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Sri Tripurasundari Suprabhatam – श्रीत्रिपुरसुन्दरी सुप्रभातम्

Sri Tripurasundari Suprabhatam – श्रीत्रिपुरसुन्दरी सुप्रभातम्
॥ श्रीत्रिपुरसुन्दरी सुप्रभातम् ॥ श्रीसेव्य-पादकमले श्रित-चन्द्र-मौले श्रीचन्द्रशेखर-यतीश्वर-पूज्यमाने। श्रीखण्ड-कन्दुककृत-स्व-शिरोवतंसे श्रीमन्महात्रिपुरसुन्दरि सुप्रभातम् ॥ १॥ उत्तिष्ठ तुङ्ग-कुलपर्वत-राज-कन्ये उत्तिष्ठ भक्त-जन-दुःख-विनाश-दक्षे । उत्तिष्ठ सर्व-जगती-जननि प्रसन्ने उत्तिष्ठ हे त्रिपुरसुन्दरि सुप्रभातम् ॥ २॥ उत्तिष्ठ राजत-गिरि-द्विषतो रथात् त्वं उत्तिष्ठ रत्न-खचितत् ज्वलिताच्च पीठात्। उत्तिष्ठ बन्धन-सुखं परिधूय शंभोः उत्तिष्ठ विघ्नित-तिरस्करिणीं विपाट्य ॥ ३॥ यत्पृष्ठभागमवलम्ब्य विभाति लक्ष्मीः यस्या वसन्ति निखिला अमराश्च देहे । स्नात्वा विशुद्धहृदया कपिला सवत्सा सिद्धा प्रदर्शयितुमिह नस्तव विश्वरूपम् ॥ ४॥ आकर्ण्यतेऽद्य मदमत्त-गजेन्द्रनादः त्वं बोध्यसे प्रतिदिनं मधुरेण येन । भूपालरागमुखरा मुखवाद्यवीणा भेरीध्वनिश्च कुरुते भवतीं प्रबुद्धाम् ॥ ५॥ त्वां सेवितुं विविध-रत्न-सुवर्ण-रूप्य- खाद्यम्बरैः कुसुम-पत्र-फलैश्च भक्ताः । श्रद्धान्विताः जननि विस्मृत-गृह्य-बन्धाः आयान्ति भारत-निवासि-जनाः सवेगम् ॥ ६॥ जीवातवः सुकृतिनः श्रुतिरूपमातुः विप्राः प्रसन्न-मनसो जपितार्क-मन्त्राः । श्रीसूक्त-रुद्र-चमकाद्यवधारणाय सिद्धाः महेश-दयिते तव सुप्रभातम् ॥ ७॥ फालप्रकासि-तिलकाङ्क-सुवासिनीनां कर्पूर-भद्र-शिखया तव दृष्टि-दोषम् । गोष्ठी विभाति परिहर्तुमनन्यभावा हे देवि पङ्क्तिश इयं तव सुप्रभातम् ॥ ८॥ उग्रः सहस्र-किरणोऽपि करं समर्प्य त्वत्तेजसः पुरत एष विलज्जितः सन् । रक्तस्तनावुदयमेत्यगपृष्ठलीनः पद्मं त्वदास्यसहजं कुरुते प्रसन्नम् ॥ ९॥ नृत्यन्ति बर्हनिवहं शिखिनः प्रसार्य गायन्ति पञ्चमगतेन पिकाः स्वरेण। आस्ते तरङ्गतति-वाद्य-मृदङ्ग-नादः तौर्यत्रिकं शुभमकृत्रिममस्तु तुभ्यम् ॥ १०॥ संताप-पाप-हरणे त्वयि दीक्षितायां संताप-हारि-शशि-पापहरापगाभ्याम् । कुत्रापि धूर्जटि-जटा-विपिने निलीनं छिन्ना सरित् क्षयमुपैति विधुश्च वक्रः ॥ ११॥ भुक्त्वा कुचेल-पृतुकं ननु गोपबालः आकर्ण्य ते व्यरचयत् सुहृदं कुबेरम् । व्याजस्य नास्ति तव रिक्त-जनादपेक्षा निर्व्याजमेव करुणां नमते तनोषि ॥ १२॥ प्राप्नोति वृद्धिमतुलां पुरुषः कटाक्षैः द्वन्द्वी ध्रुवं क्षयमुपैति न चात्र शङ्का। मित्रस्तवोषसि पदं परिसेव्य वृद्धः चन्द्रस्त्वदीय-मुखशत्रुतया विनष्टः ॥ १३॥ सृष्टि-स्थिति-प्रलय-साक्षिणि विश्व-मातः स्वर्गापवर्ग-फल-दायनि शंभु-कान्ते । श्रुत्यन्तखेलिनि विपक्ष-कठोर-वज्रे भद्रे प्रसन्न-हृदये तव सुप्रभातम् ॥ १४॥ मातः स्वरूपमनिशं हृदि पश्यतां ते को वा न सिद्ध्यति मनश्चिर-कांक्षितार्थः । सिद्ध्यन्ति हन्त धरणी-धन-धान्य-धाम- धी-धेनु-धैर्य-धृतयः सकलाः पुमार्थाः ॥ १५॥ ॥ इति श्रीत्रिपुरसुन्दरी सुप्रभातम् सम्पूर्णम् ॥

