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Sri Saraswati Stotram (3) – श्री सरस्वती स्तोत्रम् (३)

Sri Saraswati Stotram (3) – श्री सरस्वती स्तोत्रम् (३)
॥ श्री सरस्वती स्तोत्रम् (३) ॥ कुन्दालिद्युतिमन्दहाससुमुखी राकेन्दुबिम्बानना मल्लीतल्लजमालतीसुमनसां सौभाग्यपाटच्चरी । फुल्लेन्दीवरबृन्दषट्पदतमःसन्दोहसन्देहकृ- द्वेणीका विधिसुन्दरी मम भवेदानन्दसन्दोहिनी ॥ १ ॥ (जिनका मुख कुन्द के फूलों और मन्द हास्य (मुस्कान) की कांति से चमक रहा है, जिनका चेहरा पूर्णिमा के चन्द्रमा (राकेन्दु) के बिम्ब समान है। जो श्रेष्ठ चमेली और मालती के फूलों के सौभाग्य (सुंदरता) को चुराने वाली हैं। जिनकी काली वेणी (चोटी) खिले हुए नीलकमल पर भौरों के समूह या अंधकार के समूह का संदेह उत्पन्न करती है। ऐसी वह 'विधि-सुन्दरी' (ब्रह्मा जी की प्रिय) मेरे लिए असीम आनंद देने वाली हों।) यत्पादाम्बुजसेवयैव ससुरो लोकः समर्त्यासुरो वागौन्नत्यमगाहत श्रुतिवचोवीथीषु या गीयते । या श्वेताम्बुजमध्यवासरसिका या नम्ररक्षामणिः धातुः कापि कुटुम्बिनी वितरतात् सा निर्वृतिं नोऽतुलाम् ॥ २ ॥ (जिनके चरण-कमलों की सेवा मात्र से देवताओं, मनुष्यों और असुरों सहित सारा लोक वाणी की उच्चता (पाण्डित्य) को प्राप्त करता है। जिनका यश वेदों (श्रुति) के मार्गों में गाया जाता है। जो श्वेत कमल के बीच निवास करने की रसिका हैं और जो विनम्र भक्तों की रक्षा करने वाली मणि समान हैं। विधाता (धातु) की वह अनिर्वचनीय गृहिणी (पत्नी) हमें अतुलनीय 'निर्वृति' (मोक्ष/शांति) प्रदान करें।) कस्तूरीघनसारगन्धलहरीसंवासितोरःस्थला संवीता स्फुटकाशपुष्पसदृशक्षौमांशुकेनानिशम् । पुस्तं हस्तचतुष्टये जपवटीं शस्तां शुकीं वल्लकीं बिभ्राणा गृहिणी विधातुरवतान्नः सेवया तोषिता ॥ ३ ॥ (जिनका वक्षस्थल कस्तूरी और कपूर (घनसार) की सुगंधित लहरों से महक रहा है। जो खिले हुए 'काश' के फूल के समान उज्ज्वल रेशमी वस्त्रों (क्षौम-अंशुक) से सदा ढकी हुई हैं। जो अपने चार हाथों में पुस्तक, जपमाला, सुंदर तोता (शुकी) और वीणा (वल्लकी) धारण करती हैं। विधाता की वे गृहिणी हमारी सेवा से संतुष्ट होकर हमारी रक्षा करें।) शुभ्रं दभ्रवलग्नमभ्रतनु तेऽदभ्रप्रमोदप्रदं विभ्रान्ते भ्रमदन्धपस्य सततं तैस्तैर्निजैर्विभ्रमैः । शब्दब्रह्ममये जगत्यनितरापेक्षाधिकारक्रियं किञ्चित्कुञ्चितकेशमद्य जयति स्रष्टुर्भुविष्ठं महः ॥ ४ ॥ (हे देवी! आपका स्वरूप शुभ्र (श्वेत) है, आपकी कमर पतली (दभ्र) है, और आपका शरीर आकाश (अभ्र) सा व्यापक है। आप भक्तों को बहुत (अदभ्र) आनंद देती हैं। आप अपने विविध विलास (लीलाओं) से अज्ञानी जनों (अन्धप) का भ्रम दूर करती हैं। इस शब्द-ब्रह्ममय जगत में, जहाँ किसी और की अपेक्षा नहीं है, आपकी थोड़ी-सी घुंघराले बालों वाली वह छवि, जो सृष्टिकर्ता (स्रष्टा) का सर्वोच्च तेज है, आज इस पृथ्वी पर जयकार पा रही है।) ॥ इति श्री सरस्वती स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

परिचय: एक काव्यात्मक वंदना

यह सरस्वती स्तोत्र संस्कृत साहित्य की 'शृंगार-रस' और 'भक्ति-रस' मिश्रित शैली का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। इसमें रचयिता ने माँ सरस्वती के सौंदर्य (Beauty) और ऐश्वर्य (Majesty) का वर्णन अत्यंत अलंकृत भाषा में किया है। जैसे, उनके केशों की तुलना 'भौरों के समूह' से और उनकी मुस्कान की तुलना 'कुन्द के फूलों' से की गई है।

