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Sri Vasudeva Stotram (Mahabharatam) – श्री वासुदेव स्तोत्रम् (महाभारते)

Sri Vasudeva Stotram (Mahabharatam) – श्री वासुदेव स्तोत्रम् (महाभारते)
॥ श्री वासुदेव स्तोत्रम् (महाभारते) ॥ भीष्म उवाच । विश्वावसुर्विश्वमूर्तिर्विश्वेशो विष्वक्सेनो विश्वकर्मा वशी च । विश्वेश्वरो वासुदेवोऽसि तस्मा- -द्योगात्मानं दैवतं त्वामुपैमि ॥ १ ॥ जय विश्व महादेव जय लोकहितेरत । जय योगीश्वर विभो जय योगपरावर ॥ २ ॥ पद्मगर्भ विशालाक्ष जय लोकेश्वरेश्वर । भूतभव्यभवन्नाथ जय सौम्यात्मजात्मज ॥ ३ ॥ असङ्ख्येयगुणाधार जय सर्वपरायण । नारायण सुदुष्पार जय शार्ङ्गधनुर्धर ॥ ४ ॥ जय सर्वगुणोपेत विश्वमूर्ते निरामय । विश्वेश्वर महाबाहो जय लोकार्थतत्पर ॥ ५ ॥ महोरगवराहाद्य हरिकेश विभो जय । हरिवास दिशामीश विश्वावासामिताव्यय ॥ ६ ॥ व्यक्ताव्यक्तामितस्थान नियतेन्द्रिय सत्क्रिय । असङ्ख्येयात्मभावज्ञ जय गम्भीरकामद ॥ ७ ॥ अनन्तविदित ब्रह्मन् नित्यभूतविभावन । कृतकार्य कृतप्रज्ञ धर्मज्ञ विजयावह ॥ ८ ॥ गुह्यात्मन् सर्वयोगात्मन् स्फुट सम्भूत सम्भव । भूताद्य लोकतत्त्वेश जय भूतविभावन ॥ ९ ॥ आत्मयोने महाभाग कल्पसङ्क्षेपतत्पर । उद्भावनमनोभाव जय ब्रह्मजनप्रिय ॥ १० ॥ निसर्गसर्गनिरत कामेश परमेश्वर । अमृतोद्भव सद्भाव मुक्तात्मन् विजयप्रद ॥ ११ ॥ प्रजापतिपते देव पद्मनाभ महाबल । आत्मभूत महाभूत सत्वात्मन् जय सर्वदा ॥ १२ ॥ पादौ तव धरा देवी दिशो बाहु दिवं शिरः । मूर्तिस्तेऽहं सुराः कायश्चन्द्रादित्यौ च चक्षुषी ॥ १३ ॥ बलं तपश्च सत्यं च कर्म धर्मात्मजं तव । तेजोऽग्निः पवनः श्वास आपस्ते स्वेदसम्भवाः ॥ १४ ॥ अश्विनौ श्रवणौ नित्यं देवी जिह्वा सरस्वती । वेदाः संस्कारनिष्ठा हि त्वयीदं जगदाश्रितम् ॥ १५ ॥ न सङ्ख्या न परीमाणं न तेजो न पराक्रमम् । न बलं योगयोगीश जानीमस्ते न सम्भवम् ॥ १६ ॥ त्वद्भक्तिनिरता देव नियमैस्त्वां समाश्रिताः । अर्चयामः सदा विष्णो परमेशं महेश्वरम् ॥ १७ ॥ ऋषयो देवगन्धर्वा यक्षराक्षसपन्नगाः । पिशाचा मानुषाश्चैव मृगपक्षिसरीसृपाः ॥ १८ ॥ एवमादि मया सृष्टं पृथिव्यां त्वत्प्रसादजम् । पद्मनाभ विशालाक्ष कृष्ण दुःखप्रणाशन ॥ १९ ॥ त्वं गतिः सर्वभूतानां त्वं नेता त्वं जगद्गुरुः । त्वत्प्रसादेन देवेश सुखिनो विबुधाः सदा ॥ २० ॥ पृथिवी निर्भया देव त्वत्प्रसादात्सदाऽभवत् । तस्माद्भव विशालाक्ष यदुवंशविवर्धनः ॥ २१ ॥ धर्मसंस्थापनार्थाय दैत्यानां च वधाय च । जगतो धारणार्थाय विज्ञाप्यं कुरु मे प्रभो ॥ २२ ॥ यत्तत्परमकं गुह्यं त्वत्प्रसादादिदं विभो । वासुदेव तदेतत्ते मयोद्गीतं यथातथम् ॥ २३ ॥ सृष्ट्वा सङ्कर्षणं देवं स्वयमात्मानमात्मना । कृष्ण त्वमात्मनो साक्षी प्रद्युम्नं चात्मसम्भवम् ॥ २४ ॥ प्रद्युम्नादनिरुद्धं त्वं यं विदुर्विष्णुमव्ययम् । अनिरुद्धोऽसृजन्मां वै ब्रह्माणं लोकधारिणम् ॥ २५ ॥ वासुदेवमयः सोऽहं त्वयैवास्मि विनिर्मितः । विभज्य भागशोऽऽत्मानं व्रज मानुषतां विभो ॥ २६ ॥ तत्रासुरवधं कृत्वा सर्वलोकसुखाय वै । धर्मं प्राप्य यशः प्राप्य योगं प्राप्यस्य तत्त्वतः ॥ २७ ॥ त्वां हि ब्रह्मर्षयो लोके देवाश्चामितविक्रम । तैस्तैर्हि नामभिर्युक्ता गायन्ति परमात्मकम् ॥ २८ ॥ स्थिताश्च सर्वे त्वयि भूतसङ्घाः कृत्वाश्रयं त्वां वरदं सुबाहो । अनादिमध्यान्तमपारयोगं लोकस्य सेतुं प्रवदन्ति विप्राः ॥ २९ ॥ ॥ इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि पञ्चषष्टितमोऽध्याये वासुदेव स्तोत्रम् ॥

