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Sri Saraswati Stavam (Vasudevananda) – श्री सरस्वती स्तवम् (वासुदेवानन्दसरस्वती कृतम्)

Sri Saraswati Stavam (Vasudevananda) – श्री सरस्वती स्तवम् (वासुदेवानन्दसरस्वती कृतम्)
॥ श्री सरस्वती स्तवम् (वासुदेवानन्दसरस्वती कृतम्) ॥ जुषस्व बालवाक्यवत् स्तवं ममाम्ब भारती । असत्सदप्यदस्त्वयि भ्रमाद्विभाति केवले ॥ १ ॥ (हे माँ भारती! मेरे इस स्तवन को बालक के वचनों की तरह स्वीकार करें (जैसे माता बालक की टूटी-फूटी बोली पर भी प्रसन्न होती है)। यह जगत जो सत् और असत् रूप में दिखाई देता है, वह केवल भ्रम के कारण आप (शुद्ध चैतन्य) में ही भासित हो रहा है।) क्षराक्षरात्परं हि यत्त्वमेव तत्पदं ध्रुवम् । जले यथोर्मिबुद्बुदास्तथा त्वयीशजीवदृक् ॥ २ ॥ (जो क्षर (नाशवान जगत) और अक्षर (जीवात्मा) से भी परे है, वह ध्रुव (अचल) पद आप ही हैं। जैसे जल में लहरें और बुलबुले उठते हैं, वैसे ही आप में ईश्वर, जीव और ये दृश्य जगत (दृक्) कल्पित हैं।) त्र्यधीश ओङ्कृतेऽखिलं त्वमेव चास्य मङ्गलम् । यदर्धमात्रमूर्जितं क्रियाविकारवर्जितम् ॥ ३ ॥ (आप तीनों लोकों की अधीश्वरी हैं, ओंकार (ॐ) स्वरूप हैं और इस अखिल विश्व का मंगल करने वाली हैं। आप ओंकार की वह शक्तिशाली 'अर्ध-मात्रा' हैं जो सभी क्रियाओं और विकारों से रहित (निर्विकार) है।) त्रिसप्तयागसाधिके सुभुक्तिमुक्तिदायके । स्वरार्णकारणे स्तवः स्वयं नु कैः कृतस्तव ॥ ४ ॥ (आप 21 प्रकार के यज्ञों (त्रिसप्त-याग) को सिद्ध करने वाली हैं। आप ही भोग (भुक्ति) और मोक्ष (मुक्ति) देने वाली हैं। आप ही सभी स्वरों और वर्णों (अक्षरों) का मूल कारण हैं। आपकी स्तुति स्वयं कौन कर सकता है? (आप वाणी से परे हैं)।) प्रकाशकप्रकाशके श्रुतिश्रुतादिधारके । त्वमेव सर्वकारणं त्वमेव सर्वतारणम् ॥ ५ ॥ (आप प्रकाशकों (सूर्य, चंद्र आदि) को भी प्रकाशित करने वाली हैं। आप वेदों (श्रुति) और सुने हुए ज्ञान को धारण करने वाली हैं। आप ही सबका कारण हैं और आप ही सबको तारने वाली (तारण) हैं।) सुशक्तभक्तभावितं हि तेन सर्वथा ततम् । तदेव धाम ते वरं यदीक्ष्यते बुधैः परम् ॥ ६ ॥ (श्रेष्ठ शक्ति वाले भक्तों द्वारा आपकी भावना (ध्यान) की जाती है। आपके द्वारा ही यह सब कुछ व्याप्त है। ज्ञानी जन (बुध) जिसे 'परम पद' के रूप में देखते हैं, वह आपका ही श्रेष्ठ धाम है।) स्थिराश्चराश्च गोचराः परत्र चात्र वाऽम्ब ये । त्वदेव तत्समागमः प्रमाणमत्र चागमः ॥ ७ ॥ (हे माँ! यहाँ (इस लोक में) या परलोक में, जो भी स्थिर या चर (चलने वाले) जीव इंद्रियों के विषय (गोचर) हैं, वे सब आपका ही स्वरूप/समागम हैं। इसमें वेद (आगम) ही प्रमाण हैं।) नमोऽस्तु ते सरस्वति ध्यवित्रि वाजिनीवति । प्रसीद बुद्धिचेतने स्वभक्तहृन्निकेतने ॥ ८ ॥ (हे सरस्वती! हे पवित्र करने वाली (ध्यवित्रि)! हे अन्न/बल वाली (वाजिनीवति)! आपको नमस्कार हो। हे बुद्धि में चेतना रूप से स्थित! हे अपने भक्तों के हृदय में निवास करने वाली! मुझ पर प्रसन्न होइये।) स्तुतैवं विष्णुजिह्वा सा प्रसन्ना सूनृतेरका । प्राहाविष्कृत्य चात्मानं तुष्टास्मि वरयेप्सितम् ॥ ९ ॥ (इस प्रकार स्तुति किए जाने पर, विष्णु भगवान की जिह्वा स्वरूपा, सत्य और प्रिय बोलने वाली (सूनृता), और जगत की प्रेरणा (ईरका) - माँ सरस्वती प्रसन्न हुईं। उन्होंने अपना स्वरूप प्रकट करके कहा - "मैं संतुष्ट हूँ, अपना इच्छित वर मांगो।") सकम्बलस्य कुरु मे सहायं शम्भुगायने । सुस्वरत्वादि यच्छेति ययाचेऽहिः सरस्वतीम् ॥ १० ॥ (तब उस नाग (अहि) ने सरस्वती से यह वर माँगा: "हे देवि! आप कम्बल (मेरे भाई) के साथ, शम्भु (शिव) का गायन करने में मेरी सहायता करें। हमें 'सुस्वरत्व' (मधुर स्वर) आदि प्रदान करें।") वागीशाहोभयोरस्तु दिव्यनादरहस्यमित् । स्तोत्रं चास्तु स्खलद्गीष्ट्वधीजाड्यादिहरं त्विदम् ॥ ११ ॥ (तब वागीशा (सरस्वती) ने कहा: "अहो! तुम दोनों को दिव्य नाद का रहस्य प्राप्त हो।" और यह स्तोत्र वाणी की लड़खड़ाहट (स्खलद्-गीः) तथा बुद्धि की जड़ता को हरने वाला सिद्ध हो।) ॥ इति श्रीवासुदेवानन्दसरस्वती विरचितं श्री सरस्वती स्तवम् सम्पूर्णम् ॥

