Surya Grahana Shanti Parihara Shloka – सूर्यग्रहण शान्ति परिहार श्लोकाः

अष्ट दिक्पाल और उनके विशेषण (Eight Dikpalas)
| दिक्पाल | दिशा | विशेषण | वाहन |
|---|---|---|---|
| इन्द्र | पूर्व | वज्रधर, सहस्रनयन, आदित्य प्रभु | ऐरावत (हाथी) |
| अग्नि | अग्नि कोण | सप्तार्चि, अमितद्युति, देवमुख | मेष (भेड़) |
| यम | दक्षिण | कर्मसाक्षी, दण्डधर | महिष (भैंसा) |
| निर्ऋति | नैऋत्य कोण | रक्षोगणाधिप, उग्र, कराल | नर (मनुष्य) |
| वरुण | पश्चिम | नागपाशधर, जललोकेश | मकर (मगर) |
| वायु | वायव्य कोण | प्राणरूप, कृष्णमृगप्रिय | मृग (हिरण) |
| कुबेर | उत्तर | निधिपति, खड्गशूलधर | नर (मनुष्य) |
| रुद्र/ईशान | ईशान कोण | शूलधर, शंकर | वृष (बैल) |
श्लोकों का अर्थ (Meaning)
शान्ति श्लोक: इन्द्र, अग्नि, यम (दण्डधर), राक्षसपति (निर्ऋति), वरुण (प्राचेतस), वायु, कुबेर और शर्व (रुद्र) - ये सभी मेरी जन्म राशि और नक्षत्र में स्थित सूर्य ग्रहण को शांत करें।
श्लोक 1 (इन्द्र): जो वज्र धारण करते हैं, आदित्यों के स्वामी हैं, सहस्र नेत्रों वाले शक्र - वे ग्रहण पीड़ा दूर करें।
श्लोक 2 (अग्नि): जो सभी देवताओं के मुख हैं, सात ज्वालाओं वाले, अमित तेज वाले अग्नि - चंद्र-सूर्य ग्रहण की पीड़ा दूर करें।
श्लोक 3 (यम): जो कर्मों के साक्षी हैं, महिष वाहन यम - ग्रहण पीड़ा दूर करें।
श्लोक 4 (निर्ऋति): राक्षस गणों के अधिपति, प्रलयाग्नि समान, उग्र और भयंकर निर्ऋति - ग्रहण पीड़ा दूर करें।
श्लोक 5 (वरुण): नाग पाश धारी, मकर वाहन, जल लोक के स्वामी वरुण - ग्रहण पीड़ा दूर करें।
श्लोक 6 (वायु): जो सभी प्राणियों के प्राण रूप हैं, काले मृग प्रिय वायु - ग्रहण पीड़ा दूर करें।
श्लोक 7 (कुबेर): निधियों के स्वामी, खड्ग-शूल धारी श्रेष्ठ देव - मेरे कलुष (पाप) दूर करें।
श्लोक 8 (रुद्र): शूल धारी रुद्र, शंकर, वृष वाहन - ग्रहण दोष शीघ्र नष्ट करें।
ग्रहण में पाठ विधि (Recitation During Eclipse)
- कब पढ़ें: ग्रहण प्रारंभ से पहले और ग्रहण काल में
- वेध काल: सूर्य ग्रहण से 12 घंटे पहले वेध प्रारंभ
- स्नान: ग्रहण समाप्ति पर स्नान अवश्य करें
- दान: ग्रहण बाद तिल, गुड़, वस्त्र दान करें
- गर्भवती: विशेष सावधानी - घर में रहें, मंत्र पाठ करें
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)