श्रीत्रिपुरसुन्दरी सुप्रभातम् का परिचय (Introduction)

सनातन धर्म की दैनिक उपासना पद्धति में 'सुप्रभातम्' (Suprabhatam) का एक अत्यंत विशिष्ट और हृदयस्पर्शी स्थान है। 'सुप्रभातम्' का शाब्दिक अर्थ है 'मंगलमयी शुभ प्रभात' या 'मंगलमयी सुबह'। भगवान या भगवती तो अजन्मा और निद्रा-रहित हैं, वे कभी सोते नहीं, फिर उन्हें जगाने का क्या औचित्य है? दर्शनशास्त्र के अनुसार, सुप्रभातम् के माध्यम से साधक वास्तव में भगवान को नहीं जगाता, बल्कि भगवान की वंदना करते हुए स्वयं के भीतर सोई हुई चेतना, आध्यात्मिक ऊर्जा और सद्गुणों को जागृत करता है। श्रीत्रिपुरसुन्दरी सुप्रभातम् माता राजराजेश्वरी को समर्पित एक ऐसा ही अप्रतिम और भावपूर्ण १५ श्लोकों का स्तोत्र है।

इस स्तोत्र का आरंभ अत्यंत दिव्य है। प्रथम श्लोक में ही कहा गया है— "श्रीचन्द्रशेखर-यतीश्वर-पूज्यमाने" अर्थात् हे माता! आप महान यतीश्वर (संन्यासियों में श्रेष्ठ) श्री चन्द्रशेखर द्वारा पूजित हैं। यह पंक्ति स्पष्ट रूप से संकेत करती है कि यह स्तोत्र शांकर मठों की महान परंपरा (विशेषकर कांची कामकोटि पीठ या शृंगेरी शारदा पीठ के पूज्य शंकराचार्यों) से संबंधित है, जहाँ माँ त्रिपुरसुन्दरी (कामाक्षी/शारदा) की आराधना सर्वोपरि है।

श्लोक २ और ३ में साधक अत्यंत वात्सल्य और प्रेम के साथ माता से उठने का आग्रह करता है— "उत्तिष्ठ तुङ्ग-कुलपर्वत-राज-कन्ये" (हे पर्वतराज हिमालय की पुत्री, उठिए), "उत्तिष्ठ भक्त-जन-दुःख-विनाश-दक्षे" (हे भक्तों के दुखों का नाश करने में कुशल माता, उठिए)। साधक माता से भगवान शिव (शंभोः) के आलिंगन और सुखद शय्या को त्यागकर अपने भक्तों पर कृपादृष्टि डालने की प्रार्थना करता है। यह भाव भक्त और भगवान के बीच के उस अंतरंग संबंध को दर्शाता है जहाँ ईश्वर एक परम स्नेही माता के रूप में प्रतीत होती हैं।

