Sri Dattatreya Ashtottara Shatanamavali 3 – श्री दत्तात्रेय अष्टोत्तरशतनामावली ३

॥ श्री दत्तात्रेय अष्टोत्तरशतनामावली ३ ॥
॥ नामावली ॥
ओं श्रीदत्ताय नमः ।
ओं देवदत्ताय नमः ।
ओं ब्रह्मदत्ताय नमः ।
ओं विष्णुदत्ताय नमः ।
ओं शिवदत्ताय नमः ।
ओं अत्रिदत्ताय नमः ।
ओं आत्रेयाय नमः ।
ओं अत्रिवरदाय नमः ।
ओं अनसूयने नमः । ९
ओं अनसूयासूनवे नमः ।
ओं अवधूताय नमः ।
ओं धर्माय नमः ।
ओं धर्मपरायणाय नमः ।
ओं धर्मपतये नमः ।
ओं सिद्धाय नमः ।
ओं सिद्धिदाय नमः ।
ओं सिद्धिपतये नमः ।
ओं सिद्धसेविताय नमः । १८
ओं गुरवे नमः ।
ओं गुरुगम्याय नमः ।
ओं गुरोर्गुरुतराय नमः ।
ओं गरिष्ठाय नमः ।
ओं वरिष्ठाय नमः ।
ओं महिष्ठाय नमः ।
ओं महात्मने नमः ।
ओं योगाय नमः ।
ओं योगगम्याय नमः । २७
ओं योगादेशकराय नमः ।
ओं योगपतये नमः ।
ओं योगीशाय नमः ।
ओं योगाधीशाय नमः ।
ओं योगपरायणाय नमः ।
ओं योगिध्येयाङ्घ्रिपङ्कजाय नमः ।
ओं दिगम्बराय नमः ।
ओं दिव्याम्बराय नमः ।
ओं पीताम्बराय नमः । ३६
ओं श्वेताम्बराय नमः ।
ओं चित्राम्बराय नमः ।
ओं बालाय नमः ।
ओं बालवीर्याय नमः ।
ओं कुमाराय नमः ।
ओं किशोराय नमः ।
ओं कन्दर्पमोहनाय नमः ।
ओं अर्धाङ्गालिङ्गिताङ्गनाय नमः ।
ओं सुरागाय नमः । ४५
ओं विरागाय नमः ।
ओं वीतरागाय नमः ।
ओं अमृतवर्षिणे नमः ।
ओं उग्राय नमः ।
ओं अनुग्र(ह)रूपाय नमः ।
ओं स्थविराय नमः ।
ओं स्थवीयसे नमः ।
ओं शान्ताय नमः ।
ओं अघोराय नमः । ५४
ओं गूढाय नमः ।
ओं ऊर्ध्वरेतसे नमः ।
ओं एकवक्त्राय नमः ।
ओं अनेकवक्त्राय नमः ।
ओं द्विनेत्राय नमः ।
ओं त्रिनेत्राय नमः ।
ओं द्विभुजाय नमः ।
ओं षड्भुजाय नमः ।
ओं अक्षमालिने नमः । ६३
ओं कमण्डलुधारिणे नमः ।
ओं शूलिने नमः ।
ओं डमरुधारिणे नमः ।
ओं शङ्खिने नमः ।
ओं गदिने नमः ।
ओं मुनये नमः ।
ओं मौनिने नमः ।
ओं विरूपाय नमः ।
ओं स्वरूपाय नमः । ७२
ओं सहस्रशिरसे नमः ।
ओं सहस्राक्षाय नमः ।
ओं सहस्रबाहवे नमः ।
ओं सहस्रायुधाय नमः ।
ओं सहस्रपादाय नमः ।
ओं सहस्रपद्मार्चिताय नमः ।
ओं पद्महस्ताय नमः ।
ओं पद्मपादाय नमः ।
ओं पद्मनाभाय नमः । ८१
ओं पद्ममालिने नमः ।
ओं पद्मगर्भारुणाक्षाय नमः ।
ओं पद्मकिञ्जल्कवर्चसे नमः ।
ओं ज्ञानिने नमः ।
ओं ज्ञानगम्याय नमः ।
ओं ज्ञानविज्ञानमूर्तये नमः ।
ओं ध्यानिने नमः ।
ओं ध्याननिष्ठाय नमः ।
ओं ध्यानस्थिमितमूर्तये नमः । ९०
ओं धूलिधूसरिताङ्गाय नमः ।
ओं चन्दनलिप्तमूर्तये नमः ।
ओं भस्मोद्धूलितदेहाय नमः ।
ओं दिव्यगन्धानुलेपिने नमः ।
ओं प्रसन्नाय नमः ।
ओं प्रमत्ताय नमः ।
ओं प्रकृष्टार्थप्रदाय नमः ।
ओं अष्टैश्वर्यप्रदाय नमः ।
ओं वरदाय नमः । ९९
ओं वरीयसे नमः ।
ओं ब्रह्मणे नमः ।
ओं ब्रह्मरूपाय नमः ।
ओं विष्णवे नमः ।
ओं विश्वरूपिणे नमः ।
ओं शङ्कराय नमः ।
ओं आत्मने नमः ।
ओं अन्तरात्मने नमः ।
ओं परमात्मने नमः । १०८
॥ इति श्री दत्तात्रेय अष्टोत्तरशतनामावली ३ सम्पूर्णा ॥
