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Sri Purushottama Stuti (Prahlada Krutam) – श्री पुरुषोत्तम स्तुतिः

Sri Purushottama Stuti (Prahlada Krutam) – श्री पुरुषोत्तम स्तुतिः
॥ श्री पुरुषोत्तम स्तुतिः (प्रह्लाद कृतम्) ॥ ओं नमः परमार्थार्थ स्थूलसूक्ष्मक्षराक्षर । व्यक्ताव्यक्त कलातीत सकलेश निरञ्जन ॥ १ ॥ गुणाञ्जन गुणाधार निर्गुणात्मन् गुणस्थिर । मूर्तामूर्त महामूर्ते सूक्ष्ममूर्ते स्फुटास्फुट ॥ २ ॥ करालसौम्यरूपात्मन् विद्याविद्यालयाच्युत । सदसद्रूप सद्भाव सदसद्भावभावन ॥ ३ ॥ नित्यानित्यप्रपञ्चात्मन् निष्प्रपञ्चामलाश्रित । एकानेक नमस्तुभ्यं वासुदेवादिकारण ॥ ४ ॥ यः स्थूलसूक्ष्मः प्रकटः प्रकाशो यः सर्वभूतः न च सर्वभूतः । विश्वं यतश्चैतदविश्वहेतो- -र्नमोऽस्तु तस्मै पुरुषोत्तमाय ॥ ५ ॥ ॥ इति श्रीविष्णुपुराणे प्रह्लादकृत श्री पुरुषोत्तम स्तुतिः सम्पूर्णा ॥

श्री पुरुषोत्तम स्तुतिः: भक्त प्रह्लाद का दार्शनिक उद्बोधन (Introduction)

श्री पुरुषोत्तम स्तुतिः (Sri Purushottama Stuti) सनातन धर्म के महान और प्रामाणिक ग्रंथों में से एक 'श्रीविष्णु पुराण' के प्रथम अंश से उद्धृत है। यह स्तुति भक्त प्रह्लाद की अनन्य निष्ठा और उनके गहन तत्वज्ञान का जीवंत प्रमाण है। जब प्रह्लाद को उनके पिता हिरण्यकशिपु द्वारा दिए गए भीषण कष्टों से भगवान विष्णु ने अपनी योगमाया से सुरक्षित रखा, तब प्रह्लाद के मुख से स्वतः ही यह दिव्य वन्दना प्रस्फुटित हुई। 'पुरुषोत्तम' का अर्थ है वह परम पुरुष जो नश्वर जगत और अविनाशी जीवात्मा, दोनों से परे और सर्वोच्च है।

यह स्तुति केवल ५ श्लोकों की है, परंतु इसकी गहराई असीमित है। प्रह्लाद भगवान को "स्थूलसूक्ष्मक्षराक्षर" कहकर संबोधित करते हैं। इसका तात्विक अर्थ यह है कि ईश्वर ही यह दृश्यमान विराट जगत है और वही अदृश्य सूक्ष्म शक्ति भी। वह परिवर्तनशील संसार भी है और अपरिवर्तनशील सत्य भी। यह शब्दावली वेदान्त के उस सिद्धांत को पुष्ट करती है जहाँ ईश्वर को 'निमित्त' और 'उपादान' कारण—दोनों माना गया है।

भक्त प्रह्लाद की यह वाणी सिद्ध करती है कि वे केवल एक बालक नहीं, बल्कि साक्षात् ज्ञान के अवतार थे। उनके लिए भगवान विष्णु केवल एक रक्षक नहीं थे, बल्कि वे 'निरञ्जन' (दोषरहित) और 'कलातीत' (काल से परे) परब्रह्म थे। यह स्तुति हमें सिखाती है कि जब भक्ति पूर्णता को प्राप्त करती है, तब साधक को ईश्वर की सर्वव्यापकता का अनुभव स्वयं ही होने लगता है।

विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व एवं अद्वैत रहस्य (Significance)

