर्थों और दान के बराबर है। एक दिन निर्जला रहने से मनुष्य पापों से मुक्त हो जाता है।
मृत्यु के समय विष्णु दूतों का आगमन:
जो मनुष्य निर्जला एकादशी का व्रत करते हैं, उनको मृत्यु के समय भयानक यमदूत नहीं दिखते बल्कि भगवान् विष्णु के दूत स्वर्ग से आकर उसको पुष्पक विमान पर बिठा स्वर्ग को ले जाते हैं। संसार में सबसे श्रेष्ठ निर्जला एकादशी का व्रत है।"
अतः यत्नपूर्वक इस एकादशी का निर्जल व्रत करना चाहिए। इस दिन 'ओ३म् नमो भगवते वासुदेवाय', इस मन्त्र का उच्चारण करना चाहिए। इस दिन गौदान करना चाहिए। इस एकादशी को भीमसेनी या पांडव एकादशी भी कहते हैं।
व्रत का संकल्प:
निर्जल व्रत करने से पहले भगवान् की पूजा करनी चाहिए और उनसे विनय करनी चाहिए कि हे भगवान्! आज मैं निर्जल व्रत करता हूं, इसके दूसरे दिन भोजन करूंगा। मैं इस व्रत को श्रद्धापूर्वक करूंगा। मेरे सब पाप नष्ट हो जायें। इस दिन जल से भरा हुआ घड़ा वस्त्र आदि से ढककर स्वर्ण सहित किसी सुपात्र को दान करना चाहिए।
निर्जला व्रत के अद्भुत फल:
जो मनुष्य इस व्रत के अन्तराल में स्नान, तप आदि करते हैं, उनको करोड़ पल स्वर्ण दान का फल मिलता है। जो मनुष्य इस दिन यज्ञ-होमादि करते हैं, उसका फल वर्णन भी नहीं हो सकता। इस निर्जला एकादशी के व्रत से मनुष्य विष्णुलोक को जाता है।
जो मनुष्य इस दिन अन्न खाते हैं, उनको चाण्डाल समझना चाहिए। वे अन्त में नरक में जाते हैं। ब्रह्म हत्यारे, मद्यपान करने वाले, चोरी करने वाले, गुरु से द्वेष करने वाले, असत्य बोलने वाले भी इस व्रत को करने से स्वर्ग को जाते हैं।
दान और कर्तव्य:
हे कुन्तीपुत्र! जो पुरुष या स्त्री इस व्रत को श्रद्धापूर्वक करते हैं, उनके निम्नलिखित कर्त्तव्य हैं, उन्हें सर्वप्रथम विष्णु भगवान की पूजा करनी चाहिए। तत्पश्चात् गौदान करना चाहिए। उस दिन ब्राह्मणों को दक्षिणा, मिष्टान्न आदि देना चाहिए। निर्जला के दिन अन्न, वस्त्र, छत्र, उपानह आदि का दान करना चाहिए। जो मनुष्य इस कथा को प्रेमपूर्वक सुनते व पढ़ते हैं। वे भी स्वर्ग के अधिकारी हो जाते हैं।
कथासार
भक्त को चाहिए कि वह अपनी कमजोरियों को अपने गुरुजनों या परिवार के बड़ों से न छिपाए, उन पर विश्वास रखते हुए अपनी समस्या उन्हें बताए ताकि वे उसका कोई उचित उपाय बताएं।
इस कथा की शिक्षा:
- ईमानदारी से अपनी कमजोरी स्वीकार करें - भीमसेन ने व्यास जी से अपनी असमर्थता बताई
- गुरु का मार्गदर्शन अमूल्य है - व्यास जी ने भीमसेन के लिए विशेष समाधान निकाला
- बताए गए उपाय पर श्रद्धा और विश्वास पूर्वक अमल करना चाहिए
- अपने पितामह व्यास जी की कृपा से भीमसेन भी एक एकादशी का व्रत करके सभी एकादशियों का फल प्राप्त करके स्वर्ग के भागी बने
- 6 माशे से अधिक जल = मद्यपान के समान - यह कितना कठोर नियम है
- केवल आचमन से शरीर शुद्धि होती है
- यह व्रत इतना शक्तिशाली है कि ब्रह्महत्यारे भी स्वर्ग जा सकते हैं
जय श्री हरि!
भगवान विष्णु आरती और चालीसा
(व्रत के अंत में आरती अवश्य करें)
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
निर्जला एकादशी कब आती है?
ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को निर्जला एकादशी आती है। यह मई-जून महीने में आती है।
निर्जला एकादशी में क्या नहीं खाना चाहिए?
निर्जला एकादशी में पूर्ण उपवास रखना चाहिए। न कोई अन्न, न जल। केवल 6 माशे आचमन की अनुमति है। सभी अन्न, चावल, दाल, फल वर्जित हैं।
निर्जला एकादशी पारणा का सही समय क्या है?
द्वादशी को सूर्योदय के बाद द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले पारणा करें। पारणा से पहले जल का कलश दान अवश्य करें।
निर्जला एकादशी में पानी पी सकते हैं क्या?
नहीं, निर्जला एकादशी में जल पीना वर्जित है। केवल 6 माशे (लगभग 12 ग्राम) आचमन की अनुमति है। 6 माशे से अधिक जल मद्यपान के समान पाप है।
निर्जला एकादशी व्रत के क्या लाभ हैं?
निर्जला एकादशी का व्रत करने से 24 एकादशियों का फल मिलता है। करोड़ों पल स्वर्ण दान का फल, विष्णुलोक की प्राप्ति, ब्रह्महत्या जैसे पापों से मुक्ति मिलती है।
निर्जला एकादशी को भीमसेनी एकादशी क्यों कहते हैं?
पांडव भीमसेन अधिक भोजन के कारण सभी एकादशियां नहीं कर पाते थे। व्यास जी ने उन्हें निर्जला एकादशी का व्रत बताया जिससे एक व्रत में सभी एकादशियों का फल मिलता है।
निर्जला एकादशी पर कौन से दान करने चाहिए?
जल का घड़ा (स्वर्ण सहित), गौ दान, अन्न, वस्त्र, छत्र और जूता दान करना अत्यंत शुभ है। जल का कलश दान अवश्य करें।
निर्जला व्रत में 6 माशे जल का क्या मतलब है?
6 माशे लगभग 12 ग्राम जल होता है जो केवल आचमन के लिए अनुमति है। इससे अधिक जल लेना मद्यपान के समान पाप है। आचमन से शरीर की शुद्धि हो जाती है।
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