Sri Shani Stotram (Dasaratha Kritam) – श्री शनैश्चर स्तोत्रम् (दशरथ कृतम्)

शनि देव के विशेषण (Epithets of Shani Dev)
| संस्कृत नाम | अर्थ | विवरण |
|---|---|---|
| कृष्ण | काला | शनि का रंग काला है |
| नीलमयूख | नीली किरणों वाला | नीली आभा वाले |
| शितिकण्ठनिभ | शिव के समान | नीलकण्ठ (शिव) जैसे |
| निर्मांसदेह | मांसहीन शरीर | दुबला-पतला शरीर |
| दीर्घश्मश्रुजटा | लम्बी दाढ़ी-जटाएँ | तपस्वी रूप |
| विशालनेत्र | बड़ी आँखें | विशाल नेत्रों वाले |
| शुष्कोदर | सूखा पेट | तपस्या से क्षीण उदर |
| कालाग्निरूप | प्रलय अग्नि स्वरूप | काल की अग्नि के समान |
| कोटराक्ष | गहरी आँखें | कोटर (गड्ढे) जैसी आँखें |
| मन्दगति | धीमी चाल | 30 वर्ष में एक राशि पार |
| सूर्यपुत्र | सूर्य का पुत्र | सूर्य और छाया के पुत्र |
| अधोदृष्टि | नीचे देखने वाले | नेत्र सदा नीचे रहते हैं |
श्लोकों का संक्षिप्त अर्थ (Brief Meaning)
श्लोक 1: सरस्वती और गणेश का ध्यान करके राजा दशरथ ने शनि (सौरि) का यह स्तोत्र रचा।
श्लोक 2-8: शनि के रूप का वर्णन - काला रंग, नीली आभा, मांसहीन शरीर, लम्बी जटाएँ, भयानक रूप, कालाग्नि स्वरूप, सदा तपस्या में रत।
श्लोक 9: "प्रसन्न होकर राज्य देते हो, रुष्ट होकर क्षण में छीन लेते हो।"
श्लोक 10: देव, असुर, मनुष्य, पशु-पक्षी - जिसे भी देखते हो, वह दीन हो जाता है।
श्लोक 11: ब्रह्मा, इन्द्र, यम और सप्तर्षि भी आपकी दृष्टि से राज्यभ्रष्ट हुए।
श्लोक 12: देश, नगर, ग्राम, द्वीप, पर्वत - जो भी आपकी रौद्र दृष्टि में आए, क्षण में क्षय हो गए।
श्लोक 13 (प्रार्थना): "हे सौरि! मुझ पर प्रसाद करो, मैं आपकी शरण में हूँ। मेरे अपराध क्षमा करो, सभी प्राणियों का हित करो।"
पाठ विधि (Method of Recitation)
- शुभ दिन: शनिवार (सबसे उत्तम)
- शुभ समय: शनि होरा या संध्या काल
- वस्त्र: काले या नीले वस्त्र धारण करें
- तैल दान: पाठ के बाद शनि मंदिर में तेल चढ़ाएँ
- विशेष अवसर: साढ़े साती, ढैय्या, शनि दशा-अंतर्दशा में नित्य पाठ
- जप संख्या: 1, 7, 11 या 23 बार (शनि के अंक)
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)