Logoपवित्र ग्रंथ

Sri Vishnu Mahimna Stotram – श्री विष्णु महिम्नः स्तोत्रम्: महिमा का अनंत गान

Sri Vishnu Mahimna Stotram – श्री विष्णु महिम्नः स्तोत्रम्: महिमा का अनंत गान
॥ श्री विष्णु महिम्नः स्तोत्रम् ॥ महिम्नस्ते पारं विधिहरफणीन्द्रप्रभृतयो विदुर्नाद्याप्यज्ञश्चलमतिरहं नाथ नु कथम् । विजानीयामद्धा नलिननयनात्मीयवचसो विशुद्ध्यै वक्ष्यामीषदपि तु तथापि स्वमतितः ॥ १ ॥ यदाहुर्ब्रह्मैके पुरुषमितरे कर्म च परे- -ऽपरे बुद्धं चान्ये शिवमपि च धातारमपरे । तथा शक्तिं केचिद्गणपतिमुतार्कं च सुधियो मतीनां वै भेदात्त्वमसि तदशेषं मम मतिः ॥ २ ॥ शिवः पादाम्भस्ते शिरसि धृतवानादरयुतं तथा शक्तिश्चासौ तव तनुजतेजोमयतनुः । दिनेशं चैवामुं तव नयनमूचुस्तु निगमा- -स्त्वदन्यः को ध्येयो जगति किल देवो वद विभो ॥ ३ ॥ क्वचिन्मत्स्यः कूर्मः क्वचिदपि वराहो नरहरिः क्वचित् खर्वो रामो दशरथसुतो नन्दतनयः । क्वचिद्बुद्धः कल्की विहरसि कुभारापहृतये स्वतन्त्रोऽजो नित्यो विभुरपि तवाक्रीडनमिदम् ॥ ४ ॥ हृताम्नायेनोक्तं स्तवनवरमाकर्ण्य विधिना द्रुतं मात्स्यं धृत्वा वपुरजरशङ्खासुरमथो । क्षयं नीत्वा मृत्योर्निगमगणमुद्धृत्य जलधे- -रशेषं सङ्गुप्तं जगदपि च वेदैकशरणम् ॥ ५ ॥ निमज्जन्तं वार्धौ नगवरमुपालोक्य सहसा हितार्थं देवानां कमठवपुषाविश्य गहनम् । पयोराशिं पृष्ठे तमजित सलीलं धृतवतो जगद्धातुस्तेऽभूत्किमु सुलभभाराय गिरिकः ॥ ६ ॥ हिरण्याक्षः क्षोणीमविशदसुरो नक्रनिलयं समादायामर्त्यैः कमलजमुखैरम्बरगतैः । स्तुतेनानन्तात्मन्नचिरमवभाति स्म विधृता त्वया दंष्ट्राग्रेऽसाववनिरखिला कन्दुक इव ॥ ७ ॥ हरिः क्वास्तीत्युक्ते दनुजपतिनाऽऽपूर्यनिखिलं जगन्नादैः स्तम्भान्नरहरिशरीरेण करजैः । समुत्पत्याशूरस्यसुरवरमादारितवत- -स्तव ख्याता भूमन् किमु जगति नो सर्वगतता ॥ ८ ॥ विलोक्याऽजं द्वार्गं कपटलघुकायं सुररिपु- -र्निषिद्धोऽपि प्रादादसुरगुरुणात्मीयमखिलम् । प्रसन्नस्तद्भक्त्या त्यजसि किल नाद्यापि भवनं बलेर्भक्ताधीन्यं तव विदितमेवामरपते ॥ ९ ॥ समाधावासक्तं नृपतितनयैर्वीक्ष्य पितरं हतं बाणैः रोषाद्गुरुतरमुपादाय परशुम् । विना क्षत्रं विष्णो क्षितितलमशेषं कृतवसो- -ऽसकृत् किं भूभारोद्धरणपटुता ते न विदिता ॥ १० ॥ समाराध्योमेशं त्रिभुवनमिदं वासवमुखं वशे चक्रे चक्रिन्नगणयदनिशं जगदिदम् । गतोऽसौ लङ्केशस्त्वचिरमथ ते बाणविषयं न केनाप्तं त्वत्तः फलमविनयस्यासुररिपो ॥ ११ ॥ क्वचिद्दिव्यं शौर्यं क्वचिदपि रणे कापुरुषता क्वचिद्गीताज्ञानं क्वचिदपि परस्त्रीविहरणम् । क्वचिन्मृत्स्नाशित्वं क्वचिदपि च वैकुण्ठविभव- -श्चरित्रं ते नूनं शरणद विमोहाय कुधियाम् ॥ १२ ॥ न हिंस्यादित्येव ध्रुवमवितथं वाक्यमबुधै- -र्यथाग्नीषोमीयं पशुमिति तु विप्रैर्निगदितम् । तवैतन्नास्थानेऽसुरगणविमोहाय गदतः समृद्धिर्नीचानां नयकर हि दुःखाय जगतः ॥ १३ ॥ विभागे वर्णानां निगमनिचये चावनितले विलुप्ते सञजातो द्विजवरगृहे शम्भलपुरे । समारुह्याश्वं त्वं लसदसिकरो म्लेच्छनिकरान् निहन्तास्युन्मत्तान् किल कलियुगान्ते युगपते ॥ १४ ॥ गभीरे कासारे जलचरवराकृष्टचरणो रणेऽशक्तो मज्जन्नभयद जलेऽचिन्तयदसौ । यदा नागेन्द्रस्त्वां सपदि पदपाशादपगतो गतः स्वर्गं स्थानं भवति विपदां ते किमु जनः ॥ १५ ॥ सुतैः पृष्टो वेधाः प्रतिवचनदानेऽप्रभुरसा- -वथात्मन्यात्मानं शरणमगमत्त्वां त्रिजगताम् । ततस्तेऽस्तातङ्का ययुरथ मुदं हंसवपुषा त्वया ते सार्वज्ञं प्रथितममरेशेह किमु नो ॥ १६ ॥ समाविद्धो मातुर्वचनविशिखैराशु विपिनं तपः कृत्वा गत्वा तव परम तोषाय परमम् । ध्रुवो लेभे दिव्यं पदमचलमल्पेऽपि वयसि किमस्त्यस्मिन्लोके त्वयि वरद तुष्टे दुरधिगम् ॥ १७ ॥ वृकाद्भीतस्तूर्णं स्वजनभयभित्त्वां पशुपति- -र्भ्रमन्लोकान् सर्वान् शरणमुपयातेऽथ दनुजः । स्वयं भस्मीभूतस्तव वचनभङ्ग्युद्गतमतिः रमेश हो माया तव दुरनुमेयाऽखिलजनैः ॥ १८ ॥ हृतं दैत्यैर्दृष्ट्वाऽमृतघटमजय्यैस्तु नयतः कटाक्षैः सम्मोहं युवतिपरवेषेण दितिजान् । समग्रं पीयूषं सुभगसुरपूगायददतः समस्यापि प्रायस्तव खलु हि भृत्येष्वभिरतिः ॥ १९ ॥ समाकृष्टा दुष्टैर्द्रुपदतनयाऽलब्धशरणा सभायां सर्वात्मंस्तव चरणमुच्चैरुपगता । समक्षं सर्वेषामभवदचिरं चीरनिचयं स्मृतेस्ते साफल्यं नयनविषयं नो किमु सताम् ॥ २० ॥ वदन्त्येके स्थानं तव वरद वैकुण्ठमपरे गवां लोकं लोकं फणिनिलयपातालमितरे । तथान्ये क्षीरोदं हृदयनलिनं चापि तु सतां न मन्ये तत् स्थानं त्वहमिह च यत्रासि न विभो ॥ २१ ॥ शिवोऽहं रुद्राणामहममरराजो दिविषदां मुनीनां व्यासोऽहं सुरवर समुद्रोऽस्मि सरसाम् । कुबेरो यक्षाणामिति तव वचो मन्दमतये न जाने तज्जातं जगति ननु यन्नासि भगवान् ॥ २२ ॥ शिरो नाको नेत्रे शशिदिनकरावम्बरमुरो दिशः श्रोत्रे वाणी निगमनिकरस्ते कटिरिला । अकूपारो वस्तिश्चरणमपि पातालमिति वै स्वरूपं तेऽज्ञात्वा नृतनुमवजानन्ति कुधियः ॥ २३ ॥ शरीरं वैकुण्ठं हृदयनलिनं वाससदनं मनोवृत्तिस्तार्क्ष्यो मतिरियमथो सागरसुता । विहारस्तेऽवस्थात्रितयमसवः पार्षदगणो न पश्यंस्त्यज्ञास्त्वमिह बहिरहो याति जनता ॥ २४ ॥ सुघोरं कान्तारं विशति च तटाकं सुगहनं तथोत्तुङ्गं शृङ्गं सपदि च समारोहति गिरेः । प्रसूनार्थं चेतोऽम्बुजममलमेकं त्वयि विभो समर्प्याज्ञस्तूर्णं बत न च सुखं विन्दति जनः ॥ २५ ॥ कृतैकान्तावासा विगतनिखिलाशाः शमपराः जितश्वासोच्छ्वासास्त्रुटितभवपाशाः सुयमिनः । परं ज्योतिः पश्यन्त्यनघमभिपश्यन्तु मम तु श्रियाश्लिष्टं भूयान्नयनविषयं ते किल वपुः ॥ २६ ॥ कदा गङ्गोत्तुङ्गाऽमलतरतरङ्गाच्च पुलिने वसन्नाशापाशादखिलखलदाशादपगतः । अये लक्ष्मीकान्ताम्बुजनयन ताताऽमरपते प्रसीदेत्याजल्पन्नमरवर नेष्यामि समयम् ॥ २७ ॥ कदा शृङ्गैः स्फीते मुनिगणपरीते हिमनगे द्रुमावीते शीते सुरमधुरगीते प्रतिवसन् । क्वचिद्ध्यानासक्तो विषयसुविरक्तो भवहरं स्मरंस्ते पादाब्जं जनिहर समेष्यामि विलयम् ॥ २८ ॥ सुधापानं ज्ञानं न च विपुलदानं न निगमो न यागो नो योगो न च निखिलभोगोपरमणम् । जपो नो नो तीर्थव्रतमिह न चोग्रं त्वयि तपो विना भक्तिं तेऽलं भवभयविनाशाय मधुहन् ॥ २९ ॥ नमः सर्वेष्टाय श्रुतिशिखरदृष्टाय च नमो नमोऽसंश्लिष्टाय त्रिभुवननिविष्टाय च नमः । नमो विस्पष्टाय प्रणवपरिमृष्टाय च नमो नमस्ते सर्वात्मन् पुनरपि पुनस्ते मम नमः ॥ ३० ॥ कणान् कश्चिद्वृष्टेर्गणननिपुणस्तूर्णमवने- -स्तथाऽशेषान् पांसूनमित कलयेच्चापि तु जनः । नभः पिण्डीकुर्यादचिरमपिचेच्चर्मवदिदं तथापीशासौ ते कलयितुमलं नाखिलगुणान् ॥ ३१ ॥ क्व माहात्म्यं सीमोज्झितमविषयं वेदवचसां विभो मेऽतो चेतः क्व च विविधतापाहतमिदम् । मयेदं यत्किञ्चइद्गदितमथ बाल्येन तु गुरो गृहाणैतच्छुद्धार्पितमिह न हेयं हि महताम् ॥ ३२ ॥ इति हरिस्तवनं सुमनोहरं परमहंसजनेन समीरितम् । सुगमसुन्दरसारपदास्पदं तदिदमस्तु हरेरनिशं मुदे ॥ ३३ ॥ गदारथाङ्गाम्बुजकम्बुधारिणो रमासमाश्लिष्टतनोस्तनोतु नः । बिलेशयाधीशशरीरशायिनः शिवस्तवोऽजस्रमयं परं हरेः ॥ ३४ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ पठेदिमं यस्तु नरः परस्तवं समाहितोऽघौघघनप्रभञ्जनम् । स विन्दतेऽत्राखिल भोगसम्पदो महीयते विष्णुपदे ततो ध्रुवम् ॥ ३५ ॥ ॥ इति श्रीविष्णु महिम्नः स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

