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Sri Saraswati Stotram (Vamana Purana) – श्री सरस्वती स्तोत्रम् (वामनपुराणे मार्कण्डेय कृतम्)

Sri Saraswati Stotram (Vamana Purana) – श्री सरस्वती स्तोत्रम् (वामनपुराणे मार्कण्डेय कृतम्)
॥ श्री सरस्वती स्तोत्रम् (वामनपुराणे मार्कण्डेय कृतम्) ॥ त्वं देवि सर्वलोकानां माता देवारणिः शुभा । सदसद्देवि यत्किञ्चिन्मोक्षदाय्यर्थवत्पदम् ॥ १ ॥ (हे देवी! आप समस्त लोकों की माता हैं। आप देवताओं को प्रकट करने वाली (अरणि) और शुभ स्वरूपा हैं। इस जगत में जो कुछ भी सत् (विद्यमान) या असत् (अव्यक्त) है, और जो भी मोक्ष देने वाला सार्थक पद है, वह सब आप ही हैं।) तत्सर्वं त्वयि सम्योगि योगिवद्देवि संस्थितम् । अक्षरं परमं देवि यत्र सर्वं प्रतिष्ठितम् । अक्षरं परमं ब्रह्म विश्वं चैतत् क्षरात्मकम् ॥ २ ॥ (हे देवी! वह सब आप में वैसे ही स्थित है जैसे योगी में योग। आप परम अक्षर (विनाश रहित) हैं, जिसमें सब कुछ प्रतिष्ठित है। यह दृश्य जगत क्षर (नाशवान) है, किन्तु आप परम ब्रह्म (अविनाशी) हैं।) दारुण्यवस्थितो वह्निर्भूमौ गन्धो यथा ध्रुवम् । तथा त्वयि स्थितं ब्रह्म जगच्चेदमशेषतः ॥ ३ ॥ (जैसे लकड़ी में अग्नि और पृथ्वी में गंध निश्चित रूप से (ध्रुवम्) व्याप्त रहती है, वैसे ही यह सम्पूर्ण ब्रह्म और यह अशेष जगत आप में स्थित है।) ओङ्काराक्षरसंस्थानं यत्तद्देवि स्थिरास्थिरम् । तत्र मात्रात्रयं सर्वमस्ति यद्देवि नास्ति च ॥ ४ ॥ (हे देवी! जो ओंकार (ॐ) अक्षर का संस्थान (स्वरूप) है, जो स्थिर और अस्थिर दोनों है, उसमें जो 'तीन मात्राएं' (अ, उ, म) हैं, जो (व्यक्त रूप में) हैं और (अव्यक्त रूप में) नहीं भी हैं, वह सब आप ही हैं।) त्रयो लोकास्त्रयो वेदास्त्रैविद्यं पावकत्रयम् । त्रीणि ज्योतींषि वर्गाश्च त्रयो धर्मादयस्तथा ॥ ५ ॥ (तीनों लोक (भूह, भुवः, स्वः), तीनों वेद (ऋक, यजु, साम), तीनों विद्याएं, तीनों अग्नि (गार्हपत्य, आहवनीय, दक्षिणाग्नि), तीनों ज्योतियां, और धर्म-अर्थ-काम - ये सब आपकी उन तीन मात्राओं में ही समाहित हैं।) त्रयो गुणास्त्रयो वर्णास्त्रयो देवास्तथा क्रमात् । त्रैधातवस्तथावस्थाः पितरश्चैवमादयः ॥ ६ ॥ (तीनों गुण (सत्व, रज, तम), तीनों वर्ण (स्वर), तीनों देवता (ब्रह्मा, विष्णु, महेश), तीनों धातु, तीनों अवस्थाएं (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति) और पितर आदि - ये सब क्रमशः उन्हीं तीन मात्राओं के रूप हैं।) एतन्मात्रात्रयं देवि तव रूपं सरस्वति । विभिन्नदर्शनामाद्यां ब्रह्मणो हि सनातनीम् ॥ ७ ॥ (हे देवी सरस्वती! ॐ की ये तीनों मात्राएं आपका ही रूप हैं। आप विभिन्न दर्शनों (शास्त्रों) द्वारा जानी जाने वाली, ब्रह्म की आद्य शक्ति और सनातनी हैं।) सोमसंस्था हविःसंस्था पाकसंस्था सनातनी । तास्त्वदुच्चारणाद्देवि क्रियन्ते ब्रह्मवादिभिः ॥ ८ ॥ (सोम-यज्ञ संस्था, हवि-यज्ञ संस्था और पाक-यज्ञ संस्था - ये सभी सनातन वैदिक क्रियाएं ब्रह्मवादियों द्वारा आपके (मन्त्रों के) उच्चारण से ही संपन्न की जाती हैं।) अनिर्देश्यपदं त्वेतदर्धमात्राश्रितं परम् । अविकार्यक्षयं दिव्यं परिणामविवर्जितम् ॥ ९ ॥ (इन तीन मात्राओं के परे जो 'अर्ध-मात्रा' है, जो अनिर्देश्य (बताया नहीं जा सकता), परम, अविकारी, अक्षय, दिव्य और परिणाम (बदलाव) से रहित है, वह भी आप ही हैं।) तवैतत् परमं रूपं यन्न शक्यं मयोदितुम् । न चास्येन न वा जिह्वाताल्वोष्ठादिभिरुच्यते ॥ १० ॥ (हे देवी! यह (अर्ध-मात्रा) आपका परम रूप है जिसे मेरे द्वारा कहा नहीं जा सकता। उसे न मुख से, न जीभ, तालु या होंठों से उच्चारित किया जा सकता है (वह तो केवल अनुभव गम्य है)।) स विष्णुः स वृषो ब्रह्मा चन्द्रार्कज्योतिरेव च । विश्वावासं विश्वरूपं विश्वात्मानमनीश्वरम् ॥ ११ ॥ (वही विष्णु है, वही वृष (धर्म/शिव), वही ब्रह्मा है, वही चन्द्र और सूर्य की ज्योति है। वह विश्व का निवास, विश्वरूप, विश्वात्मा और ईश्वर से भी परे है।) साङ्ख्यसिद्धान्तवेदोक्तं बहुशाखास्थिरीकृतम् । अनादिमध्यनिधनं सदसच्च सदेव तु ॥ १२ ॥ (वह सांख्य सिद्धांत और वेदों में कहा गया है, अनेक शाखाओं द्वारा उसे स्थिर (सिद्ध) किया गया है। उसका न आदि है न मध्य न अंत। वह सत् और असत् से परे केवल 'सत्' ही है।) एकं त्वनेकधाप्येकभाववेदसमाश्रितम् । अनाख्यं षड्गुणाख्यं च बह्वाख्यं त्रिगुणाश्रयम् ॥ १३ ॥ (वह एक होते हुए भी अनेक रूपों में है। वह अनाख्य (नाम रहित) है, फिर भी षड्गुण (ऐश्वर्य आदि) वाला है, उसके बहुत नाम हैं और वह तीनों गुणों का आश्रय है।) नानाशक्तिविभावज्ञं नानाशक्तिविभावकम् । सुखात् सुखं महत्सौख्यं रूपं तत्त्वगुणात्मकम् ॥ १४ ॥ (वह अनेक शक्तियों को जानने वाला और अनेक शक्तियों को प्रकट करने वाला है। वह सुख से भी सुखमय, महान सौख्य रूप और तत्व-गुणों का आत्मा है।) एवं देवि त्वया व्याप्तं सकलं निष्कलं च यत् । अद्वैतावस्थितं ब्रह्म यच्च द्वैते व्यवस्थितम् ॥ १५ ॥ (हे देवी! इस प्रकार सकल (सगुण) और निष्कल (निर्गुण), अद्वैत में स्थित ब्रह्म और द्वैत (संसार) में स्थित जगत - यह सब आपसे ही व्याप्त है।) येऽर्था नित्या ये विनश्यन्ति चान्ये येऽर्थाः स्थूला ये तथा सन्ति सूक्ष्माः । ये वा भूमौ येऽन्तरिक्षेऽन्यतो वा तेषां देवि त्वत्त एवोपलब्धिः ॥ १६ ॥ (जो पदार्थ नित्य हैं या जो नाशवान हैं; जो स्थूल हैं या जो सूक्ष्म हैं; जो भूमि पर हैं, अंतरिक्ष में हैं या अन्य कहीं भी हैं - हे देवी! उन सबकी उपलब्धि (प्रतीति/सत्ता) आपसे ही है।) यद्वा मूर्तं यदमूर्तं समस्तं यद्वा भूतेष्वेकमेकं च किञ्चित् । यच्च द्वैते व्यस्तभूतं च लक्ष्यं तत्सम्बद्धं त्वत्स्वरैर्व्यञ्जनैश्च ॥ १७ ॥ (जो भी मूर्त (साकार) या अमूर्त (निराकार) है; जो भी पंचभूतों में एक-एक करके है; जो भी इस द्वैत जगत में अलग-अलग दिखाई देता है - वह सब आपके 'स्वर' और 'व्यंजन' (अक्षरों) से ही सम्बद्ध (जुड़ा/बना) है।) ॥ इति श्रीवामनपुराणे द्वात्रिंशोऽध्याये मार्कण्डेय प्रोक्तं श्री सरस्वती स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