पुरुषोत्तम स्तुति का आध्यात्मिक महत्व इसके अद्वैत बोध में निहित है। प्रह्लाद भगवान को 'गुणाधार' (गुणों के आधार) और 'निर्गुणात्मन्' (गुणों से परे) दोनों कहते हैं। यह सगुण और निर्गुण भक्ति के अद्भुत मिलन का प्रतीक है।

  • सदसद्रूप (Sat-Asat): भगवान ही शाश्वत सत्य हैं और वही मायारूपी संसार भी हैं। वे ही ज्ञान के पुंज हैं और अज्ञान भी उन्हीं की शक्ति का एक रूप है।
  • विद्याविद्यालयाच्युत: प्रह्लाद यहाँ स्पष्ट करते हैं कि ज्ञान (विद्या) और अज्ञान (अविद्या), दोनों का अंतिम आश्रय 'अच्युत' (विष्णु) ही हैं। यह बोध मनुष्य को द्वंद्वों से मुक्त कर मानसिक स्थिरता प्रदान करता है।
  • वासुदेवादिकारण: वासुदेव ही सृष्टि के आदि कारण हैं। श्लोक ४ में बताया गया है कि वह परमात्मा 'एक' होते हुए भी अपनी माया से 'अनेक' रूपों में भासता है।

अंतिम श्लोक (श्लोक ५) इस स्तुति का प्राण है— "यः सर्वभूतो न च सर्वभूतः"। भगवान सभी प्राणियों के भीतर व्याप्त हैं, परंतु वे उन तक सीमित नहीं हैं। वे विश्व का आधार हैं, पर स्वयं 'अविश्व' (संसार की सीमाओं से परे) हैं। यह दार्शनिक चिंतन साधक के चित्त को शुद्ध कर उसे आत्म-साक्षात्कार की दिशा में प्रेरित करता है।

फलश्रुति: स्तुति पाठ के अमोघ लाभ (Benefits)

विष्णु पुराण और ऋषियों के अनुसार, प्रह्लाद कृत इस स्तुति के पाठ से निम्नलिखित लाभ सुनिश्चित होते हैं:

  • अज्ञान और मोह का नाश: यह पाठ ईश्वर के वास्तविक स्वरूप का बोध कराता है, जिससे जीवन के प्रति अज्ञान, संशय और सांसारिक मोह दूर होते हैं।
  • मानसिक शांति और निर्भयता: प्रह्लाद ने इसे मृत्यु तुल्य संकटों के बीच पढ़ा था। अतः यह पाठ तनाव, अवसाद और अज्ञात भय को जड़ से मिटाने की शक्ति रखता है।
  • पाप मुक्ति और शुद्धि: 'निरञ्जन' परमात्मा का नाम स्मरण करने से साधक के अंतःकरण की अशुद्धियाँ और करोड़ों जन्मों के संचित पाप नष्ट हो जाते हैं।
  • विष्णु सायुज्य की प्राप्ति: नित्य पाठ से भगवान नारायण के चरणों में अनन्य प्रीति बढ़ती है, जो अंततः वैकुण्ठ लोक और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करती है।
  • बौद्धिक प्रखरता: चूँकि यह एक उच्च दार्शनिक पाठ है, इसके मनन से साधक की बुद्धि सूक्ष्म और निर्णय लेने में सक्षम होती है।

पाठ विधि एवं विशेष साधना विधान (Ritual Method)

भगवान पुरुषोत्तम की आराधना पूर्ण एकाग्रता और पवित्रता की मांग करती है। अधिकतम लाभ हेतु निम्न विधि अपनाएं:

१. श्रेष्ठ समय एवं शुद्धि:

पाठ के लिए ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः ४ से ६ बजे) सर्वोत्तम है। स्नान के उपरांत स्वच्छ पीले या श्वेत वस्त्र धारण करें। गुरुवार (Thursday) और एकादशी तिथि इसके लिए विशेष शुभ मानी जाती है।

२. दिशा एवं आसन:

पूजा स्थान पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। कुशा या पीले ऊनी आसन का प्रयोग करें। सामने भगवान विष्णु, श्रीकृष्ण या नृसिंह देव की प्रतिमा स्थापित करें।

