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Vakratunda Ganesha Stavaraja - The King of Ganesha Hymns

Vakratunda Ganesha Stavaraja

Vakratunda Ganesha Stavaraja - The King of Ganesha Hymns
॥ वक्रतुण्ड गणेश स्तवराजः ॥ अस्य गायत्री मन्त्रः । ओं तत्पुरुषाय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि । तन्नो दन्तिः प्रचोदयात् ॥ ओङ्कारमाद्यं प्रवदन्ति सन्तो वाचः श्रुतीनामपि यं गृणन्ति । गजाननं देवगणानताङ्घ्रिं भजेऽहमर्धेन्दुकलावतंसम् ॥ १ ॥ पादारविन्दार्चन तत्पराणां संसारदावानलभङ्गदक्षम् । निरन्तरं निर्गतदानतोयै- -स्तं नौमि विघ्नेश्वरमम्बुदाभम् ॥ २ ॥ कृताङ्गरागं नवकुङ्कुमेन मत्तालिजालं मदपङ्कमग्नम् । निवारयन्तं निजकर्णतालैः को विस्मरेत्पुत्रमनङ्गशत्रोः ॥ ३ ॥ शम्भोर्जटाजूटनिवासिगङ्गा- -जलं समानीय कराम्बुजेन । लीलाभिराराच्छिवमर्चयन्तं गजाननं भक्तियुता भजन्ति ॥ ४ ॥ कुमारमुक्तौ पुनरात्महेतोः पयोधरौ पर्वतराजपुत्र्याः । प्रक्षालयन्तं करशीकरेण मौग्ध्येन तं नागमुखं भजामि ॥ ५ ॥ त्वया समुद्धृत्य गजास्य हस्ता- -द्ये शीकराः पुष्कररन्ध्रमुक्ताः । व्योमाङ्गणे ते विचरन्ति ताराः कालात्मना मौक्तिकतुल्यभासः ॥ ६ ॥ क्रीडारते वारिनिधौ गजास्ये वेलामतिक्रामति वारिपूरे । कल्पावसानं परिचिन्त्य देवाः कैलासनाथं श्रुतिभिः स्तुवन्ति ॥ ७ ॥ नागानने नागकृतोत्तरीये क्रीडारते देवकुमारसङ्घैः । त्वयि क्षणं कालगतिं विहाय तौ प्रापतुः कन्दुकतामिनेन्दू ॥ ८ ॥ मदोल्लसत्पञ्चमुखैरजस्र- -मध्यापयन्तं सकलागमार्थम् । देवानृषीन्भक्तजनैकमित्रं हेरम्बमर्कारुणमाश्रयामि ॥ ९ ॥ पादाम्बुजाभ्यामतिवामनाभ्यां कृतार्थयन्तं कृपया धरित्रीम् । अकारणं कारणमाप्तवाचां तं नागवक्त्रं न जहाति चेतः ॥ १० ॥ येनार्पितं सत्यवतीसुताय पुराणमालिख्य विषाणकोट्या । तं चन्द्रमौलेस्तनयं तपोभि- -रावाप्यमानन्दघनं भजामि ॥ ११ ॥ पदं श्रुतीनामपदं स्तुतीनां लीलावतारं परमात्ममूर्तेः । नागात्मको वा पुरुषात्मको वा त्वभेद्यमाद्यं भज विघ्नराजम् ॥ १२ ॥ पाशाङ्कुशौ भग्नरदं त्वभीष्टं करैर्दधानं कररन्ध्रमुक्तैः । मुक्ताफलाभैः पृथुशीकरौघैः सिञ्चन्तमङ्गं शिवयोर्भजामि ॥ १३ ॥ अनेकमेकं गजमेकदन्तं चैतन्यरूपं जगदादिबीजम् । ब्रह्मेति यं वेदवितो वदन्ति तं शम्भुसूनुं सततं प्रपद्ये ॥ १४ ॥ स्वाङ्कस्थिताया निजवल्लभाया मुखाम्बुजालोकन लोलनेत्रम् । स्मेराननाब्जं मदवैभवेन रुद्धं भजे विश्वविमोहनं तम् ॥ १५ ॥ ये पूर्वमाराध्य गजानन त्वां सर्वाणि शास्त्राणि पठन्ति तेषाम् । त्वत्तो न चान्यत्प्रतिपाद्यमेतै- -स्तदस्ति चेत्सर्वमसत्यकल्पम् ॥ १६ ॥ हिरण्यवर्णं जगदीशितारं कविं पुराणं रविमण्डलस्थम् । गजाननं यं प्रविशन्ति सन्त- -स्तत्कालयोगैस्तमहं प्रपद्ये ॥ १९ ॥ वेदान्तगीतं पुरुषं भजेऽह- -मात्मानमानन्दघनं हृदिस्थम् । गजाननं यन्महसा जनानां विघ्नान्धकारो विलयं प्रयाति ॥ १८ ॥ शम्भोः समालोक्य जटाकलापे शशाङ्कखण्डं निजपुष्करेण । स्वभग्नदन्तं प्रविचिन्त्य मौग्ध्या- -दाक्रष्टुकामः श्रियमातनोतु ॥ १९ ॥ विघ्नार्गलानां विनिपातनार्थं यं नारिकेलैः कदलीफलाद्यैः । प्रतारयन्ते मदवारणास्यं प्रभुं सदाऽभीष्टमहं भजेयम् ॥ २० ॥ यज्ञैरनेकैर्बहुभिस्तपोभि- -राराध्यमाद्यं गजराजवक्त्रम् । स्तुत्यानया ये विधिवत्स्तुवन्ति ते सर्वलक्ष्मीनिलया भवन्ति ॥ २१ ॥ इति श्री वक्रतुण्ड गणेश स्तवराजः ।