इस स्तोत्र में प्रातःकाल की बेला (ब्रह्म मुहूर्त) का अत्यंत मनोहारी और सजीव काव्यात्मक चित्रण किया गया है। श्लोक ५ और १० में बताया गया है कि कैसे मदमस्त हाथियों की चिंघाड़, वीणा की झंकार, भेरी (नगाड़े) की ध्वनि, मोर का नृत्य और कोयलों का पंचम स्वर मिलकर माता के जागरण के लिए एक प्राकृतिक और कृत्रिम संगीत का अद्भुत संगम प्रस्तुत कर रहे हैं।

स्तोत्र का विशिष्ट महत्व और काव्यात्मक सौंदर्य (Significance)

यह सुप्रभातम् केवल एक पारंपरिक स्तुति नहीं है, बल्कि यह उच्च कोटि के काव्यात्मक अलंकारों (Poetic devices) और दार्शनिक रहस्यों से परिपूर्ण है। इसमें प्रकृति, वेदपाठ, और सुवासिनियों द्वारा की जाने वाली नीराजन (आरती) का अद्भुत समन्वय है।

श्लोक ७ में एक अत्यंत पवित्र दृश्य उपस्थित किया गया है— "जीवातवः सुकृतिनः... श्रीसूक्त-रुद्र-चमकाद्यवधारणाय सिद्धाः"। अर्थात्, प्रातःकाल स्नान करके शुद्ध हुए पुण्यात्मा ब्राह्मण (विप्र) सूर्य को अर्घ्य देकर माता के समक्ष 'श्रीसूक्त', 'रुद्र सूक्त' और 'चमकम्' का सस्वर वेदपाठ करने के लिए तैयार खड़े हैं। यह दर्शाता है कि त्रिपुरसुन्दरी की उपासना वैदिक और तांत्रिक दोनों ही विधियों का सर्वोच्च शिखर है।

इस स्तोत्र में एक बहुत ही सुंदर और प्रतीकात्मक कथा-संदर्भ भी है। श्लोक १२ में भगवान श्रीकृष्ण और उनके दरिद्र मित्र सुदामा (कुचेल) का प्रसंग आता है— "भुक्त्वा कुचेल-पृतुकं ननु गोपबालः... व्यरचयत् सुहृदं कुबेरम्"। साधक कहता है कि जिस प्रकार एक गोकुल के बालक (श्रीकृष्ण) ने अपने मित्र सुदामा के लाए हुए सूखे पोहे (पृतुक) खाकर ही उसे कुबेर के समान धनवान बना दिया था, उसी प्रकार हे माता! आपकी अहैतुकी करुणा भी किसी दिखावे (व्याज) की मोहताज नहीं है; आप निर्व्याज (बिना कारण) ही अपने नम्र भक्तों पर कृपा की वर्षा कर देती हैं। यह श्लोक अद्वैत भाव को पुष्ट करता है कि त्रिपुरसुन्दरी और कृष्ण (विष्णु) तत्त्वतः एक ही हैं।

श्लोक ८ में सुवासिनियों (सौभाग्यवती स्त्रियों) का वर्णन है जो अपने मस्तक पर चमकती हुई बिंदी लगाए, हाथों में कपूर (कर्पूर-भद्र-शिखया) की आरती लिए खड़ी हैं, ताकि माता के जागते ही उनकी दृष्टि उतारी जा सके और उन्हें किसी की नज़र न लगे। यह माता के प्रति विशुद्ध वात्सल्य भाव की पराकाष्ठा है।

फलश्रुति और लाभ (Benefits of the Suprabhatam)

