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Sri Tripurasundari Veda Sara Stava – श्रीत्रिपुरसुन्दरीवेदसारस्तवः

Sri Tripurasundari Veda Sara Stava – श्रीत्रिपुरसुन्दरीवेदसारस्तवः
॥ त्रिपुरसुन्दरीवेदसारस्तवः ॥ श्रीगणेशाय नमः । कस्तूरीपङ्कभास्वद्गलचलदमलस्थूलमुक्तावलीका ज्योत्स्नाशुद्धावदाता शशिशिशुमुकुटालङ्कृता ब्रह्मपत्नी । साहित्याम्भोजभृङ्गी कविकुलविनुता सात्त्विकीं वाग्विभूतिं देयान्मे शुभवस्त्रा करचलवलया वल्लकीं वादयन्ती ॥ १॥ एकान्ते योगिवृन्दैः प्रशमितकरणैः क्षुत्पिपासाविमुक्तैः सानन्दं ध्यानयोगाद्विसगुणसद्दशी दृश्यते चित्तमध्ये । या देवी हंसरूपा भवभयहरणं साधकानां विधत्ते सा नित्यं नादरूपा त्रिभुवनजननी मोदमाविष्करोतु ॥ २॥ ईक्षित्री सृष्टिकाले त्रिभुवनमथ या तत्क्षणेऽनुप्रविश्य स्थेमानं प्रापयन्ती निजगुणविभवैः सर्वथा व्याप्य विश्वम् । संहर्त्री सर्वभासां विलयनसमये स्वात्मनि स्वप्रकाशा सा देवी कर्मबन्धं मम भवकरणं नाश्यत्वादिशक्तिः ॥ ३॥ लक्ष्या या चक्रराजे नवपुरलसिते योगिनीवृन्दगुप्ते सौवर्णे शैलश‍ृङ्गे सुरगणरचिते तत्त्वसोपानयुक्ते । मन्त्रिण्या मेचकाङ्ग्या कुचभरनतया कोलमुख्या च सार्धं साम्राज्ञी सा मदीया मदगजगमना दीर्घमायुस्तनोतु ॥ ४॥ ह्रीङ्काराम्भोजभृङ्गी हयमुखविनुता हानिवृद्ध्यादिहीना हंसोऽहंमन्त्रराज्ञी हरिहयवरदा हादिमन्त्रार्थरूपा । हस्ते चिन्मुद्रिकाढ्या हतबहुदनुजा हस्तिकृत्तिप्रिया मे हार्दं शोकातिरेकं शमयतु ललिताघीश्वरी पाशहस्ता ॥ ५॥ हस्ते पङ्केरुहाभे सरससरसिजं बिभ्रती लोकमाता क्षीरोदन्वत्सुकन्या करिवरविनुता नित्यपुष्टाक्ष गेहा । पद्माक्षी हेमवर्णा मुररिपुदयिता शेवधिः सम्पदां या सा मे दारिद्र्यदोषं दमयतु करुणादृष्टिपातैरजस्रम् ॥ ६॥ सच्चिद्ब्रह्मस्वरूपां सकलगुणयुतां निर्गुणां निर्विकारां रागद्वेषादिहन्त्रीं रविशशिनयनां राज्यदानप्रवीणाम् । चत्वारिंशत्त्रिकोणे चतुरधिकसमे चक्रराजे लसन्तीं कामाक्षीं कामितानां वितरणचतुरां चेतसा भावयामि ॥ ७॥ कन्दर्पे शान्तदर्पे त्रिनयननयनज्योतिषा देववृन्दैः साशङ्कं साश्रुपातं सविनयकरुणं याचिता कामपत्न्या । या देवी दृष्टिपातैः पुनरपि मदनं जीवयामास सद्यः सा नित्यं रोगशान्त्यै प्रभवतु ललिताधीश्वरी चित्प्रकाशा ॥ ८॥ हव्यैः कव्यैश्च सर्वैः श्रुतिचयविहितैः कर्मभिः कर्मशीला ध्यानाद्यैरष्टभिश्च प्रशमितकलुषा योगिनः पर्णभक्षाः । यामेवानेकरूपां प्रतिदिनमवनौ संश्रयन्ते विधिज्ञाः सा मे मोहान्धकारं बहुभवजनितं नाशयत्वादिमाता ॥ ९॥ लक्ष्या मूलत्रिकोणे गुरुवरकरुणालेशतः कामपीठे यस्याः विश्वं समस्तं बहुतरविततं जायते कुण्डलिन्याः । यस्याः शक्तिप्ररोहादविरलममृतं विन्दते योगिवृन्दं तां वन्दे नादरूपां प्रणवपदमयीं प्राणिनां प्राणदात्रीम् ॥ १०॥ ह्रीङ्काराम्भोधिलक्ष्मीं हिमगिरितनयामीश्वरीमीश्वराणां ह्रीं‍मन्त्राराध्यदेवीं श्रुतिशतशिखरैर्मृग्यमाणां मृगाक्षीम् । ह्रीं‍मन्त्रान्तैस्त्रिकूटैः स्थिरतरमतिभिर्धार्यमाणां ज्वलन्तीं ह्रीं ह्रीं ह्रीमित्यजस्रं हृदयसरसिजे भावयेऽहं भवानीम् ॥ ११॥ सर्वेषां ध्यानमात्रात्सवितुरुदरगा चोदयन्ती मनीषां सावित्री तत्पदार्था शशियुतमकुटा पञ्चशीर्षा त्रिनेत्रा हस्ताग्रैः शङ्खचक्राद्यखिलजनपरित्राणदक्षायुधानां बिभ्राणा वृन्दमम्बा विशदयतु मतिं मामकीनां महेशी ॥ १२॥ कर्त्री लोकस्य लीलाविलसितविधिना कारयित्री क्रियाणां भर्त्री स्वानुप्रवेशाद्वियदनिलमुखैः पञ्चभूतैः स्वसृष्टैः । हर्त्री स्वेनैव धाम्ना पुनरपि विलये कालरूपं दधाना हन्यादामूलमस्मत्कलुषभरमुमा भुक्तिमुक्तिप्रदात्री ॥ १३॥ लक्ष्या या पुण्यजालैर्गुरुवरचरणाम्भोजसेवाविशेषाद्- दृश्या स्वान्ते सुधीभिर्दरदलितमहापद्मकोशेन तुल्ये । लक्षं जस्वापि यस्या मनुवरमणिमासिद्धिमन्तो महान्तः सा नित्यं मामकीने हृदयसरसिजे वासमङ्गीकरोतु ॥ १४॥ ह्रीं‍श्रीर्मैं‍मन्त्ररूपा हरिहरविनुताऽगस्त्यपत्नीप्रदिष्टा हादिः काद्यर्णतत्त्वा सुरपतिवरदा कामराजप्रदिष्टा । दुष्टानां दानवानां मदभरहरणा दुःखहन्त्री बुधानां साम्राज्ञी चक्रराज्ञी प्रदिशतु कुशलं मह्यमोङ्काररूपा ॥ १५॥ श्रीं‍मन्त्रार्थस्वरूपा श्रितजनदुरितध्वान्तहन्त्री शरण्या श्रौतस्मार्तक्रियाणामविकलफलदा भालनेत्रस्य दाराः । श्रीचक्रान्तर्निषण्णा गुहवरजननी दुष्टहन्त्री वरेण्या श्रीमत्सिंहासनेशी प्रदिशतु विपुलां कीर्तिमानन्दरूपा ॥ १६॥ श्रीचक्रवरसाम्राज्ञी श्रीमत्त्रिपुरसुन्दरी । श्रीगुहान्वयसौवर्णदीपिका दिशतु श्रियम् ॥ १७॥ ॥ इति श्रीमत्त्रिपुरसुन्दरीवेदसारस्तवः सम्पूर्णः ॥

