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वक्रतुण्ड स्तोत्रम् (Vakratunda Stotram) - आदि शंकराचार्य कृत

Vakratunda Stotram (Adi Shankaracharya)

वक्रतुण्ड स्तोत्रम् (Vakratunda Stotram) - आदि शंकराचार्य कृत
॥ वक्रतुण्ड स्तोत्रम् ॥ ओं ओं ओंकाररूपं हिमकर रुचिरं यत्स्वरूपं तुरीयं त्रैगुण्यातीतलीलं कलयति मनसा तेजसोदारवृत्तिः । योगीन्द्रा ब्रह्मरन्ध्रे सहजगुणमयं श्रीहरेन्द्रं स्वसञ्ज्ञं गं गं गं गं गणेशं गजमुखमनिशं व्यापकं चिन्तयन्ति ॥ १ ॥ वं वं वं विघ्नराजं भजति निजभुजे दक्षिणे पाणिशुण्डं क्रों क्रों क्रों क्रोधमुद्रादलितरिपुकुलं कल्पवृक्षस्य मूले । दं दं दं दन्तमेकं दधतमभिमुखं कामधेन्वादिसेव्यं धं धं धं धारयन्तं दधतमतिशयं सिद्धिबुद्धिप्रदं तम् ॥ २ ॥ तुं तुं तुं तुङ्गरूपं गगनमुपगतं व्याप्नुवन्तं दिगन्तं क्लीं क्लीं क्लीं कामनाथं गलितमददलं लोलमत्तालिमालम् । ह्रीं ह्रीं ह्रींकाररूपं सकलमुनिजनैर्ध्येयमुद्दिक्षुदण्डं श्रीं श्रीं श्रीं संश्रयन्तं निखिलनिधिफलं नौमि हेरम्बलम्बम् ॥ ३ ॥ ग्लौं ग्लौं ग्लौंकारमाद्यं प्रणवमयमहामन्त्रमुक्तावलीनां सिद्धं विघ्नेशबीजं शशिकरसदृशं योगिनां ध्यानगम्यम् । डां डां डां डामरूपं दलितभवभयं सूर्यकोटिप्रकाशं यं यं यं यक्षराजं जपति मुनिजनो बाह्यमभ्यन्तरं च ॥ ४ ॥ हुं हुं हुं हेमवर्णं श्रुतिगणितगुणं शूर्पकर्णं कृपालुं ध्येयं यं सूर्यबिम्बे उरसि च विलसत्सर्पयज्ञोपवीतम् । स्वाहा हुं फट् समेतैष्ठ ठ ठ ठ सहितैः पल्लवैः सेव्यमानं मन्त्राणां सप्तकोटिप्रगुणित महिमध्यानमीशं प्रपद्ये ॥ ५ ॥ गणेश यन्त्र पूजा पूर्वं पीठं त्रिकोणं तदुपरि रुचिरं षड्दलं सूपपत्रं तस्योर्ध्वं बद्धरेखा वसुदलकमलं बाह्यतोऽधश्च तस्य । मध्ये हुङ्कारबीजं तदनु भगवतश्चाङ्गषट्कं षडस्रे अष्टौ शक्त्यश्च सिद्धिर्वटुगणपतेर्वक्रतुण्डस्य यन्त्रम् ॥ ६ ॥ धर्माद्यष्टौ प्रसिद्धा दिशि विदिशि गणान्बाह्यतो लोकपालान् मध्ये क्षेत्राधिनाथं मुनिजनतिलकं मन्त्रमुद्रापदेशम् । एवं यो भक्तियुक्तो जपति गणपतिं पुष्पधूपाक्षताद्यैः नैवेद्यैर्मोदकानां स्तुतिनटविलसद्गीतवादित्रनादैः ॥ ७ ॥ फलश्रुति राजानस्तस्य भृत्या इव युवतिकुलं दासवत्सर्वदास्ते लक्ष्मीः सर्वाङ्गयुक्ता त्यजति न सदनं किङ्कराः सर्वलोकाः । पुत्राः पौत्राः प्रपौत्रा रणभुवि विजयो द्यूतवादे प्रवीणो यस्येशो विघ्नराजो निवसति हृदये भक्तिभाजां स देवः ॥ ८ ॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्य कृत वक्रतुण्ड स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ।

वक्रतुण्ड स्तोत्र: एक परिचय (Introduction)

