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Sri Shulini Durga Sumukhikarana Stotram – श्रीशूलिनीदुर्गासुमुखीकरणस्तोत्रम्

Sri Shulini Durga Sumukhikarana Stotram – श्रीशूलिनीदुर्गासुमुखीकरणस्तोत्रम्
॥ श्रीशूलिनीदुर्गासुमुखीकरणस्तोत्रम् ॥ ॥ विनियोगः ॥ ॐ अस्य श्रीसुमुखीकरणस्तोत्रमन्त्रस्य दीर्घतमा ऋषिः । ककुप्छन्दः । शूलिनी देवता । तत्प्रासादसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः । श्रीदीर्घतमा ऋषये नमः शिरसि । ककुप्छन्दसे नमः मुखे । शूलिनी देवतायै नमः हृदि । तत्प्रासादसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे ॥ ॥ ध्यानम् ॥ ॐ ध्यायेद्धेमसहोपलासनपरे कन्याजनालङ्कृते पञ्चब्रह्ममुखामरैर्मुनिवरैः सेव्ये जगन्मङ्गले । आसीनां स्मितभाषिणीं शिवसखीं कल्याणवेषोज्ज्वलां भक्ताभीष्टवरप्रदाननिरतां विश्वात्मिकां शूलिनीम् ॥ ॥ मानस पूजनम् ॥ ॐ लं पृथ्वीतत्त्वात्मकं गन्धं श्रीशूलिनी देवता प्रीतये समर्पयामि नमः । ॐ हं आकाश तत्त्वात्मकं पुष्पं श्रीशूलिनी देवता प्रीतये समर्पयामि नमः । ॐ यं वायुतत्त्वात्मकं धूपं श्रीशूलिनी देवता प्रीतये घ्रापयामि नमः । ॐ रं अग्नितत्त्वात्मकं दीपं श्रीशूलिनी देवता प्रीतये दर्शयामि नमः । ॐ वं अमृततत्त्वात्मकं नैवेद्यं श्रीशूलिनी देवता प्रीतये निवेदयामि नमः । ॐ सं सर्वतत्त्वात्मकं ताम्बूलं श्रीशूलिनी देवता प्रीतये समर्पयामि नमः । ॥ अथ पाठः ॥ (नोट: प्रत्येक श्लोक से पूर्व "ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं क्ष्म्र्यौं दुं" अवश्य पढ़ें ।) ओङ्कारमन्त्रपीठस्थे ओषधीशामृतोज्ज्वले । ऐश्वर्यमायुरारोग्यमिष्टसिद्धिं च देहि मे ॥ १॥ श्रीपूर्णे श्रीपरे श्रीशे श्रीमये श्रीविवर्धने । ऐश्वर्यमायुरारोग्यमिष्टसिद्धिं च देहि मे ॥ २॥ कामेशि कामरसिके कामितार्थफलप्रदे । ऐश्वर्यमायुरारोग्यमिष्टसिद्धिं च देहि मे ॥ ३॥ मायाविलासचतुरे माये मायाधिनायिके । ऐश्वर्यमायुरारोग्यमिष्टसिद्धिं च देहि मे ॥ ४॥ चिन्तामणेऽखिलाभीष्टसिद्धिदे विश्वमङ्गले । ऐश्वर्यमायुरारोग्यमिष्टसिद्धिं च देहि मे ॥ ५॥ सर्वबीजाधिपे सर्वसिद्धिदे सिद्धरूपिणि । ऐश्वर्यमायुरारोग्यमिष्टसिद्धिं च देहि मे ॥ ६॥ ज्वलत्तेजस्त्रयानन्तकोटिकोटिसमद्युते । ऐश्वर्यमायुरारोग्यमिष्टसिद्धिं च देहि मे ॥ ७॥ लसच्चन्द्रार्धमकुटे लयजन्मविमोचके । ऐश्वर्यमायुरारोग्यमिष्टसिद्धिं च देहि मे ॥ ८॥ ज्वररोगमुखापत्ति भञ्जनैक धुरन्धरे । ऐश्वर्यमायुरारोग्यमिष्टसिद्धिं च देहि मे ॥ ९॥ लक्षलक्ष्ये लयातीते लक्ष्मीवर्गवरेक्षणे । ऐश्वर्यमायुरारोग्यमिष्टसिद्धिं च देहि मे ॥ १०॥ शूराङ्गनाऽनन्तकोटिव्यापृताशेषजालके । ऐश्वर्यमायुरारोग्यमिष्टसिद्धिं च देहि मे ॥ ११॥ लिपे लिङ्गादिदिक्स्थाननियताराधनप्रिये । ऐश्वर्यमायुरारोग्यमिष्टसिद्धिं च देहि मे ॥ १२॥ निर्मले निर्गुणे नित्ये निष्कले निरुपद्रवे । ऐश्वर्यमायुरारोग्यमिष्टसिद्धिं च देहि मे ॥ १३॥ दुर्गे दुरितसंहारे दुष्टातूलान्त्य पावके । ऐश्वर्यमायुरारोग्यमिष्टसिद्धिं च देहि मे ॥ १४॥ रमामये रमासेव्ये रमावर्धनतत्परे । ऐश्वर्यमायुरारोग्यमिष्टसिद्धिं च देहि मे ॥ १५॥ ग्रसिताशेषभुवने ग्रन्थिसन्ध्यर्णशोभिते । ऐश्वर्यमायुरारोग्यमिष्टसिद्धिं च देहि मे ॥ १६॥ हंसतार्क्ष्यवृषारूढैराराधितपदद्वये । ऐश्वर्यमायुरारोग्यमिष्टसिद्धिं च देहि मे ॥ १७॥ हुङ्कारकालदहनभस्मीकृतजगत्त्रये । ऐश्वर्यमायुरारोग्यमिष्टसिद्धिं च देहि मे ॥ १८॥ फट्कारचण्डपवनोद्वासिताखिलविग्रहे । ऐश्वर्यमायुरारोग्यमिष्टसिद्धिं च देहि मे ॥ १९॥ स्वीकृतस्वामिपादाब्जभक्तानां स्वाभिवृद्धिदे । ऐश्वर्यमायुरारोग्यमिष्टसिद्धिं च देहि मे ॥ २०॥ हालाहलविषाकारे हाटकारुणपीठिके । ऐश्वर्यमायुरारोग्यमिष्टसिद्धिं च देहि मे ॥ २१॥ मूलादिब्रह्मरन्ध्रान्तज्वलज्ज्वालास्वरूपिणि । ऐश्वर्यमायुरारोग्यमिष्टसिद्धिं च देहि मे ॥ २२॥ वषडादिक्रियाषट्कमहासिद्धिप्रदे परे । ऐश्वर्यमायुरारोग्यमिष्टसिद्धिं च देहि मे ॥ २३॥ सर्वविद्वन्मुखाम्भोजदिवाकरसमद्युते । ऐश्वर्यमायुरारोग्यमिष्टसिद्धिं च देहि मे ॥ २४॥ नानामहीपहृदयनवनीतद्रवानले । ऐश्वर्यमायुरारोग्यमिष्टसिद्धिं च देहि मे ॥ २५॥ अशेषज्वरसर्पाग्निचन्द्रोपलशशिद्युते । ऐश्वर्यमायुरारोग्यमिष्टसिद्धिं च देहि मे ॥ २६॥ महापापौघकलुषक्षालनामृतवाहिनि । ऐश्वर्यमायुरारोग्यमिष्टसिद्धिं च देहि मे ॥ २७॥ अशेषकायसम्भूतरोगतूलानलाकृते । ऐश्वर्यमायुरारोग्यमिष्टसिद्धिं च देहि मे ॥ २८॥ ओषधीकूटदावाग्निशान्तिसम्पूर्णंवर्षिणि । ऐश्वर्यमायुरारोग्यमिष्टसिद्धिं च देहि मे ॥ २९॥ तिमिरारातिसंहारदिवानाथशताकृते । ऐश्वर्यमायुरारोग्यमिष्टसिद्धिं च देहि मे ॥ ३०॥ सुधार्द्रजिह्वाऽऽवर्त्यग्र सुदीपे विश्ववाक्प्रदे । ऐश्वर्यमायुरारोग्यमिष्टसिद्धिं च देहि मे ॥ ३१॥ अरात्यवनिपानीक तूलोच्चाटमहानिले । ऐश्वर्यमायुरारोग्यमिष्टसिद्धिं च देहि मे ॥ ३२॥ समस्तमृत्युतुहिनसहस्रकिरणोपमे । ऐश्वर्यमायुरारोग्यमिष्टसिद्धिं च देहि मे ॥ ३३॥ सुभक्तहृदयानन्दसुखसंवित्स्वरूपिणि । ऐश्वर्यमायुरारोग्यमिष्टसिद्धिं च देहि मे ॥ ३४॥ जगत्सौभाग्यबलदे जङ्गमस्थावरात्मिके । ऐश्वर्यमायुरारोग्यमिष्टसिद्धिं च देहि मे ॥ ३५॥ धनधान्याब्धिसंवृद्धिचन्द्रकोटिसमोदये । ऐश्वर्यमायुरारोग्यमिष्टसिद्धिं च देहि मे ॥ ३६॥ सर्वजीवात्मधेन्वग्रसमर्च्यानलवत्सके । ऐश्वर्यमायुरारोग्यमिष्टसिद्धिं च देहि मे ॥ ३७॥ तेजःकणमहावीरसमावीतान्त्यपावके । ऐश्वर्यमायुरारोग्यमिष्टसिद्धिं च देहि मे ॥ ३८॥ नानाचराचराविषदाहोपशमनामृते । ऐश्वर्यमायुरारोग्यमिष्टसिद्धिं च देहि मे ॥ ३९॥ सर्वकल्याणकल्याणे सर्वसिद्धिविवर्धने । ऐश्वर्यमायुरारोग्यमिष्टसिद्धिं च देहि मे ॥ ४०॥ सर्वेशि सर्वहृदये सर्वाकारेऽनिराकृते । ऐश्वर्यमायुरारोग्यमिष्टसिद्धिं च देहि मे ॥ ४१॥ अनन्तानन्दजनके अमृतेऽमृतनायिके । ऐश्वर्यमायुरारोग्यमिष्टसिद्धिं च देहि मे ॥ ४२॥ रहस्यातिरहस्यात्मरहस्यागमपालिके । ऐश्वर्यमायुरारोग्यमिष्टसिद्धिं च देहि मे ॥ ४३॥ आचारकरणातीते आचार्यकरुणामये । ऐश्वर्यमायुरारोग्यमिष्टसिद्धिं च देहि मे ॥ ४४॥ सर्वरक्षाकरे भद्रे सर्वशिक्षाकरेऽतुले । ऐश्वर्यमायुरारोग्यमिष्टसिद्धिं च देहि मे ॥ ४५॥ सर्वलोके सर्वदेशे सर्वकाले सदाम्बिके । ऐश्वर्यमायुरारोग्यमिष्टसिद्धिं च देहि मे ॥ ४६॥ आद्येऽनादिकलाविशेषविवृतेऽनन्ताखिलात्माकृते आचार्याङ्घ्रिसरोजयुग्मशिरसामापूरिताशामृते । संसारार्णवतारणोद्यतकृपासम्पूर्णदृष्ट्याऽनिशं दुर्गे शूलिनि शङ्करि स्नपय मां त्वद्भावसंसिद्धये ॥ ४७॥ ॥ फलश्रुतिः ॥ इति परमशिवायाः शूलिनीदेवतायाः स्तुतिमतिशयसौख्यप्राप्तये योऽनुवारम् । स्मरति जपति विद्वान् संवृतोऽशेषलोकै- र्निखिलसुखमवाप्य श्रीशिवाकारमेति ॥ ४८॥ ॥ इति आकाशभैरवकल्पे प्रत्यक्षसिद्धिप्रदे उमामहेश्वरसंवादे शूलिनीदुर्गासुमुखीकरणस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

