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Sri Stotram (Agni Purana) – श्रीस्तोत्रम्

Sri Stotram (Agni Purana) – श्रीस्तोत्रम्
॥ श्रीस्तोत्रम् (अग्निपुराण) ॥ अथाग्नेये षट्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः । पुष्कर उवाच - राज्यलक्ष्मीस्थिरत्वाय यथेन्द्रेण पुरा श्रियः । स्तुतिः कृता तथा राजा जयार्थं स्तुतिमाचरेत् ॥ १॥ इन्द्र उवाच - नमस्ते सर्वलोकानां जननीमब्धिसम्भवाम् । श्रियमुन्निन्द्रपद्माक्षीं विष्णुवक्षःस्थलस्थिताम् ॥ २॥ त्वं सिद्धिस्त्वं स्वधा स्वाहा सुधा त्वं लोकपावनि । सन्ध्या रात्रिः प्रभा भूतिर्मेधा श्रद्धा सरस्वती ॥ ३॥ यज्ञविद्या महाविद्या गुह्यविद्या च शोभने । आत्मविद्या च देवि त्वं विमुक्तिफलदायिनी ॥ ४॥ आन्वीक्षिकी त्रयी वार्ता दण्डनीतिस्त्वमेव च । सौम्या सौम्यैर्जगद्रूपैस्त्वयैतद्देवि पूरितम् ॥ ५॥ का त्वन्या त्वामृते देवि सर्वयज्ञमयं वपुः । अध्यास्ते देव देवस्य योगिचिन्त्यं गदाभृतः ॥ ६॥ त्वया देवि परित्यक्तं सकलं भुवनत्रयम् । विनष्टप्रायमभवत्त्वयेदानीं समेधितम् ॥ ७॥ दाराः पुत्रास्तथागारं सुहृद्धान्यधनादिकम् । भवत्येतन्महाभागे नित्यं त्वद्वीक्षणान्नृणाम् ॥ ८॥ शरीरारोग्यमैश्वर्यमरिपक्षक्षयः सुखम् । देवि त्वद्दृष्टिदृष्टानां पुरुषाणां न दुर्लभम् ॥ ९॥ त्वमम्बा सर्वभूतानां देवदेवो हरिः पिता । त्वयैतद्विष्णुना चाम्ब जगद्व्याप्तं चराचरम् ॥ १०॥ मानं कोषं तथा कोष्ठं मा गृहं मा परिच्छदम् । मा शरीरं कलत्रञ्च त्यजेथाः सर्वपावनि ॥ ११॥ मा पुत्रान्मासुहृद्वर्गान्मा पशून्मा विभूषणम् । त्यजेथा मम देवस्य विष्णोर्वक्षःस्थलालये ॥ १२॥ सत्त्वेन सत्यशौचाभ्यां तथा शीलादिभिर्गुणैः । त्यजन्ते ते नरा सद्यः सन्त्यक्ता ये त्वयामले ॥ १३॥ त्वयावलोकिताः सद्यः शीलाद्यैरखिलैर्गुणैः । कुलैश्वर्यैश्च युज्यन्ते पुरुषा निर्गुणा अपि ॥ १४॥ स श्लाघ्यः स गुणी धन्यः स कुलीनः स बुद्धिमान् । स शूरः स च विक्रान्तो यस्त्वया देवि वीक्षितः ॥ १५॥ सद्यो वैगुण्यमायान्ति शीलाद्याः सकला गुणाः । पराङ्मुखी जगद्धात्री यस्य त्वं विष्णुवल्लभे ॥ १६॥ न ते वर्णयितुं शक्ता गुणान् जिह्वापि वेधसः । प्रसीद देवि पद्माक्षि नास्मांस्त्याक्षीः कदाचन ॥ १७॥ पुष्कर उवाच - एवं स्तुता ददौ श्रीश्च वरमिन्द्राय चेप्सितम् । सुस्थिरत्वं च राज्यस्य सङ्ग्रामविजयादिकम् ॥ १८॥ स्वस्तोत्रपाठश्रवणकर्तॄणां भुक्तिमुक्तिदम् । श्रीस्तोत्रं सततं तस्मात्पठेच्च श‍ृणुयान्नरः ॥ १९॥ ॥ इत्याग्नेये महापुराणे श्रीस्तोत्रं नाम षट्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥

श्रीस्तोत्रम् (अग्निपुराण) — परिचय एवं दार्शनिक महत्व

श्रीस्तोत्रम् सनातन धर्म का एक अत्यंत प्राचीन और प्रामाणिक स्तोत्र है, जिसे महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित 'अग्निपुराण' के 236वें अध्याय (षट्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः) से लिया गया है। इस स्तोत्र का उपदेश पुष्कर ने दिया है और मूल रूप से इसकी स्तुति देवराज इन्द्र द्वारा माता महालक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए की गई थी। जब दुर्वासा ऋषि के शाप के कारण इन्द्रदेव अपना स्वर्ग का राज्य और वैभव खो चुके थे, तब उन्होंने अपनी सत्ता की पुनः प्राप्ति और स्थिरता के लिए इसी स्तोत्र का गान किया था।

दार्शनिक गहराई (Philosophical Depth): इस स्तोत्र में माता लक्ष्मी को केवल धन या भौतिक समृद्धि का प्रतीक नहीं माना गया है। श्लोक 3 और 4 में इन्द्र उन्हें "सिद्धि, स्वधा, स्वाहा, सुधा, मेधा, श्रद्धा, सरस्वती" तथा "यज्ञविद्या, महाविद्या, गुह्यविद्या, आत्मविद्या" कहकर संबोधित करते हैं। यह स्पष्ट करता है कि माँ लक्ष्मी ही वह आदि शक्ति हैं जो भौतिक सफलता (भुक्ति) के साथ-साथ आध्यात्मिक पूर्णता (मुक्ति) भी प्रदान करती हैं।

संसार की प्राण-शक्ति: श्लोक 7 में इन्द्र देव अत्यंत भावुक होकर कहते हैं—"त्वया देवि परित्यक्तं सकलं भुवनत्रयम्। विनष्टप्रायमभवत्..." (हे देवी! आपके द्वारा त्याग दिए जाने पर यह संपूर्ण त्रिलोकी नष्टप्राय हो गई थी, और अब आपकी दृष्टि पड़ने से ही यह पुनः समृद्ध हुई है)। इससे सिद्ध होता है कि लक्ष्मी केवल स्वर्ण नहीं, अपितु जीवन की गतिशीलता और ऊर्जा हैं।

स्तोत्र के अद्भुत लाभ — फलश्रुति (Benefits from Phala Shruti)

अग्निपुराण के अनुसार, इस श्रीस्तोत्र का पाठ करने से साधक को जीवन में अभूतपूर्व लाभ प्राप्त होते हैं। स्वयं पुष्कर और इन्द्र ने इसके फलों का वर्णन किया है:

  • राज्यलक्ष्मी की स्थिरता (Stability of Wealth): "राज्यलक्ष्मीस्थिरत्वाय" (श्लोक 1) — जो व्यक्ति अपने पद, प्रतिष्ठा, व्यवसाय या नौकरी में अस्थिरता (Instability) का सामना कर रहे हैं, उन्हें यह पाठ स्थिर सफलता प्रदान करता है। आया हुआ धन टिकने लगता है।
  • ऐश्वर्य और आरोग्य: "शरीरारोग्यमैश्वर्यमरिपक्षक्षयः सुखम्" (श्लोक 9) — इस स्तोत्र के प्रभाव से उत्तम स्वास्थ्य (आरोग्य), अखंड ऐश्वर्य, और शत्रुओं का पूर्ण नाश होता है।
  • पारिवारिक सुख एवं संपन्नता: "दाराः पुत्रास्तथागारं सुहृद्धान्यधनादिकम्" (श्लोक 8) — माता की कृपा दृष्टि से सुयोग्य पत्नी, आज्ञाकारी पुत्र, विशाल घर, सच्चे मित्र और धन-धान्य की कभी कमी नहीं होती।
  • संग्राम में विजय: पुष्कर के अनुसार (श्लोक 18), इस स्तुति के प्रभाव से ही इन्द्र ने घोर युद्ध में विजय प्राप्त की। आधुनिक संदर्भ में, यह पाठ कानूनी विवादों, कोर्ट केस और व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा (Competition) में जीत दिलाता है।
  • सद्गुणों का विकास: श्लोक 14 और 15 में स्पष्ट है कि जिस पर देवी लक्ष्मी की कृपा होती है, वह व्यक्ति निर्गुण होने पर भी गुणी, कुलीन, शूरवीर और विक्रमी बन जाता है। समाज में उसे स्वतः ही सम्मान मिलने लगता है।

साधना विधि और विशेष नियम (Ritual Method)

चूँकि यह देवराज इन्द्र द्वारा अपने राज्य की वापसी के लिए किया गया स्तोत्र है, अतः इसका पाठ पूर्ण राजसी भाव, स्वच्छता और समर्पण के साथ करना चाहिए।