परिचय: श्री विष्णु महिम्नः स्तोत्रम् की दार्शनिक गहराई (Introduction)

श्री विष्णु महिम्नः स्तोत्रम् (Sri Vishnu Mahimna Stotram) वैष्णव साहित्य का एक अत्यंत तेजस्वी और दार्शनिक स्तोत्र है। इसकी रचना १९वीं शताब्दी के महान योगी और विद्वान परमहंस स्वामी ब्रह्मानंद द्वारा की गई थी। जिस प्रकार पुष्पदंत द्वारा रचित 'शिव महिम्न स्तोत्र' भगवान शिव की असीम महिमा का गान करता है, उसी प्रकार स्वामी ब्रह्मानंद कृत यह स्तोत्र भगवान विष्णु के विराट स्वरूप और उनके अनंत अवतारों की वंदना करता है। इसमें कुल ३५ श्लोक हैं, जो न केवल काव्य की दृष्टि से सुंदर हैं, बल्कि दार्शनिक रूप से अद्वैत और भक्ति का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत करते हैं।

इस स्तोत्र का प्रारंभ ही एक महान स्वीकृति के साथ होता है— "महिम्नस्ते पारं विधिहरफणीन्द्रप्रभृतयो विदुर्नाद्याप्यज्ञश्चलमतिरहं..."। यहाँ ऋषि स्वीकार करते हैं कि जिसकी महिमा का अंत स्वयं ब्रह्मा, शिव और शेषनाग भी आज तक नहीं पा सके, उसकी स्तुति एक अल्पबुद्धि वाला मनुष्य कैसे कर सकता है? यह विनम्रता ही वास्तविक भक्ति का द्वार है। स्वामी ब्रह्मानंद ने इस स्तोत्र में भगवान विष्णु को केवल एक व्यक्ति विशेष के रूप में नहीं, बल्कि उस 'परम ब्रह्म' के रूप में चित्रित किया है जो बुद्ध, शिव, शक्ति और गणपति जैसे विभिन्न रूपों में पूजा जाता है।

ऐतिहासिक और तांत्रिक शोध की दृष्टि से, यह स्तोत्र भगवान विष्णु के दशावतारों (मत्स्य से कल्कि तक) का एक क्रमिक और संक्षिप्त वर्णन है। श्लोक संख्या ५ से १५ तक में भगवान की विभिन्न लीलाओं—जैसे वेदों की रक्षा, समुद्र मंथन, हिरण्याक्ष वध, बलि का अहंकार मर्दन और गजेन्द्र मोक्ष—का वर्णन किया गया है। यह पाठ आज के आधुनिक युग में मानसिक अवसाद और आध्यात्मिक शून्यता को भरने के लिए एक दिव्य प्रकाश स्तंभ के समान है।

विशिष्ट महत्व: भक्ति और ज्ञान का संगम (Significance)

श्री विष्णु महिम्न स्तोत्र का महत्व उसकी उदारता में निहित है। श्लोक २ में आचार्य कहते हैं कि लोग अपनी मति के अनुसार आपको ब्रह्मा, पुरुष, कर्म, बुद्ध, शिव, शक्ति या सूर्य कहते हैं, लेकिन वास्तव में आप ही वे सब हैं। इस स्तोत्र का विशिष्ट महत्व निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है:

  • विश्वरूप दर्शन: श्लोक २३ में भगवान के शरीर को संपूर्ण ब्रह्मांड के रूप में वर्णित किया गया है—आकाश उनका सिर है, सूर्य-चंद्रमा उनकी आँखें हैं, और पाताल उनके चरण हैं।
  • भक्ति की प्राथमिकता: श्लोक २९ में स्पष्ट कहा गया है कि बिना भक्ति के ज्ञान, दान, योग या तप संसार के भयों से मुक्ति दिलाने में असमर्थ हैं।
  • मानसिक शुद्धिकरण: इसकी संस्कृत ध्वनियाँ अवचेतन मन की नकारात्मकता को मिटाने और चित्त को शांत करने में सक्षम हैं।

