Logoपवित्र ग्रंथ

Sri Venkateshwara Ashtottara Shatanama Stotram 2 – श्री वेङ्कटेश्वर अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् २

Sri Venkateshwara Ashtottara Shatanama Stotram 2 – श्री वेङ्कटेश्वर अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् २
॥ श्री वेङ्कटेश्वर अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् ॥ (ब्रह्माण्डपुराणान्तर्गतम्) श्री वेङ्कटेशः श्रीनिवासो लक्ष्मीपतिरनामयः । अमृतांशो जगद्वन्द्यो गोविन्दश्शाश्वतः प्रभुः ॥ १ ॥ शेषाद्रिनिलयो देवः केशवो मधुसूदनः । अमृतो माधवः कृष्णः श्रीहरिर्ज्ञानपञ्जरः ॥ २ ॥ श्रीवत्सवक्षा-स्सर्वेशो गोपालः पुरुषोत्तमः । गोपीश्वरः परञ्ज्योति-र्वैकुण्ठपति-रव्ययः ॥ ३ ॥ सुधातनु-र्यादवेन्द्रो नित्ययौवनरूपवान् । चतुर्वेदात्मको विष्णुरच्युतः पद्मिनीप्रियः ॥ ४ ॥ धरापति-स्सुरपति-र्निर्मलो देवपूजितः । चतुर्भुज-श्चक्रधर-स्त्रिधामा त्रिगुणाश्रयः ॥ ५ ॥ निर्विकल्पो निष्कलङ्को निरन्तरो निरञ्जनः । निराभासो नित्यतृप्तो निर्गुणो निरुपद्रवः ॥ ६ ॥ गदाधर शार्‍ङ्गपाणिर्नन्दकीशङ्खधारकः । अनेकमूर्तिरव्यक्तः कटिहस्तो वरप्रदः ॥ ७ ॥ अनेकात्मा दीनबन्धु-रार्तलोकाऽभयप्रदः । आकाशराजवरदो योगिहृत्पद्ममन्दिरः ॥ ८ ॥ दामोदरो जगत्पालः पापघ्नो भक्तवत्सलः । त्रिविक्रमश्शिंशुमारो जटामकुटशोभितः ॥ ९ ॥ शङ्खमध्योल्लसन्मञ्जुकिङ्किण्याढ्यकरणण्डकः । नीलमेघश्यामतनु-र्बिल्वपत्रार्चनप्रियः ॥ १० ॥ जगद्व्यापी जगत्कर्ता जगत्साक्षी जगत्पतिः । चिन्तितार्थप्रदो जिष्णुर्दाशार्हो दशरूपवान् ॥ ११ ॥ देवकीनन्दन-श्शौरि-र्हयग्रीवो जनार्दनः । कन्याश्रवणतारेज्यः पीताम्बरधरोऽनघः ॥ १२ ॥ वनमाली पद्मनाभो मृगयासक्तमानसः । अश्वारूढः खड्गधारी धनार्जनसमुत्सुकः ॥ १३ ॥ घनसारलसन्मध्यकस्तूरीतिलकोज्ज्वलः । सच्चिदानन्दरूपश्च जगन्मङ्गलदायकः ॥ १४ ॥ यज्ञरूपो यज्ञभोक्ता चिन्मयः परमेश्वरः । परमार्थप्रद-श्शान्त-श्श्रीमान् दोर्दण्ड विक्रमः ॥ १५ ॥ परात्परः परब्रह्मा श्रीविभुर्जगदीश्वरः । एवं श्री वेङ्कटेशस्य नाम्नां अष्टोत्तरं शतम् ॥ १६ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ पठतां शृण्वतां भक्त्या सर्वाभीष्टप्रदं शुभम् । त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नित्यं सर्वान् कामानवाप्नुयात् ॥ १७ ॥ ॥ इति श्री ब्रह्माण्डपुराणे श्री वेङ्कटेश्वराष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

श्री वेङ्कटेश्वर अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्: एक दिव्य एवं पौराणिक परिचय (Introduction)

श्री वेङ्कटेश्वर अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् भगवान विष्णु के सर्वाधिक पूजनीय अवतारों में से एक, तिरुमाला के अधिपति भगवान श्रीनिवास (बालाजी) को समर्पित है। यह विशिष्ट स्तोत्र ब्रह्माण्ड पुराण (Brahmanda Purana) से उद्धृत है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार, जब कलियुग में अधर्म का प्रभाव बढ़ने लगा, तब भगवान नारायण ने वेङ्कटाचल पर्वत पर श्रीनिवास के रूप में अवतार लिया ताकि वे अपने भक्तों के कष्टों को सीधे हर सकें।

इस स्तोत्र में भगवान के १०८ दिव्य नामों का संकलन है। "अष्टोत्तर शत" का अर्थ है १०८, जिसे आध्यात्मिकता में ब्रह्मांडीय पूर्णता का प्रतीक माना जाता है। स्तोत्र के प्रथम श्लोक में ही उन्हें "श्रीनिवास" और "लक्ष्मीपति" कहा गया है, जो उनके ऐश्वर्य और करुणा के संगम को दर्शाता है। यह पाठ केवल शब्दों का समूह नहीं है, बल्कि प्रत्येक नाम भगवान की एक विशिष्ट शक्ति को जाग्रत करता है।

विशिष्ट महत्व: कलिदोष नाशक एवं समृद्धि प्रदायक (Significance)