इस स्तोत्र के अंतिम श्लोकों (१४ और १५) में इसके पाठ से मिलने वाले अकल्पनीय लाभों का स्पष्ट उल्लेख किया गया है:

  • अष्ट-ऐश्वर्य की प्राप्ति: श्लोक १५ में स्पष्ट रूप से 'अष्ट-ध' (आठ 'ध' अक्षर वाली संपत्तियों) का वर्णन है— धरणी (भूमि), धन (संपत्ति), धान्य (अन्न), धाम (घर/तेज), धी (बुद्धि), धेनु (गायें/समृद्धि), धैर्य (साहस), और धृति (स्थिरता)। जो व्यक्ति माता के इस स्वरूप को प्रातःकाल अपने हृदय में देखता है, उसे ये सभी आठों सिद्धियां अनायास ही प्राप्त हो जाती हैं।
  • मनोवांछित फलों की सिद्धि: "को वा न सिद्ध्यति मनश्चिर-कांक्षितार्थः" अर्थात् जो व्यक्ति इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसके मन की ऐसी कौन सी चिर-प्रतीक्षित इच्छा है जो पूरी नहीं होती? (अर्थात् सब पूर्ण होती हैं)।
  • स्वर्ग और अपवर्ग (मोक्ष): श्लोक १४ में माता को 'स्वर्गापवर्ग-फल-दायनि' कहा गया है। यह स्तोत्र केवल भौतिक सुख ही नहीं, बल्कि मृत्यु के पश्चात मोक्ष भी प्रदान करता है।
  • शत्रु और विघ्नों का नाश: माता को 'विपक्ष-कठोर-वज्रे' (शत्रुओं के लिए कठोर वज्र के समान) और 'भक्त-जन-दुःख-विनाश-दक्षे' (भक्तों के दुखों का नाश करने वाली) बताया गया है। अतः इसका पाठ जीवन के हर विघ्न को नष्ट कर देता है।
  • प्रातःकालीन सकारात्मकता: ब्रह्म मुहूर्त में इस स्तोत्र के श्रवण या पठन से पूरे दिन के लिए मन में एक अद्भुत शांति, ऊर्जा और सात्विकता का संचार होता है।

पाठ विधि और नियम (Ritual Method for Chanting)

'सुप्रभातम्' का पाठ करने की विधि अत्यंत सात्विक और भक्तिपूर्ण है। इसका मूल उद्देश्य दिन का आरंभ ईश्वर के नाम और रूप के साथ करना है।

  • पाठ का समय: जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, इसका पाठ प्रातःकाल (विशेषकर ब्रह्म मुहूर्त—सूर्योदय से लगभग १.५ घंटे पूर्व) उठते ही करना चाहिए।
  • शारीरिक और मानसिक शुद्धि: यदि संभव हो तो प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण कर लें। यदि तुरंत स्नान संभव न हो, तो हाथ-मुँह धोकर शुद्ध आसन पर बैठें।
  • दिशा और आसन: पूर्व दिशा (उगते सूर्य की ओर) मुख करके बैठना सबसे शुभ माना जाता है।
  • आरती (नीराजन): यदि आप मंदिर में या अपने घर के पूजा-कक्षा में पाठ कर रहे हैं, तो स्तोत्र पूरा होने के बाद श्लोक ८ की भावना के अनुसार थोड़ा सा कपूर जलाकर माता की आरती अवश्य उतारें।
  • ध्यान: पाठ करते समय माता ललिता के उस स्वरूप का ध्यान करें कि वे शय्या से उठकर, अत्यंत प्रसन्न मुद्रा में (प्रसन्न-हृदये) अपने भक्तों की ओर देख रही हैं और उन्हें आशीर्वाद दे रही हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. 'सुप्रभातम्' स्तोत्र क्या होता है?