परिचय: ज्ञान और संगीत का संगम

श्री वासुदेवानन्द सरस्वती (1854-1914), जिन्हें भक्त प्रेम से 'टेम्बे स्वामी' कहते हैं, दत्तात्रेय संप्रदाय के एक महान विभूति थे। उनकी रचनाओं में संस्कृत का पांडित्य और वेदांत का सार (Essence) मिलता है। यह स्तोत्र एक पौराणिक संदर्भ पर आधारित है जहाँ पाताल लोक के दो नाग - कम्बल और अश्वतर - भगवान शिव के परम भक्त थे। वे शिवजी को अपने गायन से प्रसन्न करना चाहते थे, लेकिन उनके पास 'स्वर-ज्ञान' नहीं था। तब उन्होंने माँ सरस्वती की तपस्या की थी। यह स्तोत्र उसी संवाद और माँ की कृपा का वर्णन करता है।

स्तोत्र की विशेषताएँ

  • अद्वैत दर्शन: श्लोक 2 और 5 में स्पष्ट रूप से अद्वैत वेदांत है। माँ सरस्वती को ही 'सर्व-कारण' (Cause of Everything) और 'सर्व-तारण' (Savior of All) बताया गया है।
  • नाद ब्रह्म: श्लोक 11 में 'दिव्य-नाद-रहस्य' की बात की गई है। यह स्तोत्र संगीत को केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि ईश्वर प्राप्ति का साधन (साधना) मानता है।
  • विनम्रता: पहले ही श्लोक में रचयिता कहते हैं - "हे माँ! मेरी वाणी बच्चे की बोली जैसी है, इसे स्वीकार करें।" यह सच्ची भक्ति का लक्षण है।