संलिखित ग्रंथ
परिचय: श्री दत्तात्रेय अष्टोत्तरशतनामावली ३ की दिव्य महिमा (Introduction)
श्री दत्तात्रेय अष्टोत्तरशतनामावली ३ सनातन धर्म के 'गुरु तत्व' का साक्षात शब्द विग्रह है। हिंदू धर्मग्रंथों में भगवान दत्तात्रेय को त्रिगुणात्मक अवतार माना गया है, जिनमें ब्रह्मा (सृजन), विष्णु (पालन) और महेश (लय) की संयुक्त शक्तियाँ समाहित हैं। 'अष्टोत्तरशतनाम' का अर्थ है १०८ नाम। हिंदू परंपरा में १०८ संख्या पूर्णता और ब्रह्मांडीय ऊर्जा का प्रतीक है। यह नामावली केवल प्रभु के नामों की सूची नहीं है, बल्कि प्रत्येक नाम एक विशेष गुण, आध्यात्मिक शक्ति और चेतना की स्थिति को जाग्रत करने वाला महामंत्र है।
भगवान दत्तात्रेय को 'आदि गुरु' और 'योगेश्वर' के रूप में पूजा जाता है। उन्होंने २४ गुरुओं से शिक्षा प्राप्त कर यह संदेश दिया कि सीखने की दृष्टि हो तो संपूर्ण ब्रह्मांड एक पाठशाला है। यह नामावली उनके विभिन्न स्वरूपों—जैसे 'अवधूत' (जो मोह-माया से परे है), 'दिगम्बर' (आकाश ही जिनका वस्त्र है) और 'त्रिमूर्ति' (त्रिदेव स्वरूप)—का गुणगान करती है। दत्तात्रेय सम्प्रदाय में इस नामावली का पाठ "गुरु महाराज" की साक्षात उपस्थिति का अनुभव करने का सबसे सुलभ मार्ग माना जाता है।
इस विशेष नामावली (संकेत संख्या ३) की विशेषता इसकी लयात्मकता और इसमें समाहित वेदान्तिक शब्दों का संगम है। 'श्रीदत्ताय' से प्रारंभ होकर 'परमात्मने' तक की यह यात्रा साधक को 'द्वैत' (संसार) से 'अद्वैत' (ब्रह्म) की ओर ले जाती है। जो साधक अपने जीवन में मानसिक अशांति, दिशाहीनता या पितृ दोष जैसी समस्याओं से घिरे हैं, उनके लिए इन नामों का स्मरण एक दिव्य सुरक्षा कवच की भांति कार्य करता है।
विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व: अद्वैत बोध और गुरु तत्व (Significance)
दत्तात्रेय अष्टोत्तरशतनामावली का आध्यात्मिक महत्व इसमें निहित 'स्मर्तृगामी' तत्व में है। भगवान दत्त को "स्मर्तृगामी" कहा जाता है, जिसका अर्थ है— मात्र याद करने से ही वे भक्त की रक्षा के लिए दौड़ पड़ते हैं। इस नामावली के १०८ नामों का उच्चारण साधक के आज्ञा चक्र को जाग्रत करता है। जब हम "ओं दिगम्बराय नमः" कहते हैं, तो हम स्वीकार करते हैं कि ईश्वर किसी भौतिक आवरण में नहीं, बल्कि संपूर्ण आकाश में व्याप्त है।
नामावली में 'सहस्रशिरसे' (नाम ७३) और 'सहस्राक्षाय' (नाम ७४) जैसे नाम उन्हें साक्षात 'विराट पुरुष' के रूप में स्थापित करते हैं। ये नाम दर्शाते हैं कि भगवान दत्तात्रेय केवल एक ऐतिहासिक पुरुष नहीं, बल्कि वह शाश्वत सत्ता हैं जो हर जीव के भीतर चैतन्य रूप में स्थित है। इसके अतिरिक्त, 'अत्रिवरद' और 'अनसूयासूनवे' जैसे नाम उनकी उस करुणा की याद दिलाते हैं, जिसके कारण वे महर्षि अत्रि और माता अनसूया के पुत्र के रूप में पृथ्वी पर अवतरित हुए। यह नामावली अद्वैत वेदांत के रहस्यों को भक्ति के सरल रस में डुबोकर प्रस्तुत करती है।
