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वश्यवाराही स्तोत्रम्

Vashya Varahi Stotram — अथर्वशिखा उक्त वशीकरण स्तोत्र

वश्यवाराही स्तोत्रम्
॥ वश्यवाराही स्तोत्रम् ॥ (अथर्वशिखा उक्तम्) ॥ विनियोगः ॥ अस्य श्री सर्व वशीकरण स्तोत्र मन्त्रस्य नारद ऋषिः अनुष्टुप् छन्दः श्री वश्यवाराही देवता ऐं बीजं क्लीं शक्तिः ग्लौं कीलकं मम सर्ववश्यार्थे जपे विनियोगः । ॥ ऋष्यादिन्यासः ॥ नारद ऋषये नमः शिरसि । अनुष्ठप् छन्दसे नमः मुखे । वश्यवाराही देवतायै नमः हृदि । ऐं बीजाय नमः गुह्ये । क्लीं शक्तये नमः पादयोः । ग्लौं कीलकाय नमः सर्वाङ्गे । ॥ करन्यासः ॥ ॐ ऐं अङ्गुष्ठाभ्यां नमः । ॐ क्लीं तर्जनीभ्यां नमः । ॐ ग्लौं मध्यमाभ्यां नमः । ॐ अश्वारूढा अनामिकाभ्यां नमः । ॐ सर्ववश्यवाराह्यै कनिष्ठिकाभ्यां नमः । ॐ मम सर्ववशङ्करि कुरु कुरु ठः ठः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः । ॥ हृदयादिन्यासः ॥ ॐ ऐं हृदयाय नमः । ॐ क्लीं शिरसे स्वाहा । ॐ ग्लौं शिखायै वषट् । ॐ अश्वारूढा कवचाय हुं । ॐ सर्ववश्यवाराह्यै नेत्रत्रयाय वौषट् । ॐ मम सर्ववशङ्करि कुरु कुरु ठः ठः अस्त्राय फट् । ॥ ध्यानम् ॥ तारे तारिणि देवि विश्वजननि प्रौढप्रतापान्विते । तारे दिक्षु विपक्ष यक्ष दलिनि वाचा चला वारूणी ॥ लक्ष्मीकारिणि कीर्तिधारिणि महा सौभाग्य सन्दायिनि । रूपं देहि यशश्च सततं वश्यं जगत्यावृतम् ॥ ॥ मन्त्रः ॥ ॐ ऐं क्लीं ग्लौं अश्वारूढे सर्ववश्य वाराह्यै मम सर्ववशङ्करि कुरु कुरु ठः ठः ॥ ॥ पञ्चपूजा ॥ लं पृथिव्यात्मिकायै गन्धं परिकल्पयामि । हं आकाशात्मिकायै पुष्पं परिकल्पयामि । यं वाय्वात्मिकायै धूपं परिकल्पयामि । रं अग्न्यात्मिकायै दीपं परिकल्पयामि । वं अमृतात्मिकायै नैवेद्यं परिकल्पयामि । सं सर्वात्मिकायै सर्वोपचारान् परिकल्पयामि । ॥ स्तोत्रम् ॥ अश्वारूढे रक्तवर्णे स्मितसौम्यमुखाम्बुजे । राज्यस्त्री सर्वजन्तूनां वशीकरणनायिके ॥ १॥ वशीकरण कार्यार्थ पुरा देवेन निर्मितम् । तस्माद् वश्यवाराही सर्वान्मे वशमानय ॥ २॥ यथा राजा महाज्ञानं वस्त्रं धान्यं महावसु । मह्यं ददाति वाराहि यथात्वं वशमानय ॥ ३॥ अन्तर्बहिश्च मनसि व्यापारेषु सभाषु च । यथा मामेवं स्मरति तथा वश्यं वशं कुरु ॥ ४॥ चामरं दोलिकां छत्रं राज चिह्नानि यच्छति । अभीष्ठं संप्रदोराज्यं यथा देवि वशं कुरु ॥ ५॥ मन्मथस्मरणाद्रामा रतिर्यातु मयासह । स्त्री रत्नेषु महत्प्रेम तथा जनयकामदे ॥ ६॥ मृग पक्ष्यादयाः सर्वे मां दृष्ट्वा प्रेममोहिताः । अनुगच्छति मामेव त्वत्प्रसादाद्दयां कुरु ॥ ७॥ वशीकरण कार्यार्थ यत्र यत्र प्रयुञ्जति । सम्मोहनार्थ वर्द्धित्वात्तत्कार्य तत्र कर्षय ॥ ८॥ वशमस्तीति चैवात्र वश्य कार्येषु दृश्यते । तथा मां कुरु वाराही वश्य कार्यप्रदर्शय ॥ ९॥ वशीकरण बाणास्त्रं भक्त्यापद्धिनिवारणम् । तस्मात् वश्यवाराही जगत्सर्व वशं कुरु ॥ १०॥ ॥ फलश्रुति ॥ वश्यस्तोत्रमिदं देव्या त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नर । अभीष्टं प्राप्नुयाद् भक्तो रमां राज्यं यथापिवः ॥ ११॥ ॥ इति अथर्वशिखायां वश्यवाराही स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