परिचय: श्री वासुदेव स्तोत्रम् और महाभारत का प्रसंग (Deep Introduction)

श्री वासुदेव स्तोत्रम् महाभारत के महाकाव्य का एक अत्यंत पवित्र अंश है, जो 'भीष्म पर्व' के ६५वें अध्याय में अंकित है। यह स्तोत्र पितामह भीष्म द्वारा भगवान श्री कृष्ण की उस समय की गई वंदना है जब वे युद्ध की विभीषिका के बीच ईश्वर के साक्षात् अवतार को पहचान रहे थे। "वासुदेव" नाम स्वयं में अत्यंत गरिमामयी है; इसका अर्थ है वह सत्ता जो प्रत्येक जीव के हृदय में वास करती है और जिसमें संपूर्ण ब्रह्मांड समाया हुआ है (वसन्ति अस्मिन् भूतानि इति वासुदेवः)।

इस स्तोत्र की ऐतिहासिक प्रासंगिकता अद्वितीय है। जब कुरुक्षेत्र के मैदान में धर्म और अधर्म का संघर्ष चरम पर था, तब पितामह भीष्म, जो स्वयं धर्म के महान ज्ञाता और अष्ट-वसुओं में से एक थे, उन्होंने भगवान कृष्ण को केवल एक राजा या सारथी नहीं माना। उन्होंने उन्हें 'विश्वेश' (विश्व के स्वामी) और 'विश्वमूर्ति' (जिसका शरीर ही संपूर्ण विश्व है) के रूप में पूजा। श्लोक १३ में वे बड़े ही सुंदर भाव से कहते हैं कि पृथ्वी आपके चरण हैं, दिशाएँ आपकी भुजाएँ हैं और आकाश आपका मस्तक है। यह "विराट स्वरूप" का वह काव्यात्मक वर्णन है जो श्रीमद्भगवद्गीता के ११वें अध्याय में अर्जुन द्वारा देखे गए रूप की याद दिलाता है।

भीष्म पितामह का यह स्तोत्र भगवान के 'चतुर्व्यूह' (Four-fold expansion) सिद्धांत को भी रेखांकित करता है। श्लोक २४ से २६ में बताया गया है कि कैसे वासुदेव से सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध का प्राकट्य हुआ और अंततः ब्रह्मा जी की उत्पत्ति हुई। यह वैष्णव दर्शन का वह गूढ़ रहस्य है जो सृष्टि के सृजन और स्थिति के विज्ञान को समझाता है। यह पाठ साधक को इस सत्य से परिचित कराता है कि जिस कृष्ण की शरण में वे हैं, वे ही आदि पुरुष नारायण हैं जिन्होंने देवताओं की रक्षा के लिए मानुष रूप (मानुषतां विभो) धारण किया है।