वक्रतुण्ड स्तोत्रम् (Vakratunda Stotram) आदि गुरु शंकराचार्य (Adi Shankaracharya) की एक अद्वितीय रचना है। यह सामान्य भक्ति स्तोत्रों से भिन्न है क्योंकि इसमें बीजाक्षरों (Seed Mantras) का प्रचुर प्रयोग किया गया है।

इसमें 'गं' (गणेश), 'ह्रीं' (माया), 'श्रीं' (लक्ष्मी), 'क्लीं' (काम), 'ग्लौं' (पृथ्वी तत्व) जैसे शक्तिशाली बीज मंत्रों को श्लोकों में पिरोया गया है। यह स्तोत्र मात्र पाठ करने से ही एक 'महामंत्र' के जाप का फल देता है।

मुद्गल पुराण के अनुसार, 'वक्रतुण्ड' भगवान गणेश का पहला अवतार है। उन्होंने 'मत्सरासुर' (Matsaryasura) नामक राक्षस का वध किया था, जो 'ईर्ष्या' (Jealousy) का प्रतीक है। इसलिए, यह स्तोत्र ईर्ष्या-द्वेष पर विजय पाने के लिए अचूक है।

"वक्रतुण्ड" स्वरूप और बीज मंत्रों का रहस्य (Significance)

इस स्तोत्र की शक्ति इसके ध्वनि विज्ञान (Sound Science) में छिपी है।
  • वक्रतुण्ड का अर्थ: 'वक्र' का अर्थ है टेढ़ा और 'तुण्ड' का अर्थ है सूंड (या मुख)। आध्यात्मिक रूप से, जो अपने भक्तों के 'टेढ़े-मेढ़े' (कठिन) कर्मों और जीवन के रास्तों को अपनी टेढ़ी सूंड से पकड़कर 'सीधा' (सरल) कर देते हैं, वे वक्रतुण्ड हैं।

  • बीज मंत्रों का प्रभाव:
    • गं (Gam): मूलाधार चक्र को जागृत करता है और स्थिरता देता है।
    • ह्रीं (Hreem): ब्रह्मांडीय ऊर्जा और आकर्षण शक्ति बढ़ाता है।
    • हुं (Hum): नकारात्मक शक्तियों और शत्रुओं को भगाता है।

स्तोत्र के लाभ और फलश्रुति (Benefits)

स्तोत्र के अंतिम श्लोक (श्लोक 8) में इसके अद्भुत लाभों का वर्णन है:

1. राजसी वैभव की प्राप्ति

"राजानस्तस्य भृत्या इव" - अर्थात, इस स्तोत्र के प्रभाव से बड़े-बड़े राजा या अधिकारी भी साधक के अनुकूल हो जाते हैं। व्यक्ति में नेतृत्व (Leadership) के गुण विकसित होते हैं।

2. स्थाई लक्ष्मी वास

"लक्ष्मीः ... त्यजति न सदनं" - माँ लक्ष्मी ऐसे घर को कभी नहीं छोड़तीं जहाँ वक्रतुण्ड स्तोत्र का पाठ होता है। दरिद्रता का नाश होता है।

3. सर्वत्र विजय

"रणभुवि विजयो" - जीवन के युद्ध (संघर्ष) में, वाद-विवाद में, और मुकदमों में साधक की विजय सुनिश्चित होती है।

4. वंश वृद्धि

"पुत्राः पौत्राः प्रपौत्रा" - परिवार और वंश की वृद्धि होती है। संतानों को सुबुद्धि प्राप्त होती है।

साधना विधि (Rituals for Recitation)

यह एक तंत्रोक्त स्तोत्र है, अतः थोड़ी पवित्रता और अनुशासन का पालन करना चाहिए:

    यन्त्र पूजा: श्लोक 6 में "वक्रतुण्डस्य यन्त्रम्" का वर्णन है। यदि संभव हो, तो सामने गणेश यन्त्र या लाल चंदन की गणेश मूर्ति रखें।
    पुष्प और नैवेद्य: लाल फूल (गुडहल), दूर्वा और मोदक ("नैवेद्यैर्मोदकानां" - श्लोक 7) अर्पित करें।
    संकल्प: किसी विशेष कार्य की सिद्धि के लिए 41 दिनों तक नित्य पाठ का संकल्प लें।
    मनाही: अहंकार और ईर्ष्या का त्याग करें, क्योंकि वक्रतुण्ड अवतार का उद्देश्य ही ईर्ष्या (मत्सरासुर) का नाश करना है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. वक्रतुण्ड स्तोत्रम् (Vakratunda Stotram) का महत्व क्या है?