वश्यवाराही स्तोत्रम् — परिचय और उत्पत्ति

वश्यवाराही स्तोत्रम् (Vashya Varahi Stotram) अथर्वशिखा से लिया गया एक अत्यंत गोपनीय और शक्तिशाली तांत्रोक्त स्तोत्र है। अथर्वशिखा, अथर्ववेद की एक शाखा (उपनिषद) है — जो इस स्तोत्र को वैदिक प्रामाणिकता प्रदान करती है। इस स्तोत्र के ऋषि नारद हैं, छन्द अनुष्टुप है, और देवता वश्यवाराही हैं।

'वश्य' का अर्थ केवल किसी व्यक्ति को नियंत्रित करना नहीं है — इसका वास्तविक अर्थ है समस्त जगत, परिस्थितियों और अवसरों को अपने अनुकूल बनाना। यह स्तोत्र देवी वाराही के 'अश्वारूढा' (घोड़े पर सवार) स्वरूप का आह्वान करता है जो तीव्र गति से कार्य सिद्ध करने का प्रतीक है। देवी का वर्ण रक्त (लाल) है और मुख स्मितसौम्य (मधुर मुस्कान) वाला है।

विशेष तथ्य: यह एकमात्र वाराही स्तोत्र है जो सम्पूर्ण तांत्रिक अनुष्ठान के रूप में रचित है — विनियोग, ऋष्यादि न्यास, करन्यास, हृदयादि न्यास, ध्यान, मन्त्र, पंचपूजा और फिर 11 श्लोकों का स्तोत्र। अन्य वाराही स्तोत्रों में ये सब अंग नहीं मिलते।

स्तोत्र की संरचना — 7 अंग

यह स्तोत्र 7 अंगों में विभाजित है, जो इसे एक सम्पूर्ण तांत्रिक साधना बनाते हैं:

  • विनियोग: स्तोत्र का उद्देश्य, ऋषि (नारद), छन्द (अनुष्टुप), देवता (वश्यवाराही), बीज (ऐं), शक्ति (क्लीं), कीलक (ग्लौं) — यह स्तोत्र की पहचान पत्र है।
  • ऋष्यादि न्यास: शरीर के छह अंगों (शिर, मुख, हृदय, गुह्य, पाद, सर्वाङ्ग) पर मन्त्र स्थापना।
  • करन्यास: पाँच उँगलियों और करतल पर मन्त्र स्थापना — हस्तों को शक्ति ग्रहण के लिए तैयार करना।
  • हृदयादि न्यास: हृदय, शिर, शिखा, कवच, नेत्र और अस्त्र पर मन्त्र — शरीर को कवच से ढकना।
  • ध्यान: देवी का स्वरूप — तारिणी, विश्वजननी, लक्ष्मीकारिणी, कीर्तिधारिणी, सौभाग्यदायिनी।
  • मन्त्र: "ॐ ऐं क्लीं ग्लौं अश्वारूढे सर्ववश्य वाराह्यै मम सर्ववशङ्करि कुरु कुरु ठः ठः" — मूल शक्ति मन्त्र।
  • पंचपूजा + स्तोत्र: पाँच तत्वों से पूजा और फिर 11 श्लोकों का मुख्य स्तोत्र।