आधुनिक काल में, यह स्तोत्र उन भक्तों के लिए एक महान प्रकाश पुंज है जो अपने जीवन के संघर्षों (जैसे कुरुक्षेत्र का युद्ध) में फंसे हुए हैं और मार्ग की खोज कर रहे हैं। भीष्म पितामह की यह वाणी हमें सिखाती है कि चाहे परिस्थितियां कितनी भी विकट क्यों न हों, यदि ईश्वर के 'वासुदेव' स्वरूप की शरण ली जाए, तो हृदय को असीम शांति और बुद्धि को सही दिशा प्राप्त होती है।

विशिष्ट महत्व: भीष्म की शरणागति और दार्शनिक पक्ष (Significance)

१. विश्व के सेतु (The Bridge of the World): श्लोक २९ में भीष्म जी भगवान को "लोकस्य सेतुं" (संसार का पुल) कहते हैं। जिस प्रकार एक पुल दो किनारों को जोड़ता है, उसी प्रकार भगवान वासुदेव जीव को मृत्यु के तट से अमरता के तट तक ले जाने वाले सेतु हैं। यह भाव साधक के भीतर मृत्यु के भय को मिटा देता है।

२. चतुर्व्यूह दर्शन का रहस्य: यह स्तोत्र महाभारत के उन दुर्लभ स्थानों में से है जहाँ 'पंचरात्र' सिद्धांतों की पुष्टि की गई है। भगवान वासुदेव स्वयं को सङ्कर्षण (जीव तत्व), प्रद्युम्न (मनस तत्व) और अनिरुद्ध (अहंकार तत्व) के रूप में विस्तारित करते हैं। यह पाठ जपने से मनुष्य की बुद्धि (मन और अहंकार) शुद्ध होती है।

३. निर्भयता का वरदान: श्लोक २१ में उल्लेख है कि "पृथिवी निर्भया देव त्वत्प्रसादात्सदाऽभवत्" — अर्थात् आपके प्रसाद से ही यह पृथ्वी निर्भय होती है। भीष्म पितामह यह स्वीकार करते हैं कि संसार की सुरक्षा केवल अस्त्र-शस्त्रों से नहीं, बल्कि वासुदेव की कृपा दृष्टि से होती है।

फलश्रुति: वासुदेव स्तोत्र पाठ के लाभ (Phala Shruti & Benefits)

महाभारत के इस सिद्ध स्तोत्र का पाठ करने से साधक को निम्नलिखित आध्यात्मिक और व्यावहारिक लाभ प्राप्त होते हैं:

  • शत्रु और बाधा विजय: भीष्म जी ने यह स्तुति युद्ध के दौरान की थी। अतः यह जीवन के शत्रुओं (काम, क्रोध, लोभ) और बाहरी विरोधियों पर विजय प्राप्त करने हेतु अमोघ है।
  • मानसिक अपराधों से मुक्ति: भगवान को "असंख्येयगुणाधार" मानने से साधक के अंतःकरण की अशुद्धि दूर होती है और पापों का शमन होता है।
  • भीष्म जैसी अविचल मति: इस पाठ से साधक को स्थिर बुद्धि प्राप्त होती है, जिससे वह कठिन परिस्थितियों में भी सही निर्णय लेने में सक्षम होता है।
  • मोक्ष की प्राप्ति: "मुक्तात्मन् विजयप्रद" (श्लोक ११) — यह पाठ जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति दिलाने में सहायक है।
  • भय निवारण: "दुःखप्रणाशन" और "निर्भया देव" शब्दों के प्रभाव से साधक का अज्ञात भय समाप्त होता है और सुरक्षा का अनुभव होता है।
  • ईश्वर से सामीप्य: यह स्तोत्र जीव और ब्रह्म के संबंध को पुनः स्थापित करता है, जिससे साधक को हर क्षण वासुदेव की उपस्थिति का अनुभव होता है।

पाठ विधि एवं अनुष्ठान निर्देश (Ritual Method)

श्री वासुदेव स्तोत्रम् का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए महाभारत की परंपरा के अनुसार निम्न विधि अपनाई जानी चाहिए:

साधना के नियम

  • समय: प्रातःकाल सूर्योदय के समय या संध्या वंदन के समय इसका पाठ करना अत्यंत शुभ है। जन्माष्टमी और एकादशी पर इसका विशेष अनुष्ठान किया जाता है।
  • शुद्धि: स्नान के उपरांत स्वच्छ वस्त्र धारण करें। यदि संभव हो तो श्वेत या पीले वस्त्र पहनें जो भीष्म और कृष्ण के प्रतीक हैं।
  • आसन: ऊनी या कुशा के आसन पर उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  • ध्यान: भीष्म पितामह का स्मरण करते हुए, रथ पर बैठे चतुर्भुज भगवान श्री कृष्ण का ध्यान करें, जिन्होंने गीता का ज्ञान दिया था।
  • नैवेद्य: पाठ के पश्चात भगवान को दूध से बनी मिठाई या तुलसी दल अर्पित करें।

विशेष प्रयोग

  • संकट काल में: यदि आप किसी कानूनी विवाद या बड़े संकट में हों, तो इस स्तोत्र का २१ दिनों तक नित्य ३ बार पाठ करने से मार्ग प्रशस्त होता है।
  • पितृ दोष शांति हेतु: भीष्म जी पितरों के प्रतिनिधि माने जाते हैं। उनके द्वारा रचित इस स्तोत्र का पाठ करने से पितरों को भी शांति प्राप्त होती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. श्री वासुदेव स्तोत्रम् किस ग्रंथ से लिया गया है?

यह स्तोत्र भगवान व्यास रचित महाभारत के भीष्म पर्व के ६५वें अध्याय से लिया गया है।

2. इस स्तोत्र का पाठ भीष्म पितामह ने कब किया था?

जब कुरुक्षेत्र का युद्ध चल रहा था, तब भीष्म पितामह ने भगवान श्री कृष्ण की सर्वव्यापकता और उनके ईश्वरीय स्वरूप को प्रणाम करते हुए यह स्तुति की थी।

3. 'वासुदेव' नाम का क्या अर्थ है?

'वासुदेव' का अर्थ है वह परम तत्व जो सर्वत्र निवास (वास) करता है और जिसमें संपूर्ण संसार स्थित है। यह भगवान कृष्ण का मुख्य नाम है।

4. चतुर्व्यूह (Vyuha) सिद्धांत क्या है जो इस स्तोत्र में आया है?

श्लोक २४-२५ में उल्लेख है कि वासुदेव ने स्वयं को सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध के रूप में प्रकट किया। यह सृष्टि के विकास के चार चरण माने जाते हैं।

5. क्या यह स्तोत्र मोक्ष दिलाने में सक्षम है?

हाँ, श्लोक ११ में भगवान को 'मुक्तात्मन्' (मुक्त आत्माओं के स्वामी) कहा गया है। निष्काम भाव से पाठ करने पर यह जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्ति दिलाता है।

6. 'लोकस्य सेतुं' का क्या तात्पर्य है?

इसका अर्थ है कि भगवान वासुदेव संसार के लिए एक 'पुल' (Bridge) के समान हैं, जो जीव को कष्टमय संसार से सुखमय मोक्ष की ओर ले जाते हैं।

7. क्या इस पाठ को करने के लिए किसी विशेष दीक्षा की आवश्यकता है?

नहीं, महाभारत के स्तोत्र मानव मात्र के कल्याण के लिए हैं। कोई भी श्रद्धालु शुद्ध मन से इसका पाठ कर सकता है।

8. क्या इस पाठ से कुंडली के दोष शांत होते हैं?

भगवान वासुदेव समस्त ब्रह्मांड के स्वामी हैं। उनकी भक्ति करने से ग्रहों का प्रतिकूल प्रभाव स्वतः ही शांत होने लगता है।

9. भीष्म पितामह ने भगवान से क्या प्रार्थना की?

भीष्म जी ने प्रार्थना की कि भगवान धर्म की स्थापना के लिए और दैत्यों के विनाश के लिए मानुष रूप (यदुवंश) में अवतार लेकर जगत का कल्याण करें।

10. पाठ पूरा होने के बाद क्या करना चाहिए?

पाठ के अंत में भगवान की आरती करें और अपनी गलतियों के लिए क्षमा मांगें। कम से कम ५ मिनट शांत बैठकर 'वासुदेव' शब्द का मानसिक जप करें।