यह आदि शंकराचार्य द्वारा रचित एक अत्यंत शक्तिशाली तंत्रोक्त स्तोत्र है। इसमें 'गं', 'वं', 'ह्रीं', 'क्रों' जैसे बीजाक्षरों का प्रयोग किया गया है जो इसे सामान्य स्तुति से अधिक प्रभावशाली बनाता है। यह आंतरिक और बाह्य दोनों प्रकार के विघ्नों का नाश करता है।

2. 'वक्रतुण्ड' नाम का क्या अर्थ है?

'वक्रतुण्ड' का अर्थ है - 'टेढ़ी सूंड वाले'। मुद्गल पुराण के अनुसार, यह गणेश जी का पहला अवतार है जिन्होंने 'मत्सरासुर' (ईर्ष्या/Jealousy) का वध किया था। उनकी टेढ़ी सूंड भक्तों के टेढ़े-मेढ़े कर्मों और कठिनाइयों को सीधा (सरल) करने का प्रतीक है।

3. इस स्तोत्र में बीजाक्षरों (Beeja Mantras) का क्या महत्व है?

इस स्तोत्र के प्रत्येक श्लोक में विशेष बीज मंत्रों का पुनरावर्तन (Repetition) है। जैसे 'गं गं गं' (गणेश बीज), 'ह्रीं' (शक्ति/माया बीज), 'श्रीं' (लक्ष्मी बीज)। ये ध्वनियां शरीर के चक्रों को जागृत करती हैं और तुरंत ऊर्जा प्रदान करती हैं।

4. इसका पाठ कब करना चाहिए?

इसका पाठ किसी भी नए कार्य के आरंभ (Arambha) में करना सर्वश्रेष्ठ है। इसके अलावा, यदि जीवन में बहुत अधिक संघर्ष या शत्रु बाधा हो, तो प्रतिदिन 108 दिनों तक एकांत में इसका पाठ करने से अद्भुत लाभ मिलता है।

5. क्या इसके पाठ के लिए गुरु दीक्षा आवश्यक है?

चूँकि इसमें बीजाक्षरों का प्रयोग है, गुरु से दीक्षा लेना उत्तम है। परंतु शंकराचार्य जी ने इसे जन-कल्याण के लिए रचा है, इसलिए श्रद्धा और पवित्रता के साथ कोई भी भक्त इसका पाठ कर सकता है।

6. 'त्रैगुण्यातीतलीलं' का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है - जिनकी लीला तीनों गुणों (सत्व, रज, तम) से परे है। गणेश जी साक्षात परब्रह्म हैं और प्रकृति के नियमों से बंधे नहीं हैं, बल्कि वे उनके स्वामी हैं।

7. क्या इससे धन लाभ होता है?

जी हाँ, श्लोक 3 में 'श्रीं श्रीं श्रीं' (लक्ष्मी बीज) का प्रयोग है और कहा गया है 'निखिलनिधिफलं' अर्थात समस्त निधियों और समृद्धियों को देने वाले। यह आर्थिक उन्नति के लिए भी सिद्ध मंत्र है।

8. 'क्रोधमुद्रादलितरिपुकुलं' का आशय क्या है?

इसका अर्थ है कि गणेश जी अपनी क्रोध मुद्रा से ही शत्रुओं (रिपुकुल) का नाश कर देते हैं। यह केवल बाहरी शत्रुओं के लिए नहीं, बल्कि काम, क्रोध, लोभ जैसे आंतरिक शत्रुओं के लिए भी है।

9. पाठ की विधि क्या है?

शुद्ध आसन पर पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें। सामने गणेश यन्त्र या मूर्ति रखें। पहले सामान्य गणेश पूजन करें और फिर इस स्तोत्र का 1, 3 या 11 बार पाठ करें।

10. इस स्तोत्र का रचयिता कौन है?

इसकी रचना जगद्गुरु आदि शंकराचार्य (Adi Shankaracharya) ने की है। यह उनकी गणेश भक्ति और तंत्र विद्या पर,गहन पकड़ का प्रमाण है।