फलश्रुति: १०८ नामों के पाठ के दिव्य लाभ (Benefits)
दत्त सम्प्रदाय की प्राचीन मान्यताओं और गुरु-परंपरा के अनुसार, इस नामावली के नियमित पाठ से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
- मानसिक शांति और अज्ञान नाश: "ओं ज्ञानविज्ञानमूर्तये नमः" — यह पाठ अविद्या के परदे को हटाकर चित्त को शांत और बुद्धि को प्रखर बनाता है।
- पितृ दोष शांति: भगवान दत्तात्रेय पितरों के अधिपति हैं, अतः इन नामों के जाप से अतृप्त पूर्वजों को सद्गति मिलती है और परिवार पर उनकी कृपा बरसती है।
- सर्व भय निवारण: भगवान दत्त "भयत्राता" हैं। इस नामावली का पाठ अज्ञात भय, तनाव और नकारात्मक ऊर्जाओं को जड़ से मिटा देता है।
- गुरु कृपा की प्राप्ति: जो साधक मार्गभ्रष्ट हैं, उन्हें इस पाठ से शीघ्र ही एक सच्चे गुरु का मार्गदर्शन और सानिध्य प्राप्त होता है।
- आरोग्य और ऐश्वर्य: "ओं अष्टैश्वर्यप्रदाय नमः" — यह पाठ न केवल आत्मिक सुख देता है, बल्कि भौतिक अभावों को दूर कर जीवन में समृद्धि लाता है।
- पाप क्षय: भगवान के पवित्र नामों का उच्चारण संचित कर्मों के बोझ को कम करता है और अंतःकरण को निर्मल बनाता है।
सिद्ध पाठ विधि एवं विशेष साधना निर्देश (Ritual Method)
दत्तात्रेय साधना में सात्विकता और शुद्धता का सर्वोच्च स्थान है। १०८ नामों की इस नामावली का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित विधि अपनाना श्रेष्ठ है।
साधना के नियम
- शुभ समय: गुरुवार (Thursday) भगवान दत्तात्रेय का प्रिय दिन है। इसके अतिरिक्त मार्गशीर्ष पूर्णिमा (दत्त जयंती) और किसी भी पूर्णिमा पर पाठ करना अनंत फलदायी है।
- ब्रह्म मुहूर्त: प्रातः ४:०० से ६:०० के बीच पाठ करना सर्वोत्तम है। सायंकाल संध्या के समय भी पाठ किया जा सकता है।
- आसन और दिशा: कुशा या ऊनी आसन का प्रयोग करें। मुख उत्तर (North) या पूर्व (East) दिशा की ओर होना चाहिए।
- शुद्धि: स्नान के पश्चात स्वच्छ पीले या श्वेत वस्त्र धारण करें। भस्म (विभूति) का तिलक लगाना दत्त साधना में अनिवार्य माना जाता है।
- दीप और नैवेद्य: शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें। भगवान को गुड़, चने की दाल या दूध से बनी मिठाई का भोग लगाएं।
विशेष अनुष्ठान (Sadhana)
यदि आप किसी विशेष संकट के निवारण या पितृ दोष की शांति के लिए पाठ कर रहे हैं, तो संकल्प लेकर लगातार २१ गुरुवार तक इस नामावली का पाठ करें। पाठ के अंत में 'दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा' महामंत्र का १०८ बार जाप अवश्य करें। इससे मंत्र की शक्ति कई गुना बढ़ जाती है।
FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (10+ Questions)
1. श्री दत्तात्रेय अष्टोत्तरशतनामावली ३ का मुख्य उद्देश्य क्या है?