श्रीत्रिपुरसुन्दरीवेदसारस्तवः का परिचय (Introduction)

श्रीत्रिपुरसुन्दरीवेदसारस्तवः (Sri Tripurasundari Veda Sara Stava) शाक्त परम्परा और श्री विद्या का एक अत्यंत गूढ़ और शक्तिशाली स्तोत्र है। 'वेदसार' का अर्थ है समस्त वेदों, उपनिषदों और शास्त्रों का अंतिम निचोड़ या निष्कर्ष। सनातन धर्म के अनुसार वेदों का अंतिम लक्ष्य उस 'परब्रह्म' को जानना है जो सृष्टि का रक्षक और संहारक है। इस स्तोत्र में यह स्पष्ट रूप से स्थापित किया गया है कि वह परब्रह्म कोई और नहीं, अपितु स्वयं माता ललिता त्रिपुरसुन्दरी ही हैं।

यह स्तोत्र भी श्री विद्या के अन्य दुर्लभ स्तोत्रों की ही भाँति मंत्र-गर्भित है। यदि आप ध्यानपूर्वक देखें, तो इस स्तोत्र के प्रथम १६ श्लोकों का प्रथम अक्षर श्री विद्या के पञ्चदशी और षोडशी महामंत्र (क, ए, ई, ल, ह्रीं...) के बीजाक्षरों से ही आरंभ होता है। १७वां श्लोक इस स्तोत्र का मंगल-वाक्य या फलश्रुति है। इस प्रकार, यह स्तोत्र केवल देवी की काव्यात्मक स्तुति नहीं है, बल्कि एक अत्यंत जाग्रत और गुह्य तांत्रिक मंत्र भी है, जिसे ऋषियों ने स्तोत्र का आवरण पहनाकर जनमानस के कल्याण के लिए प्रस्तुत किया है।

इस स्तोत्र में देवी के विविध स्वरूपों का अत्यंत अद्भुत समन्वय किया गया है। श्लोक १ में वे सरस्वती (ब्रह्मपत्नी) के रूप में हैं जो साहित्य और वाक्-शक्ति प्रदान करती हैं। श्लोक ६ में वे लक्ष्मी (क्षीरोदन्वत्सुकन्या) के रूप में हैं जो दरिद्रता का नाश करती हैं। श्लोक ७ में वे सच्चिदानंद ब्रह्म के रूप में हैं। श्लोक १० में उन्हें कुण्डलिनी शक्ति के रूप में वर्णित किया गया है, जो योगियों के भीतर अमृत की वर्षा करती हैं। इस प्रकार यह स्तोत्र ज्ञान (ज्ञान योग), भक्ति (भक्ति योग) और तंत्र (मंत्र एवं कुण्डलिनी योग) का एक त्रिवेणी संगम है।

इस स्तोत्र की सबसे बड़ी विशेषता श्लोक १५ में छिपी है, जहाँ श्री विद्या के दो सबसे गुप्त संप्रदायों—हादि विद्या (Hadi Vidya) और कादि विद्या (Kadi Vidya)—का स्पष्ट उल्लेख है। महर्षि अगस्त्य की पत्नी लोपामुद्रा हादि विद्या की उपासिका थीं और कामदेव (कामराज) कादि विद्या के दृष्टा थे। स्तोत्र कहता है: "अगस्त्यपत्नीप्रदिष्टा हादिः काद्यर्णतत्त्वा... कामराजप्रदिष्टा"। यह पंक्ति इस स्तोत्र को श्री विद्या के प्रामाणिक और सर्वोच्च ग्रंथों की श्रेणी में स्थापित कर देती है।

स्तोत्र का विशिष्ट महत्व (Significance)

श्रीत्रिपुरसुन्दरीवेदसारस्तवः का महत्व इसके नाम में ही छिपा है। वेदों का सार 'प्रणव' (ॐ) है और तंत्र का सार 'ह्रीं' (माया बीज) है। श्लोक ११ में साधक कहता है— "ह्रीं ह्रीं ह्रीमित्यजस्रं हृदयसरसिजे भावयेऽहं भवानीम्" (मैं अपने हृदय रूपी सरोवर में ह्रीं ह्रीं ह्रीं मन्त्र का निरंतर स्मरण करते हुए माता भवानी का ध्यान करता हूँ)। यह स्तोत्र साधक को बाहरी कर्मकांडों से उठाकर सीधे हृदय के भीतर होने वाले नाद (अनाहत नाद) से जोड़ देता है।

श्लोक ३ में अद्वैत वेदांत के सर्वोच्च सिद्धांत को देवी पर आरोपित किया गया है। देवी ही सृष्टि के समय संसार को देखती हैं, उसमें प्रवेश करती हैं, अपने गुणों से उसका पालन करती हैं और प्रलय के समय सब कुछ समेट कर 'स्वात्मनि स्वप्रकाशा' (अपने ही प्रकाश में, स्वयं में लीन) हो जाती हैं। यह हुबहू उपनिषदों के 'ब्रह्म' की परिभाषा है।

श्लोक १२ में गायत्री मंत्र के रहस्य को खोला गया है। देवी को सावित्री और 'तत्पदार्था' (तत्-सवितुः-वरेण्यम् का अर्थ) बताया गया है जो पंचमुखी और त्रिनेत्रा हैं। जो साधक इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसे वेदों, उपनिषदों, तंत्रों और गायत्री मंत्र के जप का सम्पूर्ण फल एक साथ प्राप्त हो जाता है।