स्तवराज रहस्य (The Secret of the King of Hymns)

इसे "स्तवराज" (स्तुतियों का राजा) इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह गणेश जी को केवल एक देवता नहीं, बल्कि साक्षात परब्रह्म (Highest Brahman) के रूप में स्थापित करता है। श्लोक 14 में स्पष्ट घोषणा है:

"ब्रह्मेति यं वेदवितो वदन्ति" (वेद के ज्ञाता जिसे 'ब्रह्म' कहते हैं, वह आप ही हैं)।

यह स्तोत्र ओंकार (ॐ) से शुरू होकर वेदांत के गहन तत्वों तक ले जाता है।

ब्रह्मांडीय लीला (Cosmic Play)

कवि ने यहाँ अद्भुत कल्पना की है जो गणेश जी की विराटता दर्शाती है:
  • सूर्य-चन्द्र से खेल: श्लोक 8 में कहा गया है कि खेल में मग्न गणेश जी के लिए सूर्य और चन्द्रमा "कन्दुक" (गेंद) के समान हो जाते हैं। यह बताता है कि वे 'काल' (समय) से परे हैं।
  • तारों की उत्पत्ति: श्लोक 6 में आकाश के तारों की तुलना गणेश जी की सूंड से निकले जल-कणों (Water Spray) से की गई है।

लाभ और फलश्रुति (Benefits)

  • सर्व लक्ष्मी प्राप्ति: श्लोक 21 का वचन है कि इसके पाठ से साधक "सर्व लक्ष्मी निलय" (समस्त संपत्तियों का घर) बन जाता है।
  • ज्ञान और लेखन: श्लोक 11 में गणेश जी को अपनी दंत-कोटि से पुराण लिखने वाला बताया गया है। यह लेखकों और छात्रों के लिए अत्यंत शुभ है।
  • विघ्न विनाश: श्लोक 18 के अनुसार, उनके तेज़ से विघ्न रूपी अंधकार (Vighna-Andhakara) विलीन हो जाता है।

प्रश्नोत्तरी (FAQ)

"स्तवराज" का अर्थ क्या है?

"स्तवराज" का अर्थ है स्तुतियों का राजा। यह दर्शाता है कि दार्शनिक गहराई और काव्य सौंदर्य में यह स्तोत्र गणेश जी की अन्य स्तुतियों में सर्वोच्च स्थान रखता है।

स्तोत्र का आरंभ कैसे होता है?

इसका आरंभ "ओङ्कारमाद्यं प्रवदन्ति सन्तः" से होता है, जो घोषित करता है कि संत जन गणेश जी को आदि ओंकार और वेदों का मूल मानते हैं।

सूर्य और चन्द्रमा को "कन्दुक" क्यों कहा गया है?

श्लोक 8 में वर्णित है कि गणेश जी के लिए सूर्य और चन्द्रमा गेंद (Balls) के समान हैं। यह उनकी काल (समय) और ब्रह्मांड पर पूर्ण सत्ता को दर्शाता है।

क्या इसमें गणेश जी के लेखक रूप का वर्णन है?

हाँ। श्लोक 11 में स्पष्ट उल्लेख है कि उन्होंने सत्यवती नंदन (वेद व्यास) के लिए अपनी विषाण कोटि (दांत की नोंक) से पुराणों का लेखन किया।

तारों की तुलना किससे की गई है?

श्लोक 6 में आकाश के तारों को गणेश जी की सूंड से निकले जल-कणों (शीकर) या मोतियों के समान बताया गया है।

इस स्तोत्र में उनकी स्तुति कौन करता है?

देवता, ऋषि, और यहाँ तक कि स्वयं शिव (शम्भु) भी उनकी लीलाओं को देखकर मुग्ध होते हैं और आराधना करते हैं।

गणेश जी को कौन सा नैवेद्य प्रिय है?

श्लोक 20 में नालिकेर (नारियल) और कदली फल (केले) का विशेष उल्लेख है जो विघ्नों के नाश के लिए अर्पित किए जाते हैं।

क्या उन्हें यहाँ 'ब्रह्म' माना गया है?

बिलकुल। श्लोक 14 में उन्हें "जगदादिबीजम्" (जगत का आदि बीज) और वह ब्रह्म कहा गया है जिसे वेदज्ञ जानते हैं।

इस पाठ का मुख्य फल क्या है?

श्लोक 21 के अनुसार, जो इसका विधिवत पाठ करता है, वह "सर्व लक्ष्मी निलय" (समस्त संपत्तियों और ऐश्वर्य का निवास स्थान) बन जाता है।

"वक्रतुण्ड" का आध्यात्मिक अर्थ क्या है?

"वक्रतुण्ड" का अर्थ है "टेढ़ी सूंड वाला"। आध्यात्मिक रूप से, यह वह शक्ति है जो हमारे कर्मों और अज्ञान के टेढ़े-मेढ़े रास्तों को सीधा कर विघ्नों को हर लेती है।