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Sri Vittala Stavaraja – श्री विठ्ठल स्तवराजः (रुद्रपुराणोक्तम्)

Sri Vittala Stavaraja – श्री विठ्ठल स्तवराजः (रुद्रपुराणोक्तम्)
॥ श्री विठ्ठल स्तवराजः ॥ ॥ विनियोगः ॥ अस्य श्रीविठ्ठलस्तवराजस्तोत्रमहामन्त्रस्य भगवान् वेदव्यास ऋषिः अतिजगती छन्दः श्रीविठ्ठलः परमात्मा देवता त्रिमूर्त्यात्मका इति बीजं सृष्टिसंरक्षणार्थेति शक्तिः वरदाभयहस्तेति कीलकं मम सर्वाभीष्टफलसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः । ॥ अथ न्यासः ॥ ओं नमो भगवते विठ्ठलाय अङ्गुष्ठाभ्यां नमः । ओं तत्त्वप्रकाशात्मने तर्जनीभ्यां नमः । ओं शङ्खचक्रगदाधरात्मने मध्यमाभ्यां नमः । ओं सृष्टिसंरक्षणार्थाय अनामिकाभ्यां नमः । ओं त्रिमूर्त्यात्मकाय कनिष्ठिकाभ्यां नमः । ओं वरदाभयहस्ताय करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः । एवं हृदयादिन्यासः । भूर्भुवस्सुवरोमिति दिग्बन्धः । ॥ ध्यानम् ॥ श्रीगुरुं विठ्ठलानन्दं परात्परजगत्प्रभुम् । त्रैलोक्यव्यापकं देवं शुद्धमत्यन्तनिर्मलम् ॥ १ ॥ नासाग्रेऽवस्थितं देवमाब्रह्मस्तम्बसम्युतम् । ऊर्णतन्तुनिभाकारं सूत्रज्ञं विठ्ठललं स्वयम् ॥ २ ॥ गङ्गायमुनयोर्मध्ये त्रिकूटं रङ्गमन्दिरम् । ज्ञानं भीमरथीतीरं स्वदेवं पण्डरीपुरम् ॥ ३ ॥ रुक्मणीशक्तिहस्तेन क्रीडन्तं चललोचनम् । आज्ञाब्रह्मबिलान्तःस्थ ज्योतिर्मयस्वरूपकम् ॥ ४ ॥ सहस्रदलपद्मस्थं सर्वाभरणभूषितम् । सर्वदेवसमुत्पन्नं ओमितिज्योतिरूपकम् ॥ ५ ॥ समपर्वत ऊर्ध्वस्थं श्रोणित्रयसहस्रकम् । स्तम्भो मध्यं यथा स्थानं कलौ वेङ्कटनायकम् ॥ ६ ॥ पीतवस्त्रपरीधानं तुलसीवनमालिनम् । शङ्खचक्रधरं देवं वरदाभयहस्तकम् ॥ ७ ॥ ऊर्ध्वपुण्ड्रमयं देवं चित्राभरणभूषितम् । रत्नसिंहासनं देवं सुवर्णमुकुटोज्ज्वलम् ॥ ८ ॥ रत्नकिङ्किणिकेयूरं रत्नमण्टपशोभितम् । पौण्ड्रं च पालिनं रङ्गं यदूनां कुलदीपकम् ॥ ९ ॥ देवारिदैत्यदर्पघ्नं सर्वलोकैकनायकम् । ओं नमः शान्तिरूपाय सर्वलोकैकसिद्धये ॥ १० ॥ ॥ स्तोत्रम् ॥ सर्वदेवस्वरूपाय सर्वयन्त्रस्वरूपिणे । सर्वतन्त्रस्वरूपाय विठ्ठलाय नमो नमः ॥ ११ ॥ परमन्त्रप्रणाशाय परयन्त्रनिवारिणे । परतन्त्रविनाशाय विठ्ठलाय नमो नमः ॥ १२ ॥ परात्परस्वरूपाय परमात्मस्वरूपिणे । परब्रह्मस्वरूपाय विठ्ठलाय नमो नमः ॥ १३ ॥ विश्वरूपस्वरूपाय विश्वव्यापिस्वरूपिणे । विश्वम्भरस्वमित्राय विठ्ठलाय नमो नमः ॥ १४ ॥ परमहंसस्वरूपाय सोऽहं हंसस्वरूपिणे । हंसमन्त्रस्वरूपाय विठ्ठलाय नमो नमः ॥ १५ ॥ अनिर्वाच्यस्वरूपाय अखण्डब्रह्मरूपिणे । आत्मतत्त्वप्रकाशाय विठ्ठलाय नमो नमः ॥ १६ ॥ क्षराक्षरस्वरूपाय अक्षराय स्वरूपिणे । ओङ्कारवाच्यरूपाय विठ्ठलाय नमो नमः ॥ १७ ॥ बिन्दुनादकलातीतभिन्नदेहसमप्रभ । अभिन्नायैव विश्वाय विठ्ठलाय नमो नमः ॥ १८ ॥ भीमातीरनिवासाय पण्डरीपुरवासिने । पाण्डुरङ्गप्रकाशाय विठ्ठलाय नमो नमः ॥ १९ ॥ सर्वयोगार्थतत्त्वज्ञ सर्वभूतहितेरत । सर्वलोकहितार्थाय विठ्ठलाय नमो नमः ॥ २० ॥ ॥ फलश्रुति ॥ य इदं पठते नित्यं त्रिसन्ध्यं स्तौति माधवम् । सर्वयोगप्रदं नित्यं दीर्घमायुष्यवर्धनम् ॥ २१ ॥ सर्वे ज्वरा विनश्यन्ति मुच्यते सर्वबन्धनात् । आवर्तनसहस्रात्तु लभते वाञ्छितं फलम् ॥ २२ ॥ य इदं परमं गुह्यं सर्वत्र न प्रकाशयेत् । स ब्रह्मज्ञानमाप्नोति भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ॥ २३ ॥ सर्वभूतप्रशमनं सर्वदुःखनिवारणम् । सर्वापमृत्युशमनं सर्वराजवशीकरम् ॥ २४ ॥ अलक्ष्मीनाशनं चैव सुलक्ष्मीसुखदायकम् । त्रिसन्ध्यं पठते भक्त्या निर्भयो भवति ध्रुवम् ॥ २५ ॥ सङ्ग्रामे सङ्कटे चैव विवादे शत्रुमध्यगे । शृङ्खलाबन्धने चैव मुच्यते सर्वकिल्बिषात् ॥ २६ ॥ राजद्वारे सभास्थाने सिंहव्याघ्रभयेषु च । साधकः स्तम्भने चैव सर्वत्र विजयी भवेत् ॥ २७ ॥ ॥ इति श्रीरुद्रपुराणे वामकेश्वरतन्त्रे नारदवसिष्ठसंवादे श्री विठ्ठल स्तवराजः सम्पूर्णम् ॥

