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Sri Tripurasundari Aparadha Kshamapana Stotram – श्रीत्रिपुरसुन्दर्यपराधक्षमापणस्तोत्रम्

Sri Tripurasundari Aparadha Kshamapana Stotram – श्रीत्रिपुरसुन्दर्यपराधक्षमापणस्तोत्रम्
॥ श्रीत्रिपुरसुन्दर्यपराधक्षमापणस्तोत्रम् ॥ अथ स्तोत्रं प्रवक्ष्यामि त्रिपुरार्णव ईरितम् । किं किं द्वन्द्वं दनुजदलिनि क्षीयते न श्रुतायां का का सिद्धिः कुलकमलिनि प्राप्यते नार्चितायाम् । का का कीर्तिः सुरवरनुते व्याप्यते न स्तुतायां कं कं भोगं त्वयि न चिनुते चित्तमालम्बितायाम् ॥ १॥ सकुसं सकुसं रम्भ स्वारिता मोक्षविभ्रमे । चिच्चन्द्रमण्डलान्तःस्थे नमस्ते हरवल्लभे ॥ २॥ जगदुद्धारणोद्योगयोगभोगवियोगिनि । स्थितिभावस्थिते देवि नमः स्थाणुप्रियेऽम्बिके ॥ ३॥ भावाभावपृथग्भावानुभावे वेदकर्मणि । चैतन्यपञ्चके देवि नमस्तुभ्यं हराङ्गने ॥ ४॥ सृष्टिस्थित्युपसंहारप्रत्युर्जितपदद्वये । चिद्विश्रान्तिमहासत्तामात्रे मातर्नमोऽस्तु ते ॥ ५॥ वह्न्यर्कशीतकिरणब्रह्मचक्रान्तरोदिते । चतुष्पीठेश्वरि शिवे नमस्ते त्रिपुरेश्वरि ॥ ६॥ चराचरमिदं विश्वं प्रकाशयसि तेजसा । मातृकारूपमास्थाय तस्यै मातर्नमोऽस्तु ते ॥ ७॥ स्मृता भवभयं हंसि पूजिताऽसि शुभङ्करि । स्तुता त्वं वाच्छितं वस्तु ददासि करुणावरे ॥ ८॥ भक्तस्य नित्यपूजायां रतस्य मम साम्प्रतम् । वाग्भवादिमहासिद्धिं देहि त्रिपुरसुन्दरि ॥ ९॥ परमानन्दसन्दोहप्रमोदभरनिर्भरे । दुःखत्रयपरिम्लानवदनं पाहि मां शिवे ॥ १०॥ शब्दब्रह्ममयि यच्च देवि त्रिपुरसुन्दरि । यथाशक्ति जपं पूजां गृहाण मदनुग्रहात् ॥ ११॥ अज्ञानादल्पबुद्धित्वादालस्याद् दुष्टभावतः । ममापराधं कार्पण्यं क्षमस्व परदेवते ॥ १२॥ अज्ञानामसमर्थानामस्वस्थाननिवासिनाम् । अशुद्धं बलमस्माकं शिशूनां हरवल्लभे ॥ १३॥ कृपामयि कृपां भद्रे सकृन्मयि निवेशय । तावदहं कृतार्थोऽस्मि न ते किञ्चन हीयते ॥ १४॥ यन्मया क्रियते कर्म जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिषु । तत् सर्वं तावकी पूजा भूयाद् भूत्यै रमे शिवे ॥ १५॥ द्रव्यहीनं क्रियाहीनं विधिहीनञ्च यद् भवेत् । तत् सर्वं कृपया देवि क्षमस्व परदेवते ॥ १६॥ यन्मयोक्तं महाज्ञानं तन्महत् स्वल्पमेव वा । तावत् सर्वं जगद्धात्रि क्षन्तव्यमयमञ्जलिः ॥ १७॥ ॥ इति श्रीत्रिपुरसुन्दरी अपराधक्षमापणस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥ (तत्त्वचिन्तामणि एकोनविंशः प्रकाशः त्रिपुरार्णवोक्तं त्रिपुरसुन्दरीस्तोत्रम्)

श्रीत्रिपुरसुन्दर्यपराधक्षमापणस्तोत्रम् का परिचय (Introduction)