परिचय: मार्कण्डेय प्रोक्त सरस्वती स्तोत्र

वामन पुराण में वर्णित यह स्तोत्र अन्य स्तुतियों से भिन्न है। जहाँ अन्य स्तोत्रों में माँ के भौतिक स्वरूप (वीणा, श्वेत वस्त्र) का वर्णन होता है, वहीं महर्षि मार्कण्डेय ने यहाँ अध्यात्म-विज्ञान का वर्णन किया है।

वे कहते हैं कि यह सारा ब्रह्मांड 'शब्द-ब्रह्म' है, और सरस्वती ही वह शब्द (अक्षर) शक्ति हैं। ॐ (Om) की तीन ध्वनियाँ—अ, उ, और म—सरस्वती का ही शरीर हैं।

इस स्तोत्र की विशेषता: ॐ और त्रिगुण

  • अ (A-Kar): यह ऋग्वेद है, पृथ्वी लोक है, और जो 'जाग्रत' अवस्था है, वह सरस्वती का प्रथम रूप है।
  • उ (U-Kar): यह यजुर्वेद है, अन्तरिक्ष लोक है, और जो 'स्वप्न' अवस्था है, वह सरस्वती का द्वितीय रूप है।
  • म (M-Kar): यह सामवेद है, स्वर्ग लोक है, और जो 'सुषुप्ति' (गहरी नींद) अवस्था है, वह सरस्वती का तृतीय रूप है।
  • अर्ध-मात्रा: अंत में, जो 'तुरीय' अवस्था (समाधि) है, जो अनिर्वचनीय है (श्लोक 9-10), वह सरस्वती का परम सत्य स्वरूप है।

पाठ के लाभ

इस दार्शनिक स्तोत्र के पाठ से:
  • आत्मज्ञान: साधक को यह बोध होता है कि वह केवल शरीर नहीं, बल्कि 'अक्षर ब्रह्म' का अंश है।
  • समग्र दृष्टिश: व्यक्ति भेद-भाव से ऊपर उठकर अद्वैत (Oneness) की ओर बढ़ता है (श्लोक 15)।
  • वाणी सिद्धि: चूँकि सब स्वर और व्यंजन (Vowels & Consonants) माँ के ही रूप हैं (श्लोक 17), अतः वाणी शुद्ध और सत्य हो जाती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. वामन पुराण का क्या महत्व है?

वामन पुराण में भगवान विष्णु के वामन अवतार और शिव-पार्वती तीर्थों का विस्तृत वर्णन है। यह शैव और वैष्णव मतों का सुंदर समन्वय प्रस्तुत करता है।

2. 'अर्ध-मात्रा' क्या है?

जब हम 'ॐ' का उच्चारण करते हैं, तो 'म' के बाद जो गूँज (नाद) और उसके बाद जो सन्नाटा (Silence) शेष रहता है, उसे 'अर्ध-मात्रा' या 'अमात्र' कहते हैं। यह मोक्ष की स्थिति है।