परिचय: श्री विठ्ठल स्तवराजः (Introduction to Vitthal Stavaraja)

श्री विठ्ठल स्तवराजः (Sri Vittala Stavaraja) वैष्णव और तान्त्रिक वाङ्मय की एक दुर्लभ मणि है। यह स्तोत्र प्राचीन 'रुद्र पुराण' के अंतर्गत 'वामकेश्वर तन्त्र' से उद्धृत है। यह देवर्षि नारद और महर्षि वसिष्ठ के बीच हुए एक पावन संवाद के रूप में प्रस्तुत किया गया है। यद्यपि भगवान विट्ठल (विठोबा) को महाराष्ट्र के भक्ति आंदोलन के केंद्र के रूप में जाना जाता है, किन्तु यह स्तवराज उनके उस "विराट्" और "तान्त्रिक" स्वरूप का दर्शन कराता है जो ब्रह्मांड की उत्पत्ति, स्थिति और लय का मूल कारण है।

इस स्तोत्र की संरचना अत्यंत वैज्ञानिक है। यह केवल भक्तिपरक श्लोकों का संग्रह नहीं है, बल्कि एक "महामन्त्र" है, जिसमें विनियोग, ऋषि, छन्द और न्यास (अंगन्यास व करन्यास) का स्पष्ट विधान है। "विठ्ठल" शब्द का दार्शनिक अर्थ ही ज्ञान और योग से जुड़ा है। इस स्तवराज में भगवान विठ्ठल को 'परब्रह्म', 'परमहंस' और 'ओंकार' का साक्षात् विग्रह माना गया है। श्लोक ३ में पण्डरीपुर (पंढरपुर) और भीमरथी (भीमा नदी) के तट का उल्लेख उनके पावन धाम की महिमा को सिद्ध करता है।

स्तोत्र में भगवान को "सर्वयन्त्रस्वरूपिणे" और "सर्वतन्त्रस्वरूपाय" कहकर संबोधित किया गया है, जो यह स्पष्ट करता है कि समस्त यंत्रों और तंत्रों की शक्ति भगवान विठ्ठल में ही समाहित है। यह पाठ उन साधकों के लिए विशेष रूप से प्रभावी है जो योग और ध्यान के मार्ग पर अग्रसर हैं, क्योंकि यह आज्ञा चक्र और सहस्रदल कमल के साथ भगवान के सूक्ष्म संबंध को प्रतिपादित करता है।