सनातन धर्म की पूजा और तंत्र साधना में 'अपराध क्षमापण' (क्षमा याचना) का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। श्री विद्या और दशमहाविद्या की साधनाएं अत्यंत गूढ़, नियम-बद्ध और विस्तृत होती हैं। पञ्चोपचार, षोडशोपचार या श्रीयंत्र के नव-आवरण की पूजा करते समय एक साधारण मनुष्य या साधक से मंत्र के उच्चारण में, ध्यान में, या सामग्री अर्पित करने में कोई न कोई भूल या 'अपराध' होना स्वाभाविक है। श्रीत्रिपुरसुन्दर्यपराधक्षमापणस्तोत्रम् (Sri Tripurasundari Aparadha Kshamapana Stotram) इन्हीं ज्ञात और अज्ञात त्रुटियों के लिए माता राजराजेश्वरी से क्षमा मांगने का एक अत्यंत भावपूर्ण और प्रामाणिक तंत्रोक्त स्तोत्र है।

यह स्तोत्र तंत्र शास्त्र के प्रामाणिक ग्रंथ 'त्रिपुरार्णव तंत्र' (Tripurarnava Tantra) में वर्णित है और इसे परमहंस पूर्णानन्द स्वामी द्वारा रचित प्रसिद्ध ग्रंथ 'तत्त्वचिन्तामणि' (Tattvachintamani) के १९वें प्रकाश में संकलित किया गया है। १७ श्लोकों का यह स्तोत्र मात्र क्षमा याचना नहीं है, बल्कि यह अद्वैत दर्शन, भक्ति, और पूर्ण शरणागति का एक अद्भुत काव्य है।

स्तोत्र का आरंभ देवी की अनंत महिमा के गान से होता है। श्लोक १ में साधक कहता है— "किं किं द्वन्द्वं दनुजदलिनि क्षीयते न श्रुतायां" अर्थात् हे दैत्यों का नाश करने वाली! आपके चरित्र को सुनने मात्र से ऐसा कौन सा द्वंद्व (सुख-दुःख का भेद) है जो नष्ट नहीं हो जाता? आपकी अर्चना करने से कौन सी सिद्धि प्राप्त नहीं होती? इसके पश्चात साधक श्लोक १० से अपनी मानवीय कमियों को स्वीकार करते हुए माता के वात्सल्य और करुणा को पुकारता है।

तंत्र शास्त्र में यह माना जाता है कि बिना क्षमा-याचना के कोई भी पूजा, जप या अनुष्ठान पूर्ण फल नहीं देता, क्योंकि त्रुटियों के कारण उत्पन्न होने वाला दोष उस पुण्य को नष्ट कर सकता है। यह स्तोत्र उसी दोष को मिटाकर पूजा को परिपूर्ण (Complete) करता है।

स्तोत्र का विशिष्ट महत्व और दार्शनिक गहराई (Significance)

इस स्तोत्र की सबसे बड़ी विशेषता इसका दार्शनिक दृष्टिकोण (Philosophical approach) है। इसमें साधक कर्मकांड की कठोरता से ऊपर उठकर भाव और समर्पण की गहराई में उतर जाता है।

श्लोक १२ और १३ में साधक अत्यंत विनम्रतापूर्वक अपनी दुर्बलताओं को माता के सामने रखता है— "अज्ञानादल्पबुद्धित्वादालस्याद् दुष्टभावतः... अशुद्धं बलमस्माकं शिशूनां हरवल्लभे"। साधक कहता है कि हे माता! अज्ञान, कम बुद्धि, आलस्य और मन में उठने वाले दुष्ट भावों के कारण मुझसे जो भी अपराध हुए हैं, उन्हें क्षमा करें। हम बालक (शिशु) हैं, अस्वस्थ हैं और हमारा बल अशुद्ध है। जिस प्रकार एक माँ अपने शिशु की अज्ञानता में की गई गलतियों पर क्रोधित नहीं होती, उसी प्रकार हे हरवल्लभे (शिव-प्रिया)! आप मुझे क्षमा करें।

इस स्तोत्र का सबसे प्रसिद्ध और सर्वोच्च श्लोक १५वां है— "यन्मया क्रियते कर्म जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिषु । तत् सर्वं तावकी पूजा भूयाद् भूत्यै रमे शिवे ॥" अर्थात् 'जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्थाओं में मेरे द्वारा जो भी कर्म किया जाए, वह सब आपकी ही पूजा बन जाए।' यह श्लोक शिवानंद लहरी के "आत्मा त्वं गिरिजा मतिः" के भाव के समान है, जहाँ साधक का संपूर्ण जीवन ही एक निरंतर पूजा बन जाता है।