स्तोत्र की विशेषताएँ

  • विशिष्ट आयुध: सामान्यतः माँ के हाथों में वीणा और पुस्तक होती है, परन्तु यहाँ उनके हाथ में 'शुक' (तोता) भी वर्णित है (श्लोक 3)। तोता 'सीखने' और 'शुद्ध उच्चारण' का प्रतीक है।
  • ब्रह्मा की शक्ति: चारों श्लोकों में माँ को बार-बार 'विधि-सुन्दरी', 'धातुः कुटुम्बिनी' और 'स्रष्टुः महः' (ब्रह्मा का तेज) कहा गया है, जो उनकी सृजन शक्ति को दर्शाता है।
  • शब्द-ब्रह्म: यह स्तोत्र स्थापित करता है कि यह सारा संसार 'शब्द' (Sound/Vibration) से बना है और सरस्वती उस शब्द की अधिष्ठात्री (Ruler) हैं।

पाठ के लाभ

इस ललित स्तोत्र का पाठ करने से:
  • साहित्यिक निपुणता: व्यक्ति की भाषा में मधुरता और काव्यात्मकता आती है।
  • आंतरिक आनंद: श्लोक 1 में माँ को 'आनन्द-सन्दोहिनी' कहा गया है, अर्थात वे तनाव हर कर मन को प्रसन्नता से भर देती हैं।
  • मोक्ष प्राप्ति: श्लोक 2 में उनसे 'अतुलनीय निर्वृति' (मोक्ष) की प्रार्थना की गई है।
  • विद्या और कला: संगीत (वीणा) और पठन (तोता) दोनों क्षेत्रों में सफलता मिलती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. इस स्तोत्र की मुख्य विशेषता क्या है?

इस स्तोत्र की सबसे बड़ी विशेषता इसकी 'काव्यात्मक सुंदरता' (Poetic Beauty) है। इसमें माँ के सौंदर्य का वर्णन 'राकेन्दु' (पूर्णिमा का चाँद) और 'मल्ली' (चमेली) के फूलों से किया गया है।

2. माँ सरस्वती तोता (Parrot) क्यों धारण करती हैं?

श्लोक 3 में 'शुकीं' (मादा तोता) का उल्लेख है। तोता 'वाणी' और 'स्मृति' का प्रतीक है, क्योंकि वह जो सुनता है, उसे दोहरा सकता है। यह वेदों के पठन का सूचक है।

3. 'विधि-सुन्दरी' का क्या अर्थ है?

'विधि' का अर्थ है ब्रह्मा (विधाता) और 'सुन्दरी' का अर्थ है उनकी प्रिय पत्नी। यह शब्द माँ सरस्वती और ब्रह्मा जी के अटूट संबंध को दर्शाता है।

4. क्या यह स्तोत्र प्राचीन है?

इसकी भाषा-शैली और छंद (Meter) से यह किसी प्रबुद्ध संस्कृत कवि या आचार्य की रचना प्रतीत होती है, जो शास्त्रीय संस्कृत साहित्य की परंपरा का है।

5. इसका पाठ किसके लिए लाभकारी है?

यह विशेष रूप से कवियों, लेखकों और साहित्यकारों (Litterateurs) के लिए लाभकारी है, क्योंकि यह 'कवित्व शक्ति' और 'रचनात्मकता' प्रदान करता है।

6. 'शब्द-ब्रह्म' का क्या अर्थ है?

श्लोक 4 में जगत को 'शब्द-ब्रह्म-मय' कहा गया है। इसका अर्थ है कि यह पूरा संसार ध्वनि और कंपन (Sound Vibration) से बना है, जिसकी स्वामिनी सरस्वती हैं।

7. माँ के वस्त्र कैसे बताए गए हैं?

उन्हें 'काश-पुष्प' (Kasha flower) के समान उज्ज्वल श्वेत रेशमी वस्त्र ('क्षौमांशुके') धारण किए हुए बताया गया है, जो पवित्रता का प्रतीक है।

8. इस स्तोत्र में कितनी भुजाओं का वर्णन है?

श्लोक 3 में स्पष्ट रूप से 'हस्त-चतुष्टये' (चार हाथ) का उल्लेख है, जिनमें पुस्तक, जपमाला, तोता और वीणा हैं।

9. क्या इसे शाम को पढ़ सकते हैं?

हाँ, माँ सरस्वती की आराधना किसी भी समय की जा सकती है, विशेषकर ब्रह्म मुहूर्त (सुबह) और गोधूलि बेला (शाम) में।

10. 'आनन्द-सन्दोहिनी' का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है 'आनंद का समूह देने वाली' या 'अत्यधिक खुशी प्रदान करने वाली'। माँ की कृपा से भक्त को दिव्य आनंद (Bliss) की प्राप्ति होती है।