श्री वल्लभेश हृदयम् (Sri Vallabhesha Hrudayam)
Sri Vallabhesha Hrudayam (Tantric Ganesha Kavacham)

अथ श्री वल्लभेश हृदयम्
श्रीदेव्युवाच ।
वल्लभेशस्य हृदयं कृपया ब्रूहि शङ्कर ।
श्रीशिव उवाच ।
ऋष्यादिकं मूलमन्त्रवदेव परिकीर्तितम् ॥ १ ॥
ओं विघ्नेशः पूर्वतः पातु गणनाथस्तु दक्षिणे ।
पश्चिमे गजवक्त्रस्तु उत्तरे विघ्ननाशनः ॥ २ ॥
आग्नेय्यां पितृभक्तस्तु नैऋत्यां स्कन्दपूर्वजः ।
वायव्यामाखुवाहस्तु ईशान्यां देवपूजितः ॥ ३ ॥
ऊर्ध्वतः पातु सुमुखो ह्यधरायां गजाननः ।
एवं दशदिशो रक्षेत् विकटः पापनाशनः ॥ ४ ॥
शिखायां कपिलः पातु मूर्धन्याकाशरूपधृक् ।
किरीटिः पातु नः फालं भ्रुवोर्मध्ये विनायकः ॥ ५ ॥
चक्षुषी मे त्रिनयनः श्रवणौ गजकर्णकः ।
कपोलयोर्मदनिधिः कर्णमूले मदोत्कटः ॥ ६ ॥
सदन्तो दन्तमध्येऽव्यात् वक्त्रं पातु हरात्मजः ।
चिबुके नासिके चैव पातु मां पुष्करेक्षणः ॥ ७ ॥
उत्तरोष्ठे जगद्व्यापी त्वधरोष्ठेऽमृतप्रदः ।
जिह्वां विद्यानिधिः पातु तालुन्यापत्सहायकः ॥ ८ ॥
किन्नरैः पूजितः कण्ठं स्कन्धौ पातु दिशाम्पतिः ।
चतुर्भुजो भुजौ पातु बाहुमूलेऽमरप्रियः ॥ ९ ॥
अंसयोरम्बिकासूनुरङ्गुलीश्च हरिप्रियः ।
आन्त्रं पातु स्वतन्त्रो मे मनः प्रह्लादकारकः ॥ १० ॥
प्राणाऽपानौ तथा व्यानमुदानं च समानकम् ।
यशो लक्ष्मीं च कीर्तिं च पातु नः कमलापतिः ॥ ११ ॥
हृदयं तु परम्ब्रह्मस्वरूपो जगदिपतिः ।
स्तनौ तु पातु विष्णुर्मे स्तनमध्यं तु शाङ्करः ॥ १२ ॥
उदरं तुन्दिलः पातु नाभिं पातु सुनाभिकः ।
कटिं पात्वमलो नित्यं पातु मध्यं तु पावनः ॥ १३ ॥
मेढ्रं पातु महायोगी तत्पार्श्वं सर्वरक्षकः ।
गुह्यं गुहाग्रजः पातु अणुं पातु जितेन्द्रियः ॥ १४ ॥
शुक्लं पातु सुशुक्लस्तु ऊरू पातु सुखप्रदः ।
जङ्घदेशे ह्रस्वजङ्घो जानुमध्ये जगद्गुरुः ॥ १५ ॥
गुल्फौ रक्षाकरः पातु पादौ मे नर्तनप्रियः ।
सर्वाङ्गं सर्वसन्धौ च पातु देवारिमर्दनः ॥ १६ ॥
पुत्रमित्रकलत्रादीन् पातु पाशाङ्कुशाधिपः ।
धनधान्यपशूंश्चैव गृहं क्षेत्रं निरन्तरम् ॥ १७ ॥
पातु विश्वात्मको देवो वरदो भक्तवत्सलः ।
रक्षाहीनं तु यत्स्थानं कवचेन विना कृतम् ॥ १८ ॥
तत्सर्वं रक्षयेद्देवो मार्गवासी जितेन्द्रियः ।
अटव्यां पर्वताग्रे वा मार्गे मानावमानगे ॥ १९ ॥
जलस्थलगतो वाऽपि पातु मायापहारकः ।
सर्वत्र पातु देवेशः सप्तलोकैकसंश्रितः ॥ २० ॥
फलश्रुतिः ।
य इदं कवचं पुण्यं पवित्रं पापनाशनम् ।
प्रातःकाले जपेन्मर्त्यः सदा भयविनाशनम् ॥ २१ ॥
कुक्षिरोगप्रशमनं लूतास्फोटनिवारणम् ।
मूत्रकृच्छ्रप्रशमनं बहुमूत्रनिवारणम् ॥ २२ ॥
बालग्रहादिरोगाणांनाशनं सर्वकामदम् ।
यः पठेद्धारयेद्वाऽपि करस्थास्तस्य सिद्धयः ।
यत्र यत्र गतश्चाऽपि तत्र तत्राऽर्थसिद्धिदम् ॥ २३ ॥
यश्शृणोति पठति द्विजोत्तमो
विघ्नराजकवचं दिने दिने ।
पुत्रपौत्रसुकलत्रसम्पदः
कामभोगमखिलांश्च विन्दति ॥ २४ ॥
यो ब्रह्मचारिणमचिन्त्यमनेकरूपं
ध्यायेज्जगत्रयहितेरतमापदघ्नम् ।
सर्वार्थसिद्धिं लभते मनुष्यो
विघ्नेशसायुज्यमुपेन्न संशयः ॥ २५ ॥
इति श्रीविनायकतन्त्रे श्रीवल्लभेशहृदयं सम्पूर्णम् ।
वल्लभेश हृदयम्: तन्त्र परिचय (Introduction)
श्री वल्लभेश हृदयम् (Sri Vallabhesha Hrudayam) भगवान गणेश का एक अत्यंत गोपनीय और शक्तिशाली कवच है। यह श्री विनायक तन्त्र (Shri Vinayak Tantra) के अंतर्गत भगवान शिव और देवी पार्वती के संवाद में प्रकट हुआ है।
"हृदयम्" का अर्थ यहाँ "गूढ़ रहस्य" या "सार" है। यह स्तोत्र साधक को चारों ओर से दैवीय सुरक्षा प्रदान करता है और उसे गणेश सायुज्य (मोक्ष) की ओर ले जाता है।