फलश्रुति और स्तोत्र के लाभ (Benefits from Phalashruti)

इस स्तोत्र के श्लोकों के भीतर ही साधक के लिए प्रार्थना और फलश्रुति छिपी हुई है। जो व्यक्ति निष्काम या सकाम भाव से इस 'वेदसार' का पाठ करता है, उसे निम्नलिखित सिद्धियां प्राप्त होती हैं:

  • अद्भुत वाक्-सिद्धि और विद्या: श्लोक १ के अनुसार, जो इसका पाठ करता है, उसे देवी 'सात्त्विकीं वाग्विभूतिं' (सात्विक वाणी और साहित्य का ज्ञान) प्रदान करती हैं। विद्यार्थी और लेखकों के लिए यह अमोघ है।
  • कर्म बंधनों का नाश: श्लोक ३ की प्रार्थना— "सा देवी कर्मबन्धं मम भवकरणं नाश्यत्वादिशक्तिः"— जन्म-मरण के चक्र में फंसाने वाले भारी से भारी कर्म-बंधनों को काटकर मोक्ष प्रदान करती है।
  • दीर्घायु और स्वास्थ्य: श्लोक ४ में "दीर्घमायुस्तनोतु" (लंबी आयु प्रदान करें) और श्लोक ८ में "नित्यं रोगशान्त्यै प्रभवतु" (निरंतर रोगों को शांत करें) कहकर साधक पूर्ण स्वास्थ्य का आशीर्वाद प्राप्त करता है।
  • अत्यधिक शोक और अवसाद से मुक्ति: श्लोक ५ के अनुसार यह स्तोत्र "हार्दं शोकातिरेकं शमयतु" अर्थात् हृदय में बैठे गहरे से गहरे शोक और डिप्रेशन को समाप्त कर देता है।
  • दरिद्रता और गरीबी का समूल नाश: श्लोक ६ में देवी को लक्ष्मी स्वरूपा मानते हुए प्रार्थना की गई है कि "दारिद्र्यदोषं दमयतु" अर्थात् वे अपनी करुणा दृष्टि से मेरी दरिद्रता के दोष का हमेशा के लिए दमन कर दें।
  • यश, कीर्ति और आनंद: श्लोक १६ के अनुसार, यह स्तोत्र जीवन में विपुल कीर्ति (विपुलां कीर्तिम्) और आनंद प्रदान करता है।

पाठ विधि और नियम (Ritual Method)

चूँकि यह स्तोत्र वेदों का सार है और सात्विक ऊर्जा से परिपूर्ण है, अतः इसके पाठ में शारीरिक और मानसिक शुद्धि का विशेष महत्व है।

  • उत्तम समय: ब्रह्म मुहूर्त, सूर्योदय का समय (संध्या वंदन के समय) या गोधूलि वेला इसके पाठ के लिए सर्वश्रेष्ठ हैं।
  • दिशा और आसन: श्वेत या पीले रंग के ऊनी/कुश के आसन पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  • पूजन: अपने समक्ष श्रीयंत्र या देवी राजराजेश्वरी का चित्र रखें। घी का दीपक जलाएं। श्लोक १ में देवी को श्वेत वस्त्रा (शुभवस्त्रा) और ज्योत्स्ना (चांदनी) के समान उज्ज्वल बताया गया है, इसलिए उन्हें श्वेत या हल्के गुलाबी पुष्प अर्पित करना अत्यंत शुभ होता है।
  • पाठ का प्रकार: इसे बहुत उच्च स्वर में पढ़ने के बजाय, मध्यम या मंद स्वर (उपांशु) में पढ़ना चाहिए। श्लोकों का अर्थ हृदय में धारण करते हुए इसका धीरे-धीरे पाठ करें।
  • अनुष्ठान: यदि किसी विशेष कामना (जैसे दरिद्रता नाश या भयंकर रोग की शांति) के लिए पाठ करना हो, तो लगातार ४१ दिनों तक संकल्प लेकर नित्य इसके ३ या ११ पाठ करने चाहिए।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. 'वेदसार' का क्या अर्थ है?