श्लोक १६ (द्रव्यहीनं क्रियाहीनं विधिहीनञ्च यद् भवेत्) कर्मकांड के तीन मुख्य स्तंभों—द्रव्य (सामग्री), क्रिया (मुद्रा/आसन), और विधि (नियम)—में होने वाली कमियों को सीधे देवी की कृपा पर छोड़ देता है।

फलश्रुति और लाभ (Benefits of the Kshamapana Stotram)

इस 'अपराध क्षमापण' स्तोत्र के पाठ से केवल क्षमा ही नहीं मिलती, अपितु साधक को अनेक आध्यात्मिक और लौकिक लाभ भी प्राप्त होते हैं:

  • पूजा की पूर्णता: किसी भी मंत्र जप, नव-आवरण पूजा, या अनुष्ठान के अंत में इसे पढ़ने से उस पूजा में हुई सभी त्रुटियां (चाहे वे सामग्री की कमी हो या मंत्र का अशुद्ध उच्चारण) दूर हो जाती हैं और पूजा का शत-प्रतिशत फल प्राप्त होता है।
  • दुःखत्रय का नाश: श्लोक १० में साधक "दुःखत्रयपरिम्लानवदनं पाहि मां शिवे" कहता है। इसका अर्थ है कि यह स्तोत्र तीन प्रकार के दुखों—आध्यात्मिक (शारीरिक/मानसिक रोग), आधिभौतिक (शत्रु/जीवों से कष्ट), और आधिदैविक (प्राकृतिक आपदाओं)—से रक्षा करता है।
  • अहंकार का शमन: जब साधक अपनी कमियों (आलस्य, अल्पबुद्धि) को स्वीकार करता है, तो उसका अहंकार नष्ट हो जाता है, जो आध्यात्मिक उन्नति की सबसे बड़ी शर्त है।
  • वाग्भव आदि महासिद्धियां: श्लोक ९ में देवी से "वाग्भवादिमहासिद्धिं देहि" की प्रार्थना की गई है। अतः यह स्तोत्र वाक्-सिद्धि, ज्ञान और पञ्चदशी मंत्र के तीनों कूटों (वाग्भव, कामराज, शक्ति) की सिद्धियां प्रदान करता है।
  • भय से मुक्ति: श्लोक ८ (स्मृता भवभयं हंसि) के अनुसार, देवी का स्मरण करने मात्र से संसार के सभी प्रकार के भयों (मृत्यु, रोग, दरिद्रता) का नाश हो जाता है।

पाठ विधि और नियम (Ritual Method for Chanting)

'अपराध क्षमापण' स्तोत्र का पाठ करने की विधि अत्यंत भावपूर्ण और विनम्रता से परिपूर्ण होनी चाहिए। इसमें किसी विशेष कर्मकांड से अधिक हृदय के सच्चे भाव की आवश्यकता होती है।

  • पाठ का सही समय: इसका पाठ कभी भी किया जा सकता है, परंतु सर्वोत्तम समय किसी भी दैनिक पूजा, श्री विद्या के जप, स्तोत्र पाठ, या हवन के बिल्कुल अंत में होता है (आरती से पूर्व या पश्चात्)।
  • आसन और मुद्रा: माता ललिता त्रिपुरसुन्दरी या श्रीयंत्र के सामने खड़े होकर या घुटनों के बल बैठकर (वीर मुद्रा/वज्रासन) इसका पाठ करना चाहिए।
  • अंजलि मुद्रा: श्लोक १७ में स्पष्ट कहा गया है— "क्षन्तव्यमयमञ्जलिः" (इस अंजलि को स्वीकार करें और मुझे क्षमा करें)। अतः पाठ करते समय दोनों हाथों को जोड़कर अंजलि मुद्रा (नमस्कार की स्थिति) में रखना अनिवार्य है।
  • भाव: पाठ करते समय मन में पूर्ण विनम्रता रखें। यह अनुभव करें कि आप एक छोटे शिशु हैं और माता आपकी सभी अज्ञानतापूर्ण गलतियों को मुस्कुराते हुए क्षमा कर रही हैं।
  • समर्पण: अंतिम श्लोक पढ़ने के बाद, थोड़ा सा जल (आचमनी से) लेकर "ॐ तत्सत् ब्रह्ार्पणमस्तु" या "श्री माता त्रिपुरसुन्दरी अर्पणमस्तु" कहते हुए पृथ्वी पर छोड़ दें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. 'अपराध क्षमापण स्तोत्र' क्या होता है?