फलश्रुति लाभ: पाठ से मिलने वाले दिव्य फल (Benefits)

स्तोत्र के अंतिम श्लोक (श्लोक ३५) में इसके चमत्कारी फलों का वर्णन स्वयं स्वामी ब्रह्मानंद ने किया है:

  • पापों का समूह विनाश: जिस प्रकार तेज हवा बादलों के झुंड को तितर-बितर कर देती है, उसी प्रकार यह स्तोत्र साधक के घोर पापों के समूह को नष्ट कर देता है।
  • अखिल भोग संपदा: यह स्तोत्र भौतिक सुख-समृद्धि, धन और ऐश्वर्य प्रदान करने वाला है। जो सांसारिक उन्नति चाहते हैं, उनके लिए यह विशेष फलदायी है।
  • विष्णु पद की प्राप्ति: अंततः साधक को भगवान विष्णु के परम पद (मोक्ष) की प्राप्ति निश्चित रूप से होती है।
  • मानसिक शांति और अभय: यह पाठ जन्म-मरण के भय और मृत्यु की विभीषिका से रक्षा करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. श्री विष्णु महिम्नः स्तोत्रम् के रचयिता कौन हैं?

इस दिव्य स्तोत्र की रचना महान योगी और विद्वान परमहंस स्वामी ब्रह्मानंद ने की थी।

2. 'महिम्नः' शब्द का अर्थ क्या है?

संस्कृत में 'महिम्नः' का अर्थ है 'महिमा का'। अतः विष्णु महिम्न का अर्थ है भगवान विष्णु की असीम महिमा का गुणगान करने वाला ग्रंथ।

3. क्या यह स्तोत्र शिव महिम्न स्तोत्र के समान है?

हाँ, ओज और दार्शनिक गहराई की दृष्टि से यह शिव महिम्न के समान ही शक्तिशाली है। जहाँ वह शिव को समर्पित है, यह भगवान विष्णु के विराट स्वरूप को समर्पित है।

4. क्या इस स्तोत्र का पाठ करने से पाप नष्ट होते हैं?

जी हाँ, श्लोक ३५ में इसे "अघौघघनप्रभञ्जनम्" कहा गया है, जिसका अर्थ ही पापों के घने बादलों को नष्ट करने वाला है।

5. क्या इसे घर में नित्य पढ़ना शुभ है?

हाँ, घर में नित्य पाठ करने से घर की नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और परिवार में सुख-समृद्धि एवं शांति का वास होता है।

6. क्या स्त्रियाँ भी इस स्तोत्र का पाठ कर सकती हैं?

अवश्य। भगवान की भक्ति में कोई भेद नहीं है। कोई भी श्रद्धालु शुद्ध मन से इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है।

7. 'विश्वरूप' का वर्णन किस श्लोक में है?

श्लोक २३ में भगवान के ब्रह्मांडीय स्वरूप का वर्णन है, जहाँ आकाश, दिशाएं, सूर्य और चंद्रमा उनके अंगों के रूप में बताए गए हैं।

8. पाठ के लिए सबसे उत्तम समय कौन सा है?

प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त (४-६ बजे) पाठ के लिए सर्वोत्तम है। संध्या काल में पाठ करने से मानसिक थकान दूर होती है।

9. क्या केवल सुनने से भी लाभ मिलता है?

जी हाँ, यदि आप शुद्ध उच्चारण नहीं कर सकते, तो इसे एकाग्रता से सुनना भी पुण्यप्रद और शांतिदायक माना गया है।

10. पाठ के दौरान किस रंग के वस्त्र पहनना शुभ है?

भगवान विष्णु की साधना में पीताम्बर (पीला वस्त्र) धारण करना सात्विकता और समृद्धि का प्रतीक माना गया है।