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दामोदराष्टकम्

दामोदराष्टकम्
दामोदराय कृष्णाय करे वंशीधराय च ।
उदरे दामबद्धाय बालकृष्णाय ते नमः ॥ १॥

उलूखलेन सम्बद्ध उदरेऽपि च बन्धनम् ।
मुक्तिदाता स्वयं बद्ध अन्यान् लोकान् विमुक्तये ॥ २॥

यमलार्जुनयोत्पाट्य नलकूवर मुक्तये ।
मणिग्रीवाय मोक्षञ्च ददन्तं तं नमाम्यहम् ॥ ३॥

रिङ्गयञ्च समागच्छन्नङ्गणे यशोदाग्रतः ।
पालायन परं देवं दामोदरं नमाम्यहम् ॥ ४॥

उलूखलोपर्य्यारुह्य नवनीतञ्चभुञ्जयन् ।
मर्कटान्नपि दत्तं तं बालकृष्णं नमाम्यहम् ॥ ५॥

दधिभाण्डं खण्डयित्वा पलायित्वा गतोऽन्यतः ।
नवनीतञ्चौरकं तं दामोदरं नमाम्यहम् ॥ ६॥

दामोदरेति नामस्तु लोकान् मुक्ति प्रदायकम् ।
तेन तं संस्मरेन्नित्यं भवबन्ध विमुक्तये ॥ ७॥

यशोदा यष्टिकां धृत्त्वा भीषयन्ती भयापहम् ।
भयभीताय कृष्णाय दामोदरायते नमः ॥ ८॥

दामोदराष्टकं नित्यं ये पठन्ति नरा भुवि ।
ते भवबन्ध निर्मुक्ता यान्ति तं परमं पदम् ॥ ९॥

इस अष्टकम् का विशिष्ट महत्व

दामोदराष्टकम् (Damodara Ashtakam) भगवान श्री कृष्ण के 'दामोदर' स्वरूप को समर्पित एक अत्यंत मधुर और महत्वपूर्ण स्तोत्र है। 'दामोदर' नाम का अर्थ है 'जिसके उदर (पेट) पर दाम (रस्सी) बंधी हो'। यह नाम श्री कृष्ण की प्रसिद्ध बाल लीला का स्मरण कराता है, जब माता यशोदा ने उनकी नटखट शरारतों से तंग आकर उन्हें एक ओखली से बांधने का प्रयास किया था। यह अष्टकम् उसी लीला के गहरे आध्यात्मिक अर्थों को प्रकट करता है। वैष्णव परंपरा में, विशेषकर पवित्र कार्तिक मास (Kartik month), जिसे 'दामोदर मास' भी कहा जाता है, में इस अष्टकम् का पाठ करना और दीपक अर्पित करना सर्वोच्च भक्ति कृत्यों में से एक माना जाता है।

अष्टकम् के प्रमुख भाव और लाभ (फलश्रुति)

यह स्तोत्र भगवान की सर्वोच्चता और उनकी भक्त-वत्सलता का एक अनूठा चित्रण है:

  • परमेश्वर का बंधन (The Binding of the Supreme): "मुक्तिदाता स्वयं बद्ध" - यह स्तोत्र इस दिव्य विरोधाभास को दर्शाता है कि जो स्वयं संपूर्ण जगत को मुक्ति देने वाले हैं, वे अपनी माता के शुद्ध वात्सल्य प्रेम (parental love) के कारण स्वयं बंधन में बंध जाते हैं। यह दिखाता है कि भगवान को केवल प्रेम से ही जीता जा सकता है।

  • नलकुबेर और मणिग्रीव का उद्धार (Liberation of Nalakuvara and Manigriva): अष्टकम् में उस लीला का भी उल्लेख है जब बाल कृष्ण ओखली को घसीटते हुए दो अर्जुन वृक्षों के बीच से निकलते हैं, जिससे उन वृक्षों का उद्धार होता है और वे कुबेर के शापित पुत्र, नलकूबर और मणिग्रीव अपने दिव्य स्वरूप को प्राप्त करते हैं।

  • नाम की महिमा (Glory of the Name): सातवें श्लोक में कहा गया है कि "दामोदर" नाम ही संसार को मुक्ति प्रदान करने वाला (giver of liberation) है। इसलिए, भव-बंधन से छूटने के लिए नित्य ही इस नाम का स्मरण करना चाहिए।

  • फलश्रुति - परम पद की प्राप्ति (Benefit - Attainment of the Supreme Abode): अंतिम श्लोक में स्पष्ट रूप से फलश्रुति बताई गई है - "ते भवबन्ध निर्मुक्ता यान्ति तं परमं पदम्"। अर्थात, जो भी व्यक्ति इस दामोदराष्टकम् का नित्य पाठ करता है, वह संसार के बंधन से मुक्त होकर परम पद को प्राप्त करता है।

पाठ करने की विधि और विशेष अवसर

  • इस अष्टकम् का पाठ करने का सबसे पवित्र और महत्वपूर्ण समय कार्तिक मास (Kartik Month) है। इस पूरे महीने में प्रतिदिन संध्या के समय भगवान दामोदर को घी का दीपक अर्पित करते हुए इसका पाठ करने की परंपरा है।

  • इसे दैनिक पूजा में, विशेषकर जन्माष्टमी (Janmashtami) और अन्य वैष्णव उत्सवों पर भी गाया जा सकता है।

  • इसका पाठ करते समय बालकृष्ण के उस नटखट और करुणामय स्वरूप का ध्यान करना चाहिए, जो अपनी माता के प्रेम से बंधे हुए हैं।

  • यह स्तोत्र भक्ति और प्रेम को बढ़ाने, पापों को नष्ट करने और अंततः व्यक्ति को भगवान के दिव्य धाम की ओर ले जाने में अत्यंत सहायक है।