Logoपवित्र ग्रंथ

श्री गणेश कवचम् (Sri Ganesha Kavacham)

Sri Ganesha Kavacham

श्री गणेश कवचम् (Sri Ganesha Kavacham)
अथ श्री गणेश कवचम् गौर्युवाच (माता गौरी बोलीं): एषोऽतिचपलो दैत्यान्बाल्येऽपि नाशयत्यहो । अग्रे किं कर्म कर्तेति न जाने मुनिसत्तम ॥ १ ॥ दैत्या नानाविधा दुष्टाः साधुदेवद्रुहः खलाः । अतोऽस्य कण्ठे किञ्चित्त्वं रक्षार्थं बद्धुमर्हसि ॥ २ ॥ मुनिरुवाच (मुनि कश्यप बोले): ध्यायेत्सिंहगतं विनायकममुं दिग्बाहुमाद्ये युगे त्रेतायां तु मयूरवाहनममुं षड्बाहुकं सिद्धिदम् । द्वापारे तु गजाननं युगभुजं रक्ताङ्गरागं विभुं तुर्ये तु द्विभुजं सिताङ्गरुचिरं सर्वार्थदं सर्वदा ॥ ३ ॥ कवचम् विनायकः शिखां पातु परमात्मा परात्परः । अतिसुन्दरकायस्तु मस्तकं सुमहोत्कटः ॥ ४ ॥ ललाटं कश्यपः पातु भ्रूयुगं तु महोदरः । नयने फालचन्द्रस्तु गजास्यस्त्वोष्ठपल्लवौ ॥ ५ ॥ जिह्वां पातु गणक्रीडश्चिबुकं गिरिजासुतः । वाचं विनायकः पातु दन्तान् रक्षतु दुर्मुखः ॥ ६ ॥ श्रवणौ पाशपाणिस्तु नासिकां चिन्तितार्थदः । गणेशस्तु मुखं कण्ठं पातु देवो गणञ्जयः ॥ ७ ॥ स्कन्धौ पातु गजस्कन्धः स्तनौ विघ्नविनाशनः । हृदयं गणनाथस्तु हेरम्बो जठरं महान् ॥ ८ ॥ धराधरः पातु पार्श्वौ पृष्ठं विघ्नहरः शुभः । लिङ्गं गुह्यं सदा पातु वक्रतुण्डो महाबलः ॥ ९ ॥ गणक्रीडो जानुजङ्घे ऊरू मङ्गलमूर्तिमान् । एकदन्तो महाबुद्धिः पादौ गुल्फौ सदाऽवतु ॥ १० ॥ क्षिप्रप्रसादनो बाहू पाणी आशाप्रपूरकः । अङ्गुलीश्च नखान्पातु पद्महस्तोऽरिनाशनः ॥ ११ ॥ सर्वाङ्गानि मयूरेशो विश्वव्यापी सदाऽवतु । अनुक्तमपि यत्स्थानं धूमकेतुः सदाऽवतु ॥ १२ ॥ आमोदस्त्वग्रतः पातु प्रमोदः पृष्ठतोऽवतु । प्राच्यां रक्षतु बुद्धीश आग्नेय्यां सिद्धिदायकः ॥ १३ ॥ दक्षिणस्यामुमापुत्रो नैरृत्यां तु गणेश्वरः । प्रतीच्यां विघ्नहर्ताऽव्याद्वायव्यां गजकर्णकः ॥ १४ ॥ कौबेर्यां निधिपः पायादीशान्यामीशनन्दनः । दिवाऽव्यादेकदन्तस्तु रात्रौ सन्ध्यासु विघ्नहृत् ॥ १५ ॥ राक्षसासुरभेतालग्रहभूतपिशाचतः । पाशाङ्कुशधरः पातु रजःसत्त्वतमः स्मृतीः ॥ १६ ॥ फलश्रुतिः ज्ञानं धर्मं च लक्ष्मीं च लज्जां कीर्तिं तथा कुलम् । वपुर्धनं च धान्यं च गृहान्दारान्सुतान्सखीन् ॥ १७ ॥ सर्वायुधधरः पौत्रान्मयूरेशोऽवतात्सदा । कपिलोऽजाविकं पातु गजाश्वान्विकटोऽवतु ॥ १८ ॥ भूर्जपत्रे लिखित्वेदं यः कण्ठे धारयेत्सुधीः । न भयं जायते तस्य यक्षरक्षःपिशाचतः ॥ १९ ॥ त्रिसन्ध्यं जपते यस्तु वज्रसारतनुर्भवेत् । यात्राकाले पठेद्यस्तु निर्विघ्नेन फलं लभेत् ॥ २० ॥ युद्धकाले पठेद्यस्तु विजयं चाप्नुयाद्ध्रुवम् । मारणोच्चाटनाकर्षस्तम्भमोहनकर्मणि ॥ २१ ॥ सप्तवारं जपेदेतद्दिनानामेकविंशतिः । तत्तत्फलमवाप्नोति साधको नात्र संशयः ॥ २२ ॥ एकविंशतिवारं च पठेत्तावद्दिनानि यः । कारागृहगतं सद्यो राज्ञा वध्यं च मोचयेत् ॥ २३ ॥ राजदर्शनवेलायां पठेदेतत्त्रिवारतः । स राजानं वशं नीत्वा प्रकृतीश्च सभां जयेत् ॥ २४ ॥ इदं गणेशकवचं कश्यपेन समीरितम् । मुद्गलाय च तेनाथ माण्डव्याय महर्षये ॥ २५ ॥ मह्यं स प्राह कृपया कवचं सर्वसिद्धिदम् । न देयं भक्तिहीनाय देयं श्रद्धावते शुभम् ॥ २६ ॥ अनेनास्य कृता रक्षा न बाधाऽस्य भवेत्क्वचित् । राक्षसासुरभेतालदैत्यदानवसम्भवा ॥ २७ ॥ इति श्रीगणेशपुराणे उत्तरखण्डे बालक्रीडायां षडशीतितमेऽध्याये गणेश कवचम् सम्पूर्णम् ।
संलिखित ग्रंथ पढ़ें