सुप्रभातम् वह स्तोत्र है जो प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) में देवताओं को प्रतीकात्मक रूप से नींद से जगाने और उनकी वंदना करने के लिए गाया जाता है। यह दिन की शुभ शुरुआत का प्रतीक है।

2. पहले श्लोक में 'श्रीचन्द्रशेखर-यतीश्वर' का क्या संदर्भ है?

यह शांकर मठों (विशेषकर कांची कामकोटि पीठ) के महान संन्यासियों और आचार्यों की ओर संकेत करता है, जो माता त्रिपुरसुन्दरी की अगाध भक्ति और पूजा करते थे। यह स्तोत्र उसी पवित्र परंपरा से प्रेरित है।

3. इस स्तोत्र में प्रकृति के जागरण का वर्णन कैसे किया गया है?

श्लोक 10 में बताया गया है कि मोर अपने पंख फैलाकर नाच रहे हैं और कोयले पंचम स्वर में गा रही हैं। प्रकृति स्वयं माता के स्वागत के लिए संगीतमय हो उठी है।

4. श्लोक 12 में सुदामा (कुचेल) और कृष्ण का संदर्भ क्यों आया है?

यह बताने के लिए कि जिस प्रकार कृष्ण ने सुदामा के सूखे पोहे खाकर उसे कुबेर बना दिया था, उसी प्रकार माता त्रिपुरसुन्दरी भी भक्तों की थोड़ी सी श्रद्धा से ही उन पर बिना किसी स्वार्थ (निर्व्याज) के करुणा की वर्षा कर देती हैं।

5. श्लोक 15 के अनुसार इस पाठ से कौन सी आठ सिद्धियां मिलती हैं?

इस पाठ से आठ 'ध' अक्षर वाली संपत्तियां मिलती हैं— धरणी (भूमि), धन, धान्य, धाम (घर/तेज), धी (बुद्धि), धेनु (समृद्धि), धैर्य और धृति (दृढ़ता)।

6. क्या इस पाठ के लिए स्नान करना अनिवार्य है?

यद्यपि स्नान करके पाठ करना सर्वोत्तम है, परंतु 'सुप्रभातम्' का मुख्य उद्देश्य जागते ही भगवान का स्मरण करना है। इसलिए आँख खुलते ही बिस्तर पर बैठे-बैठे मानसिक शुद्धि के साथ भी इसका पाठ किया जा सकता है।

7. श्लोक 8 में सुवासिनियों द्वारा कपूर जलाने का क्या अर्थ है?

यह एक अत्यंत मधुर वात्सल्य भाव है, जहाँ सौभाग्यवती स्त्रियाँ (सुवासिनियां) कपूर जलाकर माता की आरती उतार रही हैं ताकि माता के अत्यंत सुंदर मुखमंडल को किसी की नज़र (दृष्टि-दोष) न लगे।

8. क्या इस स्तोत्र से मोक्ष की प्राप्ति होती है?

हाँ। श्लोक 14 में माता को 'स्वर्गापवर्ग-फल-दायनि' कहा गया है। स्वर्ग का अर्थ है लौकिक/पारलौकिक सुख, और अपवर्ग का अर्थ है जन्म-मरण से मुक्ति (मोक्ष)। यह दोनों प्रदान करता है।

9. क्या कोई भी भक्त इसका पाठ कर सकता है?

बिल्कुल। यह एक अत्यंत सरल, भक्तिपूर्ण और काव्यात्मक स्तुति है। इसके पाठ के लिए किसी विशेष तांत्रिक दीक्षा की आवश्यकता नहीं है, इसे कोई भी श्रद्धालु गा सकता है।

10. 'विपक्ष-कठोर-वज्रे' का क्या तात्पर्य है?

इसका अर्थ है कि जो माता अपने भक्तों के लिए अत्यंत कोमल हैं, वही माता धर्म के विरोधियों (विपक्षियों) या पापियों के लिए कठोर वज्र के समान प्रहार करने वाली हैं। वे भक्तों की पूर्ण रक्षक हैं।