पाठ के लाभ

इस दिव्य स्तवन का पाठ करने से:
  • संगीत सिद्धि: गायकों और वाद्य-यंत्र बजाने वालों के लिए यह अत्यंत फलदायी है, क्योंकि इसमें 'सुस्वर' (Melodious Voice) का वरदान माँगा गया है।
  • वाक-दोष निवारण: यह हकलाना या वाणी की अन्य बाधाओं (स्खलद्-गीः) को दूर करता है।
  • बुद्धि विकास: यह मंद बुद्धि और अज्ञान (जाड्य) को नष्ट कर कुशाग्र बुद्धि प्रदान करता है।
  • आत्म-ज्ञान: वेदांत के जिज्ञासुओं को इससे आत्म-तत्व समझने में मदद मिलती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. वासुदेवानन्द सरस्वती कौन थे?

वे 19वीं-20वीं सदी के एक महान संत थे, जिन्हें 'टेम्बे स्वामी' के नाम से भी जाना जाता है। दत्त संप्रदाय में उन्हें भगवान दत्तात्रेय का अवतार माना जाता है।

2. इस स्तोत्र की पृष्ठभूमि (Context) क्या है?

श्लोक 10 में 'सकम्बलस्य' (कम्बल सहित) का उल्लेख है। यह 'कम्बल' और 'अश्वतर' नागों की कथा की ओर संकेत करता है जिन्होंने शिवजी को प्रसन्न करने के लिए सरस्वती से संगीत विद्या मांगी थी।

3. 'स्वरार्ण-कारण' का क्या अर्थ है?

श्लोक 4 में माँ को 'स्वरार्ण-कारण' कहा गया है, जिसका अर्थ है स्वरों (Sounds/Notes) और वर्णों (Letters) के समुद्र का मूल कारण।

4. क्या यह सामान्य छात्रों के लिए है?

यद्यपि यह एक दार्शनिक स्तोत्र है, लेकिन उच्च शिक्षा, संगीत और वेदांत के छात्रों के लिए यह विशेष लाभकारी है। यह 'बुद्धि-जाड्य' (बुद्धि की जड़ता) को हरता है।

5. श्लोक 3 में 'अर्ध-मात्र' का क्या महत्व है?

यहाँ 'ओंकार' (Om) की 'अर्ध-मात्रा' (बिंदु/नाद) का वर्णन है, जो समाधि की अवस्था है। माँ सरस्वती उसी तुरीय अवस्था (चौथी अवस्था) का स्वरूप हैं।

6. फलश्रुति में क्या कहा गया है?

अंतिम श्लोक (11) में कहा गया है कि यह स्तोत्र वाणी की स्खलन (लड़खड़ाहट) और बुद्धि की जड़ता (Dullness) को दूर करने वाला है।

7. 'प्रकाशक-प्रकाशके' का क्या अर्थ है?

श्लोक 5 में माँ को 'प्रकाशकों का भी प्रकाशक' कहा गया है। जैसे सूर्य जगत को रोशन करता है, वैसे ही वाणी/चेतना सूर्य को भी प्रकाशित करती है (जानती है)।

8. इस स्तोत्र में भक्ति का कौन सा भाव है?

में 'आत्म-निवेदन' और 'ज्ञान-मिश्रित भक्ति' है। रचयिता मानते हैं कि उनकी अपनी वाणी भी सरस्वती ही हैं, इसलिए स्तुति करने वाला और जिसकी स्तुति हो रही है, दोनों एक ही हैं।

9. क्या संगीत सीखने वालों को इसे पढ़ना चाहिए?

अवश्य। श्लोक 10 में 'सुस्वरत्व' (अच्छी आवाज/स्वर) की मांग की गई है, जो संगीत साधकों की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

10. 'विष्णु-जिह्वा' किसे कहा गया है?

श्लोक 9 में सरस्वती जी को 'विष्णु-जिह्वा' (भगवान विष्णु की जीभ/वाणी) कहा गया है, क्योंकि वे ही सत्य और धर्म का उपदेश करने वाली शक्ति हैं।