'वेदसार' का अर्थ है वेदों का अंतिम निष्कर्ष या निचोड़। इस स्तोत्र में स्थापित किया गया है कि वेदों में जिस 'परब्रह्म' की नेति-नेति कहकर स्तुति की गई है, वह वास्तव में आदि पराशक्ति ललिता त्रिपुरसुन्दरी ही हैं।

2. क्या यह स्तोत्र भी मंत्र-गर्भित है?

जी हाँ। इस स्तोत्र के प्रथम 16 श्लोक श्री विद्या के पञ्चदशी और षोडशी महामंत्र के 16 बीजाक्षरों (क, ए, ई, ल, ह्रीं...) से प्रारंभ होते हैं। अतः इसका पाठ करने से मंत्र जप का फल भी स्वतः प्राप्त हो जाता है।

3. श्लोक 15 में वर्णित 'हादि' और 'कादि' विद्या क्या है?

श्री विद्या के दो प्रमुख और प्रामाणिक संप्रदाय हैं— हादि विद्या और कादि विद्या। 'कादि' विद्या (जिसका मंत्र 'क' से शुरू होता है) के दृष्टा कामदेव (कामराज) हैं। 'हादि' विद्या (जिसका मंत्र 'ह' से शुरू होता है) की दृष्टा महर्षि अगस्त्य की पत्नी लोपामुद्रा हैं। स्तोत्र में इन दोनों का उल्लेख कर समन्वय स्थापित किया गया है।

4. क्या कोई आम व्यक्ति इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है?

बिल्कुल। यद्यपि इसमें अत्यंत गुह्य मंत्र और तांत्रिक रहस्य छिपे हैं, किंतु स्तुति और स्तोत्र के रूप में होने के कारण कोई भी श्रद्धालु इसका भक्तिपूर्वक पाठ कर सकता है, इसके लिए तांत्रिक दीक्षा अनिवार्य नहीं है।

5. इस स्तोत्र से दरिद्रता का नाश कैसे होता है?

श्लोक 6 में देवी को क्षीर सागर की पुत्री (महालक्ष्मी), भगवान विष्णु की प्रिया और 'संपदां शेवधिः' (संपत्तियों का खजाना) कहा गया है। इस श्लोक के सकाम पाठ से माता की करुणा दृष्टि होती है और घोर दरिद्रता मिट जाती है।

6. श्लोक 10 में 'कुण्डलिनी' का क्या संदर्भ है?

श्लोक 10 में बताया गया है कि देवी ही मूलाधार चक्र में कुण्डलिनी रूप में सोई हुई हैं। जब गुरु कृपा से वे जाग्रत होती हैं, तो सहस्रार चक्र से योगियों के लिए अमृत की वर्षा (शक्ति प्ररोहादविरलममृतं) करती हैं।

7. क्या यह स्तोत्र रोगों को दूर करने में सहायक है?

हाँ। श्लोक 8 में देवी से प्रार्थना की गई है— "सा नित्यं रोगशान्त्यै प्रभवतु" (वे देवी नित्य रोगों की शांति करें)। इसका संकल्प पूर्वक पाठ भयंकर और असाध्य रोगों में भी लाभ देता है।

8. श्लोक 1 में देवी को वल्लकी (वीणा) बजाते हुए क्यों दिखाया गया है?

त्रिपुरसुन्दरी के मंत्री रूप को 'श्यामला' या 'मातंगी' कहा जाता है जो ज्ञान, संगीत और कला की देवी सरस्वती का ही तांत्रिक स्वरूप हैं। वीणा बजाने का वर्णन इसी ज्ञान और सात्विक वाक्-शक्ति को दर्शाता है।

9. श्लोक 12 में किस मंत्र की ओर इशारा है?

श्लोक 12 में पूर्णतः 'गायत्री मंत्र' का रहस्य बताया गया है। देवी को सावित्री कहा गया है जो सूर्य (सवितुः) के भीतर निवास करती हैं और हमारी बुद्धि (मनीषां) को प्रेरित (चोदयन्ती/प्रचोदयात्) करती हैं।

10. पाठ करते समय किस प्रकार का ध्यान करना चाहिए?

पाठ करते समय देवी के उस अत्यंत शांत, करुणामय और प्रकाशवान स्वरूप का ध्यान करना चाहिए जो अद्वैत ब्रह्म का साक्षात रूप है। मन में यह भावना रखनी चाहिए कि देवी की किरणें आपके शरीर से रोग, शोक और अज्ञान को नष्ट कर रही हैं।