शूलिनी दुर्गा और सुमुखीकरण का तांत्रिक रहस्य

श्रीशूलिनीदुर्गासुमुखीकरणस्तोत्रम् महाशैव तंत्र के एक अत्यंत गुप्त और सिद्ध ग्रंथ 'आकाश भैरव कल्प' से लिया गया है। यह उमा (पार्वती) और महेश्वर (शिव) के संवाद के रूप में प्रकट हुआ है।

सुमुखीकरण का अर्थ: 'सुमुखी' का अर्थ है 'सुंदर या अनुकूल मुख वाला'। जब कोई व्यक्ति, अधिकारी, जीवनसाथी या शत्रु आपके प्रति अत्यधिक क्रोधित या विमुख (विरोधी) हो जाता है, तो उसके हृदय और मुखमंडल को अपने प्रति दयालु और अनुकूल बनाने की तांत्रिक प्रक्रिया को 'सुमुखीकरण' कहते हैं। यह एक प्रकार का सात्विक वशीकरण (Vashikaran) है जो हिंसा के बिना शत्रु के मन को बदल देता है।

शूलिनी दुर्गा कौन हैं? पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब हिरण्यकशिपु का वध करने के बाद भगवान नृसिंह का क्रोध शांत नहीं हो रहा था, तो उन्हें शांत करने के लिए शिव जी ने 'शरभ' अवतार लिया। उस समय शिव की शक्ति के रूप में माँ भगवती ने 'शूलिनी' (त्रिशूल धारण करने वाली उग्र देवी) का रूप धारण किया था। यह स्वरूप ब्रह्मांड के सबसे भयंकर क्रोध को भी शांत (सुमुख) करने की क्षमता रखता है।

स्तोत्र के अद्भुत लाभ (Miraculous Benefits)

इस स्तोत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके 46 श्लोकों के अंत में एक ही पंक्ति दोहराई गई है—"ऐश्वर्यमायुरारोग्यमिष्टसिद्धिं च देहि मे"। इसके प्रमुख लाभ इस प्रकार हैं:

  • विवादों और मुकदमों में शांति: यदि आपका किसी से गंभीर विवाद, कोर्ट-केस या पारिवारिक क्लेश चल रहा है, तो यह पाठ सामने वाले व्यक्ति के क्रोध को पिघलाकर उसे समझौते (Compromise) के लिए अनुकूल बना देता है।
  • अष्ट-ऐश्वर्य और स्वास्थ्य: प्रत्येक श्लोक में 'ऐश्वर्य', 'आयु' (लंबी उम्र), और 'आरोग्य' (स्वास्थ्य) की स्पष्ट मांग की गई है। यह पाठ दरिद्रता और बीमारियों का समूल नाश करता है।
  • शत्रु सेना का उच्चाटन: श्लोक 32 में कहा गया है—"अरात्यवनिपानीक तूलोच्चाटमहानिले" (शत्रुओं की सेना को रूई की तरह उड़ा देने वाली आंधी)। यह विरोधियों के षड्यंत्रों को टिकने नहीं देता।
  • विष और मृत्यु से रक्षा: श्लोक 21 में "हालाहलविषाकारे" (विष को धारण करने वाली) और श्लोक 33 में मृत्यु रूपी बर्फ को पिघलाने वाले 'सहस्र सूर्य' के समान कहा गया है। यह अकाल मृत्यु और विषैले प्रभाव को काटता है।

साधना विधि एवं मानस पूजन (Ritual Method)

यह एक उच्च तांत्रिक स्तोत्र है, अतः इसके पाठ में कुछ विशेष नियमों का पालन अनिवार्य है:

  • मानस पूजन (Mental Worship): पाठ आरंभ करने से पहले 'लं, हं, यं, रं, वं, सं' बीजाक्षरों के माध्यम से गंध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य को केवल 'मन' से देवी को अर्पित किया जाता है। तांत्रिक ग्रंथों में भौतिक पूजा से अधिक मानस पूजा को शक्तिशाली माना गया है।
  • बीज मंत्र का सम्पुट: इस स्तोत्र के प्रत्येक श्लोक को पढ़ने से ठीक पहले "ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं क्ष्म्र्यौं दुं" (Om Shreem Hreem Kleem Kshmryoum Dum) मंत्र का उच्चारण करना अनिवार्य है। 'क्ष्म्र्यौं' नृसिंह बीज है और 'दुं' दुर्गा बीज है।
  • समय और दिशा: इस पाठ के लिए 'गोधूलि बेला' (शाम) या 'अमावस्या' की रात्रि सर्वश्रेष्ठ है। उत्तर (धन के लिए) या पूर्व (शांति के लिए) दिशा की ओर मुख करें।
  • अनुष्ठान: जिस अधिकारी या व्यक्ति को वश (अनुकूल) करना हो, उसका ध्यान करते हुए लगातार 21 दिन तक इस स्तोत्र का 11 बार पाठ करें। सफलता निश्चित मिलती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. शूलिनी दुर्गा कौन हैं?