  • समय और वेला: प्रातःकाल सूर्योदय के समय या शुक्रवार की गोधूलि बेला (संध्याकाल) में इस स्तोत्र का पाठ सर्वोत्तम माना जाता है।
  • आसन और दिशा: पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके कुशा या लाल रंग के ऊनी आसन पर बैठें।
  • दीप और नैवेद्य: माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु के चित्र के समक्ष गाय के शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें। नैवेद्य के रूप में खीर, बताशे या पंचामृत अर्पित करें। श्लोक में "विष्णुवक्षःस्थलस्थिताम्" कहा गया है, इसलिए नारायण का ध्यान अनिवार्य है।
  • संकल्प: पाठ आरंभ करने से पूर्व दाहिने हाथ में जल और अक्षत लेकर अपने अभीष्ट कार्य (जैसे रोजगार में स्थिरता, कर्ज मुक्ति या मुक़दमे में विजय) का संकल्प लें।
  • विशेष अवसर: दीपावली, अक्षय तृतीया, शरद पूर्णिमा और नवरात्रि के दिनों में इस स्तोत्र का 11 या 21 बार पाठ करने से त्वरित फल की प्राप्ति होती है और 'भुक्ति-मुक्ति' (श्लोक 19) दोनों प्राप्त होते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. 'श्रीस्तोत्रम्' किस पुराण से लिया गया है?

यह स्तोत्र महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित 'अग्निपुराण' के 236वें अध्याय (षट्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः) से उद्धृत है। इसमें पुष्कर और इन्द्र का संवाद है।

2. इस स्तोत्र की रचना किसने की थी?

पौराणिक संदर्भों के अनुसार, यह स्तुति देवराज इन्द्र द्वारा माता महालक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए रची गई थी, जब दुर्वासा ऋषि के शाप के कारण उन्होंने अपना स्वर्ग का राज्य खो दिया था।

3. 'राज्यलक्ष्मीस्थिरत्वाय' का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है 'राज्य (सत्ता, पद, या व्यापार) रूपी लक्ष्मी की स्थिरता के लिए'। यह स्तोत्र मुख्य रूप से प्राप्त धन, नौकरी और पद को सुरक्षित और स्थिर रखने के लिए किया जाता है।

4. इस स्तोत्र में 'यज्ञविद्या' और 'आत्मविद्या' किसे कहा गया है?

इस स्तोत्र में माता लक्ष्मी को ही यज्ञविद्या (कर्मकांड का ज्ञान) और आत्मविद्या (ब्रह्मज्ञान) कहा गया है, जो यह सिद्ध करता है कि वे न केवल भौतिक धन की, बल्कि मोक्ष की भी दात्री हैं।

5. क्या यह पाठ स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी है?

हाँ, श्लोक 9 में "शरीरारोग्यमैश्वर्यमरिपक्षक्षयः सुखम्" कहा गया है, जिसका अर्थ है कि माता की कृपा से व्यक्ति को निरोगी काया (आरोग्य) और परम सुख प्राप्त होता है।

6. 'का त्वन्या त्वामृते देवि' का क्या तात्पर्य है?

इन्द्र कहते हैं कि हे देवी! आपके बिना दूसरा कौन है जो भगवान विष्णु (गदाधर) के वक्षस्थल पर निवास कर सके। आप ही संपूर्ण जगत का मूल आधार हैं।

7. क्या इस पाठ से शत्रुओं का नाश होता है?

जी हाँ, फलश्रुति में 'सङ्ग्रामविजयादिकम्' और 'अरिपक्षक्षयः' का उल्लेख है, जिसका अर्थ है कि यह पाठ शत्रुओं के नाश और हर प्रकार के संघर्ष (कानूनी विवाद, प्रतियोगिता) में विजय दिलाने में सक्षम है।

8. माता लक्ष्मी के रूठने का क्या परिणाम बताया गया है?

श्लोक 16 के अनुसार, यदि माता लक्ष्मी विमुख हो जाएं (पराङ्मुखी जगद्धात्री), तो व्यक्ति के सभी शील, सद्गुण और सम्मान तत्काल नष्ट (वैगुण्य) हो जाते हैं।

9. पाठ के लिए कौन सा दिन सबसे शुभ है?

माता लक्ष्मी की आराधना के लिए शुक्रवार का दिन सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। इसके अतिरिक्त पूर्णिमा, दीपावली और अक्षय तृतीया के दिन इसका पाठ विशेष फलदायी होता है।

10. क्या गृहस्थ जीवन की शांति के लिए यह पाठ किया जा सकता है?

बिल्कुल, श्लोक 8 में कहा गया है कि माता की दृष्टि से पत्नी (दारा), पुत्र, घर, मित्र और धन की प्राप्ति होती है। अतः यह पारिवारिक सुख-शांति के लिए अमोघ है।