प्रस्तावना (Introduction)

श्री गणेश कवचम् (Shri Ganesha Kavacham) गणेश पुराण के उत्तरखण्ड (बालक्रीडा अध्याय 86) का एक अत्यंत शक्तिशाली अंश है। इसकी रचना तब हुई जब माता पार्वती अपने चंचल पुत्र बाल गणेश की सुरक्षा को लेकर चिंतित थीं।

गणेश जी बचपन से ही दैत्यों का संहार कर रहे थे। एक माँ के हृदय की व्याकुलता देखकर महर्षि कश्यप ने उन्हें यह अभेद्य कवच प्रदान किया, जिसे स्वयं धारण करने के बाद तीनों लोकों में किसी का भय नहीं रहता।

कवच का महत्व (Significance)

यह कवच केवल शब्दों का समूह नहीं है, बल्कि एक "आध्यात्मिक ढाल" है।

  • अंग-न्यास: इसमें गणेश जी के अलग-अलग नामों से शरीर के हर अंग (सिर से पैर तक) को सुरक्षित करने की प्रार्थना की गई है। जैसे - मस्तक की रक्षा "अतिसुन्दरकाय", ललाट की "कश्यप", और वाणी की "विनायक"।

  • दसों दिशाओं से रक्षा: केवल शरीर ही नहीं, यह कवच पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण और हर कोने से आने वाली अदृश्य बाधाओं को रोकता है।

  • काला जादू नाशक: आज के समय में, यह कवच "राक्षसासुरभेतालग्रहभूतपिशाचतः" के भय से मुक्त करने के लिए राम-बाण है।

पाठ के लाभ (Benefits)

  • वज्रसारतनु (Invincible Body): श्लोक 20 के अनुसार, जो इसका त्रिसंध्या (तीन पहर) पाठ करता है, उसका शरीर और मनोबल "वज्र" (Diamond) की तरह कठोर और अभेद्य हो जाता है।

  • बंधन मुक्ति (Freedom from Prison): "कारागृहगतं सद्यो" - यदि कोई व्यक्ति झूठे केस में फंसा हो या बंधन में हो, तो 21 दिनों तक 21 बार पाठ करने से वह राजा/सरकार द्वारा मुक्त हो जाता है।

  • शत्रु विजय: यदि शत्रु परेशान कर रहे हों या "मारण-मोहन" (Black Magic) का प्रयोग हुआ हो, तो यह कवच उसे वापस लौटा देता है और साधक को विजय दिलाता है।

पाठ विधि (Chanting Method)

इस कवच की सिद्धि के लिए अनुशासनात्मक विधि बताई गई है:

  1. सामान्य पाठ: नित्य प्रातः काल स्नान के बाद 1 बार पाठ करें।
  2. विशेष कार्य सिद्धि: 21 दिनों तक लगातार 21 बार (21 times for 21 days) पाठ करने से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं।
  3. भोजपत्र प्रयोग: इसे भोजपत्र पर लाल चंदन की स्याही से लिखकर ताबीज में भरकर गले में पहनने से कोई भी बुरी शक्ति छू नहीं सकती (श्लोक 19)।

प्रश्नोत्तरी (FAQ)

श्री गणेश कवच (Ganesha Kavacham) का मूल स्रोत क्या है?

