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Sri Saraswati Stavam (Virajamana) – श्री सरस्वती स्तवम् (विराजमान पङ्कजाम्)

Sri Saraswati Stavam (Virajamana) – श्री सरस्वती स्तवम् (विराजमान पङ्कजाम्)
॥ श्री सरस्वती स्तवम् (विराजमान पङ्कजाम्) ॥ विराजमानपङ्कजां विभावरीं श्रुतिप्रियां वरेण्यरूपिणीं विधायिनीं विधीन्द्रसेविताम् । निजां च विश्वमातरं विनायिकां भयापहां सरस्वतीमहं भजे सनातनीं वरप्रदाम् ॥ १ ॥ (मैं उस सरस्वती को भजता हूँ, जो प्रकाशमान कमल पर विराजमान हैं (या जो स्वयं कमल समान शोभायमान हैं); जो विभावरी (ज्ञान की रात्रि/दीप्ति) स्वरूप हैं; जिन्हें वेद (श्रुति) प्रिय हैं। जो श्रेष्ठ रूप वाली (वरेण्य) हैं; जो विधाता (नियम बनाने वाली) हैं; जिनकी सेवा ब्रह्मा (विधि) और इन्द्र करते हैं। जो अपनी (निजा) हैं; जो विश्व की माता हैं; जो विशिष्ट नायिका/मार्गदर्शक (विनायिका) हैं; जो भय को दूर करने वाली हैं। मैं उस सनातनी (शाश्वत) और वर देने वाली सरस्वती को भजता हूँ।) अनेकधा विवर्णितां त्रयीसुधास्वरूपिणीं गुहान्तगां गुणेश्वरीं गुरूत्तमां गुरुप्रियाम् । गिरेश्वरीं गुणस्तुतां निगूढबोधनावहां सरस्वतीमहं भजे सनातनीं वरप्रदाम् ॥ २ ॥ (जिनका अनेक प्रकार से वर्णन किया गया है; जो तीनों वेदों (त्रयी) की अमृत स्वरूपा हैं; जो (हृदय रूपी) गुफा के अंत तक जाने वाली हैं; जो गुणों की स्वामिनी (गुणेश्वरी) हैं; जो गुरुओं में उत्तम और गुरुओं को प्रिय हैं। जो वाणी की स्वामिनी (गिरेश्वरी) हैं; गुणों द्वारा जिनकी स्तुति की गई है; जो गूढ़ ज्ञान (निगूढ-बोध) को देने वाली हैं। मैं उस सनातनी और वर देने वाली सरस्वती को भजता हूँ।) श्रुतित्रयात्मिकां सुरां विशिष्टबुद्धिदायिनीं जगत्समस्तवासिनीं जनैः सुपूजितां सदा । गुहस्तुतां पराम्बिकां परोपकारकारिणीं सरस्वतीमहं भजे सनातनीं वरप्रदाम् ॥ ३ ॥ (जो तीनों वेदों की आत्मा हैं; जो सुर (देवी) हैं; जो विशिष्ट बुद्धि प्रदान करने वाली हैं। जो समस्त जगत में निवास करती हैं; लोग जिनकी सदा भली-भांति पूजा करते हैं। कार्तिकेय (गुह) द्वारा जिनकी स्तुति की गई है; जो परम अम्बा (माता) हैं; जो परोपकार करने वाली हैं। मैं उस सनातनी और वर देने वाली सरस्वती को भजता हूँ।) शुभेक्षणां शिवेतरक्षयङ्करीं समेश्वरीं शुचिष्मतीं च सुस्मितां शिवङ्करीं यशोमतीम् । शरत्सुधांशुभासमानरम्यवक्त्रमण्डलां सरस्वतीमहं भजे सनातनीं वरप्रदाम् ॥ ४ ॥ (जिनकी दृष्टि शुभ है; जो अमंगल (शिवेतर) का नाश करने वाली हैं; जो सबकी समान ईश्वरी (समेश्वरी) हैं। जो परम पवित्र (शुचिष्मती) हैं; जो सुंदर मुस्कान वाली (सुस्मिता) हैं; जो कल्याण करने वाली (शिवङ्करी) और यश वाली हैं। जिनका मुख-मंडल शरद ऋतु के चन्द्रमा (सुधांशु) के समान सुंदर चमक रहा है। मैं उस सनातनी और वर देने वाली सरस्वती को भजता हूँ।) सहस्रहस्तसम्युतां नु सत्यसन्धसाधितां विदां च वित्प्रदायिनीं समां समेप्सितप्रदाम् । सुदर्शनां कलां महालयङ्करीं दयावतीं सरस्वतीमहं भजे सनातनीं वरप्रदाम् ॥ ५ ॥ (जो हजारों हाथों से युक्त (अनंत शक्तिशाली) हैं; जो सत्य-प्रतिज्ञा वालों द्वारा साधी (आराधी) जाती हैं। जो ज्ञानियों (विदां) को धन/ज्ञान (वित्) देने वाली हैं; जो सम (पक्षपातरहित) हैं और सबकी इच्छाओं (ईप्सित) को पूरा करने वाली हैं। जो सुंदर दर्शन वाली हैं; जो कला स्वरूपा हैं; जो महालय (प्रलय/विश्राम) करने वाली हैं और जो दयावती हैं। मैं उस सनातनी और वर देने वाली सरस्वती को भजता हूँ।) सदीश्वरीं सुखप्रदां च संशयप्रभेदिनीं जगद्विमोहनां जयां जपासुरक्तभासुराम् । शुभां सुमन्त्ररूपिणीं सुमङ्गलासु मङ्गलां सरस्वतीमहं भजे सनातनीं वरप्रदाम् ॥ ६ ॥ (जो सत् (सत्य) की ईश्वरी हैं; जो सुख देने वाली हैं; जो संशयों को भेदने (नष्ट करने) वाली हैं। जो जगत को विमोहित करने वाली हैं; जो जया (विजय) स्वरूपा हैं; जो जपा-कुसुम (गुड़हल) के समान रक्त वर्ण की कांति से भी भासित होती हैं (शक्ति रूप में)। जो शुभ हैं; जो श्रेष्ठ मंत्र रूपिणी हैं; जो सुमंगल कार्यों में स्वयं मंगल रूपा हैं। मैं उस सनातनी और वर देने वाली सरस्वती को भजता हूँ।) मखेश्वरीं मुनिस्तुतां महोत्कटां मतिप्रदां त्रिविष्टपप्रमोददां च मुक्तिदां जनाश्रयाम् । शिवां च सेवकप्रियां मनोमयीं महाशयां सरस्वतीमहं भजे सनातनीं वरप्रदाम् ॥ ७ ॥ (जो यज्ञों की ईश्वरी (मखेश्वरी) हैं; मुनियों द्वारा जिनकी स्तुति की गई है; जो महान शक्तिशाली (महोत्कटा) हैं; जो मति (बुद्धि) देने वाली हैं। जो स्वर्ग (त्रिविष्टप) का आनंद देने वाली और मुक्ति (मोक्ष) देने वाली हैं; जो लोगों का आश्रय हैं। जो कल्याणकारी (शिवा) हैं; जो सेवकों (भक्तों) को प्रिय हैं; जो मनोमयी (मन स्वरूपा) हैं और उदार आशय वाली (महाशया) हैं। मैं उस सनातनी और वर देने वाली सरस्वती को भजता हूँ।) मुदालयां मुदाकरीं विभूतिदां विशारदां भुजङ्गभूषणां भवां सुपूजितां बुधेश्वरीम् । कृपाभिपूर्णमूर्तिकां सुमुक्तभूषणां परां सरस्वतीमहं भजे सनातनीं वरप्रदाम् ॥ ८ ॥ (जो आनंद का घर (मुदालया) हैं; जो आनंद प्रदान करती हैं; जो विभूति (ऐश्वर्य/सम्पत्ति) देने वाली हैं; जो विशारदा (अत्यंत निपुण) हैं। जो सर्पों को भूषण रूप में धारण करती हैं (शक्ति रूप में); जो संसार (भवा) स्वरूपा हैं; जो भली-भांति पूजित हैं और ज्ञानियों (बुध) की ईश्वरी हैं। जिनकी मूर्ति कृपा से परिपूर्ण है; जो मोतियों के सुंदर आभूषणों से युक्त हैं; जो परा (सर्वोच्च) हैं। मैं उस सनातनी और वर देने वाली सरस्वती को भजता हूँ।) ॥ इति श्री सरस्वती स्तवम् (विराजमान पङ्कजाम्) सम्पूर्णम् ॥

