Sri Shani Raksha Stava – श्री शनैश्चर रक्षा स्तवः

॥ श्री शनैश्चर रक्षा स्तवः ॥
॥ नारद उवाच ॥
ध्यात्वा गणपतिं राजा धर्मराजो युधिष्ठिरः ।
धीरः शनैश्चरस्येमं चकार स्तवमुत्तमम् ॥ १ ॥
॥ अथ रक्षा स्तवः ॥
शिरो मे भास्करिः पातु फालं छायासुतोऽवतु ।
कोटराक्षो दृशौ पातु शिखिकण्ठनिभः श्रुती ॥ २ ॥
घ्राणं मे भीषणः पातु मुखं बलिमुखोऽवतु ।
स्कन्धौ संवर्तकः पातु भुजौ मे भयदोऽवतु ॥ ३ ॥
सौरिर्मे हृदयं पातु नाभिं शनैश्चरोऽवतु ।
ग्रहराजः कटिं पातु सर्वतो रविनन्दनः ॥ ४ ॥
पादौ मन्दगतिः पातु कृष्णः पात्वखिलं वपुः ।
॥ फलश्रुति ॥
रक्षामेतां पठेन्नित्यं सौरेर्नामबलैर्युताम् ।
सुखी पुत्री चिरायुश्च स भवेन्नात्र संशयः ॥ ५ ॥
॥ इति श्री शनैश्चर रक्षा स्तवः सम्पूर्णम् ॥
संलिखित ग्रंथ पढ़ें
अंग-अंग की रक्षा (Protection Decoded)
इस स्तोत्र में शरीर के 12 प्रमुख अंगों की रक्षा के लिए शनि देव के 12 विशिष्ट नामों का प्रयोग किया गया है। इसे 'अंग-न्यास' के रूप में भी समझा जा सकता है।
1. मस्तक (शिर):
रक्षक: भास्करि (सूर्य पुत्र)। सिर सबसे ऊँचा स्थान है, जैसे आकाश में सूर्य।
2. ललाट (Forehead):
रक्षक: छायासुत (छाया पुत्र)। ललाट भाग्य का स्थान है।
3. ऑंखें (Eyes):
रक्षक: कोटराक्ष (गहरी/कोटर जैसी आँखों वाले)।
4. कान (Ears):
रक्षक: शिखिकण्ठनिभ (मोर कंठ जैसी आभा वाले)।
5. नाक (Nose):
रक्षक: भीषण (भयानक रूप वाले)।
6. मुख (Face):
रक्षक: बलिमुख (बलवान मुख वाले)।
7. कंधे (Shoulders):
रक्षक: संवर्तक (प्रलयंकारी)। कंधे बल का प्रतीक हैं।
8. भुजाएं (Arms):
रक्षक: भयद (भय देने वाले - शत्रुओं को)।
9. हृदय (Heart):
रक्षक: सौरि (सूर्य पुत्र)।
10. नाभि (Navel):
रक्षक: शनैश्चर (मंद गति वाले)।
11. कमर (Waist):
रक्षक: ग्रहराज (ग्रहों के राजा/न्यायाधीश)।
12. पैर (Feet):
रक्षक: मन्दगति। शनि पैरों के कारक हैं, और उनकी चाल धीमी (मन्द) है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. शनैश्चर रक्षा स्तव की रचना किसने की?
इसकी रचना महाभारत काल में पांडव पुत्र धर्मराज युधिष्ठिर ने की थी। उन्होंने संकट के समय श्री गणेश का ध्यान कर शनि देव को प्रसन्न करने के लिए यह लिखा था।
2. रक्षा स्तव और रक्षा कवच में क्या अंतर है?
दोनों का उद्देश्य एक ही है - 'सुरक्षा'। यह स्तव कवच शैली में ही लिखा गया है, जहाँ 'पातु' (रक्षा करें) और 'अवतु' (सुरक्षित रखें) शब्दों का बार-बार प्रयोग हुआ है।
3. 'कोटराक्ष' का क्या अर्थ है?
'कोटर' (गुफा/गहरा) + 'अक्ष' (आंखें)। शनि की आँखें धंसी हुई मानी जाती हैं, जो उनकी गहन दृष्टि और तपस्या का प्रतीक हैं। यहाँ आँखों की रक्षा के लिए इस नाम का प्रयोग है।
4. शनि को 'बलिमुख' क्यों कहा गया है?
'बलि' का अर्थ शक्तिशाली या बलवान है। बलिमुख का अर्थ है जिनका मुख अत्यंत तेजस्वी और शक्तिशाली (या भयभीत करने वाला) हो। यह मुख की रक्षा के लिए प्रयुक्त नाम है।
5. क्या इसके पाठ से आयु की वृद्धि होती है?
हाँ, फलश्रुति (श्लोक 5) में स्पष्ट लिखा है - 'सुखी पुत्री चिरायुश्च स भवेन्न' अर्थात पाठ करने वाला सुखी, पुत्रवान और चिरायु (दीर्घायु) होता है।
6. 'संवर्तक' नाम का क्या महत्व है?
संवर्तक वह प्रलयंकारी शक्ति है जो युग के अंत में सक्रिय होती है। यहाँ कंधों (Shoulders) की रक्षा के लिए शनि के इस महाविनाशक और महाशक्तिशाली रूप का आह्वान किया गया है।
7. यह पाठ किस समय करना चाहिए?
श्लोक 5 में 'नित्यं' (प्रतिदिन) पाठ करने का निर्देश है। विशेष रूप से सुबह स्नान के बाद या शाम को प्रदोष काल में पाठ करना उत्तम है।
8. 'शिखिकण्ठनिभ' का क्या अर्थ है?
'शिखि' (मोर) + 'कण्ठ' (गर्दन) + 'निभ' (समान)। अर्थात श्लोक 2 में कानों (श्रुति) की रक्षा के लिए उनका आह्वान किया गया है, जिनकी आभा मोर की गर्दन जैसी (नीली/चमकदार) है।
9. क्या स्त्रियां और बच्चे इसका पाठ कर सकते हैं?
हाँ, यह एक 'रक्षा' स्तोत्र है। भय, बुरे सपने या नजर दोष से बचने के लिए कोई भी इसका पाठ कर सकता है।
10. 'भास्करी' का क्या अर्थ है?
'भास्कर' (सूर्य) के पुत्र। श्लोक 1 में मस्तक (शिर) की रक्षा के लिए शनि के इस नाम का प्रयोग किया गया है।