यह कवच 'श्री गणेश पुराण' के उत्तरखण्ड (बालक्रीडा) के 86वें अध्याय से लिया गया है। इसे स्वयं महर्षि कश्यप ने माता गौरी (पार्वती) को बाल गणेश की रक्षा के लिए सुनाया था।

इस कवच का पाठ क्यों करना चाहिए?

जैसे युद्ध में कवच (Armor) शरीर को वार से बचाता है, वैसे ही यह 'गणेश कवच' साधक को अदृश्य बाधाओं, काला जादू, भूत-प्रेत, और शत्रुओं के प्रहार से बचाता है।

कवच में 'विनायकः शिखां पातु' का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है - 'विनायक (विशिष्ट नायक) मेरी शिखा (सिर की चोटी) की रक्षा करें'। इस कवच में गणेश जी के अलग-अलग 12 नामों से शरीर के हर अंग की सुरक्षा मांगी गई है।

क्या यह कवच काला जादू (Black Magic) हटाने में सक्षम है?

जी हाँ। श्लोक 16 में स्पष्ट लिखा है - 'राक्षसासुरभेतालग्रहभूतपिशाचतः'। यह कवच ब्रह्मराक्षस, बेताल, और तांत्रिक अभिचारों (Black Magic) को नष्ट कर देता है।

जेल (Prison) या बंधन से मुक्ति के लिए इसका प्रयोग कैसे करें?

श्लोक 23 के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति जेल में हो या किसी झूठे केस में फंसा हो, तो उसके नाम से 21 दिनों तक रोज 21 बार इस कवच का पाठ करने से वह राजा (सरकार) द्वारा मुक्त कर दिया जाता है ('राज्ञा वध्यं च मोचयेत्')।

'वज्रसारतनुर्भवेत्' (Verse 20) का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है - 'उसका शरीर वज्र (Diamond/Thunderbolt) के समान कठोर हो जाएगा'। आध्यात्मिक रूप से इसका मतलब है कि उसे कोई भी रोग या शस्त्र भेद नहीं पाएगा।

क्या विद्यार्थी और व्यापारी इसका पाठ कर सकते हैं?

हाँ। व्यापारी अपनी दुकान/फैक्ट्री की सुरक्षा ('निधिपः पायात्') के लिए और विद्यार्थी अपनी बुद्धि और याददाश्त की रक्षा ('बुद्धीश') के लिए इसका पाठ अवश्य करें।

इस कवच के पाठ की सही विधि क्या है?

इसे 'त्रिसन्ध्यं' (सुबह, दोपहर, शाम) बांचना चाहिए। यदि समय कम हो, तो कम से कम सुबह स्नान के बाद पूर्व दिशा में बैठकर 1 बार पाठ अवश्य करें।

श्लोक 3 में वर्णित गणेश जी के 4 युगों के रूपों का क्या रहस्य है?

मुनि ने बताया है कि अलग-अलग युगों में गणेश जी के वाहन अलग हैं: सत्ययुग में सिंह (Lion), त्रेता में मयूर (Peacock), द्वापर में मूषक (Mouse), और कलियुग में धूम्रवर्ण (Smoke-colored) हैं।

क्या इसे भोजपत्र पर लिखने का कोई विधान है?

हाँ, श्लोक 19 के अनुसार, जो व्यक्ति इसे भोजपत्र पर लिखकर ताबीज (यंत्र) के रूप में गले में धारण करता है, उसे यक्ष, राक्षस या प्रेत बाधा कभी नहीं सताती।

शत्रु बाधा (Enemy Problem) के लिए यह कैसे उपयोगी है?

श्लोक 21 कहता है - 'युद्धकाले पठेद्यस्तु विजयं...'। यदि शत्रु परेशान कर रहे हों, तो इसका पाठ करने से वे स्वतः ही शांत हो जाते हैं या परास्त हो जाते हैं।

क्या इसे सिदुंर लगाकर पढ़ना चाहिए?

गणेश जी को सिन्दूर प्रिय है। पाठ करने से पहले माथे पर लाल चंदन या सिन्दूर का तिलक लगाने से 'तेज' बढ़ता है और कवच अधिक प्रभावी होता है।