माँ शूलिनी दुर्गा भगवती का एक अत्यंत उग्र तांत्रिक स्वरूप हैं, जो 'शूल' (त्रिशूल) धारण करती हैं। जब भगवान नृसिंह का क्रोध शांत नहीं हो रहा था, तब उन्हें शांत करने के लिए माँ ने 'शूलिनी' रूप धारण किया था।

2. सुमुखीकरण का क्या अर्थ है?

'सुमुखीकरण' का अर्थ है किसी क्रोधित, विमुख या विरोधी व्यक्ति के मुख (स्वभाव) को अपने प्रति अनुकूल या सौम्य बना लेना। यह एक प्रकार का सात्विक वशीकरण है।

3. यह स्तोत्र किस ग्रंथ से लिया गया है?

यह दुर्लभ स्तोत्र महाशैव तंत्र के 'आकाश भैरव कल्प' से उद्धृत है। यह उमा-महेश्वर (शिव-पार्वती) संवाद के रूप में 31वें अध्याय में वर्णित है।

4. इस स्तोत्र की प्रत्येक पंक्ति में क्या मांगा गया है?

इस स्तोत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके 46 श्लोकों के अंत में एक ही प्रार्थना है—'ऐश्वर्यमायुरारोग्यमिष्टसिद्धिं च देहि मे' (अर्थात हे माँ! मुझे ऐश्वर्य, आयु, आरोग्य और अभीष्ट सिद्धि प्रदान करें)।

5. प्रत्येक श्लोक से पहले कौन सा बीज मंत्र पढ़ा जाता है?

प्रत्येक श्लोक को पढ़ने से पहले 'ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं क्ष्म्र्यौं दुं' तांत्रिक बीज मंत्रों का उच्चारण करना अनिवार्य है, जो मंत्र को जागृत करता है।

6. क्या यह पाठ शत्रुओं के नाश के लिए है?

यह शत्रुओं का प्राण-नाश नहीं करता, बल्कि उनके हृदय को बदल देता है। श्लोक 32 के अनुसार यह शत्रुओं की सेना और उनके बुरे विचारों को रूई की तरह उड़ा देता है।

7. ध्यान श्लोक में माँ का स्वरूप कैसा है?

ध्यान श्लोक के अनुसार, माँ स्वर्ण और रत्नों के आसन पर बैठी हैं, उनके मुख पर मंद मुस्कान है, और वे शिव की सखी के रूप में अत्यंत कल्याणकारी वेष में हैं।

8. 'मानस पूजन' क्या है?

यह बिना किसी भौतिक सामग्री के केवल मन से की जाने वाली तांत्रिक पूजा है। इसमें 'लं' बीज से पृथ्वी, 'हं' से आकाश आदि तत्वों को मानसिक रूप से माँ को अर्पित किया जाता है।

9. इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए?

जो व्यक्ति मुकदमों में फंसा हो, जिसके पारिवारिक या व्यावसायिक संबंध खराब हो गए हों, या जो उच्चाधिकारियों के क्रोध का सामना कर रहा हो, उसे यह 'सुमुखीकरण' पाठ अवश्य करना चाहिए।

10. क्या इस स्तोत्र से मोक्ष मिलता है?

हाँ, अंतिम फलश्रुति श्लोक (48) के अनुसार, जो इस स्तुति का निरंतर जप करता है, वह संपूर्ण भौतिक सुखों को भोगकर अंत में 'श्रीशिवाकारमेति' (शिव-शक्ति के स्वरूप में विलीन) हो जाता है।