भगवान वेङ्कटेश्वर को "कलौ वेङ्कटनायकः" कहा गया है, जिसका अर्थ है कलियुग के एकमात्र नायक और रक्षक। इस स्तोत्र का विशिष्ट महत्व इसके दोष-निवारक स्वभाव में है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, जिनकी कुंडली में राहु-केतु, शनि या मारक ग्रहों की प्रतिकूलता हो, उनके लिए श्रीनिवास की आराधना किसी रामबाण से कम नहीं है।

इस पाठ का एक और महत्वपूर्ण पहलू "मानसिक शान्ति" है। स्तोत्र में प्रयुक्त "शान्त" और "चिन्मय" जैसे शब्द साधक के विक्षुब्ध मन को स्थिरता प्रदान करते हैं। जो व्यक्ति प्रत्येक शनिवार या एकादशी को इसका श्रद्धापूर्वक गान करता है, उसके घर में अखंड लक्ष्मी का वास होता है।

फलश्रुति: १०८ नामों के पाठ के दिव्य लाभ (Benefits)

ब्रह्माण्ड पुराण के अनुसार, इस स्तोत्र के नियमित पठन से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:

  • समस्त इच्छाओं की पूर्ति: साधक जो भी सात्विक कामना (जैसे करियर या व्यापार में सफलता) लेकर पाठ करता है, भगवान उसे पूर्ण करते हैं।

  • आर्थिक कष्टों का निवारण: भगवान "धनार्जनसमुत्सुक" हैं, वे अपने भक्तों की आर्थिक उन्नति के मार्ग खोलते हैं।

  • पाप और कलिदोष मुक्ति: इस पाठ से अनजाने में हुए समस्त पापों का शमन होता है और चित्त शुद्ध होता है।

  • अकाल मृत्यु से सुरक्षा: भगवान के शाश्वत स्वरूप का ध्यान करने से साधक को दीर्घायु और सुरक्षा का कवच प्राप्त होता है।

पाठ विधि एवं साधना के नियम (Ritual Method)

भगवान वेंकटेश्वर की पूजा में पवित्रता का विशेष महत्व है। फलश्रुति में कहा गया है— "त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नित्यं" (दिन के तीनों संधि कालों में पाठ करें)।

  • समय: ब्रह्ममुहूर्त और सायं काल सूर्यास्त के समय पाठ करना सर्वोत्तम है। शनिवार को पाठ करना विशेष फलदायी है।
  • शुद्धि: स्नान के पश्चात पीले वस्त्र धारण करें। भगवान श्रीनिवास को पीताम्बर प्रिय है।
  • पूजा सामग्री: भगवान के चित्र के सम्मुख घी का दीपक प्रज्वलित करें और उन्हें तुलसी दल अवश्य अर्पित करें।
  • आसन: उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊनी आसन पर बैठकर पाठ करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

१. यह स्तोत्र किस ग्रन्थ से लिया गया है?
यह स्तोत्र ब्रह्माण्ड पुराण से लिया गया है, जिसमें भगवान वेंकटेश्वर के दिव्य १०८ नामों का वर्णन है।
२. क्या यह पाठ कालसर्प दोष में मदद करता है?
जी हाँ, भगवान वेंकटेश्वर को नागों के पर्वत (शेषाद्रि) का स्वामी माना गया है। उनके नामों का जाप राहु-केतु और कालसर्प दोष को शांत करता है।
३. 'त्रिसन्ध्यं' पाठ का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है दिन के तीन मुख्य संधि समय— प्रातःकाल, दोपहर और सायंकाल में पाठ करना।
४. क्या महिलाएं इस स्तोत्र का पाठ कर सकती हैं?
निश्चित रूप से। शुद्धता और श्रद्धा के साथ कोई भी श्रद्धालु (स्त्री या पुरुष) सुख-समृद्धि के लिए यह पाठ कर सकता है।
५. पाठ के लिए शनिवार का ही दिन क्यों विशेष है?
शनिवार भगवान वेंकटेश्वर का प्रिय दिन है। इस दिन पाठ करने से शनि देव के दुष्प्रभाव कम होते हैं।
६. "कन्याश्रवणतारेज्य" नाम का क्या महत्व है?
यह नाम भगवान के जन्म नक्षत्र 'श्रवण' की ओर संकेत करता है, जो जातक के नक्षत्र दोषों को दूर करने में सहायक है।
७. क्या इस पाठ से दरिद्रता दूर होती है?
हाँ, भगवान श्रीनिवास महालक्ष्मी के पति हैं। उनकी स्तुति से घर में दरिद्रता का नाश और ऐश्वर्य का आगमन होता है।
८. क्या पाठ के दौरान तुलसी चढ़ाना आवश्यक है?
विष्णु अवतार होने के कारण भगवान को तुलसी अत्यंत प्रिय है। तुलसी अर्पण से वे शीघ्र प्रसन्न होते हैं।
९. "वज्रकिरीटं" का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है हीरे और वज्र से जड़ा हुआ मुकुट, जो भगवान की सर्वोच्च सत्ता का प्रतीक है।
१०. इस स्तोत्र को कितनी बार पढ़ना चाहिए?
नित्य १ बार पाठ उत्तम है, लेकिन विशेष कामना सिद्धि के लिए ११ बार पाठ करना सिद्धदायक माना गया है।