यह वह प्रार्थना है जिसमें साधक अपनी पूजा, जप या दैनिक जीवन में जाने-अनजाने में हुई गलतियों, नियमों के उल्लंघन और आलस्य के लिए इष्ट देवता से क्षमा मांगता है।

2. यह विशेष स्तोत्र किस ग्रंथ से लिया गया है?

यह स्तोत्र मूल रूप से 'त्रिपुरार्णव तंत्र' का हिस्सा है और इसे परमहंस पूर्णानन्द स्वामी द्वारा रचित प्रसिद्ध तांत्रिक ग्रंथ 'तत्त्वचिन्तामणि' (19वें प्रकाश) में संकलित किया गया है।

3. इस स्तोत्र को पूजा के अंत में ही क्यों पढ़ा जाता है?

पूजा करते समय मंत्रों के उच्चारण, न्यास, या सामग्री अर्पण में किसी न किसी त्रुटि (दोष) की संभावना रहती है। अंत में इसे पढ़ने से वे सभी दोष नष्ट हो जाते हैं और पूजा फलदायी बन जाती है।

4. श्लोक 16 में वर्णित 'द्रव्यहीनं, क्रियाहीनं, विधिहीनं' का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है: 'द्रव्यहीन' (पूजा सामग्री की कमी), 'क्रियाहीन' (पूजा के आसन, मुद्रा आदि में कमी), और 'विधिहीन' (शास्त्रोक्त नियमों के पालन में कमी)। साधक इन तीनों प्रकार की कमियों के लिए क्षमा मांगता है।

5. श्लोक 15 का दार्शनिक रहस्य क्या है?

"यन्मया क्रियते कर्म जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिषु... तावकी पूजा" — इसका अर्थ है कि जाग्रत, स्वप्न और गहरी नींद (सुषुप्ति) में मैं जो भी करूँ, वह सब आपकी ही पूजा बन जाए। यह कर्मों को देवी के प्रति पूर्णतः समर्पित करने का अद्वैत भाव है।

6. श्लोक 10 में 'दुःखत्रय' किसे कहा गया है?

सनातन दर्शन में तीन प्रकार के दुःख माने गए हैं: 1. आध्यात्मिक (शारीरिक/मानसिक रोग), 2. आधिभौतिक (शत्रुओं, जानवरों से कष्ट), 3. आधिदैविक (बाढ़, भूकंप आदि प्राकृतिक आपदाएं)। देवी इन तीनों दुखों से रक्षा करती हैं।

7. क्या मैं इसे अपनी नित्य पूजा के बिना भी पढ़ सकता हूँ?

बिल्कुल! यदि आप कोई विस्तृत पूजा नहीं भी करते, तो भी रात को सोने से पूर्व इस स्तोत्र का पाठ करके दिन भर में हुई भूल-चूक के लिए माता से क्षमा मांग सकते हैं। यह मन को बहुत शांति देता है।

8. श्लोक 17 में 'अञ्जलिः' का क्या तात्पर्य है?

'अंजलि' का अर्थ है दोनों हाथों को जोड़कर प्रार्थना की मुद्रा बनाना। श्लोक कहता है कि "हे जगद्धात्री! मेरे द्वारा जो भी कम या ज्यादा कहा गया है, उसे क्षमा करें, मैं हाथ जोड़कर आपके समक्ष खड़ा हूँ।"

9. क्या इस पाठ के लिए श्री विद्या की दीक्षा आवश्यक है?

यद्यपि यह त्रिपुरार्णव तंत्र से लिया गया है, लेकिन क्षमा याचना स्तोत्र होने के कारण यह पूरी तरह से भक्ति और भाव पर आधारित है। कोई भी श्रद्धालु बिना किसी दीक्षा के इसका पाठ कर सकता है।

10. इस स्तोत्र का पाठ करने से साधक का मन कैसा हो जाता है?

साधक का मन अहंकार-शून्य, विनम्र और परमानंद से भर जाता है। जब वह अपनी 'अल्पबुद्धि' और 'आलस्य' को स्वीकार कर लेता है, तो माता का वात्सल्य उस पर बरसने लगता है, जिससे उसे असीम मानसिक शांति मिलती है।