11 श्लोकों का विश्लेषण — वशीकरण के 5 स्तर

श्लोक 1-2 — देवी का आह्वान: "अश्वारूढे रक्तवर्णे... वशीकरणनायिके" — देवी को राज्य, स्त्री और सभी प्राणियों की वशीकरण नायिका कहा गया है। यह स्तोत्र देवेन निर्मितम् (देवताओं द्वारा निर्मित) है।

श्लोक 3-5 — राजकीय वशीकरण: राजा, ज्ञान, वस्त्र, धान्य, धन, चामर, छत्र, राज्य चिह्न — सब वश में आने की प्रार्थना। यह भौतिक सफलता और पदोन्नति का स्तर है।

श्लोक 4 — मानसिक वशीकरण: "अन्तर्बहिश्च मनसि व्यापारेषु सभाषु च" — अंदर-बाहर, मन में, व्यापार में और सभाओं में — सर्वत्र लोग स्मरण करें। यह व्यापार और राजनीतिक सफलता का श्लोक है।

श्लोक 6-7 — प्रेम और आकर्षण: कामदेव जैसा आकर्षण, प्रेम संबंधों में सफलता। पशु-पक्षी भी प्रेममोहित होकर अनुसरण करें। यह चुंबकीय व्यक्तित्व का स्तर है।

श्लोक 8-10 — सर्वजन वशीकरण: "जगत्सर्व वशं कुरु" — सम्पूर्ण जगत वश में होने की प्रार्थना। स्तोत्र को "वशीकरण बाणास्त्र" (वशीकरण का अचूक बाण) कहा गया है। यह सर्वव्यापी प्रभाव का स्तर है।

श्लोक 11 — फलश्रुति: "त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नर, अभीष्टं प्राप्नुयाद् भक्तो रमां राज्यं यथापिवः" — जो त्रिकाल संध्या (दिन में तीन बार) पाठ करे, वह लक्ष्मी (रमा) और राज्य दोनों प्राप्त करता है।

पाठ विधि (Sadhana Vidhi)

समय: फलश्रुति में "त्रिसन्ध्यं" कहा गया है — प्रातः, मध्याह्न और संध्या — दिन में तीन बार पाठ करना सर्वोत्तम है।

क्रम: विनियोग → ऋष्यादि न्यास → करन्यास → हृदयादि न्यास → ध्यान → मन्त्र → पंचपूजा → स्तोत्र। क्रम का पालन आवश्यक है।

विशेष तिथियाँ: नवरात्रि (विशेषकर गुप्त नवरात्रि), पंचमी तिथि, शुक्रवार और पूर्णिमा को विशेष फलदायी।

ध्यान: देवी के अश्वारूढा, रक्तवर्णा, स्मितसौम्यमुखी स्वरूप का ध्यान करें। लाल वस्त्र, लाल पुष्प और लाल चन्दन से पूजा करें।

FAQ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. वश्यवाराही स्तोत्र क्या है?

अथर्वशिखा से लिया गया अत्यंत गोपनीय वशीकरण स्तोत्र। नारद ऋषि प्रणीत, अश्वारूढा वश्यवाराही देवता। विनियोग, न्यास, ध्यान, मन्त्र और 11 श्लोकों का सम्पूर्ण तांत्रिक अनुष्ठान। राज्य, धन, यश और सर्वजन वशीकरण के लिए सर्वोत्तम।

2. अथर्वशिखा क्या है?

