वश्यवाराही स्तोत्रम्
Vashya Varahi Stotram — अथर्वशिखा उक्त वशीकरण स्तोत्र

वश्यवाराही स्तोत्रम् — परिचय और उत्पत्ति
वश्यवाराही स्तोत्रम् (Vashya Varahi Stotram) अथर्वशिखा से लिया गया एक अत्यंत गोपनीय और शक्तिशाली तांत्रोक्त स्तोत्र है। अथर्वशिखा, अथर्ववेद की एक शाखा (उपनिषद) है — जो इस स्तोत्र को वैदिक प्रामाणिकता प्रदान करती है। इस स्तोत्र के ऋषि नारद हैं, छन्द अनुष्टुप है, और देवता वश्यवाराही हैं।
'वश्य' का अर्थ केवल किसी व्यक्ति को नियंत्रित करना नहीं है — इसका वास्तविक अर्थ है समस्त जगत, परिस्थितियों और अवसरों को अपने अनुकूल बनाना। यह स्तोत्र देवी वाराही के 'अश्वारूढा' (घोड़े पर सवार) स्वरूप का आह्वान करता है जो तीव्र गति से कार्य सिद्ध करने का प्रतीक है। देवी का वर्ण रक्त (लाल) है और मुख स्मितसौम्य (मधुर मुस्कान) वाला है।
विशेष तथ्य: यह एकमात्र वाराही स्तोत्र है जो सम्पूर्ण तांत्रिक अनुष्ठान के रूप में रचित है — विनियोग, ऋष्यादि न्यास, करन्यास, हृदयादि न्यास, ध्यान, मन्त्र, पंचपूजा और फिर 11 श्लोकों का स्तोत्र। अन्य वाराही स्तोत्रों में ये सब अंग नहीं मिलते।
स्तोत्र की संरचना — 7 अंग
यह स्तोत्र 7 अंगों में विभाजित है, जो इसे एक सम्पूर्ण तांत्रिक साधना बनाते हैं:
- विनियोग: स्तोत्र का उद्देश्य, ऋषि (नारद), छन्द (अनुष्टुप), देवता (वश्यवाराही), बीज (ऐं), शक्ति (क्लीं), कीलक (ग्लौं) — यह स्तोत्र की पहचान पत्र है।
- ऋष्यादि न्यास: शरीर के छह अंगों (शिर, मुख, हृदय, गुह्य, पाद, सर्वाङ्ग) पर मन्त्र स्थापना।
- करन्यास: पाँच उँगलियों और करतल पर मन्त्र स्थापना — हस्तों को शक्ति ग्रहण के लिए तैयार करना।
- हृदयादि न्यास: हृदय, शिर, शिखा, कवच, नेत्र और अस्त्र पर मन्त्र — शरीर को कवच से ढकना।
- ध्यान: देवी का स्वरूप — तारिणी, विश्वजननी, लक्ष्मीकारिणी, कीर्तिधारिणी, सौभाग्यदायिनी।
- मन्त्र: "ॐ ऐं क्लीं ग्लौं अश्वारूढे सर्ववश्य वाराह्यै मम सर्ववशङ्करि कुरु कुरु ठः ठः" — मूल शक्ति मन्त्र।
- पंचपूजा + स्तोत्र: पाँच तत्वों से पूजा और फिर 11 श्लोकों का मुख्य स्तोत्र।
11 श्लोकों का विश्लेषण — वशीकरण के 5 स्तर
श्लोक 1-2 — देवी का आह्वान: "अश्वारूढे रक्तवर्णे... वशीकरणनायिके" — देवी को राज्य, स्त्री और सभी प्राणियों की वशीकरण नायिका कहा गया है। यह स्तोत्र देवेन निर्मितम् (देवताओं द्वारा निर्मित) है।
श्लोक 3-5 — राजकीय वशीकरण: राजा, ज्ञान, वस्त्र, धान्य, धन, चामर, छत्र, राज्य चिह्न — सब वश में आने की प्रार्थना। यह भौतिक सफलता और पदोन्नति का स्तर है।
श्लोक 4 — मानसिक वशीकरण: "अन्तर्बहिश्च मनसि व्यापारेषु सभाषु च" — अंदर-बाहर, मन में, व्यापार में और सभाओं में — सर्वत्र लोग स्मरण करें। यह व्यापार और राजनीतिक सफलता का श्लोक है।
श्लोक 6-7 — प्रेम और आकर्षण: कामदेव जैसा आकर्षण, प्रेम संबंधों में सफलता। पशु-पक्षी भी प्रेममोहित होकर अनुसरण करें। यह चुंबकीय व्यक्तित्व का स्तर है।
श्लोक 8-10 — सर्वजन वशीकरण: "जगत्सर्व वशं कुरु" — सम्पूर्ण जगत वश में होने की प्रार्थना। स्तोत्र को "वशीकरण बाणास्त्र" (वशीकरण का अचूक बाण) कहा गया है। यह सर्वव्यापी प्रभाव का स्तर है।
श्लोक 11 — फलश्रुति: "त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नर, अभीष्टं प्राप्नुयाद् भक्तो रमां राज्यं यथापिवः" — जो त्रिकाल संध्या (दिन में तीन बार) पाठ करे, वह लक्ष्मी (रमा) और राज्य दोनों प्राप्त करता है।
पाठ विधि (Sadhana Vidhi)
समय: फलश्रुति में "त्रिसन्ध्यं" कहा गया है — प्रातः, मध्याह्न और संध्या — दिन में तीन बार पाठ करना सर्वोत्तम है।
क्रम: विनियोग → ऋष्यादि न्यास → करन्यास → हृदयादि न्यास → ध्यान → मन्त्र → पंचपूजा → स्तोत्र। क्रम का पालन आवश्यक है।
विशेष तिथियाँ: नवरात्रि (विशेषकर गुप्त नवरात्रि), पंचमी तिथि, शुक्रवार और पूर्णिमा को विशेष फलदायी।
ध्यान: देवी के अश्वारूढा, रक्तवर्णा, स्मितसौम्यमुखी स्वरूप का ध्यान करें। लाल वस्त्र, लाल पुष्प और लाल चन्दन से पूजा करें।