Sri Sharada Pancharatna Stotram – श्री शारदा पञ्चरत्न स्तोत्रम्

॥ श्री शारदा पञ्चरत्न स्तोत्रम् ॥
वारारम्भसमुज्जृम्भरविकोटिसमप्रभा ।
पातु मां वरदा देवी शारदा नारदार्चिता ॥ १ ॥
(जिनकी प्रभा करोड़ों उगते हुए सूर्यों के समान है, जो वरदान देने वाली हैं और देवर्षि नारद द्वारा पूजित हैं, वह देवी शारदा मेरी रक्षा करें।)
अपारकाव्यसंसारशृङ्कारालङ्कृताम्बिका ।
पातु मां वरदा देवी शारदा नारदार्चिता ॥ २ ॥
(जो अपार काव्य रूपी संसार के शृंगार से अलंकृत हैं, वह जगदम्बिका वरदायिनी शारदा मेरी रक्षा करें।)
नवपल्लवकामाङ्गकोमला श्यामलाऽमला ।
पातु मां वरदा देवी शारदा नारदार्चिता ॥ ३ ॥
(जो नए पल्लवों और कामदेव के अंगों के समान कोमल हैं, जो श्याम वर्ण की और निर्मल हैं, वह वरदायिनी शारदा मेरी रक्षा करें।)
अखण्डलोकसन्दोहमोहशोकविनाशिनी ।
पातु मां वरदा देवी शारदा नारदार्चिता ॥ ४ ॥
(जो सम्पूर्ण लोकों के समूह के मोह और शोक का विनाश करने वाली हैं, वह वरदायिनी शारदा मेरी रक्षा करें।)
वाणी विशारदा माता मनोबुद्धिनियन्त्रिणी ।
पातु मां वरदा देवी शारदा नारदार्चिता ॥ ५ ॥
(जो वाणी की अधिष्ठात्री, विदुषी माता और हमारे मन तथा बुद्धि को नियंत्रित करने वाली हैं, वह वरदायिनी शारदा मेरी रक्षा करें।)
॥ फलश्रुति ॥
शारदापञ्चरत्नाख्यं स्तोत्रं नित्यं नु यः पठेत् ।
स प्राप्नोति परां विद्यां शारदायाः प्रसादतः ॥ ६ ॥
(जो मनुष्य इस 'शारदा पञ्चरत्न' नामक स्तोत्र का नित्य पाठ करता है, वह माँ शारदा की कृपा से 'परा विद्या' (ब्रह्म विद्या) को प्राप्त करता है।)
॥ इति श्री शारदा पञ्चरत्न स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥
परिचय: श्री शारदा पञ्चरत्न स्तोत्रम्
श्री शारदा पञ्चरत्न स्तोत्रम् माँ सरस्वती के 'शारदा' रूप की एक संक्षिप्त और अत्यंत मधुर प्रार्थना है। इसमें ५ श्लोक हैं, इसलिए इसे 'पञ्चरत्न' (पाँच रत्न) कहा जाता है।
इस स्तोत्र की विशेषता यह है कि इसमें प्रत्येक श्लोक के अंत में "पातु मां वरदा देवी शारदा नारदार्चिता" की पंक्ति आती है, जिसका अर्थ है - "देवर्षि नारद द्वारा पूजित, वरदान देने वाली देवी शारदा मेरी रक्षा करें।" यह पुनरावृत्ति भक्त के मन में सुरक्षा और विश्वास का भाव जगाती है।
इस स्तोत्र की विशेषताएं
- तेज और कांति: पहले श्लोक में माँ की तुलना 'रविकोटि' (करोड़ों सूर्यों) से की गई है, जो ज्ञान के असीमित प्रकाश को दर्शाता है।
- सौंदर्य और कोमलता: तीसरे श्लोक में उन्हें 'नवपल्लव' (नई कोपलों) के समान कोमल बताया गया है।
- मनोबुद्धि की नियंत्री: पाँचवें श्लोक में उन्हें 'मनोबुद्धिनियन्त्रिणी' कहा गया है। यह सबसे महत्वपूर्ण विशेषण है क्योंकि ज्ञान प्राप्ति के लिए मन और बुद्धि का नियंत्रण आवश्यक है।
- नारद द्वारा पूजित: बार-बार 'नारदार्चिता' कहने का अर्थ है कि संगीत और भक्ति के आचार्य नारद मुनि भी इन्हीं की उपासना करते हैं, अतः संगीत साधकों के लिए यह आदर्श स्तोत्र है।
पाठ के लाभ (Phalashruti)
अंतिम छठे श्लोक (फलश्रुति) में स्पष्ट कहा गया है:
- परा विद्या की प्राप्ति: नित्य पाठ करने वाला साधक 'परा विद्या' (Supreme Knowledge/Spiritual Wisdom) प्राप्त करता है।
- शोक और मोह का नाश: श्लोक 4 के अनुसार, यह सांसारिक मोह और दुःखों (Shoka) को जड़ से मिटा देता है।
- काव्य शक्ति: श्लोक 2 में उन्हें काव्य रूपी संसार के शृंगार से अलंकृत कहा गया है, अतः कवियों और लेखकों को इससे रचनात्मक शक्ति मिलती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. 'शारदा पञ्चरत्न स्तुति' और 'शारदा पञ्चरत्न स्तोत्र' में क्या अंतर है?
दोनों ही माँ शारदा के ५ श्लोकों वाले स्तोत्र हैं। 'स्तुति' (Stuti) की शुरुआत "श्रीमच्छंकर..." से होती है और वह विशेष रूप से शृंगेरी पीठ से जुड़ी है। यह 'स्तोत्र' (Stotram) "वारारम्भ..." से शुरू होता है और इसमें नारद मुनि का विशेष उल्लेख है। दोनों का अपना महत्व है।
2. 'नारदार्चिता' का क्या महत्व है?
नारद जी 'भक्ति सूत्र' के रचयिता और वीणा वादक हैं। उनका माँ शारदा की पूजा करना यह सिद्ध करता है कि संगीत और भक्ति में सिद्धि पाने के लिए शारदा उपासना अनिवार्य है।
3. 'परा विद्या' क्या है?
विद्या दो प्रकार की होती है - 'अपरा' (भौतिक ज्ञान/पुस्तकीय ज्ञान) और 'परा' (ब्रह्म ज्ञान/आत्म ज्ञान)। यह स्तोत्र सर्वोच्च 'परा विद्या' देने में सक्षम है।
4. क्या बच्चे इसका पाठ कर सकते हैं?
हाँ, श्लोक बहुत सरल और गेय (Lyrical) हैं। बच्चों के लिए विशेष रूप से "मनोबुद्धिनियन्त्रिणी" (श्लोक 5) का जप करना लाभकारी है ताकि उनका मन पढ़ाई में लगे।