आधुनिक जीवन के संघर्षों, मानसिक अशांति और अज्ञात भयों के निवारण हेतु श्री विठ्ठल स्तवराजः एक अमोघ अस्त्र के समान है। यह साधक को आत्मज्ञान (Brahma Jnana) की ओर ले जाता है और उसे सांसारिक भोगों के साथ-साथ मोक्ष (भुक्ति और मुक्ति) का अधिकारी बनाता है।

विशिष्ट महत्व और आध्यात्मिक रहस्य (Significance & Philosophy)

१. तान्त्रिक रक्षा कवच: इस स्तवराज का १२वां श्लोक अत्यंत महत्वपूर्ण है—"परमन्त्रप्रणाशाय परयन्त्रनिवारिणे । परतन्त्रविनाशाय विठ्ठलाय नमो नमः"। यह श्लोक किसी भी प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा, शत्रु द्वारा किए गए प्रयोगों और बाहरी तन्त्र-बाधाओं को नष्ट करने का सामर्थ्य रखता है।

२. विठ्ठल और वेङ्कटनायक की एकता: श्लोक ६ में एक अद्भुत रहस्य उद्घाटित किया गया है—"कलौ वेङ्कटनायकम्"। यहाँ पंढरपुर के विठ्ठल और तिरुपति के भगवान वेङ्कटनायक (बालाजी) की एकता को दर्शाया गया है, जो यह सिद्ध करता है कि कलयुग में भगवान का यही स्वरूप समस्त जीवों का रक्षक है।

३. सूक्ष्म योगिक दर्शन: ध्यान के श्लोकों में भगवान को 'नासाग्र' (नाक के अग्र भाग) पर स्थित और 'सहस्रदल पद्म' में विराजमान बताया गया है। यह कुण्डलिनी योग के उच्च स्तरों की ओर संकेत करता है, जहाँ भगवान को ज्योति स्वरूप में अनुभव किया जाता है।

फलश्रुति: पाठ के चमत्कारी लाभ (Benefits from Phala Shruti)

इस स्तोत्र की फलश्रुति (श्लोक २१-२७) में भगवान शिव और ऋषियों ने इसके अद्भुत लाभों का वर्णन किया है:

  • सर्व व्याधि और ज्वर नाश: "सर्वे ज्वरा विनश्यन्ति" — पुराने से पुराने बुखार (ज्वर) और शारीरिक कष्ट इस पाठ के प्रभाव से समूल नष्ट हो जाते हैं।
  • दीर्घायु और आरोग्य: नित्य त्रिकाल पाठ करने से साधक की आयु में वृद्धि होती है और वह निरोगी रहता है।
  • राज-द्वार और विवाद में विजय: "राजद्वारे सभास्थाने... सर्वत्र विजयी भवेत्" — कोर्ट-कचहरी के विवादों, कानूनी मुकदमों और राजनैतिक कार्यों में यह पाठ साधक को सफलता और विजय दिलाता है।
  • शत्रु स्तम्भन और भय मुक्ति: शेर, बाघ और हिंसक जंतुओं के भय से लेकर शत्रुओं के षड्यंत्रों तक, यह पाठ साधक को पूर्ण सुरक्षा और 'स्तम्भन' की शक्ति प्रदान करता है।
  • दरिद्रता निवारण (Alakshmi Nashan): "अलक्ष्मीनाशनं चैव सुलक्ष्मीसुखदायकम्" — यह स्तोत्र घर की दरिद्रता को मिटाकर ऐश्वर्य और सुखद लक्ष्मी की प्राप्ति कराता है।
  • ब्रह्मज्ञान और मुक्ति: श्रद्धापूर्वक पाठ करने वाला साधक ब्रह्मज्ञान प्राप्त करता है और संसार के बंधनों से मुक्त होकर 'भुक्ति' (सांसारिक सुख) और 'मुक्ति' (मोक्ष) पाता है।

पाठ विधि एवं साधना विधान (Ritual Method)

श्री विठ्ठल स्तवराजः एक सिद्ध स्तोत्र है, अतः इसका पाठ पूर्ण विधि-विधान के साथ करना विशेष फलदायी होता है:

साधना के नियम

  • समय: फलश्रुति के अनुसार 'त्रिसन्ध्यं' (प्रातः, दोपहर और सायंकाल) पाठ करना सर्वोत्तम है। यदि संभव न हो, तो प्रातः काल स्नान के उपरांत पाठ अवश्य करें।
  • शुद्धि: स्वच्छ पीले या श्वेत वस्त्र धारण करें। विठ्ठल भगवान को पीला रंग (पीताम्बर) प्रिय है।
  • न्यास: पाठ प्रारंभ करने से पहले 'न्यास' (अंगन्यास व करन्यास) अवश्य करें। इससे साधक का शरीर मन्त्रमय और सुरक्षित हो जाता है।
  • माला: जप के लिए तुलसी की माला या चन्दन की माला का प्रयोग करें।
  • ध्यान: भीमा नदी के तट पर कमर पर हाथ रखे (समचरण) खड़े भगवान पाण्डुरङ्ग और माता रुक्मिणी का हृदय में ध्यान करें।

विशेष प्रयोग

  • संकट काल में: किसी बड़ी विपत्ति या शत्रुओं से घिरे होने पर इस स्तोत्र का ११ या २१ बार पाठ करना चमत्कारिक फल देता है।
  • अनुष्ठान: विशेष सिद्धि के लिए १००० आवर्तन (पाठ) का अनुष्ठान किया जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

१. श्री विठ्ठल स्तवराजः किस ग्रंथ से लिया गया है?

यह स्तोत्र 'रुद्र पुराण' के अंतर्गत 'वामकेश्वर तन्त्र' से उद्धृत है। यह नारद और वसिष्ठ मुनि के बीच का संवाद है।

२. क्या यह स्तोत्र रोगों को ठीक कर सकता है?

जी हाँ, फलश्रुति में स्पष्ट कहा गया है कि 'सर्वे ज्वरा विनश्यन्ति' अर्थात् सभी प्रकार के बुखार और शारीरिक व्याधियाँ इसके पाठ से नष्ट होती हैं।

३. 'परमन्त्रप्रणाशाय' का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है दूसरों के द्वारा किए गए घातक मन्त्रों, तन्त्रों और यंत्रों के प्रभाव को नष्ट करना। यह एक अत्यंत शक्तिशाली रक्षा मन्त्र है।

४. क्या गृहस्थ व्यक्ति इस स्तवराज का पाठ कर सकता है?

हाँ, भगवान विठ्ठल स्वयं भक्त पुण्डलीक की सेवा और पितृभक्ति से प्रसन्न होकर पंढरपुर आए थे। कोई भी गृहस्थ शुद्ध भाव से इसका पाठ कर सकता है।

५. पाठ के लिए तुलसी की माला का क्या महत्व है?

विठ्ठल भगवान कृष्ण का ही रूप हैं और उन्हें तुलसी अत्यंत प्रिय है। तुलसी की माला पर पाठ करने से एकाग्रता बढ़ती है और भगवान की कृपा शीघ्र प्राप्त होती है।

६. क्या यह स्तोत्र कानूनी विवादों (Legal Issues) में मदद करता है?

हाँ, 'राजद्वारे' और 'विवादे' शब्दों के अनुसार यह स्तोत्र कोर्ट केस और सरकारी कार्यों में आने वाली बाधाओं को दूर करने में सहायक माना जाता है।

७. भगवान विठ्ठल को 'पाण्डुरङ्ग' क्यों कहा जाता है?

'पाण्डुरङ्ग' का अर्थ है वह जो श्वेत (ज्ञान के प्रकाश) रंग का है। आध्यात्मिक रूप से यह उनके शुद्ध सात्त्विक और दोषरहित स्वरूप को दर्शाता है।

८. क्या इस स्तोत्र का पाठ सार्वजनिक रूप से किया जा सकता है?

श्लोक २३ के अनुसार, यह 'परमं गुह्यं' (अत्यंत गोपनीय) है। इसे केवल श्रद्धावान और भक्ति भाव रखने वाले पात्र व्यक्तियों को ही बताया जाना चाहिए।

९. 'त्रिसन्ध्यं' पाठ का क्या तात्पर्य है?

त्रिसन्ध्यं का अर्थ है दिन में तीन बार—प्रातः काल (सूर्योदय), मध्याह्न (दोपहर) और सायंकाल (सूर्यास्त)। इन समयों पर पाठ करने से स्तोत्र का फल कई गुना बढ़ जाता है।

१०. पाठ के अंत में क्या करना चाहिए?

पाठ के अंत में भगवान विठ्ठल की आरती करें, क्षमा प्रार्थना करें और 'विठ्ठल-विठ्ठल' नाम का संकीर्तन करें।