इसका मुख्य उद्देश्य भगवान दत्तात्रेय के दिव्य स्वरूप का स्मरण कर मानसिक शांति, गुरु कृपा की प्राप्ति और जीवन की बाधाओं का निवारण करना है।
2. भगवान दत्तात्रेय को 'त्रिमूर्ति' क्यों कहा जाता है?
क्योंकि उनमें ब्रह्मा (सृजन), विष्णु (पालन) और महेश (लय) तीनों की शक्तियाँ एकाकार हैं। वे स्वयं परमात्मा का एकीकृत स्वरूप हैं।
3. क्या इस नामावली के पाठ से पितृ दोष सच में दूर होता है?
जी हाँ। दत्त संप्रदाय में ऐसी प्रबल मान्यता है कि भगवान दत्तात्रेय पितरों के अधिपति हैं। १०८ नामों का नित्य पाठ पूर्वजों को शांति प्रदान करता है और परिवार पर उनकी कृपा लाता है।
4. 'अवधूत' शब्द का अर्थ क्या है?
अवधूत का अर्थ है वह जो संसार की धूल को 'धो' चुका है। जो सुख-दुख, मान-अपमान और देह-बोध से ऊपर उठकर परमानंद में स्थित है।
5. क्या स्त्रियाँ इस नामावली का पाठ कर सकती हैं?
अवश्य। भगवान दत्तात्रेय की भक्ति में कोई लिंग भेद नहीं है। माता अनसूया के पुत्र होने के कारण, प्रभु स्त्रियों पर विशेष वात्सल्य रखते हैं। शुद्ध चित्त से कोई भी श्रद्धालु इसका पाठ कर सकता है।
6. पाठ के लिए सबसे उत्तम माला कौन सी है?
दत्तात्रेय साधना के लिए रुद्राक्ष की माला सर्वोत्तम मानी गई है। यदि माला न हो, तो भी श्रद्धापूर्वक पाठ स्वीकार्य है।
7. 'स्मर्तृगामी' का क्या तात्पर्य है?
इसका अर्थ है— "स्मरण करते ही पहुँचने वाले"। यह भगवान दत्त की वह कृपा है जिसमें वे किसी कठिन योग के बिना मात्र याद करने से ही भक्त की सहायता करते हैं।
8. भगवान दत्त के साथ चार कुत्ते क्या दर्शाते हैं?
वे चार कुत्ते ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद के प्रतीक हैं, जो यह बताते हैं कि संपूर्ण ज्ञान प्रभु के चरणों में सुरक्षित है।
9. क्या इस पाठ से नौकरी या व्यापार में लाभ मिलता है?
जी हाँ, क्योंकि यह नामावली 'प्रकृष्टार्थप्रदाय' (श्रेष्ठ अर्थ देने वाली) है। गुरु की प्रसन्नता से जातक के बुद्धि दोष दूर होते हैं और निर्णय क्षमता बढ़ती है।
10. पाठ के दौरान किस खाद्य पदार्थ का दान करना शुभ है?
पाठ के पश्चात गाय को भोजन कराना या कुत्तों को रोटी देना अत्यंत शुभ माना जाता है, क्योंकि ये दत्तात्रेय भगवान के साथ सदैव उपस्थित रहते हैं।