अथर्वशिखा, अथर्ववेद की एक शाखा (उपनिषद) है। यह स्तोत्र उसी वैदिक परंपरा से आया है, जो इसे अत्यंत प्राचीन और प्रामाणिक बनाता है। 'शिखा' का अर्थ है शिखर/चोटी — अर्थात अथर्ववेद का सर्वोच्च ज्ञान।

3. अश्वारूढा का क्या अर्थ है?

अश्वारूढा = 'अश्व' (घोड़ा) + 'आरूढा' (सवार)। यह वाराही का तीव्र गति वाला स्वरूप है। जहाँ अन्य स्वरूपों में भैंसा वाहन है, वहीं वश्यवाराही घोड़े पर सवार हैं — कार्य शीघ्र सिद्ध करने का प्रतीक।

4. वशीकरण का सही अर्थ क्या है?

यहाँ वशीकरण का अर्थ नकारात्मक नियंत्रण नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ है — परिस्थितियों, अवसरों और लोगों को अपने अनुकूल बनाना। चुंबकीय व्यक्तित्व, प्रभाव शक्ति और आकर्षण बढ़ाना। यह सकारात्मक शक्ति है।

5. क्या इसे बिना दीक्षा के पढ़ सकते हैं?

यह तांत्रिक स्तोत्र है जिसमें विनियोग, न्यास और मन्त्र हैं। सामान्य पाठ भक्तिपूर्वक किया जा सकता है। हालाँकि, विशेष वशीकरण प्रयोग और मन्त्र सिद्धि हेतु गुरु मार्गदर्शन नितांत आवश्यक है।

6. त्रिकाल संध्या पाठ क्या है?

फलश्रुति में "त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नर" कहा गया है — प्रातः (सूर्योदय), मध्याह्न (दोपहर) और संध्या (सूर्यास्त) — दिन में तीन बार पाठ करने से पूर्ण फल (लक्ष्मी और राज्य) प्राप्त होता है।

7. क्या यह व्यापार और नौकरी में सहायक है?

हाँ, श्लोक 3-5 में राजा, धन, वस्त्र, धान्य, राज्य चिह्न (चामर, छत्र) वश में करने की प्रार्थना है। श्लोक 4 में "व्यापारेषु सभाषु च" — व्यापार और सभाओं में प्रभाव बढ़ाने की प्रार्थना है। यह व्यापार, नौकरी, पदोन्नति में अत्यंत प्रभावी है।

8. न्यास क्या होते हैं और क्यों आवश्यक हैं?

न्यास शरीर के विभिन्न अंगों पर मन्त्र स्थापित करने की प्रक्रिया है। करन्यास (उँगलियों पर) और हृदयादि न्यास (हृदय, शिर, शिखा पर) होते हैं। ये शरीर को स्तोत्र की तीव्र ऊर्जा ग्रहण करने के लिए तैयार करते हैं — जैसे बर्तन को पानी भरने से पहले साफ करना।

9. पंचपूजा क्या है?

पाँच तत्वों से देवी की पूजा: लं — पृथ्वी (गन्ध), हं — आकाश (पुष्प), यं — वायु (धूप), रं — अग्नि (दीप), वं — अमृत (नैवेद्य)। छठा "सं" सर्वतत्व (सर्वोपचार) है। यह तांत्रिक पूजा की मूल विधि है।

10. "जगत्सर्व वशं कुरु" का क्या अर्थ है?

"हे वश्यवाराही, सम्पूर्ण जगत को मेरे वश में करो।" यह स्तोत्र की सबसे शक्तिशाली प्रार्थना है (श्लोक 10)। इसका अर्थ है — सभी परिस्थितियाँ, अवसर, लोग और प्रकृति अनुकूल हों। साधक सर्वत्र सफल हो।