महत्व: वल्लभेश और दशदिशा रक्षा (Significance)
वल्लभेश स्वरूप: यहाँ गणेश जी को उनकी शक्ति "वल्ल्भा" (जो सिद्धि और रिद्धि का ही रूप हैं) के पति के रूप में पूजा गया है। यह स्वरूप भोग और मोक्ष दोनों देने वाला है।
दशदिशा रक्षक: इस कवच की विशेषता यह है कि यह दसों दिशाओं (पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ईशान, आग्नेय, नैऋत्य, वायव्य, ऊर्ध्व, अधर) में अलग-अलग गणेश रूपों को रक्षा के लिए नियुक्त करता है।
फलश्रुति (Benefits)
रोग नाश: यह कवच "कुक्षिरोग" (पेट की बीमारियां), "मूत्रकृच्छ्र" (यूरिनरी समस्याएं) और "लूतास्फोट" (चर्म रोग/फोड़े) के निवारण के लिए सिद्ध माना गया है।
बालग्रह निवारण: बच्चों को होने वाली नजर, भय और अज्ञात रोगों ("बालग्रह") से रक्षा करने में यह अद्भुत प्रभावी है।
सर्व सिद्धि: "करस्थास्तस्य सिद्धयः" - इसके नियमित पाठ से सिद्धियाँ साधक के हाथ में आ जाती हैं।
पाठ विधि (Ritual & Vidhi)
- समय: प्रतिदिन प्रातःकाल और सायंकाल पाठ करें। यह "दिने दिने" (प्रतिदिन) जपने योग्य है।
- न्यास: यह एक न्यास-प्रधान स्तोत्र है। पढ़ते समय जिन शरीर के अंगों का नाम आये (जैसे - शिखा, नेत्र, हृदय), उन्हें मानसिक या शारीरिक रूप से स्पर्श करना चाहिए। इससे कवच 'जागृत' होता है।
प्रश्नोत्तरी (FAQ)
श्री वल्लभेश हृदयम् (Vallabhesha Hrudayam) क्या है?
यह विनायक तंत्र (Vinayaka Tantra) से लिया गया एक गुप्त स्तोत्र है। इसे "कवच" भी कहा जाता है क्योंकि यह साधक के शरीर और प्राणों की रक्षा एक बख्तर (Armor) की तरह करता है।
वल्लभेश (Vallabhesha) का अर्थ क्या है?
"वल्ल्भा" शक्ति (Siddhi/Riddhi) का नाम है और "ईश" का अर्थ स्वामी है। अतः वल्लभेश वह स्वरूप है जहाँ गणेश अपनी शक्ति के साथ संयुक्त होकर वरदान देते हैं।
इसके पाठ का मुख्य उद्देश्य क्या है?
मुख्य उद्देश्य "सर्व रोग निवारण" और "अभय" (Fearlessness) है। यह पेट के रोगों, गुप्त शत्रुओं और नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा करने में अमोघ माना गया है।
यह स्तोत्र किस ग्रन्थ से है?
यह "श्री विनायक तंत्र" (Shri Vinayaka Tantra) का अंश है, जिसे भगवान शिव ने देवी पार्वती को उपदेश के रूप में सुनाया था।
क्या इसे हर कोई पढ़ सकता है?
हाँ, यद्यपि यह तंत्र का भाग है, लेकिन यह एक सात्विक स्तोत्र है। इसे भक्ति भाव से कोई भी पढ़ सकता है।
कुक्षिरोग (Stomach diseases) के लिए यह कैसे लाभकारी है?
फलश्रुति में स्पष्ट कहा गया है - "कुक्षिरोगप्रशमनं"। भक्तिपूर्वक पाठ करने से उदर विकार और पाचन सम्बंधित समस्याओं में दैवीय सहायता मिलती है।
दशदिशा रक्षा (Directional Protection) क्या है?
स्तोत्र में गणेश जी के 10 अलग-अलग रूपों (विघ्नेश, धूम्रकेतु, आदि) को 10 दिशाओं (पूर्व, पश्चिम, आदि) में रक्षक के रूप में तैनात किया गया है।
"करस्थास्तस्य सिद्धयः" का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है कि सिद्धियाँ (सफलताएँ) साधक के "हाथ में स्थित" हो जाती हैं। उसे सफलता के लिए भटकना नहीं पड़ता।
पाठ करने का सर्वोत्तम समय क्या है?
प्रातः काल (ब्रह्म मुहूर्त) या संध्या वंदन के समय। अश्विन और कार्तिक मास में इसका अनुष्ठान विशेष फलदायी बताया गया है।
बच्चों के लिए इसका क्या लाभ है?
यह "बालग्रह" (Childrens affliction/nightmares) दोषों का नाश करता है। बच्चों को नजर दोष और बुरे सपनों से बचाने के लिए माता-पिता इसका पाठ कर सकते हैं।
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