३. पूजन एवं अर्पण:

शुद्ध घी का दीपक जलाएं। प्रभु को तुलसी दल (तुलसी के पत्ते) और पीले पुष्प अर्पित करें। पाठ के पूर्व भगवान गणेश का स्मरण अवश्य करें।

४. ध्यान की मुद्रा:

पाठ करते समय उस 'विराट पुरुष' का ध्यान करें जो प्रह्लाद की रक्षा हेतु स्तंभ से प्रकट हुए थे। यह अनुभव करें कि वही परमेश्वर आपके भीतर भी चैतन्य रूप में स्थित हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. श्री पुरुषोत्तम स्तुतिः का रचयिता कौन है?

इस स्तुति के रचयिता भगवान विष्णु के परम भक्त प्रह्लाद हैं। यह उनकी वह वाणी है जो उन्होंने संकटों के बीच अपनी रक्षा हेतु नहीं, बल्कि ईश्वर के स्वरूप को पहचानने के बाद की थी।

2. यह स्तुति किस पुराण से ली गई है?

यह प्रसिद्ध 'श्रीविष्णु पुराण' के प्रथम अंश के २०वें अध्याय से ली गई है। यह ग्रंथ वेदव्यास जी के पिता ऋषि पराशर द्वारा रचित है।

3. क्या महिलाएं पुरुषोत्तम स्तुति का पाठ कर सकती हैं?

निश्चित रूप से। भगवान की भक्ति में कोई भेदभाव नहीं है। महिलाएं पूर्ण शुद्धि और श्रद्धा के साथ अपने और अपने परिवार के कल्याण हेतु इसका पाठ कर सकती हैं।

4. 'पुरुषोत्तम' शब्द का वास्तविक अर्थ क्या है?

गीता के १५वें अध्याय के अनुसार, जो क्षर (जगत) और अक्षर (जीव) दोनों से श्रेष्ठ है, वह पुरुषोत्तम है। प्रह्लाद की यह स्तुति इसी सत्य का प्रतिपादन करती है।

5. क्या यह स्तोत्र अकाल मृत्यु और संकटों से बचाता है?

जी हाँ, प्रह्लाद ने इसे उस समय पढ़ा था जब उन पर अग्नि और शस्त्रों का प्रहार हो रहा था। यह पाठ साधक के चारों ओर सुरक्षा कवच बनाता है और संकटों को दूर करता है।

6. पाठ के लिए सबसे उत्तम माला कौन सी है?

भगवान विष्णु की साधना के लिए तुलसी की माला सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। स्तोत्र पाठ मात्र के लिए माला अनिवार्य नहीं है, परंतु एकाग्रता हेतु इसका प्रयोग करें।

7. 'व्यक्ताव्यक्त' का दार्शनिक रहस्य क्या है?

'व्यक्त' वह है जो हमें दिखाई दे रहा है, और 'अव्यक्त' वह मूल कारण (ब्रह्म) है जिससे यह प्रकट हुआ। भगवान इन दोनों के आधार और नियंता हैं।

8. क्या केवल ५ श्लोक पढ़ने से पूर्ण फल मिलता है?

हाँ, मंत्रों की शक्ति उनकी लंबाई में नहीं, बल्कि उनमें निहित तत्वज्ञान में होती है। इन ५ श्लोकों में वेदान्त का संपूर्ण सार समाहित है।

9. क्या बिना संस्कृत जाने लाभ मिल सकता है?

हाँ, भगवान भाव के भूखे हैं। यदि आप संस्कृत नहीं पढ़ सकते, तो इसका हिंदी अर्थ समझकर भावपूर्वक सुनने या पाठ करने से भी समान फल प्राप्त होता है।

10. पाठ का फल कितने दिनों में प्राप्त होता है?

यह साधक की श्रद्धा पर निर्भर है। २१ या ४१ दिनों तक निरंतर पाठ करने से चित्त की शुद्धि और आध्यात्मिक शांति का अनुभव स्पष्ट रूप से होने लगता है।