परिचय: ज्ञान की अधिष्ठात्री

यह स्तोत्र माँ सरस्वती के उस रूप का वर्णन करता है जो न केवल शांत और सौम्य है, बल्कि शक्तिशाली और ऐश्वर्यशाली भी है। इसमें उन्हें 'सहस्र-हस्त-संयुतां' (हजारों हाथों वाली) और 'भुजंग-भूषणां' (नागों को आभूषण बनाने वाली) कहा गया है, जो सामान्यतः माँ दुर्गा या शिव के रूप माने जाते हैं। यह सिद्ध करता है कि विद्या की देवी सरस्वती ही अंततः परम शक्ति (परा-शक्ति) हैं।

स्तोत्र की विशेषताएँ

  • सनातन स्वरूप: इसमें माँ को बार-बार 'सनातनी' कहा गया है। अर्थात, ज्ञान कभी नष्ट नहीं होता; वह कल भी था, आज भी है, और कल भी रहेगा।
  • भय और संशय नाशक: केवल अज्ञान नहीं, यह स्तोत्र जीवन के भय (भयापहाम्) और मन के संशयों (संशय-प्रभेदिनीं) को भी काटता है।
  • विशिष्ट वंदना: इसमें 'वि' अक्षर का बहुत सुंदर प्रयोग है - विराजमान, विभावरी, वरेण्य, विधायिनी, विश्वमातरं, विनायिका। यह 'वि' (विशेष) ज्ञान की ओर संकेत करता है।

पाठ के लाभ

इस अष्टकम के नियमित पाठ से:
  • विशिष्ट बुद्धि: साधक को साधारण नहीं, बल्कि 'विशिष्ट-बुद्धि' (Special Intelligence) की प्राप्ति होती है (श्लोक 3)।
  • सर्वत्र विजय: माँ को 'जया' (Victory) कहा गया है, अतः जीवन के हर क्षेत्र में विजय मिलती है।
  • परोपकार की भावना: यह मन में 'परोपकार' (Helping others) की भावना जगाता है, जो विद्या का असली उद्देश्य है।
  • गूढ़ ज्ञान: शास्त्रों के छिपे हुए रहस्य (निगूढ-बोध) समझ में आने लगते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. 'विराजमान-पङ्कजाम्' का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है 'शोभायमान कमल'। माँ सरस्वती ज्ञान रूपी प्रकाशमान कमल पर विराजमान हैं, जो पवित्रता और दिव्यता का प्रतीक है।

2. इस स्तोत्र में 'सनातनी' किसे कहा गया है?

प्रत्येक श्लोक के अंत में माँ को 'सनातनी' कहा गया है, जिसका अर्थ है 'शाश्वत' या 'अनादि'। वे समय से परे हैं और सदा विद्यमान रहती हैं।

3. 'त्रयी-सुधा-स्वरूपिणी' का तात्पर्य क्या है?

'त्रयी' का अर्थ है तीन वेद (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद)। माँ सरस्वती इन तीनों वेदों के सार (अमृत/सुधा) का साक्षात स्वरूप हैं।

4. क्या यह भय को दूर करता है?

हाँ, पहले ही श्लोक में माँ को 'भयापहाम्' कहा गया है, अर्थात जो सभी प्रकार के भयों (डर) का अपहरण (नाश) करती हैं।

5. 'गुहान्तगां' शब्द का क्या रहस्य है?

श्लोक 2 में 'गुहान्तगां' का अर्थ है जो हृदय-गुफा (Heart Cave) के अंत तक जाती हैं। वे हमारे अंतर्मन की गहराइयों में छिपे अज्ञान को मिटाती हैं।

6. इस स्तोत्र में माँ के कितने हाथों का वर्णन है?

श्लोक 5 में उन्हें 'सहस्र-हस्त-संयुतां' (हजारों हाथों वाली) कहा गया है। यह उनके विराट स्वरूप और अनंत शक्तियों का प्रतीक है, जिससे वे अनेकों वरदान एक साथ दे सकती हैं।

7. 'शिवेतर-क्षयङ्करी' का क्या अर्थ है?

श्लोक 4 में यह विशेषण आया है। 'शिव' का अर्थ है कल्याण। 'शिवेतर' का अर्थ है जो कल्याणकारी नहीं है (अमंगल)। अतः वे अमंगल का नाश करने वाली हैं।

8. क्या यह मोक्ष प्रदान करता है?

हाँ, श्लोक 7 में माँ को 'मुक्ति-दां' (मुक्ति देने वाली) और 'त्रिविष्टप-प्रमोद-दां' (स्वर्ग का सुख देने वाली) कहा गया है।

9. 'विशालाक्षी' का क्या अर्थ है?

यह माँ के नेत्रों की सुंदरता का वर्णन है। 'विशालाक्षी' का अर्थ है 'बड़ी-बड़ी आँखों वाली', जो करुणा और ज्ञान से भरी हुई हैं।

10. इसके पाठ का सर्वोत्तम समय क्या है?

चूंकि इसमें माँ को 'विभावरी' (रात्रि/तारों भरी रात) कहा गया है, इसे ब्रह्ममुहूर्त (भोर) या शाम के समय दीप जलाकर पढ़ना अत्यंत शुभ माना जाता है।